नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: उसी प्रकार, हे नानक! करतार के (ये सारे सिद्धांत आदि) अनेकों स्वरूप हैं।2।2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु धनासरी महला 1 ॥ सारा आकाश (जैसे कि) थाल है। सूरज और चाँद (उस थाल में) दिये बने हुए हैं। तारों के समूह, जैसे, थाल में मोती रखे हुए हैं। मलय पर्वत से आने वाली हवा, जैसे धूप (धूणे की सुगंध) है। हवा चौर कर रही है। सारी बनस्पति जोति-रूप (प्रभू की आरती) वास्ते फूल दे रही है।1। कैसी सुंदर आपकी आरती हैं रही है ! हे जीवों के जनम, मरन, नाश करने वाले! (कुदरति में) आपकी आरती हैं रही है सभ जीवों में चल रहीं) एक ही जीवन तरंगें, मानों आपकी आरती के वास्ते नगारे बज रहे है।1।रहाउ। (सभ जीवों में व्यापक होने के कारण) हजारों आपकी आँखें हैं (पर, निराकार होने की वजह से, हे प्रभू) आपकी कोई आँख नहीं। हजारों आपकी शक्लें हैं, पर आपकी कोई भी शक्ल नहीं। हजारों आपके सुंदर पैर हैं (पर निराकार होने के कारण) आपका एक भी पैर नहीं। हजारों आपके नाक हैं, पर आप नाक के बिना ही है। आपके ऐसे चमत्कारों ने मुझे हैरान किया हुआ है।1। सारे जीवों में एक वही परमात्मा की ज्योति बरत रही है। उस ज्योति के प्रकाश से सारे जीवों में प्रकाश (सूझ-बूझ) है। पर, इस ज्योति का ज्ञान गुरू की शिक्षा से ही होता है। (गुरू के द्वारा ही ये समझ पड़ती है कि हरेक के अंदर परमात्मा की ज्योति है) (इस सर्व-व्यापक ज्योति की) आरती ये है कि जो कुछ भी उसकी रजा में हो रहा है, वह जीव को अच्छा लगे (प्रभू की रजा में रहना ही प्रभू की आरती करना है)।3। हे हरी! आपके चरन-रूपी कमल फूलों के लिए मेरा मन ललचाता है, हर रोज मुझे इस रस की प्यास लगी हुई है। मुझ नानक पपीहे को अपनी मेहर का जल दे, जिस (की बरकति) से मैं आपके नाम में टिका रहूँ।4।3।
रागु गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥ पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥1॥ करि साधू अंजुली पुनु वडा हे ॥ करि डंडउत पुनु वडा हे ॥1॥ रहाउ ॥ साकत हरि रस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥ जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥2॥ हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥ अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥3॥ हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥ जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥4॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ (मनुष्य का यह शरीर रूपी) शहर काम और क्रोध से भरा रहता है। गुरू को मिल के ही (काम-क्रोध आदि के इस मेल को) तोड़ जा सकता है। जिस मनुष्य को पूर्बले कर्मों के संजोगों से गुरू मिल जाता है, उसके मन में परमात्मा के साथ लिव लग जाती है (और उसके अंदर से कामादिक विकारों का जोड़ टूट जाता है)।1। (हे भाई!) गुरू के आगे हाथ जोड़, यह बहुत भला काम है। गुरू के आगे नत्मस्तक हो जाओ, ये बड़ा नेक काम है।1।रहाउ। जो मनुष्य प्रमात्मा से टूटे हुए हैं, वे उसके नाम के रस के स्वाद को नहीं समझ सकते। उनके मन में अहंकार का (मानों) काँटा चुभा हुआ है। ज्यों ज्यों वे चलते हैं (ज्यों ज्यों वे अहम् के स्वभाव में जीते हैं, अहंकार का काँटा उनको) चुभता है, वे दुख पाते हैं, और अपने सिर पर उन्हें आत्मिक मौत रूपी डंडा बर्दाश्त करना पड़ता है। (भाव, आत्मिक मौत उनके सिर पे सवार रहती है)।2। (दूसरी तरफ) परमात्मा के प्यारे बंदे परमात्मा के नाम में जुड़े रहते हैं। उनके संसार के जनम-तरण का दुख काटा जाता है। उन्हें कभी नाश ना होने वाला परमेश्वर मिल जाता है। उनकी शोभा सारे खंड-ब्रहिमंडों में हो जाती है।3। हे प्रभू! हम जीव आपके दर के गरीब मंगते हैं। आप सबसे बड़ा मददगार है। हमें (इन कामादिक विकारों से) बचा ले। हे प्रभू आपके दास नानक को आपका ही आसरा है, आपका नाम ही सहारा है। आपके नाम में जुड़ने से ही सुख मिलता है।4।4।
रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ॥ करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥ ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥1॥ अउध घटै दिनसु रैणारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥ इहु संसारु बिकारु संसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥ जिसहि जगाइ पीआवै इहु रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥2॥ जा कउ आए सोई बिहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥ निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥3॥ अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥ नानक दासु इहै सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥4॥5॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ॥ हे मेरे मित्रो! सुनो! मैं विनती करता हूँ- (अब) गुरमुखों की सेवा करने की बेला है। (यदि सेवा करोगे, तो) इस जनम में ईश्वर के नाम की कमाई कर के जाओगे, और परलोक में बसेरा सुखमय हो जाएगा।1। हे मन! दिन रात (बीत बीत के) उम्र घटती जा रही है।हे (मेरे) मन! गुरू को मिल के (मानव जीवन के) उद्देश्य को सफल कर।1।रहाउ। ये जगत विकारों से भरपूर है।(जगत के जीव) शंकाओं में (डूब रहे हैं। इनमें से) वही मनुष्य निकलता है जिस ने परमात्मा के साथ जान-पहिचान बना ली है। (विकारों में सो रहे) जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं खुद जगा के ये नाम अमृत पिलाता है, उस मनुष्य ने अकथ प्रभू की बातें (बेअंत गुणों वाले प्रभू की सिफत सलाह) करने का तौर-तरीका सीख लिया है।2। (हे भाई!) जिस काम वास्ते (यहाँ) आए हो, उस का व्यापार करो। वह हरि नाम गुरू के द्वारा ही मन में बस सकता है। (यदि गुरू की शरण पड़ोगे, तो) आत्मिक आनंद और अडोलता में टिक के अपने अंदर ही परमात्मा का ठिकाना ढूँढ लेंगे। फिर दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं रहेगा।3। हे हरेक दिल की जानने वाले सर्व-व्यापक सृजनहार! मेरे मन की इच्छा पूरी कर। दास नानक आपसे यही सुख मांगता है कि मुझे संतों के चरणों की धूड़ बना दे।4।5।नोट: आखीरले अंक 5 का भाव ये है कि इस संग्रहि (सोहिले) का यह पाँचवां शबद् है। पाठक सज्जन ध्यान रखें कि इस संग्रहि का नाम ‘सोहिला’ है, ‘कीरतन सोहिला’ नहीं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ये नित्य की प्रार्थनाएँ हैं, अधिकांश पन्द्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी की शुरुआत में रची गयीं।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसी प्रकार, हे नानक! करतार के (ये सारे सिद्धांत आदि) अनेकों स्वरूप हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।