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अंग 1184

अंग
1184
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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से धनवंत जिन हरि प्रभु रासि ॥
काम क्रोध गुर सबदि नासि ॥
भै बिनसे निरभै पदु पाइआ ॥
गुर मिलि नानकि खसमु धिआइआ ॥2॥
साधसंगति प्रभि कीओ निवास ॥
हरि जपि जपि होई पूरन आस ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ ॥
गुर मिलि नानकि हरि हरि कहिआ ॥3॥
असट सिधि नव निधि एह ॥ करमि परापति जिसु नामु देह ॥
प्रभ जपि जपि जीवहि तेरे दास ॥
गुर मिलि नानक कमल प्रगास ॥4॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा की नाम-पूँजी मौजूद है वे धनवान हैं। गुरू के शबद की बरकति से उनके अंदर से काम-क्रोध (आदि विकार) नाश हो जाते हैं। उनके सारे डर दूर हो जाते हैं। वे ऐसा आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लेते हैं जहाँ कोई डर छू नहीं सकता। हे भाई ! गुरू को मिल के नानक ने (भी) उस पति-प्रभू को सिमरा है। 2। हे भाई ! परमात्मा ने जिस मनुष्य का ठिकाना साध-संगति में बना दिया है। परमात्मा का नाम जप-जप के उसकी हरेक आशा पूरी हो जाती है। वह प्रभू पानी में धरती में आकाश में (हर जगह) व्यापक है। गुरू को मिल के नानक ने (भी) उसी का सिमरन किया है। 3। हे भाई ! ये हरी-नाम ही (सिद्धों की) आठ आत्मिक शक्तियां हैं (कुबेर के) नौ-खजाने हैं। जिस मनुष्य को प्रभू ये नाम देता है उसी को उसकी मेहर से मिलता है। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! आपके दास (आपका नाम) जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। गुरू को मिल के (नाम की बरकति से उनका) हृदय-कमल खिला रहता है। 4। 13।
बसंतु महला 5 घरु 1 इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल इछा जपि पुंनीआ ॥
प्रभि मेले चिरी विछुंनिआ ॥1॥
तुम रवहु गोबिंदै रवण जोगु ॥
जितु रविऐ सुख सहज भोगु ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा नदरि निहालिआ ॥
अपणा दासु आपि सम॑ालिआ ॥2॥
सेज सुहावी रसि बनी ॥
आइ मिले प्रभ सुख धनी ॥3॥
मेरा गुणु अवगणु न बीचारिआ ॥
प्रभ नानक चरण पूजारिआ ॥4॥1॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 घरु 1 इक तुके सतिगुर प्रसादि॥ (परमात्मा का नाम) जप के उनकी सारी मुरादें पूरी हो गई। हे भाई ! (जिन्होंने सिमरन किया। उनका) चिर के विछुड़े हुओं को (भी) प्रभू ने (अपने चरणों के साथ) मिला लिया। 1। हे भाई ! आप सिमरने योग्य गोबिंद का नाम सिमरा करो। अगर (उसका नाम) सिमरा जाए। तो आत्मिक अडोलता के सुखों का स्वाद (प्राप्त होता है)। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने अपने दास की (सदा) स्वयं संभाल की है। कृपा करके (प्रभू ने अपने दास को सदा) मेहर भरी निगाह से देखा है। 2। हे भाई ! सुखों के मालिक प्रभू जी (जिस मनुष्य को) आ के मिल लेते हैं। (प्रभू-मिलाप के) स्वाद से उनकी हृदय-सेज सोहानी बन जाती है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू ने मेरा कोई गुण नहीं बिचारा। कोई अवगुण नहीं विचारा। (मेहर कर के उसने मुझे) अपने चरणों का पुजारी बना लिया है। 4। 1। 14।
बसंतु महला 5 ॥
किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥
अनदिन उपजी सहज धुना ॥1॥
मनु मउलिओ हरि चरन संगि ॥
करि किरपा साधू जन भेटे नित रातौ हरि नाम रंगि ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा प्रगटे गोुपाल ॥
लड़ि लाइ उधारे दीन दइआल ॥2॥
इहु मनु होआ साध धूरि ॥
नित देखै सुआमी हजूरि ॥3॥
काम क्रोध त्रिसना गई ॥
नानक प्रभ किरपा भई ॥4॥2॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! (कोई भी मनुष्य हो। परमात्मा के) गुण गा-गा के उसके सारे पाप नाश हो जाते हैं। उसके अंदर हर वक्त आत्मिक अडोलता की रौंअ पैदा हुई रहती है। 1। हे भाई ! परमात्मा मेहर करके जिस सेवक को गुरू मिलाता है। वह सेवक सदा हरी-नाम रंग में रंगा जाता है। उस सेवक का मन प्रभू के चरणों में (जुड़ के) आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! मेहर कर के गोपाल-प्रभू (जिस मनुष्य के हृदय में) प्रगट होता है। दीनों पर दया करने वाला प्रभू उसको अपने पल्ले से लगा के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा देता है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य का ये मन गुरू के चरणों की धूड़ बनता है। वह मनुष्य स्वामी प्रभू को सदा अपने अंग-संग बसता देखता है। 3। (उसके अंदर से) काम-क्रोध-तृष्णा (आदिक विकार) दूर हो जाते हैं। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर होती है 4। 2। 15।
बसंतु महला 5 ॥
रोग मिटाए प्रभू आपि ॥
बालक राखे अपने कर थापि ॥1॥
सांति सहज ग्रिहि सद बसंतु ॥
गुर पूरे की सरणी आए कलिआण रूप जपि हरि हरि मंतु ॥1॥ रहाउ ॥
सोग संताप कटे प्रभि आपि ॥
गुर अपुने कउ नित नित जापि ॥2॥
जो जनु तेरा जपे नाउ ॥
सभि फल पाए निहचल गुण गाउ ॥3॥
नानक भगता भली रीति ॥
सुखदाता जपदे नीत नीति ॥4॥3॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! (जो मनुष्य पूरे गुरू की शरण आते हैं) परमात्मा स्वयं (उनके सारे) रोग मिटा देता है। उन बच्चों को अपने हाथों से थापणा दे के उनकी रक्षा करता है (जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों की संभाल करते हैं)। 1। हे भाई ! (जो मनुष्य) पूरे गुरू की शरण आते हैं। सुख-स्वरूप परमात्मा का नाम-मंत्र जप के (उनके हृदय-) घर में आत्मिक अडोलता वाली शांति बनी रहती है। सदा कायम रहने वाली उमंग बनी रहती है। 1। रहाउ। प्रभू आप ही चिन्ता व दुख मिटा देता है। अपने गुरू को रोज-रोज याद करना चाहिये। 2। हे भाई ! जो मनुष्य आपका नाम जपता है। वह मनुष्य आपके सदा कायम रहने वाले गुणों का गायन कर के सारे फल प्राप्त कर लेता है। 3। हे नानक ! भगत-जनों की ये सुंदर जीवन-मर्यादा है। कि वे सदा ही सुखों के देने वाले परमात्मा का नाम जपते रहते हैं। 4। 3। 16।
बसंतु महला 5 ॥
हुकमु करि कीन॑े निहाल ॥
अपने सेवक कउ भइआ दइआलु ॥1॥
गुरि पूरै सभु पूरा कीआ ॥
अंम्रित नामु रिद महि दीआ ॥1॥ रहाउ ॥
करमु धरमु मेरा कछु न बीचारिओ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ अपने हुकम अनुसार उनको प्रसन्न-चित्त रखता है। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवकों पर (सदा) दयावान होता है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम (जिस मनुष्य के) हृदय में बसा दिया। (उस मनुष्य का उसने) हरेक काम सफल कर दिया (उसका सारा जीवन ही सफल हो गया)। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू ने) मेरा (भी) कोई (अच्छा) कर्म नहीं विचारा मेरा कोई धर्म नहीं विचारा।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा की नाम-पूँजी मौजूद है वे धनवान हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।