लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1206 · सारंग

इस पृष्ठ पर
अंग
1206
सारंग
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. खोजत खोजत इहै बीचारिओ सरब सुखा हरि नामा ॥
  2. अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥
  3. बलिहारी गुरदेव चरन ॥
  4. गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥
  5. कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

खोजत खोजत इहै बीचारिओ सरब सुखा हरि नामा ॥

अंग 1205 से चला आ रहा अंश

खोजत खोजत इहै बीचारिओ सरब सुखा हरि नामा ॥
कहु नानक तिसु भइओ परापति जा कै लेखु मथामा ॥4॥11॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक! कहें: खोज करते-करते (हमने) यही विचार की है कि परमात्मा का नाम (ही) सारे सुख देने वाला है। पर यह हरी-नाम उस मनुष्य को मिलता है जिसके माथे पर (हरी-नाम की प्राप्ति का) लेख (जागता) है। 4। 11।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥

सारग महला 5 ॥
अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥
सगल पदारथ सरब सूख सिधि मन बांछत फल लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
आवहु संत प्रान सुखदाते सिमरह प्रभु अबिनासी ॥
अनाथह नाथु दीन दुख भंजन पूरि रहिओ घट वासी ॥1॥
गावत सुनत सुनावत सरधा हरि रसु पी वडभागे ॥
कलि कलेस मिटे सभि तन ते राम नाम लिव जागे ॥2॥
कामु क्रोधु झूठु तजि निंदा हरि सिमरनि बंधन तूटे ॥
मोह मगन अहं अंध ममता गुर किरपा ते छूटे ॥3॥
तू समरथु पारब्रहम सुआमी करि किरपा जनु तेरा ॥
पूरि रहिओ सरब महि ठाकुरु नानक सो प्रभु नेरा ॥4॥12॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! आएँ। हम हर वक्त परमात्मा के गुण गाते रहें। (गुण-गान की बरकति से) हे भाई! आएँ, सारे पदार्थ, सारे सुख, सारी सिद्धियां। सारे मन-माँगे फल हासिल करें। 1। रहाउ। हे संत जनो! आएँ। हम प्राण-दाते सुख-दाते अविनाशी प्रभू (का नाम) सिमरें। वह प्रभू अनाथों का नाथ है। वह प्रभू गरीबों के दुखों का नाश करने वाला है। वह प्रभू सब जगह व्यापक है। वह प्रभू सारे शरीरों में मौजूद है। 1। हे संत जनो! परमात्मा के गुण श्रद्धा से गाते सुनते-सुनते परमात्मा का नाम-रस पी के बहुत भाग्यशाली बन जाया जाता हैं हे संत जनो! जो मनुष्य परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ के (विकारों के हमलों से सदा) सचेत रहते हैं। उनके शरीर में से सारे झगड़े सारे दुख मिट जाते हैं। 2। हे संत जनो! काम क्रोध झूठ निंदा छोड़ के परमात्मा का नाम सिमरन से (मनुष्य के अंदर से माया के मोह की सारी) फाहियां टूट जाती हैं। मोह में डूबे रहना। अहंकार में अंधे हुए रहना। माया के कब्जे की लालसा, यह सारे गुरू की कृपा से (मनुष्य के अंदर से) खत्म हो जाते हैं। 3। हे पारब्रहम! हे स्वामी! आप सब ताकतों के मालिक हैं (मेरे पर) मेहर करें (मुझे अपने नाम सिमरन की ख़ैर दें। मैं) आपका दास हूँ। हे नानक! (कहें: हे भाई!) मालिक-प्रभू सब जीवों में व्यापक है। वह प्रभू सबके नजदीक बसता है। 4। 12।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

बलिहारी गुरदेव चरन ॥

सारग महला 5 ॥
बलिहारी गुरदेव चरन ॥
जा कै संगि पारब्रहमु धिआईऐ उपदेसु हमारी गति करन ॥1॥ रहाउ ॥
दूख रोग भै सगल बिनासे जो आवै हरि संत सरन ॥
आपि जपै अवरह नामु जपावै वड समरथ तारन तरन ॥1॥
जा को मंत्रु उतारै सहसा ऊणे कउ सुभर भरन ॥
हरि दासन की आगिआ मानत ते नाही फुनि गरभ परन ॥2॥
भगतन की टहल कमावत गावत दुख काटे ता के जनम मरन ॥
जा कउ भइओ क्रिपालु बीठुला तिनि हरि हरि अजर जरन ॥3॥
हरि रसहि अघाने सहजि समाने मुख ते नाही जात बरन ॥
गुर प्रसादि नानक संतोखे नामु प्रभू जपि जपि उधरन ॥4॥13॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई! (मैं अपने) गुरू के चरणों से बलिहार जाता हूँ। जिसका उपदेश हम जीवों की ऊँची आत्मि्क दशा बना देता है। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य हरी के संत गुरदेव की शरण पड़ता है। उसके सारे दुख सारे रोग सारे डर नाश हो जाते हैं। वह मनुष्य बड़ी समर्था वाले हरी का। सबको संसार-समुंद्र से पार लंघाने योग्य हरी का नाम स्वयं जपता है व औरों को जपाता है। 1। हे भाई! (मैं अपने गुरू के चरणों से बलिहार जाता हूँ) जिसका उपदेश मनुष्य का सहम दूर कर देता है जो गुरू आत्मिक जीवन से वंचित मनुष्यों को नाको-नाक भर देता है। (हे भाई!) जो मनुष्य हरी के दासों की रज़ा में चलते हैं। वे दोबारा जनम-मरन के चक्करों में नहीं पड़ते। 2। हे भाई! संत-जनों की सेवा करते हुए परमात्मा के गुण गाते हुए (गुरू) उनके जनम-मरण के सारे दुख काट देता है। (गुरू की कृपा से) जिस मनुष्य पर माया से निर्लिप प्रभू दयावान होता है। उस मनुष्य ने सदा जवान रहने वाले (जरा रहि अर्थात जिसे बुढ़ापा नहीं आता। उस) परमात्मा को अपने हृदय में बसा लिया है। 3। हे नानक! जो मनुष्य ने गुरू की कृपा से परमात्मा के नाम-रस से तृप्त हो जाते हैं। आत्मिक अडोलता में लीन हो जाते हैं (उनकी ऊँची आत्मिक अवस्था) मुँह से बयान नहीं की जा सकती। वे मनुष्य प्रभू का नाम ज पके संतोषी जीवन वाले हो जाते हैं। वे मनुष्य प्रभू का नाम ज पके संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 4। 13।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥

सारग महला 5 ॥
गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥
भले संजोग भले दिन अउसर जउ गोपालु रीझाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
संतह चरन मोरलो माथा ॥
हमरे मसतकि संत धरे हाथा ॥1॥
साधह मंत्रु मोरलो मनूआ ॥
ता ते गतु होए त्रै गुनीआ ॥2॥
भगतह दरसु देखि नैन रंगा ॥
लोभ मोह तूटे भ्रम संगा ॥3॥
कहु नानक सुख सहज अनंदा ॥
खोलि॑ भीति मिले परमानंदा ॥4॥14॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे बहिन! मैं भी उस गुणों के खजाने प्रभू के सिफत-सालाह के गीत गा रही हूँ। हे बहिन! (प्राणों के लिए वह) भले सबब होते हैं। भाग्यशाली दिन होते हैं। सुंदर समय होते हैं। जब (कोई जिंद) सृष्टि के पालनहार प्रभू को प्रसन्न कर ले। 1। रहाउ। हे बहिन! मेरा माथा अब संतजनों के चरणों पर है। मेरे माथे पर संत-जनों ने अपने हाथ रखे हैं, (मेरे लिए यह बहुत भाग्यशाली समय है)। 1। हे बहिन! गुरू का उपदेश मेरे अंजान मन में आ बसा है। उसकी बरकति से (मेरे अंदर से) माया के तीनों ही गुणों का प्रभाव दूर हो गया है। 2। हे बहिन! संतजनों के दर्शन करके मेरी आँखों में (ऐसा) प्रेम पैदा हो गया है कि लोभ मोह भटकना का साथ (मेरे अंदर से) समाप्त हो गया है। 3। हे नानक! कहें: (अब मेरे अंदर) आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने हुए हैं। (हे बहिन! मेरे अंदर से अहंकार की) दीवार तोड़ के सबसे ऊँचे आनंद के मालिक-प्रभू जी मुझे मिल गए हैं 4। 14।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग सारंग

कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सारग महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥
दरसन पिआस प्रिअ प्रीति मनोहर मनु न रहै बहु बिधि उमकाई ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे वीर! मैं अपने दिल की पीड़ा कैसे बगयान करूँ। (नहीं बयान कर सकती)। मेरे अंदर मन को मोह लेने वाले प्यारे प्रभू की प्रीति है उसके दर्शनों की तमन्ना है (दर्शन के बिना मेरा) मन धीरज नहीं धरता। (मेरे अंदर) कई तरीकों से उमंग उठ रही है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1206 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।