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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 12 · सो पुरखु · सोहिला

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अंग
12
सो पुरखु · सोहिला
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  1. तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥
  2. तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥
  3. भई परापति मानुख देहुरीआ ॥
  4. जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥
  5. छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥

गुरु राम दास जी · शबद

तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥

अंग 11 से चला आ रहा अंश

तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥
तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥
जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू!) आप स्वयं ही सब कुछ पैदा करने वाले हैं, सब कुछ आपका किया हुआ ही होता है। आपके बिना (आपके जैसा) और कोई नहीं। जीव पैदा करके उनकी सँभाल भी आप स्वयं ही करते हैं और हरेक के दिल की सार जानते हैं। हे दास नानक! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसके अंदर प्रमात्मा परगट हो जाता है। 4। 2।

गुरु नानक देव जी · शबद

तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥

आसा महला 1 ॥
तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥
पंकजु मोह पगु नही चालै हम देखा तह डूबीअले ॥1॥
मन एकु न चेतसि मूड़ मना ॥
हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥1॥ रहाउ ॥
ना हउ जती सती नही पड़िआ मूरख मुगधा जनमु भइआ ॥
प्रणवति नानक तिन की सरणा जिन तू नाही वीसरिआ ॥2॥3॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे भाई! हम जीवों का) उस भयानक (संसार) सरोवर में बसेरा है (जिसमे) उस प्रभू ने खुद ही पानी (की जगह तृष्णा की) आग पैदा की है (और उस भयानक शरीर में) जो मोह का कीचड़ है (उसमें जीवों का) पैर नहीं चल सकता है (जीव मोह के कीचड़ में फंसे हुए हैं)। हमारे सामने ही (अनेको जीव मोह के कीचड़ में फस के) उस (तृष्णारूपी आग के अथाह समुंद्र में) डूबते जा रहे हैं। 1। हे मन! हे मूर्ख मन! आप एक परमात्मा को याद नहीं करते। आप ज्यों-ज्यों परमात्मा को विसारते जा रहे हैं, आपके (अंदर से) गुण घटते जा रहे हैं। 1। रहाउ। (हे प्रभू!) ना मैं जती हूँ, ना मैं सती हूँ, ना ही मैं पढ़ा हुआ हूँ। मेरा जीवन तो मूर्खों-बेसमझों वाला बना हुआ है सो, नानक विनती करता है, (कि हे प्रभू! मुझे) उन (गुरमुखों) की शरण में (रखें), जिन्होंने आपको नहीं भुलाया। 2। 3।

गुरु अर्जन देव जी · शबद

भई परापति मानुख देहुरीआ ॥

आसा महला 5 ॥
भई परापति मानुख देहुरीआ ॥
गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥
अवरि काज तेरै कितै न काम ॥
मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥1॥
सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥
जनमु ब्रिथा जात रंगि माइआ कै ॥1॥ रहाउ ॥
जपु तपु संजमु धरमु न कमाइआ ॥
सेवा साध न जानिआ हरि राइआ ॥
कहु नानक हम नीच करंमा ॥
सरणि परे की राखहु सरमा ॥2॥4॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई!) आपको सुंदर मानव शरीर मिला है। परमेश्वर को मिलने का आपके लिए यही मौका है। (यदि ईश्वर को मिलने का कोई प्रयत्न ना किया, तो) और सारे काम आपके किसी भी अर्थ नहीं। (ये काम आपकी जीवात्मा को कोई लाभ नहीं पहुँचाएंगे)। (इस वास्ते) साध-संगत में (भी) मिल बैठा करें। (साध-संगति में बैठ के भी) सिर्फ परमेश्वर का नाम सिमरा करें (साध-संगति में बैठने का भी तभी लाभ है अगर वहाँ आप परमात्मा की सिफत सलाह में जुड़े)। 1। (हे भाई!) संसार समुन्द्र से पार लांघने की भी कोशिश में लगें। (सिर्फ) माया के प्यार में मानव जन्म व्यर्थ जा रहा है। 1। रहाउ। (हे भाई!) आप प्रभू का सिमरन नहीं करते (प्रभू से मिलने के लिए सेवा आदि कोई) उद्यम नहीं करते, मन को विकारों की ओर से रोकने का कोई यत्न नहीं करते, आप (ऐसा कोई) धर्म नहीं कमाते। ना आपने गुरू की सेवा की, ना आपने मालिक प्रभू का नाम सिमरन ही किया। हे नानक! (परमेश्वर के दर पे अरदास करें, और) कहें: (हे प्रभू!) हम जीव मंद-कर्मी हैं (आपकी शरण पड़े हैं) शरण पड़े की लाज रखें। 2। 4।

गुरु नानक देव जी · शबद

जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥

सोहिला रागु गउड़ी दीपकी महला 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥
तितु घरि गावहु सोहिला सिवरिहु सिरजणहारो ॥1॥
तुम गावहु मेरे निरभउ का सोहिला ॥
हउ वारी जितु सोहिलै सदा सुखु होइ ॥1॥ रहाउ ॥
नित नित जीअड़े समालीअनि देखैगा देवणहारु ॥
तेरे दानै कीमति ना पवै तिसु दाते कवणु सुमारु ॥2॥
संबति साहा लिखिआ मिलि करि पावहु तेलु ॥
देहु सजण असीसड़ीआ जिउ होवै साहिब सिउ मेलु ॥3॥
घरि घरि एहो पाहुचा सदड़े नित पवंनि ॥
सदणहारा सिमरीऐ नानक से दिह आवंनि ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: सोहिला राग गउड़ी दीपकी महला 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस (सत्संग) घर में (परमात्मा की) सिफत-सलाह की जाती है और करतार के गुणों की विचार होती है (हे शरीर-कन्या!) उस (सत्संग) घर में (जा के आप भी) प्रभू के सिफत-सलाह के गीत, सुहाग-मिलाप के उल्लास के शबद, गाया कीजिए और अपने पैदा करने वाले प्रभु को याद किया कीजिए। 1। (हे शरीर!) आप (सत्संगियों के साथ मिल के) प्यारे निरभउ (पति परमेश्वर) की सिफत के गीत गाइए और कहिए: हम सदके हैं उस सिफत के गीत से जिसकी बरकति से सदा सुख मिलता है। 1। रहाउ। (हे शरीर! जिस पति परमेश्वर की हजूरी में) सदा ही जीवों की संभाल हो रही है, जो दातें देने वाला मालिक (हरेक जीव की) संभाल करता है, (जिस दातार की) दातों के मुल्य (हे शरीर-कन्या!) आपसे नहीं चुकाए जा सकते, उस दातार का क्या अंदाजा (आप लगा सकती हैं) ? (वह दातार प्रभू बहुत बेअंत है)। 2। (सत्संग में जा के, हे शरीर-कन्या! आरज़ू किया कीजिए): वह संबत् वह दिन (जो पहले ही) निश्चित है (जब पति के देश जाने के लिए मेरे वास्ते साहे-चिट्ठी आनी है, हे सत्संगी सहेलियो!) मिल के मुझे मांईएं डालें, तथा, हे सज्जन सहेलियो! मुझे खूबसूरत आर्शीवाद भी दें (भाव, मेरे लिए अरदास भी करें) जिससे प्रभू पति से मेरा मिलाप हो जाए। 3। (परलोक में जाने के लिए मौत की) ये साहा-चिट्ठी हरेक घर में आ रही है, ये बुलावे नित्य आ रहे हैं। (हे सत्संगियो!) उस बुलावा देने वाले प्रभू-पति को हमेशा याद रखना चाहिए (क्योंकि) हे नानक! (हमारे भी) वह दिन (नजदीक) आ रहे हैं। 4। 1।

गुरु नानक देव जी · शबद

छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥

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रागु आसा महला 1 ॥
छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥
गुरु गुरु एको वेस अनेक ॥1॥
बाबा जै घरि करते कीरति होइ ॥
सो घरु राखु वडाई तोइ ॥1॥ रहाउ ॥
विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ ॥
सूरजु एको रुति अनेक ॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 ॥ (हे भाई!) छे शास्त्र हैं, छे ही (इन शास्त्रों को) चलाने वाले हैं, छे ही इनके सिद्धांत हैं। पर इन सारों का मूल गुरू (परमात्मा) एक है। (ये सारे सिद्धांत) उस एक प्रभू के ही अनेकों वेश हैं (प्रभू की हस्ती के प्रकाश के रूप हैं)। 1। हे भाई! जिस (सत्संग) घर में करतार की सिफत सलाह होती है, उस घर को संभाल के रखें (उस सत्संग का आसरा लिए रखें। इसी में) आपकी भलाई है। 1। रहाउ। जैसे, विसुए, चसे, घड़ियां, पहर, थिति, वार, महीना (आदि) और अन्य ऋतुएं हैं, पर सूरज एक ही है (जिसके सारे विभिन्न रूप हैं),

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 12 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।