जाप न ताप न करम कीति ॥
आवै नाही कछू रीति ॥
मन महि राखउ आस एक ॥
नाम तेरे की तरउ टेक ॥2॥
सरब कला प्रभ तुम॑ प्रबीन ॥
अंतु न पावहि जलहि मीन ॥
अगम अगम ऊचह ते ऊच ॥
हम थोरे तुम बहुत मूच ॥3॥
जिन तू धिआइआ से गनी ॥
जिन तू पाइआ से धनी ॥
जिनि तू सेविआ सुखी से ॥
संत सरणि नानक परे ॥4॥7॥
तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥
तिसु अराधि जिनि जीउ दीआ ॥
तिस का चाकरु होहि फिरि डानु न लागै ॥
तिस की करि पोतदारी फिरि दूखु न लागै ॥1॥
एवड भाग होहि जिसु प्राणी ॥
सो पाए इहु पदु निरबाणी ॥1॥ रहाउ ॥
दूजी सेवा जीवनु बिरथा ॥
कछू न होई है पूरन अरथा ॥
माणस सेवा खरी दुहेली ॥
साध की सेवा सदा सुहेली ॥2॥
जे लोड़हि सदा सुखु भाई ॥
साधू संगति गुरहि बताई ॥
ऊहा जपीऐ केवल नाम ॥
साधू संगति पारगराम ॥3॥
सगल तत महि ततु गिआनु ॥
सरब धिआन महि एकु धिआनु ॥
हरि कीरतन महि ऊतम धुना ॥
नानक गुर मिलि गाइ गुना ॥4॥8॥
जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥
जिसु सिमरत निरमल है सोइ ॥
जिसु अराधे जमु किछु न कहै ॥
जिस की सेवा सभु किछु लहै ॥1॥
राम राम बोलि राम राम ॥
तिआगहु मन के सगल काम ॥1॥ रहाउ ॥
जिस के धारे धरणि अकासु ॥
घटि घटि जिस का है प्रगासु ॥
जिसु सिमरत पतित पुनीत होइ ॥
अंत कालि फिरि फिरि न रोइ ॥2॥
सगल धरम महि ऊतम धरम ॥
करम करतूति कै ऊपरि करम ॥
जिस कउ चाहहि सुरि नर देव ॥
संत सभा की लगहु सेव ॥3॥
आदि पुरखि जिसु कीआ दानु ॥
तिस कउ मिलिआ हरि निधानु ॥
तिस की गति मिति कही न जाइ ॥
नानक जन हरि हरि धिआइ ॥4॥9॥
मन तन भीतरि लागी पिआस ॥
गुरि दइआलि पूरी मेरी आस ॥
किलविख काटे साधसंगि ॥
नामु जपिओ हरि नाम रंगि ॥1॥
गुर परसादि बसंतु बना ॥
चरन कमल हिरदै उरि धारे सदा सदा हरि जसु सुना ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मेहर कर) मुझे ऊँची आत्मिक अवस्था दे।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।