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अंग 1183

अंग
1183
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
समरथ सुआमी कारण करण ॥
मोहि अनाथ प्रभ तेरी सरण ॥
जीअ जंत तेरे आधारि ॥
करि किरपा प्रभ लेहि निसतारि ॥2॥
भव खंडन दुख नास देव ॥
सुरि नर मुनि जन ता की सेव ॥
धरणि अकासु जा की कला माहि ॥
तेरा दीआ सभि जंत खाहि ॥3॥
अंतरजामी प्रभ दइआल ॥
अपणे दास कउ नदरि निहालि ॥
करि किरपा मोहि देहु दानु ॥
जपि जीवै नानकु तेरो नामु ॥4॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे सब ताकतों के मालिक ! हे स्वामी ! हे जगत के मूल ! हे प्रभू ! मैं अनाथ आपकी शरण में आया हूँ। हे प्रभू ! सारे जीव-जंतु आपके ही आसरे हैं। मेहर कर (इनको संसार-समुंद्र से) पार लंघा ले। 2। हे जनम-मरण के चक्कर काटने वाले ! हे दुखों का नाश करने वाले ! हे प्रकाश-स्वरूप ! सारे जीव आपका दिया (अन्न) खाते हैं। हे भाई ! धरती और आकाश जिस (परमात्मा) की कला के आसरे टिके हुए हैं। दैवी गुणों वाले मनुष्य और मुनि-जन उसकी सेवा-भगती करते हैं। 3। हे सबके दिलों की जानने वाले दयालु प्रभू ! अपने दास को मेहर की निगाह से देख। मेहर करके मुझे (यह) दान दे कि (आपका दास) नानक आपका नाम जप के आत्मिक जीवन प्राप्त करे। 4। 10।
बसंतु महला 5 ॥
राम रंगि सभ गए पाप ॥
राम जपत कछु नही संताप ॥
गोबिंद जपत सभि मिटे अंधेर ॥
हरि सिमरत कछु नाहि फेर ॥1॥
बसंतु हमारै राम रंगु ॥
संत जना सिउ सदा संगु ॥1॥ रहाउ ॥
संत जनी कीआ उपदेसु ॥
जह गोबिंद भगतु सो धंनि देसु ॥
हरि भगतिहीन उदिआन थानु ॥
गुर प्रसादि घटि घटि पछानु ॥2॥
हरि कीरतन रस भोग रंगु ॥
मन पाप करत तू सदा संगु ॥
निकटि पेखु प्रभु करणहार ॥
ईत ऊत प्रभ कारज सार ॥3॥
चरन कमल सिउ लगो धिआनु ॥
करि किरपा प्रभि कीनो दानु ॥
तेरिआ संत जना की बाछउ धूरि ॥
जपि नानक सुआमी सद हजूरि ॥4॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा के प्यार में (टिकने से) सारे पाप मिट जाते हैं। परमात्मा का नाम जपने से दुख-कलेश छू नहीं सकते। गोबिंद का नाम जपने से (माया के मोह के) सारे अंधेरे मिट जाते हैं। हरी-नाम सिमरने से जनम-मरण के चक्कर नहीं रह जाते। 1। (अब) मेरे अंदर परमात्मा (के नाम) का प्यार बन गया है। मेरे हृदय में उमंग पैदा हो गई है। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) संत-जनों के साथ (मेरा) सदा साथ बना रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! संत-जनों ने शिक्षा दी है कि जहाँ परमात्मा का भगत बसता है वह देश भाग्यशाली है और परमात्मा की भगती से वंचित स्थान उजाड़ (बिआबान के तूल्य) है। हे भाई ! गुरू की कृपा से (आप उस परमात्मा को) हरेक शरीर में बसता समझ। 2। हे (मेरे) मन ! परमात्मा की सिफत-सालाह को ही दुनिया के रसों-भोगों की मौज-बहार समझ। हे मन ! पाप करते हुए सदा झिझका कर। सब कुछ कर सकने वाले प्रभू को (अपने) नजदीक बसता देख। इस लोक के और परलोक के सारे काम प्रभू ही सँवारने वाला है। 3। हे भाई ! प्रभू ने मेहर करके (जिस मनुष्य पर) बख्शिश की। उसकी सुरति प्रभू के सुंदर चरणों में जुड़ गई। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं आपके संत-जनों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। (ताकि) हे स्वामी ! (उनकी संगति की बरकति से आपको) सदा अंग-संग समझ के जपता रहूँ। 4। 11।
बसंतु महला 5 ॥
सचु परमेसरु नित नवा ॥
गुर किरपा ते नित चवा ॥
प्रभ रखवाले माई बाप ॥
जा कै सिमरणि नही संताप ॥1॥
खसमु धिआई इक मनि इक भाइ ॥
गुर पूरे की सदा सरणाई साचै साहिबि रखिआ कंठि लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
अपणे जन प्रभि आपि रखे ॥
दुसट दूत सभि भ्रमि थके ॥
बिनु गुर साचे नही जाइ ॥
दुखु देस दिसंतरि रहे धाइ ॥2॥
किरतु ओन॑ा का मिटसि नाहि ॥
ओइ अपणा बीजिआ आपि खाहि ॥
जन का रखवाला आपि सोइ ॥
जन कउ पहुचि न सकसि कोइ ॥3॥
प्रभि दास रखे करि जतनु आपि ॥
अखंड पूरन जा को प्रतापु ॥
गुण गोबिंद नित रसन गाइ ॥
नानकु जीवै हरि चरण धिआइ ॥4॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। (फिर वह प्यारा लगता है क्योंकि वह) सदा ही नया है। गुरू की मेहर से मैं सदा (उसका नाम) उचारता हूँ। हे भाई ! (जैसे) माता-पिता (अपने बच्चे का ध्यान रखते हैं। वैसे ही) प्रभू जी सदा (मेरे) रखवाले हैं (वह प्रभू ऐसा है) कि उसके सिमरन से कोई दुख-कलेश छू नहीं सकते। 1। (अब) मैं एकाग्र मन से उसके प्यार में टिक के उस पति-प्रभू को सिमरता रहता हूँ। हे भाई ! मैं पूरे गुरू की सदा शरण पड़ा रहता हूँ (उसकी मेहर से) सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभू ने (मुझे) अपने गले से लगा के (मेरी) रक्षा की हुई है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने अपने सेवकों की सदा स्वयं रक्षा की है (सेवकों के) दुष्ट वैरी सारे भटक-भटक के हार जाते हैं। (सेवकों को) सदा-स्थिर प्रभू के रूप गुरू के बिना और कोई आसरा नहीं होता। (जो मनुष्य गुरू को छोड़ के) और-और जगहों पर भटकते फिरते हैं। उन्हें दुख (व्यापता है)। 2। हे भाई ! (गुरू को छोड़ के अन्य जगहों पर भटकने वाले) उन मनुष्यों का (यह) किया हुआ काम (किए इन कामों का संस्कार-समूह उनके अंदर से) मिटता नहीं। अपने किए कर्मों का फल वह स्वयं ही खाते हैं। अपने सेवक का रखवाला प्रभू स्वयं बनता है। कोई और मनुष्य प्रभू के सेवक की बराबरी नहीं कर सकता। 3। उसने (विशेष) प्रयत्न कर के अपने सेवकों की सदा स्वयं रक्षा की है। हे भाई ! जिस प्रभू का अटुट व सम्पूर्ण प्रताप है। हे भाई ! उस गोबिंद के गुण सदा अपनी जीभ से गाया कर। नानक (भी) उस परमात्मा के चरणों का ध्यान धर के आत्मिक जीवन हासिल करता रहता है। 4। 12।
बसंतु महला 5 ॥
गुर चरण सरेवत दुखु गइआ ॥
पारब्रहमि प्रभि करी मइआ ॥
सरब मनोरथ पूरन काम ॥
जपि जीवै नानकु राम नाम ॥1॥
सा रुति सुहावी जितु हरि चिति आवै ॥
बिनु सतिगुर दीसै बिललांती साकतु फिरि फिरि आवै जावै ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ गुरू के चरण हृदय में बसा के उस मनुष्य का हरेक दुख दूर हो जाता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) पारब्रहम ने मेहर की। उसकी सारी मुरादें उसके सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। हे भाई ! नानक (भी) उस परमात्मा का नाम जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा है। 1। हे भाई ! (मनुष्यों के लिए) वह ऋतु सुंदर होती है जब परमात्मा उसके चित्त में आ बसता है। गुरू की शरण के बिना (दुनिया) बिलकती दिखती है। परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य बार-बार पैदा होता मरता रहता है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सब ताकतों के मालिक ! हे स्वामी ! हे जगत के मूल ! हे प्रभू ! मैं अनाथ आपकी शरण में आया हूँ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।