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11
सो पुरखु
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· शबद
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाणा ॥2॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुखवासी ॥
से मुकतु से मुकतु भए जिन हरि धिआइआ जी तिन तूटी जम की फासी ॥
जिन निरभउ जिन हरि निरभउ धिआइआ जी तिन का भउ सभु गवासी ॥
जिन सेविआ जिन सेविआ मेरा हरि जी ते हरि हरि रूपि समासी ॥
से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जी जनु नानकु तिन बलि जासी ॥3॥
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता ॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥4॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥
तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥
तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥5॥1॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाणा ॥2॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुखवासी ॥
से मुकतु से मुकतु भए जिन हरि धिआइआ जी तिन तूटी जम की फासी ॥
जिन निरभउ जिन हरि निरभउ धिआइआ जी तिन का भउ सभु गवासी ॥
जिन सेविआ जिन सेविआ मेरा हरि जी ते हरि हरि रूपि समासी ॥
से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जी जनु नानकु तिन बलि जासी ॥3॥
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बिअंत बेअंता ॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥4॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥
तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥
तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥5॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे हरि! आप हरेक शरीर में व्यापक हैं, आप सारे जीवों में एकरस मौजूद हैं, आप अकेले ही सबमें समाए हुए हैं (फिर भी) कई जीव दानी हैं, कई जीव मंगते हैं, ये सारे आपके ही आश्चर्यजनक तमाशे हैं (क्योंकि असल में) आप स्वयं ही दातें देने वाले हैं और स्वयं ही उन दातों का उपयोग करने वाले हैं। (सारी सृष्टि में) मैं आपके बिना किसी और को नहीं पहचानता (आपके बिना और कोई नहीं दिखता)। मैं आपके कौन कौन से गुण गा के बताऊँ? आप बेअंत, अनंत पारब्रह्म हैं। हे प्रभू! जो मनुष्य आपको याद करते हैं, आपको सिमरते हैं (आपका) दास नानक उनसे सदके (कुर्बान) जाता है। 2। हे प्रभू जी! जो लोग आपको सिमरते हैं, आपका ध्यान धरते हैं, वो लोग अपनी जिंदगी में सुखी बसते हैं। जिन लोगों ने हरि नाम सिमरा है, वे हमेशा के लिए माया के बंधनों से आजाद हो गये हैं, उनकी यमों वाली फांसी टूट गई है (भाव, आत्मिक मौत उनके नजदीक नहीं फटकती)। जिन लोगों ने सदा निरभउ प्रभू का नाम सिमरा है; प्रभू उनका सारा डर दूर कर देता है। जिन मनुष्यों ने प्यारे प्रभू को हमेशा सिमरा है, वो प्रभू के रूप में ही लीन हो गये हैं। सौभाग्यशाली हैं वे मनुष्य, धन्य हैं वह लोग, जिन्होंने प्रभू का नाम सिमरा है। दास नानक उनके सदके जाता है। 3। हे प्रभू! आपकी भक्ति के बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। हे हरी! अनेकों और बेअंतों आपके भक्त आपकी सिफत सलाह कर रहे हैं। हे प्रभू! अनेकों जीव आपकी पूजा करते हैं। बेअंत जीव (आपको मिलने के लिए) तप साधना करते हैं। आपके अनेकों (सेवक) कई समृतियां व शास्त्र पढ़ते हैं (और उनके बताए हुए) छे धार्मिक कर्म व और कर्म करते हैं। हे दास नानक! वही भगत भले हैं (उनके ही प्रयत्न कबूल हुए मानों) जो प्यारे हरि-भगवंत को प्यारे लगते है। 4। हे प्रभू! आप सारे जगत के मूल हैं। सबमें व्यापक हैं, बेअंत हैं, सबको पैदा करने वाले हैं और आपके बराबर का और कोई नहीं। आप हरेक युग में स्वयं ही हैं, सदा स्वयं ही हैं। आप सदा कायम रहने वाले हैं, सबको पैदा करने वाले हैं, सबकी सार लेने वाले हैं। हे प्रभू! जगत में वही होता है जो आपको स्वयं को अच्छा लगता है। वही होता है जो आप स्वयं करते हैं। हे प्रभू! सारी सृष्टि आपने स्वयं पैदा की है। आप ही इसको पैदा करके स्वयं ही इसका नाश करते हैं। दास नानक उस करतार के गुण गाता है जो हरेक जीव के दिल की जानने वाला है। 5। 1।नोट: इस शबद के पाँच बंद हैं। हरेक बंद में पाँच तुके हैं। आखिरी बंद की समाप्ति पर अंक ‘5’ के साथ एक और अंक ‘1’ दिया गया है। इसका अर्थ है कि शीर्षक ‘सो पुरखु’ एक नया संग्रह है जिसका यह पहला शबद है।
· शबद
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
आसा महला 4 ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥
जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥
तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥
जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥
विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥
जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥
हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥
जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥
तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥
जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥
विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥
जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥
हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे प्रभू!) आप सबको पैदा करने वाले हैं, आप सदा कायम रहने वाले हैं, आप ही हमारे खसम, पति और मालिक हैं। (जगत में) वही कुछ होता है जो आपको पसंद आता है। जो कुछ आप दें, हमें वही प्राप्त हो सकता है। 1। रहाउ। (हे प्रभू!) सारी सृष्टि आपकी (ही बनाई हुई) है, सारे जीव आपको ही सिमरते हैं। जिस पर आप दया करते हैं उसने आपका रतन जैसा (कीमती) नाम ढूँढ लिया है। गुरमुखों (साधकों) ने आपको प्राप्त किया ,जो अपने मन के पीछे चला, उसने (यह जीवन) गवा लिया। (पर, किसी जीव के क्या बस? हे प्रभू!) जीव को आप स्वयं ही अपने से बिछोड़ते हैं और स्वयं ही अपने से मिला लेते हैं। 1। (हे प्रभू!) आप जिंदगी के मानो एक दरिया हैं, सारे जीव आपके में ही (मानों, लहरें) हैं। आपके बिना (आप जैसा) और कोई नहीं। ये सारे जीअ-जंतु आपकी (रची हुई) खेल हैं। जिनके माथे पर विछोड़े का लेख है, वह मानव जन्म प्राप्त करके भी आपसे विछुड़े हुए हैं। (पर, आपकी रज़ा अनुसार) संजोगों केलेख से (फिर आपके साथ) मिलाप हो जाता है। 2। (हे प्रभू!) जिस मनुष्य को आप स्वयं सूझ बख्शते हैं, वह मनुष्य (जीवन का सही रास्ता) समझता है। वह मनुष्य, हे हरी! सदा आपके गुण गाता है, और (औरों को) उचार उचारके सुनाता है। (हे भाई!) जिस मनुष्य ने प्रमात्मा का नाम सिमरा है, उसने सुख हासिल किया है। वह मनुष्य सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहके प्रभू के नाम में लीन हो जाता है। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 11 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।