लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1182 · बसंत

इस पृष्ठ पर
अंग
1182
बसंत
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. तू करि गति मेरी प्रभ दइआर ॥1॥ रहाउ ॥
  2. तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥
  3. जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥
  4. मन तन भीतरि लागी पिआस ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

तू करि गति मेरी प्रभ दइआर ॥1॥ रहाउ ॥

अंग 1181 से चला आ रहा अंश

तू करि गति मेरी प्रभ दइआर ॥1॥ रहाउ ॥
जाप न ताप न करम कीति ॥
आवै नाही कछू रीति ॥
मन महि राखउ आस एक ॥
नाम तेरे की तरउ टेक ॥2॥
सरब कला प्रभ तुम॑ प्रबीन ॥
अंतु न पावहि जलहि मीन ॥
अगम अगम ऊचह ते ऊच ॥
हम थोरे तुम बहुत मूच ॥3॥
जिन तू धिआइआ से गनी ॥
जिन तू पाइआ से धनी ॥
जिनि तू सेविआ सुखी से ॥
संत सरणि नानक परे ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: (मेहर करें) मुझे ऊँची आत्मिक अवस्था दें। 1। रहाउ। हे प्रभू! मैंने कोई जप नहीं किए। मैंने कोई तप नहीं किए। मैंने (तीर्थ-स्नान आदि निर्धारित धार्मिक) कर्म भी नहीं किए; कोई धार्मिक रीति-रस्म भी करनी मुझे नहीं आती। पर, हे प्रभू! मैं अपने मन में सिर्फ ये आस रखे बैठा हूँ। कि आपके नाम के आसरे मैं (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाऊँगा। 2। हे प्रभू! आप सारी ही ताकतों में पूरे हैं (हम जीव आपका अंत नहीं पा सकते। जैसे समुंद्र के) पानी की मछलियां (समुंद्र का) अंत नहीं पा सकतीं। हे प्रभू! आप अपहुँच हैं। आप अपहुँच हैं। आप ऊँचों से भी ऊँचे हैं। हम जीव छोटी सोच वाले हैं। आप बड़े जिगरे वाले हैं। 3। हे प्रभू! जिन मनुष्यों ने आपका नाम सिमरा है। वह (असल में) दौलतमंद हैं। जिन्होंने आपको पा लिया वे असल धनाढ्य हैं। हे नानक! (कहें: हे प्रभू!) जिस-जिस मनुष्य ने आपकी भक्ति की। वे सब सुखी हैं। वे आपके संतजनों की शरण पड़े रहते हैं। 4। 7।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥

बसंतु महला 5 ॥
तिसु तू सेवि जिनि तू कीआ ॥
तिसु अराधि जिनि जीउ दीआ ॥
तिस का चाकरु होहि फिरि डानु न लागै ॥
तिस की करि पोतदारी फिरि दूखु न लागै ॥1॥
एवड भाग होहि जिसु प्राणी ॥
सो पाए इहु पदु निरबाणी ॥1॥ रहाउ ॥
दूजी सेवा जीवनु बिरथा ॥
कछू न होई है पूरन अरथा ॥
माणस सेवा खरी दुहेली ॥
साध की सेवा सदा सुहेली ॥2॥
जे लोड़हि सदा सुखु भाई ॥
साधू संगति गुरहि बताई ॥
ऊहा जपीऐ केवल नाम ॥
साधू संगति पारगराम ॥3॥
सगल तत महि ततु गिआनु ॥
सरब धिआन महि एकु धिआनु ॥
हरि कीरतन महि ऊतम धुना ॥
नानक गुर मिलि गाइ गुना ॥4॥8॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई! जिस परमात्मा ने आपको पैदा किया है। उसकी सेवा-भक्ति किया करें। जिसने आपको जिंद दी है उसका नाम सिमरा करें। अगर आप उस (परमात्मा) का दास बने रहें, तो आपको (जम आदि की ओर से किसी से भी) दण्ड नहीं लग सकता। (बेअंत भण्डारों के मालिक) उस परमात्मा का सिर्फ भण्डारी बने रहें (फिर उस के दिए किसी पदार्थ के छिन जाने से) आपको कोई दुख नहीं व्यापेगा। 1। हे भाई! जिस मनुष्य के बड़े भाग्य हों। उस मनुष्य को वह आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है जहाँ कोई वासना छू नहीं सकती। 1। रहाउ। हे भाई! (परमात्मा को छोड़ के) किसी और की ख़िदमत में जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। और जरूरत कोई भी पूरी नहीं होती। हे भाई! मनुष्य की खिदमत बहुत दुखदाई हुआ करती है। गुरू की सेवा सदा ही सुख देने वाली होती है। 2। हे भाई! अगर आप चाहते हैं कि सदा आत्मिक आनंद मिला रहे। तो। गुरू ने बताया है कि साध-संगति किया करें। साध-संगति में सिर्फ परमात्मा का नाम जपा जाता है। साध-संगति में टिक के संसार-समुंद्र से पार लांघने के योग्य हुआ जाता है। 3। हे भाई! परमात्मा के साथ जान-पहचान बनानी सब विचारों से उत्तम विचार है। परमात्मा में सुरति टिकाए रखनी अन्य सारी समाधियों से श्रेष्ठ समाधि है। परमात्मा की सिफत-सालाह में सुरति जोड़नी सबसे श्रेष्ठ काम है। हे नानक! गुरू को मिल के गुण गाते रहा करें। 4। 8।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥

बसंतु महला 5 ॥
जिसु बोलत मुखु पवितु होइ ॥
जिसु सिमरत निरमल है सोइ ॥
जिसु अराधे जमु किछु न कहै ॥
जिस की सेवा सभु किछु लहै ॥1॥
राम राम बोलि राम राम ॥
तिआगहु मन के सगल काम ॥1॥ रहाउ ॥
जिस के धारे धरणि अकासु ॥
घटि घटि जिस का है प्रगासु ॥
जिसु सिमरत पतित पुनीत होइ ॥
अंत कालि फिरि फिरि न रोइ ॥2॥
सगल धरम महि ऊतम धरम ॥
करम करतूति कै ऊपरि करम ॥
जिस कउ चाहहि सुरि नर देव ॥
संत सभा की लगहु सेव ॥3॥
आदि पुरखि जिसु कीआ दानु ॥
तिस कउ मिलिआ हरि निधानु ॥
तिस की गति मिति कही न जाइ ॥
नानक जन हरि हरि धिआइ ॥4॥9॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई! (वह हरी-नाम उचारा करें) जिसको उचारने से मुँह पवित्र हो जाता है। जिसको सिमरने से (लोक-परलोक में) बेदाग़ शोभा मिलती है। जिसको आराधने से जम-राज कुछ नहीं कहता (डरा नहीं सकता) जिसकी सेवा-भक्ति से (मनुष्य) हरेक (आवश्यक) चीज़ हासिल कर लेता है। 1। हे भाई! सदा परमात्मा का नाम उचारा करें। हरी-नाम उचारा करें। अपने मन की और सारी वासनाएं छोड़ दें। 1। रहाउ। हे भाई! (उस परमात्मा का नाम सिमरा करें) धरती और आकाश जिसके टिकाए हुए हैं। जिसका नूर हरेक शरीर में है। जिसको सिमरने से विकारी मनुष्य (भी) पवित्र जीवन वाला हो जाता है। (और जिसकी बरकति से) अंत के समय (मनुष्य) बार-बार दुखी नहीं होता। 2। हे भाई! (परमात्मा का नाम सिमरा करें) सारे धर्मों में से (नाम-सिमरन ही) सब से श्रेष्ठ धर्म है। यही कर्म अन्य सारे धार्मिक कर्मों से उत्तम है। हे भाई! (उस परमात्मा को याद किया करें) जिस को (मिलने के लिए) दैवी गुणों वाले मनुष्य और देवतागण भी अभिलाषा रखते हैं। हे भाई! साध-संगति की सेवा किया करें (साध-संगति में से ही नाम-सिमरन की दाति मिलती है)। 3। हे भाई! सब के मूल सर्व-व्यापक प्रभू ने जिस मनुष्य को दाति बख्शी। उसको हरी-नाम का खज़ाना मिल गया। हे दास नानक! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करें। उसकी बाबत यह नहीं बताया जा सकता कि वह किस प्रकार का है और कितना बड़ा है। 4। 9।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

मन तन भीतरि लागी पिआस ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

बसंतु महला 5 ॥
मन तन भीतरि लागी पिआस ॥
गुरि दइआलि पूरी मेरी आस ॥
किलविख काटे साधसंगि ॥
नामु जपिओ हरि नाम रंगि ॥1॥
गुर परसादि बसंतु बना ॥
चरन कमल हिरदै उरि धारे सदा सदा हरि जसु सुना ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई! दयालु गुरू ने मेरी (चिरों की) आस पूरी कर दी है। (अब) मेरे मन में मेरे तन में (हरी-नाम की) लगन बन गई है। गुरू की संगति में (मेरे सारे) पाप कट गए हैं (क्योंकि गुरू की कृपा से) मैं प्रेम-रंग में टिक के परमात्मा का नाम जप रहा हूँ। 1। हे भाई! गुरू की कृपा से (मेरे अंदर) बसंत (ऋतु वाली उमंग) बन गई है। (गुरू की मेहर से) मैंने परमात्मा के सुंदर चरण अपने हृदय में बसा लिए हैं। अब मैं हर वक्त सदा परमात्मा की सिफत-सालाह सुनता हूँ। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1182 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।