कहु नानक तिसु भइओ परापति जा कै लेखु मथामा ॥4॥11॥
अनदिनु राम के गुण कहीऐ ॥
सगल पदारथ सरब सूख सिधि मन बांछत फल लहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
आवहु संत प्रान सुखदाते सिमरह प्रभु अबिनासी ॥
अनाथह नाथु दीन दुख भंजन पूरि रहिओ घट वासी ॥1॥
गावत सुनत सुनावत सरधा हरि रसु पी वडभागे ॥
कलि कलेस मिटे सभि तन ते राम नाम लिव जागे ॥2॥
कामु क्रोधु झूठु तजि निंदा हरि सिमरनि बंधन तूटे ॥
मोह मगन अहं अंध ममता गुर किरपा ते छूटे ॥3॥
तू समरथु पारब्रहम सुआमी करि किरपा जनु तेरा ॥
पूरि रहिओ सरब महि ठाकुरु नानक सो प्रभु नेरा ॥4॥12॥
बलिहारी गुरदेव चरन ॥
जा कै संगि पारब्रहमु धिआईऐ उपदेसु हमारी गति करन ॥1॥ रहाउ ॥
दूख रोग भै सगल बिनासे जो आवै हरि संत सरन ॥
आपि जपै अवरह नामु जपावै वड समरथ तारन तरन ॥1॥
जा को मंत्रु उतारै सहसा ऊणे कउ सुभर भरन ॥
हरि दासन की आगिआ मानत ते नाही फुनि गरभ परन ॥2॥
भगतन की टहल कमावत गावत दुख काटे ता के जनम मरन ॥
जा कउ भइओ क्रिपालु बीठुला तिनि हरि हरि अजर जरन ॥3॥
हरि रसहि अघाने सहजि समाने मुख ते नाही जात बरन ॥
गुर प्रसादि नानक संतोखे नामु प्रभू जपि जपि उधरन ॥4॥13॥
गाइओ री मै गुण निधि मंगल गाइओ ॥
भले संजोग भले दिन अउसर जउ गोपालु रीझाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
संतह चरन मोरलो माथा ॥
हमरे मसतकि संत धरे हाथा ॥1॥
साधह मंत्रु मोरलो मनूआ ॥
ता ते गतु होए त्रै गुनीआ ॥2॥
भगतह दरसु देखि नैन रंगा ॥
लोभ मोह तूटे भ्रम संगा ॥3॥
कहु नानक सुख सहज अनंदा ॥
खोलि॑ भीति मिले परमानंदा ॥4॥14॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कैसे कहउ मोहि जीअ बेदनाई ॥
दरसन पिआस प्रिअ प्रीति मनोहर मनु न रहै बहु बिधि उमकाई ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह- खोज करते-करते (हमने) यही विचार की है कि परमात्मा का नाम (ही) सारे सुख देने वाला है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।