अंम्रित नामु सुआमी तेरा जो पीवै तिस ही त्रिपतास ॥
जनम जनम के किलबिख नासहि आगै दरगह होइ खलास ॥1॥
सरनि तुमारी आइओ करते पारब्रहम पूरन अबिनास ॥
करि किरपा तेरे चरन धिआवउ नानक मनि तनि दरस पिआस ॥2॥5॥19॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन कहा लुभाईऐ आन कउ ॥
ईत ऊत प्रभु सदा सहाई जीअ संगि तेरे काम कउ ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रित नामु प्रिअ प्रीति मनोहर इहै अघावन पांन कउ ॥
अकाल मूरति है साध संतन की ठाहर नीकी धिआन कउ ॥1॥
बाणी मंत्रु महा पुरखन की मनहि उतारन मांन कउ ॥
खोजि लहिओ नानक सुख थानां हरि नामा बिस्राम कउ ॥2॥1॥20॥
मन सदा मंगल गोबिंद गाइ ॥
रोग सोग तेरे मिटहि सगल अघ निमख हीऐ हरि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
छोडि सिआनप बहु चतुराई साधू सरणी जाइ पाइ ॥
जउ होइ क्रिपालु दीन दुख भंजन जम ते होवै धरम राइ ॥1॥
एकस बिनु नाही को दूजा आन न बीओ लवै लाइ ॥
मात पिता भाई नानक को सुखदाता हरि प्रान साइ ॥2॥2॥21॥
हरि जन सगल उधारे संग के ॥
भए पुनीत पवित्र मन जनम जनम के दुख हरे ॥1॥ रहाउ ॥
मारगि चले तिन॑ी सुखु पाइआ जिन॑ सिउ गोसटि से तरे ॥
बूडत घोर अंध कूप महि ते साधू संगि पारि परे ॥1॥
जिन॑ के भाग बडे है भाई तिन॑ साधू संगि मुख जुरे ॥
तिन॑ की धूरि बांछै नित नानकु प्रभु मेरा किरपा करे ॥2॥3॥22॥
हरि जन राम राम राम धिआंए ॥
एक पलक सुख साध समागम कोटि बैकुंठह पांए ॥1॥ रहाउ ॥
दुलभ देह जपि होत पुनीता जम की त्रास निवारै ॥
महा पतित के पातिक उतरहि हरि नामा उरि धारै ॥1॥
जो जो सुनै राम जसु निरमल ता का जनम मरण दुखु नासा ॥
कहु नानक पाईऐ वडभागंी मन तन होइ बिगासा ॥2॥4॥23॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! जिस परमात्मा के सिमरन की बरकति से सारे पदार्थ मिलते हैं (गुरू की शरण पड़ करी) आठों पहर उसका नाम जपा कर।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।