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अंग 1207

अंग
1207
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चितवनि चितवउ प्रिअ प्रीति बैरागी कदि पावउ हरि दरसाई ॥
जतन करउ इहु मनु नही धीरै कोऊ है रे संतु मिलाई ॥1॥
जप तप संजम पुंन सभि होमउ तिसु अरपउ सभि सुख जांई ॥
एक निमख प्रिअ दरसु दिखावै तिसु संतन कै बलि जांई ॥2॥
करउ निहोरा बहुतु बेनती सेवउ दिनु रैनाई ॥
मानु अभिमानु हउ सगल तिआगउ जो प्रिअ बात सुनाई ॥3॥
देखि चरित्र भई हउ बिसमनि गुरि सतिगुरि पुरखि मिलाई ॥
प्रभ रंग दइआल मोहि ग्रिह महि पाइआ जन नानक तपति बुझाई ॥4॥1॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे वीर ! मैं प्यार की प्रीति से वैरागनि होई हुई हूँ। मैं (हर समय यह) सोच सोचती रहती हूँ कि मैं हरी के दर्शन कब करूँगी। (इस मन को धीरज देने के लिए) मैं यतन करती रहती हूँ। पर ये मन धैर्य नहीं धरता। हे वीर ! कोई ऐसा भी संत है जो मुझे प्रभू से मिला दे। 1। हे वीर ! मैं सारे जप सारे तप सारे संजम सारे पुन्य कुर्बान कर दूँ। सारे सुखों के साधन (प्यारे-प्रभू से मिलने के लिए संत के आगे) भेटा रख दूँगी। हे वीर ! यदि कोई आँख झपकने जितने समय के लिए ही मुझे प्यारे के दर्शन करवा दे। तो मैं उस प्यारे के उन संतों के सदके कुर्बान जाऊँ। 2। मैं उसके आगे बहुत तरला करूँगी। विनती करूँगी। मैं दिन-रात उसकी सेवा करूँगी। हे वीर ! जो कोई संत मुझे प्यारे प्रभू की सिफतसालाह की बात सुनाए। मैं उसके आगे अपना सारा मान अहंकार त्याग दूँगी। 3। हे दास नानक ! (कह- हे वीर !) मैं यह करिश्मा देख के हैरान हो गई कि गुरू ने सतिगुरू ने मुझे अकाल-पुरख (के चरणों) में जोड़ दिया। दया का श्रोत प्यार-स्वरूप परमात्मा मैंने अपने हृदय-घर में पा लिया। (और। मेरे अंदर से माया वाली सारी) तपश मिट गई। 4। 1। 15।
सारग महला 5 ॥
रे मूड़॑े तू किउ सिमरत अब नाही ॥
नरक घोर महि उरध तपु करता निमख निमख गुण गांही ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक जनम भ्रमतौ ही आइओ मानस जनमु दुलभाही ॥
गरभ जोनि छोडि जउ निकसिओ तउ लागो अन ठांही ॥1॥
करहि बुराई ठगाई दिनु रैनि निहफल करम कमाही ॥
कणु नाही तुह गाहण लागे धाइ धाइ दुख पांही ॥2॥
मिथिआ संगि कूड़ि लपटाइओ उरझि परिओ कुसमांही ॥
धरम राइ जब पकरसि बवरे तउ काल मुखा उठि जाही ॥3॥
सो मिलिआ जो प्रभू मिलाइआ जिसु मसतकि लेखु लिखांही ॥
कहु नानक तिन॑ जन बलिहारी जो अलिप रहे मन मांही ॥4॥2॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला ॥ हे मूर्ख ! अब (जनम ले के) आप क्यों परमात्मा को नहीं सिमरता। (जब) आप भयानक नर्क (जैसे माँ के पेट) में (था तब आप) उल्टा (लटका हुआ) तप करता था। (वहाँ आप) हर वक्त परमात्मा के गुण गाता था। 1। रहाउ। हे मूर्ख ! आप अनेकों ही जन्मों में भटकता आया है। अब आपको दुर्लभ मनुष जन्म मिला है। पर माँ का पेट छोड़ के जब आप जगत में आ गया। तब आप (सिमरन को छोड़ के) और-और जगहों में व्यस्त हैं गया। 1। हे मूर्ख ! आप दिन-रात बुराईयाँ करता है। ठॅगीयां करता है। आप सदा वही काम करता रहता है जिनसे कुछ भी हाथ नहीं आता। (देख जो किसान उन) तूहों को गाहते रहते हैं। जिनमें दाने नहीं होते। वे दौड़-दौड़ के दुख (ही) पाते हैं। हे कमले ! आप नाशवंत माया के संग नाशवंत जगत के साथ चिपका रहता है। आप कुसंभ के फूलों के साथ ही प्यार डाले बैठा है। जब आपको धर्मराज आ के पकड़ेगा (जब मौत आ गई) तब (बुरे कामों की) कालिख़ ही मुँह पर लगवा के (यहाँ से) चला जाएगा। 3। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश।) वह मनुष्य (ही परमात्मा को) मिलता है जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं मिलाता है। जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभू-मिलाप के) लेख लिखे होते हैं। हे नानक ! कह- मैं उन मनुष्यों से कुर्बान जाता हूँ। जो (प्रभू-मिलाप की बरकति से) मन में (माया से) निर्लिप रहते हैं। 4। 2। 16।
सारग महला 5 ॥
किउ जीवनु प्रीतम बिनु माई ॥
जा के बिछुरत होत मिरतका ग्रिह महि रहनु न पाई ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ हंीअ प्रान को दाता जा कै संगि सुहाई ॥
करहु क्रिपा संतहु मोहि अपुनी प्रभ मंगल गुण गाई ॥1॥
चरन संतन के माथे मेरे ऊपरि नैनहु धूरि बांछाइंी ॥
जिह प्रसादि मिलीऐ प्रभ नानक बलि बलि ता कै हउ जाई ॥2॥3॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ उस प्रीतम प्रभू की याद के बिना आत्मिक जीवन हासिल नहीं हो सकता। हे (मेरी) माँ ! जिस परमात्मा की जोति शरीर से विछुड़ने से शरीर मुर्दा हो जाता है। (और मुर्दा शरीर) घर में टिका नहीं रह सकता। 1। जो (सब जीवों को) जिंद (प्राण) देने वाला है हृदय देने वाला है प्राण देने वाला है। और। जिसकी संगति में ही (यह शरीर) सुंदर लगता है। हे संत जनो ! मेरे पर अपनी मेहर करो। मैं उस परमात्मा के गुण सिफत-सालाह के गीत गाता रहूँ। 1। हे माँ ! मेरी तमन्ना है कि संत जनों के चरण मेरे माथे पर टिके रहें। संत-जनों के चरणों की धूल मेरी आँखों को लगती रहे। हे नानक ! (कह-) जिन संत-जनों की कृपा से परमात्मा को मिला जा सकता है। मैं उनसे सदके जाता हूँ। 2। 3। !7।
सारग महला 5 ॥
उआ अउसर कै हउ बलि जाई ॥
आठ पहर अपना प्रभु सिमरनु वडभागी हरि पांई ॥1॥ रहाउ ॥
भलो कबीरु दासु दासन को ऊतमु सैनु जनु नाई ॥
ऊच ते ऊच नामदेउ समदरसी रविदास ठाकुर बणि आई ॥1॥
जीउ पिंडु तनु धनु साधन का इहु मनु संत रेनाई ॥
संत प्रतापि भरम सभि नासे नानक मिले गुसाई ॥2॥4॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! मैं उस अवसर के सदके जाता हूँ (जब मुझे संत जनों की संगति प्राप्त हुई)। (अब मुझे) आठों पहर अपने प्रभू का सिमरन (मिल गया है)। और बहुत भाग्यों से मैंने हरी को पा लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! कबीर (परमात्मा के) दासों का दास बन के भला बन गया। सैण नाई संत जनों का दास बन के उक्तम जीवन वाला हो गया। (संत जनों की संगत से) नामदेव ऊँचे से ऊँचे जीवन वाला बना। और सबमें परमात्मा की जोति देखने वाला बन गया। (संत जनों की कृपा से ही) रविदास की परमात्मा से प्रीति बन गई। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरी यह जिंद। मेरा यह शरीर। ये तन। ये धन – सब कुछ संत जनों का हो चुका है। मेरा यह मन संत जनों के चरणों की धूड़ बना रहता है। संत जनों के प्रताप से सारे भरम नाश हो जाते हैं और जगत का पति प्रभू मिल जाता है। 2। 4। 18।
सारग महला 5 ॥
मनोरथ पूरे सतिगुर आपि ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ (शरण पड़े मनुष्य की) सारी आवश्यक्ताएं गुरू स्वयं पूरी करता है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे वीर ! मैं प्यार की प्रीति से वैरागनि होई हुई हूँ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।