चरणी चलउ मारगि ठाकुर कै रसना हरि गुण गाए ॥2॥ देखिओ द्रिसटि सरब मंगल रूप उलटी संत कराए ॥ पाइओ लालु अमोलु नामु हरि छोडि न कतहू जाए ॥3॥ कवन उपमा कउन बडाई किआ गुन कहउ रीझाए ॥ होत क्रिपाल दीन दइआ प्रभ जन नानक दास दसाए ॥4॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: पैरों से उस मालिक-प्रभू के राह पर चलता हूँ। मेरी जीभ उसके गुण गाती रहती है। 2। हे भाई ! जब संतजनों ने मेरी बिरती माया की ओर से पलट दी है। मैंने अपनी आँखों से उस सारी खूबियों के मालिक-हरी को देख लिया है। मैंने परमात्मा का कीमती अमूल्य नाम पा लिया है। उस को छोड़ के (मेरा मन अब) और किसी भी तरफ नहीं जाता। 3। हे भाई ! उस परमात्मा की कौन सी सिफत करूँ। कौन सी महिमा बयान करूँ। कौन से गुण बताऊँ। जिस के करने से वह मेरे ऊपर प्रसन्न हो जाए। हे दास नानक ! दीनों पर दया करने वाला प्रभू स्वयं ही जिस पर दयावान होता है। उसको अपने दासों का दास बना लेता है। 4। 8।
सारग महला 5 ॥ ओुइ सुख का सिउ बरनि सुनावत ॥ अनद बिनोद पेखि प्रभ दरसन मनि मंगल गुन गावत ॥1॥ रहाउ ॥ बिसम भई पेखि बिसमादी पूरि रहे किरपावत ॥ पीओ अंम्रित नामु अमोलक जिउ चाखि गूंगा मुसकावत ॥1॥ जैसे पवनु बंध करि राखिओ बूझ न आवत जावत ॥ जा कउ रिदै प्रगासु भइओ हरि उआ की कही न जाइ कहावत ॥2॥ आन उपाव जेते किछु कहीअहि तेते सीखे पावत ॥ अचिंत लालु ग्रिह भीतरि प्रगटिओ अगम जैसे परखावत ॥3॥ निरगुण निरंकार अबिनासी अतुलो तुलिओ न जावत ॥ कहु नानक अजरु जिनि जरिआ तिस ही कउ बनि आवत ॥4॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ उन सुखों का बया किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता। हे भाई ! प्रभू के दर्शन करते हुए प्रभू के गुण गाते हुए मन में जो खुशिायाँ पैदा होती हैं जो आनंद-करिश्मे पैदा होते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! उस आश्चर्य-रूप और कृपा के श्रोत सर्व-व्यापक प्रभू के दर्शन करके मैं हैरान हो गई हूँ। जब मैंने उसका आत्मिक जीवन देने वाला अमल्य नाम-जल पीया (तब मेरी हालत ऐसे हो गई) जैसे कोई गूँगा मनुष्य (गुड़ वगैरा) चख के (सिर्फ) मुस्कराता ही है। (स्वाद बता नहीं सकता)। 1। हे भाई ! जैसे (कोई जोगी) अपने प्राण रोक लेता है। उनके आने-जाने की (किसी और को) समझ नहीं पड़ सकती (इसी तरह) जिस मनुष्य के दिल में परमात्मा का प्रकाश हो जाता है। उस मनुष्य की आत्मिक दशा बयान नहीं की जा सकती। 2। हे भाई ! (दुनियावी गुण सीखने के लिए) अन्य जितने भी यतन बताए जाते हैं। वे (और से) सीखने से ही सीखे जा सकते हैं। पर चिंता दूर करने वाला सुंदर प्रभू मनुष्य के हृदय-घर के अंदर ही प्रकट हो जाता है (जिसके दिल में प्रकट होता है। उसकी) करनी कठिन सा काम है। 3। हे भाई ! परमात्मा माया के तीन गुणों की पहुँच से परे है। परमात्मा का कोई स्वरूप बताया नहीं जा सकता। परमात्मा नाश-रहित है। वह अतोल है। उसको तोला नहीं जा सकता। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य ने उस सदा जवान रहने वाले (बुढ़ापा-रहत) परमात्मा को अपने मन में बसा लिया। उसकी आत्मिक दशा वह स्वयं ही जानता है (बयान नहीं की जा सकती)। 4। 9।
सारग महला 5 ॥ बिखई दिनु रैनि इव ही गुदारै ॥ गोबिंदु न भजै अहंबुधि माता जनमु जूऐ जिउ हारै ॥1॥ रहाउ ॥ नामु अमोला प्रीति न तिस सिउ पर निंदा हितकारै ॥ छापरु बांधि सवारै त्रिण को दुआरै पावकु जारै ॥1॥ कालर पोट उठावै मूंडहि अंम्रितु मन ते डारै ॥ ओढै बसत्र काजर महि परिआ बहुरि बहुरि फिरि झारै ॥2॥ काटै पेडु डाल परि ठाढौ खाइ खाइ मुसकारै ॥ गिरिओ जाइ रसातलि परिओ छिटी छिटी सिर भारै ॥3॥ निरवैरै संगि वैरु रचाए पहुचि न सकै गवारै ॥ कहु नानक संतन का राखा पारब्रहमु निरंकारै ॥4॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! विषयी मनुष्य इसी तरह (विकारों में) ही दिन-रात (अपनी उम्र) गुजारता है। (विषयी मनुष्य) परमात्मा का भजन नहीं करता। अहंकार में मस्ताया हुआ (अपना मानस) जनम (यूँ) हार जाता है जैसे (जुआरिआ) जूए में (बाज़ी हारता है)। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम बहुत ही कीमती है (विषयी मनुष्य) उसके साथ प्यार नहीं डालता। दूसरों की निंदा करने में रुचि रखता है। (विषयी मनुष्य। मानो) तिनकों का छप्पर बना के (उसको) सजाता रहता है (पर उसके) दरवाजे पर आग जला देता है (जिस कारण हर वक्त उसके जलने का खतरा बना रहता है)। 1। हे भाई ! (विकारों में फसा हुआ मनुष्य। मानो) कलॅर की पोटली (अपने) सिर पर उठाए फिरता है। और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (अपने) मन में से (बाहर) फेंक देता है। कालिख (-भरे कमरे) में बैठा हुआ (सफेद) कपड़े पहनता है और (कपड़ों पर पड़ी कालिख़ को) बार-बार झाड़ता रहता ड्ढहै। 2। हे भाई ! (विकारों में फसा हुआ मनुष्य। मानो। वृख की ही) अहनियों पर खड़ा हुआ (उसी) वृक्ष को काट रहा है। (साथ-साथ ही मिठाई वगैरा) खा-खा के मुस्करा रहा है। (पर वृक्ष के कट जाने पर वह मनुष्य) गहरे गड्ढे में जा गिरता है। सिर भार गिर के हड्डी-हड्डी हो जाता है। 3। हे भाई ! मूर्ख (विकारी) मनुष्य उस संत-जन के साथ सदा वैर बनाए रखता है जो किसी के साथ भी वैर नहीं करता। (मूर्ख उस संत जन के साथ बराबरी करने का यतन करता है। पर) उसकी बराबरी नहीं कर सकता। हे नानक ! कह- (विकारी मूर्ख मनुष्य संत-जनों का कुछ बिगाड़ नहीं सकता। क्योंकि) संत-जनों का रखवाला निरंकार पारब्रहम (सदा स्वयं) है। 4। 10।
सारग महला 5 ॥ अवरि सभि भूले भ्रमत न जानिआ ॥ एकु सुधाखरु जा कै हिरदै वसिआ तिनि बेदहि ततु पछानिआ ॥1॥ रहाउ ॥ परविरति मारगु जेता किछु होईऐ तेता लोग पचारा ॥ जउ लउ रिदै नही परगासा तउ लउ अंध अंधारा ॥1॥ जैसे धरती साधै बहु बिधि बिनु बीजै नही जांमै ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई है तुटै नाही अभिमानै ॥2॥ नीरु बिलोवै अति स्रमु पावै नैनू कैसे रीसै ॥ बिनु गुर भेटे मुकति न काहू मिलत नही जगदीसै ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अन्य सारे जीव गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। (माया की खातिर) भटकते हुए उनको (सही जीवन राह की) सूझ नहीं पड़ती। हे भाई ! जो मनुष्य के हृदय में परमात्मा का पवित्र नाम बसता है। उसने (समझो) वेद (आदि धर्म-पुस्तकों) का तत्व समझ लिया। 1। रहाउ। हे भाई ! दुनिया के धंधों में व्यस्त रहने वाले जितने भी जीवन-राह हैं। ये सारे लोगों के अपनी इज्जत बनाए रखने वाले रास्ते हैं। जब तक (मनुष्य के) हृदय में (हरी-नाम की) रौशनी नहीं होती। तब तक (आत्मिक जीवन की तरफ से) घोर-अंधकार ही टिका रहता है। 1। हे भाई ! जैसे (कोई किसान अपनी) जमीन को कई तरीकों से तैयार करता है। पर उस में बीज बीजे बिना कुछ भी नहीं उगता। (इसी तरह) परमात्मा का नाम (हृदय में बीजे) बिना मनुष्य को विकारों से निजात नहीं मिलती। उसके अंदर से अहंकार नहीं खत्म होता। 2। हे भाई ! जो मनुष्य पानी को ही मथता रहता है वह सिर्फ थकावट ही मोल लेता है। (पानी के मथने से उसमें से) मक्खन नहीं निकल सकता। (वैसे ही) गुरू के मिले बिना किसी को भी मुक्ति (विकारों से खलासी) प्राप्त नहीं होती। मनुष्य परमात्मा को नहीं मिल सकता। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पैरों से उस मालिक-प्रभू के राह पर चलता हूँ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।