राग: So Purakh · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
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तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू!) आप स्वयं ही सब कुछ पैदा करने वाला है, सब कुछ आपका किया हुआ ही होता है। आपके बिना (आपके जैसा) और कोई नहीं। जीव पैदा करके उनकी संभाल भी आप स्वयं ही करता है।और, हरेक (के दिल) की सार जानता है। हे दास नानक! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसके अंदर प्रमात्मा परगट हो जाता है।4।2।
आसा महला 1 ॥ तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥ पंकजु मोह पगु नही चालै हम देखा तह डूबीअले ॥1॥ मन एकु न चेतसि मूड़ मना ॥ हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥1॥ रहाउ ॥ ना हउ जती सती नही पड़िआ मूरख मुगधा जनमु भइआ ॥ प्रणवति नानक तिन की सरणा जिन तू नाही वीसरिआ ॥2॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे भाई! हम जीवों का) उस भयानक (संसार) सरोवर में बसेरा है (जिसमे) उस प्रभू ने खुद ही पानी (की जगह तृष्णा की) आग पैदा की है (और उस भयानक शरीर में) जो मोह का कीचड़ है (उसमें जीवों का) पैर नहीं चल सकता है (जीव मोह के कीचड़ में फंसे हुए हैं)। हमारे सामने ही (अनेको जीव मोह के कीचड़ में फस के) उस (तृष्णारूपी आग के अथाह समुंद्र में) डूबते जा रहे है।1। हे मन! हे मूर्ख मन! आप एक परमात्मा को याद नहीं करता। आप ज्यों ज्यों प्रमात्मा को विसारता जा रहा है, आपके (अंदर से) गुण घटते जा रहे हैं।1।रहाउ। (हे प्रभू!) ना मैं जती हूँ, ना मैं सती हूँ, ना ही मैं पढ़ा हुआ हूँ।मेरा जीवन तो मूर्खों-बेसमझों वाला बना हुआ है सो, नानक विनती करता है, (कि हे प्रभू ! मुझे) उन (गुरमुखों) की शरण में (रख), जिनको आप नहीं भूला (जिनको आपकी याद नहीं भूली)।2।3।
आसा महला 5 ॥ भई परापति मानुख देहुरीआ ॥ गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥ अवरि काज तेरै कितै न काम ॥ मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥1॥ सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥ जनमु ब्रिथा जात रंगि माइआ कै ॥1॥ रहाउ ॥ जपु तपु संजमु धरमु न कमाइआ ॥ सेवा साध न जानिआ हरि राइआ ॥ कहु नानक हम नीच करंमा ॥ सरणि परे की राखहु सरमा ॥2॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई!) आपको सुंदर मानव शरीर मिला है। परमेश्वर को मिलने का आपके लिए यही मौका है। (यदि ईश्वर को मिलने का कोई प्रयत्न ना किया, तो) और सारे काम आपके किसी भी अर्थ नहीं।(ये काम आपकी जीवात्मा को कोई लाभ नहीं पहुँचाएंगे)। (इस वास्ते) साध-संगत में (भी) मिल बैठा कर। (साध-संगति में बैठ के भी) सिर्फ परमेश्वर का नाम सिमरा कर (साध-संगति में बैठने का भी तभी लाभ है अगर वहाँ आप परमात्मा की सिफत सलाह में जुड़े)।1। (हे भाई!) संसार समुन्द्र से पार लांघने की भी कोशिश में लग। (सिर्फ) माया के प्यार में मानव जन्म व्यर्थ जा रहा है।1।रहाउ। (हे भाई!) आप प्रभू का सिमरन नहीं करता (प्रभू से मिलने के लिए सेवा आदि कोई) उद्यम नहीं करता, मन को विकारों की ओर से रोकने का कोई यत्न नहीं करता – आप (ऐसा कोई) धर्म नहीं कमाता। ना तूने गुरू की सेवा की, ना तूने मालिक प्रभू का नाम सिमरन ही किया। हे नानक! (परमेश्वर के दर पे अरदास कर, और) कह – (हे प्रभू!) हम जीव मंद-कर्मी हैं (आपकी शरण पड़े हैं) शरण पड़े की लाज रखो।2।4।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: सोहिला राग गउड़ी दीपकी महला 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस (सत्संग) घर में (परमात्मा की) सिफत-सलाह की जाती है और करतार के गुणों की विचार होती है (हे शरीर-कन्या!) उस (सत्संग) घर में (जा के आप भी) प्रभू के सिफत-सलाह के गीत (सुहाग-मिलाप के उल्लास के शबद) गाया कर और अपने पैदा करने वाले प्रभू को याद करा कर।1। (हे शरीर!) आप (सत्संगियों के साथ मिल के) प्यारे निरभउ (पति परमेश्वर) की सिफत के गीत गा (और कह) मैं सदके हूँ उस सिफत के गीत से जिसकी बरकति से सदा सुख मिलता है।1।रहाउ। (हे शरीर! जिस पति परमेश्वर की हजूरी में) सदा ही जीवों की संभाल हो रही है, जो दातें देने वाला मालिक (हरेक जीव की) संभाल करता है, (जिस दातार की) दातों के मुल्य (हे शरीर-कन्या!) आपसे नहीं चुकाए जा सकते, उस दातार का क्या अंदाजा (आप लगा सकती है) ? (वह दातार प्रभू बहुत बेअंत है)।2। (सत्संग में जा के, हे शरीर-कन्या! आरजूएं करा कर-) वह संबत् वह दिन (जो पहले ही) निश्चित है (जब पति के देश जाने के लिए मेरे वास्ते साहे-चिट्ठी आनी है, हे सत्संगी सहेलियो!) मिल के मुझे मांईएं डालो, तथा, हे सज्जन सहेलियो! मुझे खूबसूरत आर्शीवाद भी दो (भाव, मेरे लिए अरदास भी करो) जिससे प्रभू पति से मेरा मिलाप हो जाए।3। (परलोक में जाने के लिए मौत की) ये साहा-चिट्ठी हरेक घर में आ रही है, ये बुलावे नित्य आ रहे हैं। (हे सत्संगियो!) उस बुलावा देने वाले प्रभू-पति को हमेशा याद रखना चाहिए (क्योंकि) हे नानक! (हमारे भी) वह दिन (नजदीक) आ रहे हैं।4।1।
रागु आसा महला 1 ॥ छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥ गुरु गुरु एको वेस अनेक ॥1॥ बाबा जै घरि करते कीरति होइ ॥ सो घरु राखु वडाई तोइ ॥1॥ रहाउ ॥ विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ ॥ सूरजु एको रुति अनेक ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 ॥ (हे भाई!) छे शास्त्र हैं, छे ही (इन शास्त्रों को) चलाने वाले हैं, छे ही इनके सिद्धांत हैं। पर इन सारों का मूल गुरू (परमात्मा) एक है।(ये सारे सिद्धांत) उस एक प्रभू के ही अनेकों वेश हैं (प्रभू की हस्ती के प्रकाश के रूप हैं)।1। हे भाई! जिस (सत्संग) घर में करतार की सिफत सलाह होती है, उस घर को संभाल के रख (उस सत्संग का आसरा लिए रख। इसी में) आपकी भलाई है।1।रहाउ। जैसे, विसुए, चसे, घड़ियां, पहर, थिति, वार, महीना (आदि) और अन्य ऋतुएं हैं, पर सूरज एक ही है (जिसके सारे विभिन्न रूप हैं),
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू!) आप स्वयं ही सब कुछ पैदा करने वाला है, सब कुछ आपका किया हुआ ही होता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
रात की प्रार्थना के लिए जलाया गया एक दीया। बाहर तारे, भीतर शान्ति।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
सोहिला की imagery
अंगों के पाठ में बार-बार लौटने वाले बिम्ब (recurring imagery)।
तारों भरा आँगन · रात की प्रार्थना खुले आसमान के नीचे।पीतल की थाली, बीच में दीया · आरती की तैयारी।दरवाज़े से आती रोशनी · भीतर का बुलावा।रात की नदी पर बहते दीये · जो गुज़र गए, उनके लिए।सुबह की चारपाई · दिन शुरू होने से पहले की शान्ति।दीयों की एक क़तार · नींद से पहले का पाठ।