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अंग 1208

अंग
1208
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सगल पदारथ सिमरनि जा कै आठ पहर मेरे मन जापि ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु सुआमी तेरा जो पीवै तिस ही त्रिपतास ॥
जनम जनम के किलबिख नासहि आगै दरगह होइ खलास ॥1॥
सरनि तुमारी आइओ करते पारब्रहम पूरन अबिनास ॥
करि किरपा तेरे चरन धिआवउ नानक मनि तनि दरस पिआस ॥2॥5॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से सारे पदार्थ मिलते हैं (गुरू की शरण पड़ करी) आठों पहर उसका नाम जपा कर । 1। रहाउ। हे मालिक प्रभू ! आपका नाम आत्मिक-जीवन वाला है। जो मनुष्य (यह नाम जल) पीता है। उसको शांति मिलती है। उसके अनेकों जन्मों के पाप नाश हो जाते हैं। आगे (आपकी) हजूरी में उसको मुक्ति हासिल होती है। 1। हे करतार ! हे पारब्रहम ! हे सर्व-व्यापक ! हे नाश-रहित ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मेहर कर। मैं (सदा) आपके चरणों में ध्यान धरता रहॅूँ। मुझ नानक के मन में हृदय में (आपके) दर्शन की तमन्ना है। 2। 5। 19।
सारग महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन कहा लुभाईऐ आन कउ ॥
ईत ऊत प्रभु सदा सहाई जीअ संगि तेरे काम कउ ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु प्रिअ प्रीति मनोहर इहै अघावन पांन कउ ॥
अकाल मूरति है साध संतन की ठाहर नीकी धिआन कउ ॥1॥
बाणी मंत्रु महा पुरखन की मनहि उतारन मांन कउ ॥
खोजि लहिओ नानक सुख थानां हरि नामा बिस्राम कउ ॥2॥1॥20॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 घरु 3 सतिगुर प्रसादि ॥ हे मन ! और और पदार्थों की खातिर लोभ में नहीं फसना चाहिए। इस लोक में और परलोक में परमात्मा (ही) सदा सहायता करने वाला है। और। जिंद के साथ रहने वाला है। हे मन ! वह प्रभू ही आपकी काम आने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! मन को मोहने वाले प्यारे प्रभू की प्रीति। प्रभू का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल – यह ही पीना तृप्ति देने के लिए है। हे भाई ! अकाल-मूरति प्रभू का ध्यान धरने के लिए साध-संगति ही सुंदर जगह है। 1। हे भाई ! महापुरुषों की बाणी। महापुरुखों का उपदेश ही मन का मान दूर करने में समर्थ है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) आत्मिक शांति के लिए परमात्मा का नाम ही सुखों की जगह है (यह जगह साध-संगति में) खोज करने से मिलती है। 2। 1। 20।
सारग महला 5 ॥
मन सदा मंगल गोबिंद गाइ ॥
रोग सोग तेरे मिटहि सगल अघ निमख हीऐ हरि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
छोडि सिआनप बहु चतुराई साधू सरणी जाइ पाइ ॥
जउ होइ क्रिपालु दीन दुख भंजन जम ते होवै धरम राइ ॥1॥
एकस बिनु नाही को दूजा आन न बीओ लवै लाइ ॥
मात पिता भाई नानक को सुखदाता हरि प्रान साइ ॥2॥2॥21॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरे) मन ! सदा परमात्मा की सिफॅतसालाह के गीत गाया कर। हे भाई ! अगर आप आँख झपकने जितने समय के लिए हृदय में हरी का नाम सिमरे। तो आपके सारे रोग सारी चिंता-फिकर सारे पाप दूर हैं जाएं। 1। रहाउ। हे भाई ! अपनी बहुत चतुराई-समझदारी छोड़ के (यह ख्याल दूर कर के कि आप बहुत समझदार और बुद्धिमान है) गुरू की शरण जा पड़। जब गरीबों का दुख नाश करने वाला प्रभू (किसी पर) दयावान होता है। तो (उस मनुष्य के लिए) जमराज से धर्मराज बन जाता है (पवरलोक में मनुष्य को जमों का कोई डर नहीं रह जाता)। 1। हे भाई ! एक परमात्मा के बिना कोई और (हम जीवों का रखवाला) नहीं। कोई और दूसरा उस परमात्मा की बराबरी नहीं कर सकता। नानक का तो वह परमात्मा ही माता-पिता-भाई और प्राणों को सुख देने वाला है। 2। 2। 21।
सारग महला 5 ॥
हरि जन सगल उधारे संग के ॥
भए पुनीत पवित्र मन जनम जनम के दुख हरे ॥1॥ रहाउ ॥
मारगि चले तिन॑ी सुखु पाइआ जिन॑ सिउ गोसटि से तरे ॥
बूडत घोर अंध कूप महि ते साधू संगि पारि परे ॥1॥
जिन॑ के भाग बडे है भाई तिन॑ साधू संगि मुख जुरे ॥
तिन॑ की धूरि बांछै नित नानकु प्रभु मेरा किरपा करे ॥2॥3॥22॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के संतजन (अपने) साथ बैठने वाले सभी को संसार-समुंद्र से पार लंघा लेते हैं। (संतजनों की संगति करने वाले मनुष्य) पवित्र मन वाले ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं। उनके अनेकों जन्मों के दुख दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य (साध-संगति के) रास्ते पर चलते हें। वे सुख-आनंद पाते हैं। जिनपके साथ संत जनों का उठना-बैठना हो जाता है वे (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। जो मनुष्य (माया के मोह के) घोर अंधेरे कूएँ में डूबे रहते हैं वे भी साध-संगति की बरकति से पार लांघ जाते हैं। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों के अहो भाग्य (जागते) हैं। उनके मुँह साध-संगति में जुड़ते हैं (वे मनुष्य साध-संगति में सत्संगियों के साथ मिलते हैं)। नानक उनके चरणों की धूड़ सदा माँगता है (पर। यह तब ही मिल सकती है। जब) मेरा प्रभू मेहर करे। 2। 3। 22।
सारग महला 5 ॥
हरि जन राम राम राम धिआंए ॥
एक पलक सुख साध समागम कोटि बैकुंठह पांए ॥1॥ रहाउ ॥
दुलभ देह जपि होत पुनीता जम की त्रास निवारै ॥
महा पतित के पातिक उतरहि हरि नामा उरि धारै ॥1॥
जो जो सुनै राम जसु निरमल ता का जनम मरण दुखु नासा ॥
कहु नानक पाईऐ वडभागंी मन तन होइ बिगासा ॥2॥4॥23॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के भगत सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते हैं। साध-संगति के पल भर के सुख (को ऐसे समझते हैं कि) करोड़ों बैकुंठ हासिल कर लिए हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाता है। नाम ज पके उसका दुर्लभ मनुष्य-शरीर पवित्र हो जाता है। (नाम उसके अंदर से) जमों का डर दूर कर देता है। हे भाई ! नाम की बरकति से बड़े-बड़े विकारियों के पाप उतर जाते हैं। 1। हे भाई ! जो जो मनुष्य परमात्मा की पवित्र सिफत-सालाह सुनता है। उसका सारी उम्र का दुख नाश हो जाता है। हे नानक ! कह- (यह सिफतसालाह) बहुत भाग्यों से मिलती है (जिनको मिलती है उनके) मनों में तनों में खिड़ाव पैदा हो जाता है। 2। 4। 23।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से सारे पदार्थ मिलते हैं (गुरू की शरण पड़ करी) आठों पहर उसका नाम जपा कर।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।