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अंग 1202

अंग
1202
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सारग महला 4 पड़ताल ॥
जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का नामु अंम्रितु हरि हरि हरे सो पीऐ जिसु रामु पिआसी ॥
हरि आपि दइआलु दइआ करि मेलै जिसु सतिगुरू सो जनु हरि हरि अंम्रित नामु चखासी ॥1॥
जो जन सेवहि सद सदा मेरा हरि हरे तिन का सभु दूखु भरमु भउ जासी ॥
जनु नानकु नामु लए तां जीवै जिउ चात्रिकु जलि पीऐ त्रिपतासी ॥2॥5॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 पड़ताल ॥ हे (मेरे) मन ! गोबिंद (का नाम) जप। हरी (का नाम) जप। हरी गुणों का खजाना है। सारी सृष्टि का मालिक है। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम उचारा कर। वह परमात्मा सर्व-व्यापक है। नाश-रहित है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है (अमृत है)। (यह जल) वह मनुष्य पीता है। जिसको परमात्मा (स्वयं) पिलाता है। दया का घर प्रभू जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है। वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम-जल चखता है। 1। हे मेरे मन ! जो मनुष्य सदा ही सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं। उनका हरेक दुख। उनका हरेक भरम। उनका हरेक डर दूर हो जाता है। (प्रभू का) दास नानक (भी जब) प्रभू का नाम जपता है तब आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। जैसे पपीहा (Üवाति नक्षत्र की वर्षा का) पानी पीने से तृप्त हो जाता है। 2। 5। 12।
सारग महला 4 ॥
जपि मन सिरी रामु ॥
राम रमत रामु ॥
सति सति रामु ॥
बोलहु भईआ सद राम रामु रामु रवि रहिआ सरबगे ॥1॥ रहाउ ॥
रामु आपे आपि आपे सभु करता रामु आपे आपि आपि सभतु जगे ॥
जिसु आपि क्रिपा करे मेरा राम राम राम राइ सो जनु राम नाम लिव लागे ॥1॥
राम नाम की उपमा देखहु हरि संतहु जो भगत जनां की पति राखै विचि कलिजुग अगे ॥
जन नानक का अंगु कीआ मेरै राम राइ दुसमन दूख गए सभि भगे ॥2॥6॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 4 ॥ हे (मेरे) मन ! श्री राम (का नाम) जपा कर। (उस राम का) जो सब जगह मौजूद है (व्यापक है)। जो सदा ही सदा ही कायम रहने वाला है। हे भाई ! सदा राम का नाम बोला करो। सब जगहों में विद्यमान है। वह सब कुछ जानने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! वह राम (सब जगह) स्वयं ही स्वयं है। स्वयं ही सब कुछ पैदा करने वाला है। जगत में हर जगह खुद ही खुद मौजूद है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर वह मेरा प्यारा राम मेहर करता है। वह मनुष्य राम के नाम की लगन में जुड़ता है। 1। हे संत जनो ! उस परमात्मा के नाम की वडिआई देखो। जो इस विकारो-भरे जगत की विकारों की आग में अपने भक्तों की स्वयं इज्जत रखता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मेरे प्रभू-पातशाह ने (अपने जिस) सेवक का पक्ष किया। उसके सारे वैरी उसके सारे दुख दूर हो गए। 2। 6। 13।
सारंग महला 5 चउपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ॥
अंतरि पिआस चात्रिक जिउ जल की सफल दरसनु कदि पांउ ॥1॥ रहाउ ॥
अनाथा को नाथु सरब प्रतिपालकु भगति वछलु हरि नाउ ॥
जा कउ कोइ न राखै प्राणी तिसु तू देहि असराउ ॥1॥
निधरिआ धर निगतिआ गति निथाविआ तू थाउ ॥
दह दिस जांउ तहां तू संगे तेरी कीरति करम कमाउ ॥2॥
एकसु ते लाख लाख ते एका तेरी गति मिति कहि न सकाउ ॥
तू बेअंतु तेरी मिति नही पाईऐ सभु तेरो खेलु दिखाउ ॥3॥
साधन का संगु साध सिउ गोसटि हरि साधन सिउ लिव लाउ ॥
जन नानक पाइआ है गुरमति हरि देहु दरसु मनि चाउ ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 5 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मैं (तो अपने) गुरू से बलिहार जाता हूँ। जैसे पपीहे को (Üवाति नक्षत्र की बरखा के) पानी की प्यास होती है। (वैसे ही) मेरे अंदर ये चाहत रहती है कि मैं (गुरू के द्वारा) कभी उस हरी के दर्शन करूँगा जो सारी मुरादें पूरी करने वाला है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप निखसमों का खसम है (निआसरों का आसरा है)। आप सब जीवों की पालना करने वाला है। हे हरी ! आपका नाम ही है ‘भगति वछलु’ (भगती को प्यार करने वाला)। हे प्रभू ! जिस मनुष्य की अन्य कोई प्राणी रक्षा नहीं कर सकता। आप (स्वयं) उसको (अपना) आसरा देता है। 1। हे प्रभू ! जिनका और कोई सहारा नहीं होता। आप उनका सहारा बनता है। बुरी-खराब हालत वालों की (दुर्दशा में फंसे हुओं की) आप अच्छी हालत बनाता है। जिन्हें कहीं कोई आसरा नहीं मिलता। आप उनका सहारा है। हे प्रभू ! दसों दिशाओं में जिधर मैं जाता हूँ। वहाँ ही आप (मेरे) साथ ही दिखाई देता है। (आपकी मेहर से) मैं आपकी सिॅफतसालाह की कार कमाता हूँ। 2। हे प्रभू ! आप एक से लाखों ब्रहमण्ड बनते हैं। और। लाखों ब्रहमण्डों से (फिर) आप एक स्वयं ही स्वयं बन जाता है। मैं बता नहीं सकता कि आप किस तरह का है और कितना बड़ा है। हे प्रभू ! आप बेअंत है। आपकी हस्ती का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यह सारा जगत मैं तो आपका ही रचा हुआ तमाशा देखता हूँ। 3। (हे प्रभू ! आपके चरणों में जुड़ने के लिए) मैं संत-जनों का संग करता हूँ। मैं संत-जनों के साथ (आपके गुणों की) विचार-चर्चा करता रहता हूँ। आपके संत-जनों की संगति में रह के आपके चरणों में सुरति जोड़ता हूँ। हे दास नानक ! (कह- हे प्रभू !) गुरू की मति पर चलने से ही आपका मिलाप होता है। हे हरी ! (मेरे) मन में (बड़ी) तमन्ना है। (मुझे) अपने दर्शन दे। 4। 1।
सारग महला 5 ॥
हरि जीउ अंतरजामी जान ॥
करत बुराई मानुख ते छपाई साखी भूत पवान ॥1॥ रहाउ ॥
बैसनौ नामु करत खट करमा अंतरि लोभ जूठान ॥
संत सभा की निंदा करते डूबे सभ अगिआन ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सारग महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू जी हरेक के दिल की जानने वाले हैं और सुजान हैं। (जो मनुष्य) और मनुष्यों से छुपा के कोई बुरा काम करता है (वह यह नहीं जानता कि) परमात्मा तो पिछले बीते कर्मों से ले के आगे भविष्य के किए जाने वाले सारे कर्मों को देखने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य) अपने आप को वैश्णव कहलवाते हैं। (शास्त्रों में बताए हुए) छह कर्म भी करते हैं। (पर। अगर उनके) अंदर (मन को) मैला करने वाला लोभ बस रहा है (अगर वह) साध-संगति की निंदा करते हैं (तो वे सारे मनुष्य) आत्मिक जीवन के पक्ष से बेसमझी के कारण (संसार-समुंद्र में) डूब जाते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 4 पड़ताल ॥ हे (मेरे) मन ! गोबिंद (का नाम) जप।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।