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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 13 · सोहिला

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अंग
13
सोहिला
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  1. नानक करते के केते वेस ॥2॥2॥
  2. गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥
  3. कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥
  4. करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥

गुरु नानक देव जी · शबद

नानक करते के केते वेस ॥2॥2॥

अंग 12 से चला आ रहा अंश

नानक करते के केते वेस ॥2॥2॥

हिन्दी अर्थ: उसी प्रकार, हे नानक! करतार के (ये सारे सिद्धांत आदि) अनेकों स्वरूप हैं। 2। 2।

गुरु नानक देव जी · शबद

गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥

रागु धनासरी महला 1 ॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥1॥
कैसी आरती होइ ॥ भव खंडना तेरी आरती ॥
अनहता सबद वाजंत भेरी ॥1॥ रहाउ ॥
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोुही ॥
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥2॥
सभ महि जोति जोति है सोइ ॥
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥3॥
हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनोु मोहि आही पिआसा ॥
क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नाइ वासा ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: रागु धनासरी महला 1 ॥ सारा आकाश (जैसे कि) थाल है। सूरज और चाँद (उस थाल में) दिये बने हुए हैं। तारों के समूह, जैसे, थाल में मोती रखे हुए हैं। मलय पर्वत से आने वाली हवा, जैसे धूप (धूणे की सुगंध) है। हवा चौर कर रही है। सारी बनस्पति जोति-रूप (प्रभू की आरती) वास्ते फूल दे रही है। 1। कैसी सुंदर आपकी आरती हो रही है! हे जीवों के जनम, मरन, नाश करने वाले! (कुदरति में) आपकी आरती हो रही है सभ जीवों में चल रहीं) एक ही जीवन तरंगें, मानों आपकी आरती के वास्ते नगारे बज रहे है। 1। रहाउ। (सभ जीवों में व्यापक होने के कारण) हजारों आपकी आँखें हैं (पर, निराकार होने की वजह से, हे प्रभू) आपकी कोई आँख नहीं। हजारों आपकी शक्लें हैं, पर आपकी कोई भी शक्ल नहीं। हजारों आपके सुंदर पैर हैं (पर निराकार होने के कारण) आपका एक भी पैर नहीं। हजारों आपके नाक हैं, पर आप नाक के बिना ही हैं। आपके ऐसे चमत्कारों ने मुझे हैरान किया हुआ है। 1। सारे जीवों में एक वही परमात्मा की ज्योति बरत रही है। उस ज्योति के प्रकाश से सारे जीवों में प्रकाश (सूझ-बूझ) है। पर, इस ज्योति का ज्ञान गुरू की शिक्षा से ही होता है। (गुरू के द्वारा ही ये समझ पड़ती है कि हरेक के अंदर परमात्मा की ज्योति है) (इस सर्व-व्यापक ज्योति की) आरती ये है कि जो कुछ भी उसकी रजा में हो रहा है, वह जीव को अच्छा लगे (प्रभू की रजा में रहना ही प्रभू की आरती करना है)। 3। हे हरी! आपके चरन-रूपी कमल फूलों के लिए मेरा मन ललचाता है, हर रोज मुझे इस रस की प्यास लगी हुई है। मुझ नानक पपीहे को अपनी मेहर का जल दें, जिस (की बरकति) से मैं आपके नाम में टिका रहूँ। 4। 3।

गुरु राम दास जी · शबद

कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥

रागु गउड़ी पूरबी महला 4 ॥
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥
पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥1॥
करि साधू अंजुली पुनु वडा हे ॥
करि डंडउत पुनु वडा हे ॥1॥ रहाउ ॥
साकत हरि रस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥
जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥2॥
हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥
अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥3॥
हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥
जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 4 ॥ (मनुष्य का यह शरीर रूपी) शहर काम और क्रोध से भरा रहता है। गुरू को मिल के ही (काम-क्रोध आदि के इस मेल को) तोड़ जा सकता है। जिस मनुष्य को पूर्बले कर्मों के संजोगों से गुरू मिल जाता है, उसके मन में परमात्मा के साथ लिव लग जाती है (और उसके अंदर से कामादिक विकारों का जोड़ टूट जाता है)। 1। (हे भाई!) गुरू के आगे हाथ जोड़ें, यह बहुत भला काम है। गुरू के आगे नत्मस्तक हो जाएँ, ये बड़ा नेक काम है। 1। रहाउ। जो मनुष्य प्रमात्मा से टूटे हुए हैं, वे उसके नाम के रस के स्वाद को नहीं समझ सकते। उनके मन में अहंकार का (मानों) काँटा चुभा हुआ है। ज्यों ज्यों वे चलते हैं (ज्यों ज्यों वे अहम् के स्वभाव में जीते हैं, अहंकार का काँटा उनको) चुभता है, वे दुख पाते हैं, और अपने सिर पर उन्हें आत्मिक मौत रूपी डंडा बर्दाश्त करना पड़ता है। (भाव, आत्मिक मौत उनके सिर पे सवार रहती है)। 2। (दूसरी तरफ) परमात्मा के प्यारे बंदे परमात्मा के नाम में जुड़े रहते हैं। उनके संसार के जनम-तरण का दुख काटा जाता है। उन्हें कभी नाश ना होने वाला परमेश्वर मिल जाता है। उनकी शोभा सारे खंड-ब्रहिमंडों में हो जाती है। 3। हे प्रभू! हम जीव आपके दर के गरीब मंगते हैं। आप सबसे बड़े मददगार हैं। हमें (इन कामादिक विकारों से) बचा लें। हे प्रभू आपके दास नानक को आपका ही आसरा है, आपका नाम ही सहारा है। आपके नाम में जुड़ने से ही सुख मिलता है। 4। 4।

गुरु अर्जन देव जी · शबद

करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥

रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ॥
करउ बेनंती सुणहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥
ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥1॥
अउध घटै दिनसु रैणारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥
इहु संसारु बिकारु संसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥
जिसहि जगाइ पीआवै इहु रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥2॥
जा कउ आए सोई बिहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥
निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥3॥
अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥
नानक दासु इहै सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी महला 5 ॥ हे मेरे मित्रो! सुनें! मैं विनती करता हूँ: (अब) गुरमुखों की सेवा करने की बेला है। (यदि सेवा करेंगे, तो) इस जनम में ईश्वर के नाम की कमाई कर के जाएँगे, और परलोक में बसेरा सुखमय हो जाएगा। 1। हे मन! दिन रात (बीत बीत के) उम्र घटती जा रही है। हे (मेरे) मन! गुरू को मिल के (मानव जीवन के) उद्देश्य को सफल करें। 1। रहाउ। ये जगत विकारों से भरपूर है। (जगत के जीव) शंकाओं में (डूब रहे हैं। इनमें से) वही मनुष्य निकलता है जिस ने परमात्मा के साथ जान-पहिचान बना ली है। (विकारों में सो रहे) जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं खुद जगा के ये नाम अमृत पिलाता है, उस मनुष्य ने अकथ प्रभू की बातें (बेअंत गुणों वाले प्रभू की सिफत सलाह) करने का तौर-तरीका सीख लिया है। 2। (हे भाई!) जिस काम वास्ते (यहाँ) आए हैं, उस का व्यापार करें। वह हरि नाम गुरू के द्वारा ही मन में बस सकता है। (यदि गुरू की शरण पड़ेंगे, तो) आत्मिक आनंद और अडोलता में टिक के अपने अंदर ही परमात्मा का ठिकाना ढूँढ लेंगे। फिर दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं रहेगा। 3। हे हरेक दिल की जानने वाले सर्व-व्यापक सृजनहार! मेरे मन की इच्छा पूरी करें। दास नानक आपसे यही सुख मांगता है कि मुझे संतों के चरणों की धूड़ बना दे। 4। 5।नोट: आखीरले अंक 5 का भाव ये है कि इस संग्रहि (सोहिले) का यह पाँचवां शबद् है। पाठक सज्जन ध्यान रखें कि इस संग्रहि का नाम ‘सोहिला’ है, ‘कीरतन सोहिला’ नहीं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग पर सोहिला की अंतिम रचनाएँ हैं। यहाँ धनासरी और गउड़ी पूरबी के शीर्षक तथा महला 1, 4 और 5 के संकेत मिलते हैं; पूरा अंग किसी एक रचयिता की रचना नहीं है।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 13 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।