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अंग 1203

अंग
1203
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
करहि सोम पाकु हिरहि पर दरबा अंतरि झूठ गुमान ॥
सासत्र बेद की बिधि नही जाणहि बिआपे मन कै मान ॥2॥
संधिआ काल करहि सभि वरता जिउ सफरी दंफान ॥
प्रभू भुलाए ऊझड़ि पाए निहफल सभि करमान ॥3॥
सो गिआनी सो बैसनौ पड़ि॑आ जिसु करी क्रिपा भगवान ॥
ओुनि सतिगुरु सेवि परम पदु पाइआ उधरिआ सगल बिस्वान ॥4॥
किआ हम कथह किछु कथि नही जाणह प्रभ भावै तिवै बोुलान ॥
साधसंगति की धूरि इक मांगउ जन नानक पइओ सरान ॥5॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (इस तरह के वैश्णव कहलवाने वाले मनुष्य) अपने हाथों से अपना भोजन तैयार करते हैं पर पराया धन चुराते हैं। उनके अंदर झूठ बसता है अहंकार बसता है। वे मनुष्य (अपनी धर्म-पुस्तकों) वेद-शास्त्रों की आत्मिक मर्यादा नहीं समझते। वे तो अपने मन के अहंकार में ही फसे रहते हैं। 2। हे भाई ! (इस तरह के वैश्णव कहलवाने वाले वैसे तो) तीन समय संध्या करते हैं। सारे व्रत भी रखते हैं (पर उनका ये सारा उद्यम ऐसे ही है) जैसे किसी मदारी का तमाशा (रोटी कमाने के लिए)। (पर। उनके भी क्या वश।) प्रभू ने स्वयं ही उनको सही रास्ते से भटकाया है। गलत राह पर डाला हुआ है। उनके सारे (किए हुए धार्मिक) कर्म व्यर्थ जाते हैं। 3। हे भाई ! असल ज्ञानवान वह मनुष्य है। असल वैश्णव वह है। असल विद्वान वह है। जिस पर परमात्मा ने मेहर की है। (जिसकी बरकति से) उसने गुरू की शरण पड़ कर सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल किया है। (ऐसे मनुष्य की संगति में) सारा जगत ही (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 4। पर। हे भाई ! हम जीव (परमात्मा की रजा के बारे) क्या कह सकते हैं। हम कुछ कहना नहीं जानते। जैसे प्रभू को अच्छा लगता है वैसे ही वह हम जीवों को बोलने के लिए प्रेरित करता है। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) मैं तो प्रभू की शरण पड़ा हूँ (और उसके दर से) सिर्फ साध-संगति (के चरणों) की धूड़ ही माँगता हूँ। 5। 2।
सारग महला 5 ॥
अब मोरो नाचनो रहो ॥
लालु रगीला सहजे पाइओ सतिगुर बचनि लहो ॥1॥ रहाउ ॥
कुआर कंनिआ जैसे संगि सहेरी प्रिअ बचन उपहास कहो ॥
जउ सुरिजनु ग्रिह भीतरि आइओ तब मुखु काजि लजो ॥1॥
जिउ कनिको कोठारी चड़िओ कबरो होत फिरो ॥
जब ते सुध भए है बारहि तब ते थान थिरो ॥2॥
जउ दिनु रैनि तऊ लउ बजिओ मूरत घरी पलो ॥
बजावनहारो ऊठि सिधारिओ तब फिरि बाजु न भइओ ॥3॥
जैसे कुंभ उदक पूरि आनिओ तब ओुहु भिंन द्रिसटो ॥
कहु नानक कुंभु जलै महि डारिओ अंभै अंभ मिलो ॥4॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ अब मेरी भटकना समाप्त हो गई है। हे भाई ! गुरू के वचन के द्वारा आत्मिक अडोलता में टिक के मैंने सोहाना लाल प्रभू ढूँढ लिया है प्राप्त कर लिया है। 1। रहाउ। जैसे कोई क्वारी कन्या सहेलियों के साथ अपने (मंगेतर) प्यारे की बातें हँस-हँस के करती है। पर जब (उसका) पति घर में आता है तब (वह लड़की) लज्जा से अपना मुँह ढक लेती है। 1। जैसे कुठाली में पड़ा हुआ सोना (सेक से) कमला हुआ फिरता है। पर जब वह बारह वंनी का शुद्ध हो जाता है। तब वह (सेक में तड़फने से) अडोल हो जाता है। 2। जब तक (मनुष्य की जिंदगी की) रात कायम रहती है तब तक (उम्र के बीतते जाने की खबर देने के लिए घड़ियाल से) महूरत घड़ियाँ पल बजते रहते हैं। पर जब इनको बजाने वाला (दुनिया से) उठ चलता है। तब (उन घड़ियों पलों का) बजना समाप्त हो जाता है। 3। जैसे जब कोई घड़ा पानी से भर के लाया जाए। तब (घड़े वाला) वह (पानी कूआँ आदि के अन्य पानियों से) अलग दिखता है। हे नानक ! कह- जब वह (भरा हुआ) घड़ा पानी में डाल देते हैं तब (घड़े का) पानी अन्य पानी में मिल जाता है। 4। 3।
सारग महला 5 ॥
अब पूछे किआ कहा ॥
लैनो नामु अंम्रित रसु नीको बावर बिखु सिउ गहि रहा ॥1॥ रहाउ ॥
दुलभ जनमु चिरंकाल पाइओ जातउ कउडी बदलहा ॥
काथूरी को गाहकु आइओ लादिओ कालर बिरख जिवहा ॥1॥
आइओ लाभु लाभन कै ताई मोहनि ठागउरी सिउ उलझि पहा ॥
काच बादरै लालु खोई है फिरि इहु अउसरु कदि लहा ॥2॥
सगल पराध एकु गुणु नाही ठाकुरु छोडह दासि भजहा ॥
आई मसटि जड़वत की निआई जिउ तसकरु दरि सांनि॑हा ॥3॥
आन उपाउ न कोऊ सूझै हरि दासा सरणी परि रहा ॥
कहु नानक तब ही मन छुटीऐ जउ सगले अउगन मेटि धरहा ॥4॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे कमले ! अब अगर आपको पूछा जाए तो क्या बताएगा। (तूने यहाँ जगत में आ के) आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का सुंदर नाम-रस लेना था। पर आप तो आत्मिक मौत लाने वाली माया-जहर के साथ ही चिपक रहा है। 1। रहाउ। हे झल्ले ! बड़े चिरों के बाद (आपको) दुर्लभ (मनुष्य का) जनम मिला था। पर ये तो कौड़ी के बदले जा रहा है। आप (यहाँ पर) कस्तूरी का गाहक बनने के लिए आया था। पर तूने यहाँ से कलॅर लाद लिया है। जिवांहां के बूटे लाद लिए हैं। 1। हे कमले ! (आप जगत में आत्मिक जीवन का) लाभ कमाने के लिए आया था। पर आप तो मन को मोहने वाली माया ठॅग-बूटी के साथ ही अपना मन जोड़ बैठा है। आप काँच के बदले लाल गवा रहा है। हे कमले ! ये मानस जन्म वाला समय फिर कब ढूँढेगा। 2। हे भाई ! हम जीवों में सारी कमियाँ ही हैं गुण एक भी नहीं। हम मालिक-प्रभू को छोड़ देते हैं और उसकी दासी की ही सेवा करते रहते हैं। जैसे कोई चोर सेंध के दरवाजे पर (पकड़ा जा के मार खा-खा के बेहोश हो जाता है। वैसे ही नाम-जपने की ओर से हमें) जड़-पदार्थों की तरह मूर्छा ही आई रहती है। 3। हे भाई ! (इस मोहनी माया के पँजे में से निकलने के लिए मुझे तो) कोई और ढंग नहीं सूझता। मैं तो परमात्मा के दासों की शरण पड़ा रहता हूँ। हे नानक ! कह- हे मन ! माया के मोह में से तब ही बचा जा सकता है जब (प्रभू के सेवकों की शरण पड़ कर अपने अंदर से) हम सारे अवगुण मिटा दें। 4। 4।
सारग महला 5 ॥
माई धीरि रही प्रिअ बहुतु बिरागिओ ॥
अनिक भांति आनूप रंग रे तिन॑ सिउ रुचै न लागिओ ॥1॥ रहाउ ॥
निसि बासुर प्रिअ प्रिअ मुखि टेरउ नंीद पलक नही जागिओ ॥
हार कजर बसत्र अनिक सीगार रे बिनु पिर सभै बिखु लागिओ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे (मेरी) माँ ! (मेरे अंदर) प्यारे से विछोड़े का दर्द बहुत तेज़ हो गया है इसे सहने की ताकत नहीं रह गई। हे भाई ! (दुनिया के) अनेकों किस्मों के सुंदर-सुंदर रंग-तमाशे हैं। पर मेरे अंदर इनके लिए कोई आकर्ष नहीं रहा। 1। रहाउ। हे (वीर) ! रात-दिन मैं (अपने) मुँह से ‘हे प्यारे ! हे प्यारे ! बोलती रहती हूँ। मुझे एक पल भी नींद नहीं आती। सदा जाग के (समय गुजार रही हूँ)। हे (वीर) ! हार। काजल। कपड़े। अनेकों गहने- ये सारे प्रभू-पति के मिलाप के बिना मुझे आत्मिक मौत लाने वाली जहर दिख रहे हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (इस तरह के वैश्णव कहलवाने वाले मनुष्य) अपने हाथों से अपना भोजन तैयार करते हैं पर पराया धन चुराते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।