काम क्रोध गुर सबदि नासि ॥
भै बिनसे निरभै पदु पाइआ ॥
गुर मिलि नानकि खसमु धिआइआ ॥2॥
साधसंगति प्रभि कीओ निवास ॥
हरि जपि जपि होई पूरन आस ॥
जलि थलि महीअलि रवि रहिआ ॥
गुर मिलि नानकि हरि हरि कहिआ ॥3॥
असट सिधि नव निधि एह ॥ करमि परापति जिसु नामु देह ॥
प्रभ जपि जपि जीवहि तेरे दास ॥
गुर मिलि नानक कमल प्रगास ॥4॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल इछा जपि पुंनीआ ॥
प्रभि मेले चिरी विछुंनिआ ॥1॥
तुम रवहु गोबिंदै रवण जोगु ॥
जितु रविऐ सुख सहज भोगु ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा नदरि निहालिआ ॥
अपणा दासु आपि सम॑ालिआ ॥2॥
सेज सुहावी रसि बनी ॥
आइ मिले प्रभ सुख धनी ॥3॥
मेरा गुणु अवगणु न बीचारिआ ॥
प्रभ नानक चरण पूजारिआ ॥4॥1॥14॥
किलबिख बिनसे गाइ गुना ॥
अनदिन उपजी सहज धुना ॥1॥
मनु मउलिओ हरि चरन संगि ॥
करि किरपा साधू जन भेटे नित रातौ हरि नाम रंगि ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा प्रगटे गोुपाल ॥
लड़ि लाइ उधारे दीन दइआल ॥2॥
इहु मनु होआ साध धूरि ॥
नित देखै सुआमी हजूरि ॥3॥
काम क्रोध त्रिसना गई ॥
नानक प्रभ किरपा भई ॥4॥2॥15॥
रोग मिटाए प्रभू आपि ॥
बालक राखे अपने कर थापि ॥1॥
सांति सहज ग्रिहि सद बसंतु ॥
गुर पूरे की सरणी आए कलिआण रूप जपि हरि हरि मंतु ॥1॥ रहाउ ॥
सोग संताप कटे प्रभि आपि ॥
गुर अपुने कउ नित नित जापि ॥2॥
जो जनु तेरा जपे नाउ ॥
सभि फल पाए निहचल गुण गाउ ॥3॥
नानक भगता भली रीति ॥
सुखदाता जपदे नीत नीति ॥4॥3॥16॥
हुकमु करि कीन॑े निहाल ॥
अपने सेवक कउ भइआ दइआलु ॥1॥
गुरि पूरै सभु पूरा कीआ ॥
अंम्रित नामु रिद महि दीआ ॥1॥ रहाउ ॥
करमु धरमु मेरा कछु न बीचारिओ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा की नाम-पूँजी मौजूद है वे धनवान हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।