मनु भूलउ भरमसि भवर तार ॥ बिल बिरथे चाहै बहु बिकार ॥ मैगल जिउ फाससि कामहार ॥ कड़ि बंधनि बाधिओ सीस मार ॥2॥ मनु मुगधौ दादरु भगतिहीनु ॥ दरि भ्रसट सरापी नाम बीनु ॥ ता कै जाति न पाती नाम लीन ॥ सभि दूख सखाई गुणह बीन ॥3॥ मनु चलै न जाई ठाकि राखु ॥ बिनु हरि रस राते पति न साखु ॥ तू आपे सुरता आपि राखु ॥ धरि धारण देखै जाणै आपि ॥4॥ आपि भुलाए किसु कहउ जाइ ॥ गुरु मेले बिरथा कहउ माइ ॥ अवगण छोडउ गुण कमाइ ॥ गुर सबदी राता सचि समाइ ॥5॥ सतिगुर मिलिऐ मति ऊतम होइ ॥ मनु निरमलु हउमै कढै धोइ ॥ सदा मुकतु बंधि न सकै कोइ ॥ सदा नामु वखाणै अउरु न कोइ ॥6॥ मनु हरि कै भाणै आवै जाइ ॥ सभ महि एको किछु कहणु न जाइ ॥ सभु हुकमो वरतै हुकमि समाइ ॥ दूख सूख सभ तिसु रजाइ ॥7॥ तू अभुलु न भूलौ कदे नाहि ॥ गुर सबदु सुणाए मति अगाहि ॥ तू मोटउ ठाकुरु सबद माहि ॥ मनु नानक मानिआ सचु सलाहि ॥8॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (माया के प्रभाव के कारण) गलत रास्ते पर पड़ा हुआ मन भौरे की तरह भटकता है। मन इन्द्रियों के द्वारा बहुत सारे व्यर्थ के विकार करना चाहता है। यह मन कामातुर हाथी की तरह फसता है जो जंजीरों से कड़ों से बाँधा जाता है और सिर पर चोटें सहता है। 2। मूर्ख मन भगती से वंचित रहता है। (यह मूर्ख मन। मानो) मेंढक है (जो नजदीक ही उगे हुए कमल के फूल की कद्र नहीं जानता)। (गलत राह पर पड़ा हुआ मन) प्रभू के दर से गिरा हुआ है। (जैसे) श्रापित है। परमात्मा के नाम से वंचित है। जो मनुष्य नाम से ख़ाली है उसकी ना कोई अच्छी जाति मानी जाती है ना अच्छी कुल। कोई उसका नाम तक नहीं लेता। वह आत्मिक गुणों से वंचित रहता है। सारे दुख ही दुख उसके साथी बने रहते हैं। 3। हे भाई ! ये मन चंचल है। इसको रोक के रख ताकि यह (विकारों के पीछे) भटकता ना फिरे। परमात्मा के नाम-रस में रंगे जाने के बिना ना कभी इज्जत मिलती है ना कोई ऐतबार करता है। सृष्टि रच के परमात्मा स्वयं ही (इसकी आवश्यक्ताएं भी) जानता है (इस वास्ते। हे भाई ! प्रभू के दर पर अरदास कर और कह- हे प्रभू !) आप स्वयं ही (हम जीवों की अरदासें) सुनने वाला है। और स्वयं ही हमारा रखवाला है। 4। मैं प्रभू के बिना और किसको जा के कहूँ। प्रभू स्वयं ही (जीवों को) गलत राह पर डालता है। हे माँ ! प्रभू स्वयं ही गुरू मिलाता है। सो। मैं गुरू के दर पर ही दिल का दुख कह सकता हूँ। गुरू की सहायता से ही गुण कमा के अवगुण त्याग सकता हूँ। जो मनुष्य गुरू के शबद में मस्त रहता है। वह उस सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहता है। 5। यदि गुरू मिल जाए तो (मनुष्य की) मति श्रेष्ठ हो जाती है। मन पवित्र हो जाता है। वह मनुष्य अपने मन में से अहंकार की मैल धो के निकाल देता है। वह विकारों से सदा बचा रहता है। कोई (विकार) उसको काबू नहीं कर सकता। वह सदा परमात्मा का नाम सिमरता है। कोई और (शुगल उसको अपनी तरफ खींच) नहीं सकते। 6। (पर। जीव के भी क्या वश। इस मन की कोई पेश नहीं चलती) यह मन परमात्मा की रज़ा अनुसार (माया के मोह में) भटकता फिरता है। वह प्रभू स्वयं ही सब जीवों में बसता है (उसकी रज़ा के उलट) कोई हील-हुज्जत नहीं की जा सकती। हर जगह प्रभू का हुकम ही चल रहा है। सारी सृष्टि प्रभू के हुकम में ही बँधी रहती है। (जीव को होने वाले) सारे दुख और सुख उस परमात्मा की रजा के अनुसार ही हैं। 7। हे प्रभू ! आप अभुल है। गलती नहीं करता। तूझमें कभी भी कोई कमी नहीं आती। (आपकी रजा के अनुसार) गुरू जिसको अपना शबद सुनाता है उस मनुष्य की मति भी अगाध (गहरी) हैं जाती है (भाव। वह भी गहरी समझ वाला हो जाता है और किसी तरह की कोई कमी-बेशी उस पर प्रभाव नहीं डाल सकती)। हे प्रभू ! आप बड़ा (पालनहार) मालिक है और गुरू के शबद में बसता है (भाव। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है उसको आपके दर्शन हैं जाते हैं)। उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की सिफत-सालाह कर के नानक का मन (उसकी याद में) पतीज गया है। 8। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ जिस मनुष्य को परमात्मा के दर्शन की तमन्ना होती है। वह प्रभू के बिना और आसरे छोड़ के एक परमात्मा के नाम में ही मस्त रहता है। (जैसे दूध मथ के। बार-बार मथानी हिला के। मक्खन निकाला जाता है। वैसे ही) वह मनुष्य बार-बार सिमर के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस चखता है। और उसका दुख-कलेश दूर हो जाता है। गुरू की शरण पड़ के वह (परमात्मा के सही स्वरूप को) समझ लेता है। और उस एक प्रभू के नाम में लीन रहता है। 1। हे प्रभू ! बेअंत दुनिया आपके दर्शन के लिए तरले लेती है। पर कोई विरला मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के (आपके स्वरूप को) पहचानता है। 1। रहाउ। वेद आदि धर्म पुस्तक भी व्याख्या करके यही कहते हैं कि एक उस परमात्मा को सिमरना चाहिए जो बेअंत है और जिस का अंत किसी जीव ने नहीं पाया। वह एक स्वयं ही स्वयं करतार है जिसने जगत रचा है। जिसने किसी दिखाई देते सहारे के बिना ही धरती और आकाश को ठहराया हुआ है। 2। समझदार मनुष्य पूरे गुरू से समझ लेता है कि परमात्मा की सिफतसालाह की लगन ही असल ज्ञान है और असल ध्यान (जोड़ना) है। एक परमात्मा ही ऐसा है जिसको किसी सहारे की आवश्यक्ता नहीं। उस अकॅथ प्रभू की सिफतसालाह करनी चाहिए। उसकी सिफत-सालाह का शबद ही (मनुष्य के पास जीव-पथ में) सच्चा परवाना है। 3। जो कोई मनुष्य अपने हृदय में यह निश्चय बैठा लेता है कि सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमरना हीएक मात्र ठीक धर्म है। वही गुरू की मति का आसरा ले के सदा के लिए (विकारों के मुकाबले पर) अडोल हो जाता है; वह मनुष्य एक-तार सुरति जोड़ के अविनाशी प्रभू में मस्त रहता है। गुरू की शरण पड़ के वह मनुष्य अदृष्य और बेअंत प्रभू के दर्शन कर लेता है। 4। (जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है उसे यकीन बन जाता है कि सारे जगत का मालिक परमात्मा ही सदा-स्थिर) एकम्-एक पातशाह है (और उसी का ही सदा-स्थिर रहने वाला) एकम्-एक तख़्त है। वह पातिशाह सब जगहों में व्यापक है (सारे जगत की कार चलाता हुआ भी वह सदा) बेफिक्र रहता है। सारा जगत उसी प्रभू का बनाया हुआ है। वही तीनों भवनों का मूल है। पर वह अपहँुच है। मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। (हर जगह) वह स्वयं ही स्वयं है। 5। (ये सारा संसार उसी) एक परमात्मा का स्वरूप है। उसका नाम सदा-स्थिर रहने वाला है। उसकी दरगाह में सदा-स्थिर न्याय ही चलता है। जिस मनुष्य ने सदा-स्थिर प्रभू की सलाह को अपना कर्तव्य बनाया है उसको सच्ची दरगाह में आदर मिलता है सम्मान मिलता है। दरगाह में वह कबूल होता है। 6। (जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है उसको निश्चय हो जाता है कि) परमात्मा की भगती परमात्मा के साथ प्यार ही एक-मात्र जीवन-राह है। जो मनुष्य भगती से वंचित है प्रभू के डर-अदब से खाली है उसको पैदा होने-मरने का चक्कर मिला रहता है। जो मनुष्य गुरू से शिक्षा ले के (जगत में) मेहमान (बन के) जीता है और
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया के प्रभाव के कारण) गलत रास्ते पर पड़ा हुआ मन भौरे की तरह भटकता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।