जपि मन गोविंदु हरि गोविंदु गुणी निधानु सभ स्रिसटि का प्रभो मेरे मन हरि बोलि हरि पुरखु अबिनासी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का नामु अंम्रितु हरि हरि हरे सो पीऐ जिसु रामु पिआसी ॥
हरि आपि दइआलु दइआ करि मेलै जिसु सतिगुरू सो जनु हरि हरि अंम्रित नामु चखासी ॥1॥
जो जन सेवहि सद सदा मेरा हरि हरे तिन का सभु दूखु भरमु भउ जासी ॥
जनु नानकु नामु लए तां जीवै जिउ चात्रिकु जलि पीऐ त्रिपतासी ॥2॥5॥12॥
जपि मन सिरी रामु ॥
राम रमत रामु ॥
सति सति रामु ॥
बोलहु भईआ सद राम रामु रामु रवि रहिआ सरबगे ॥1॥ रहाउ ॥
रामु आपे आपि आपे सभु करता रामु आपे आपि आपि सभतु जगे ॥
जिसु आपि क्रिपा करे मेरा राम राम राम राइ सो जनु राम नाम लिव लागे ॥1॥
राम नाम की उपमा देखहु हरि संतहु जो भगत जनां की पति राखै विचि कलिजुग अगे ॥
जन नानक का अंगु कीआ मेरै राम राइ दुसमन दूख गए सभि भगे ॥2॥6॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर मूरति कउ बलि जाउ ॥
अंतरि पिआस चात्रिक जिउ जल की सफल दरसनु कदि पांउ ॥1॥ रहाउ ॥
अनाथा को नाथु सरब प्रतिपालकु भगति वछलु हरि नाउ ॥
जा कउ कोइ न राखै प्राणी तिसु तू देहि असराउ ॥1॥
निधरिआ धर निगतिआ गति निथाविआ तू थाउ ॥
दह दिस जांउ तहां तू संगे तेरी कीरति करम कमाउ ॥2॥
एकसु ते लाख लाख ते एका तेरी गति मिति कहि न सकाउ ॥
तू बेअंतु तेरी मिति नही पाईऐ सभु तेरो खेलु दिखाउ ॥3॥
साधन का संगु साध सिउ गोसटि हरि साधन सिउ लिव लाउ ॥
जन नानक पाइआ है गुरमति हरि देहु दरसु मनि चाउ ॥4॥1॥
हरि जीउ अंतरजामी जान ॥
करत बुराई मानुख ते छपाई साखी भूत पवान ॥1॥ रहाउ ॥
बैसनौ नामु करत खट करमा अंतरि लोभ जूठान ॥
संत सभा की निंदा करते डूबे सभ अगिआन ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारग महला 4 पड़ताल ॥ हे (मेरे) मन ! गोबिंद (का नाम) जप।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।