मोहि अनाथ प्रभ तेरी सरण ॥
जीअ जंत तेरे आधारि ॥
करि किरपा प्रभ लेहि निसतारि ॥2॥
भव खंडन दुख नास देव ॥
सुरि नर मुनि जन ता की सेव ॥
धरणि अकासु जा की कला माहि ॥
तेरा दीआ सभि जंत खाहि ॥3॥
अंतरजामी प्रभ दइआल ॥
अपणे दास कउ नदरि निहालि ॥
करि किरपा मोहि देहु दानु ॥
जपि जीवै नानकु तेरो नामु ॥4॥10॥
राम रंगि सभ गए पाप ॥
राम जपत कछु नही संताप ॥
गोबिंद जपत सभि मिटे अंधेर ॥
हरि सिमरत कछु नाहि फेर ॥1॥
बसंतु हमारै राम रंगु ॥
संत जना सिउ सदा संगु ॥1॥ रहाउ ॥
संत जनी कीआ उपदेसु ॥
जह गोबिंद भगतु सो धंनि देसु ॥
हरि भगतिहीन उदिआन थानु ॥
गुर प्रसादि घटि घटि पछानु ॥2॥
हरि कीरतन रस भोग रंगु ॥
मन पाप करत तू सदा संगु ॥
निकटि पेखु प्रभु करणहार ॥
ईत ऊत प्रभ कारज सार ॥3॥
चरन कमल सिउ लगो धिआनु ॥
करि किरपा प्रभि कीनो दानु ॥
तेरिआ संत जना की बाछउ धूरि ॥
जपि नानक सुआमी सद हजूरि ॥4॥11॥
सचु परमेसरु नित नवा ॥
गुर किरपा ते नित चवा ॥
प्रभ रखवाले माई बाप ॥
जा कै सिमरणि नही संताप ॥1॥
खसमु धिआई इक मनि इक भाइ ॥
गुर पूरे की सदा सरणाई साचै साहिबि रखिआ कंठि लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
अपणे जन प्रभि आपि रखे ॥
दुसट दूत सभि भ्रमि थके ॥
बिनु गुर साचे नही जाइ ॥
दुखु देस दिसंतरि रहे धाइ ॥2॥
किरतु ओन॑ा का मिटसि नाहि ॥
ओइ अपणा बीजिआ आपि खाहि ॥
जन का रखवाला आपि सोइ ॥
जन कउ पहुचि न सकसि कोइ ॥3॥
प्रभि दास रखे करि जतनु आपि ॥
अखंड पूरन जा को प्रतापु ॥
गुण गोबिंद नित रसन गाइ ॥
नानकु जीवै हरि चरण धिआइ ॥4॥12॥
गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥
पारब्रहमि प्रभि करी मइआ ॥
सरब मनोरथ पूरन काम ॥
जपि जीवै नानकु राम नाम ॥1॥
सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥
बिनु सतिगुर दीसै बिललांती साकतु फिरि फिरि आवै जावै ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सब ताकतों के मालिक ! हे स्वामी ! हे जगत के मूल ! हे प्रभू ! मैं अनाथ आपकी शरण में आया हूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।