बसंतु महला 5 ॥ जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥ मुगध सुंदर धारि जोति कीन॑ ॥ सभि जाचिक प्रभ तुम॑ दइआल ॥ नामु जपत होवत निहाल ॥1॥ मेरे प्रीतम कारण करण जोग ॥ हउ पावउ तुम ते सगल थोक ॥1॥ रहाउ ॥ नामु जपत होवत उधार ॥ नामु जपत सुख सहज सार ॥ नामु जपत पति सोभा होइ ॥ नामु जपत बिघनु नाही कोइ ॥2॥ जा कारणि इह दुलभ देह ॥ सो बोलु मेरे प्रभू देहि ॥ साधसंगति महि इहु बिस्रामु ॥ सदा रिदै जपी प्रभ तेरो नामु ॥3॥ तुझ बिनु दूजा कोइ नाहि ॥ सभु तेरो खेलु तुझ महि समाहि ॥ जिउ भावै तिउ राखि ले ॥ सुखु नानक पूरा गुरु मिले ॥4॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे प्रभू ! (सब जीवों को) जिंद। प्राण। शरीर तूने ही दिए हैं। अपनी ज्योति तूने (शरीरों में) टिका के मूर्खों को सुंदर बना दिया है। हे प्रभू ! सारे जीव (आपके दर पर) मंगते हैं। आप सब के ऊपर दया करने वाला है। आपका नाम जपते हुए जीव प्रसन्न-चित्त हैं जाते हैं। 1। हे सब कुछ कर सकने की समर्था वाले ! हे मेरे प्रीतम ! मैं आपके दास से सारे पदार्थ हासिल कर सकता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए (जगत से) पार-उतारा होता है। आत्मिक अडोलता के श्रेष्ठ सुख प्राप्त हो जाते हैं। (लोक-परलोक में) इज्जत शोभा मिलती है। (जीवन-यात्रा में विकारों से) कोई रुकावट नहीं पड़ती। 2। हे मेरे प्रभू ! जिस हरी-नाम को जपने के लिए (आपका मेहर से) ये दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला हुआ है। वह हरी-नाम मुझे बख्श। (मेरा) यह (मन) साध-संगति में ठिकाना प्राप्त किए रहें। हे प्रभू ! (मेहर कर) मैं सदा आपका नाम जपता रहूँ। 3। हे प्रभू ! आपके बिना मेरा कोई और (आसरा) नहीं। ये सारा जगत-तमाशा आपका ही बनाया हुआ है। सारे जीव आपके में ही लीन हैं जाते हैं। जैसे आपको अच्छा लगे (मेरी) रक्षा कर। हे नानक ! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है। उासको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 4। 4।
बसंतु महला 5 ॥ प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥ जिसहि देखि हउ जीवा माइ ॥ जा कै सिमरनि दुखु न होइ ॥ करि दइआ मिलावहु तिसहि मोहि ॥1॥ मेरे प्रीतम प्रान अधार मन ॥ जीउ प्रान सभु तेरो धन ॥1॥ रहाउ ॥ जा कउ खोजहि सुरि नर देव ॥ मुनि जन सेख न लहहि भेव ॥ जा की गति मिति कही न जाइ ॥ घटि घटि घटि घटि रहिआ समाइ ॥2॥ जा के भगत आनंद मै ॥ जा के भगत कउ नाही खै ॥ जा के भगत कउ नाही भै ॥ जा के भगत कउ सदा जै ॥3॥ कउन उपमा तेरी कही जाइ ॥ सुखदाता प्रभु रहिओ समाइ ॥ नानकु जाचै एकु दानु ॥ करि किरपा मोहि देहु नामु ॥4॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे माँ ! प्रीतम प्रभू। प्रभू पातशाह (वैसे तो हर वक्त) मेरे साथ बसता है (पर मुझे दिखाई नहीं देता)। जिसको देख के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर सकूँ। जिसके सिमरन से कोई दुख छू नहीं सकता। हे माँ ! मेहर करके मुझे उस प्रभू से मिला दे। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे मेरी जिंद और मन के आसरे प्रभू ! मेरी ये जिंद मेरे यह प्राण- सब कुछ आपका ही दिया हुआ सरमाया है। 1। रहाउ। हे माँ ! जिस परमात्मा को दैवी गुणों वाले मनुष्य और देवते तलाशते रहते हैं। जिसका भेद मुनि जन और शेष-नाग भी नहीं पा सकते। जिसकी उच्च आत्मिक अवस्था और बड़प्पन बयान नहीं किए जा सकते। हे माँ ! वह परमात्मा हरेक शरीर में व्याप रहा है। 2। हे माँ ! जिस परमात्मा के भगत सदा आनंद-भरपूर रहते हैं। जिस परमात्मा के भक्तों को कभी आत्मिक मौत नहीं आती। जिस परमात्मा के भक्तों को (दुनिया का कोई) डर सता नहीं सकता। जिस परमात्मा के भक्तों की (विकारों के मुकाबले में) सदा जीत होती है (वह परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है)। 3। हे प्रभू ! आपकी कोई उपमा कही नहीं जा सकती (आपके जैसा कोई कहा नहीं जा सकता)। आप (सब जीवों को) सुख देने वाला मालिक है। आप हर जगह मौजूद है। हे प्रभू ! (आपके पास से) एक ख़ैर माँगता हूँ- मेहर करके मुझे अपना नाम बख्श। 4। 5।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! जैसे पानी को मिल के पौधे हरे हो जाते हैं (और। उसका सूखापन समाप्त हो जाता है) वैसे ही साध-संगति में मिल के (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। हे भाई ! जैसे किसी दास को अपने मालिक का धैर्य होता है। वैक्से ही गुरू-पीर (जीवों को) पार उतारने के लिए आसरा होता है। 1। हे प्रभू ! आप (जीवों को) सब कुछ दे सकने वाला दातार है। हे भाई ! मैं पल-पल उस (दातार प्रभू) को नमस्कार करता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की संगति प्राप्त होती है। उस मनुष्य (के मन) को परमात्मा का प्रेम-रंग चढ़ जाता है। हे भाई ! (जिन मनुष्यों को नाम-रंग चढ़ जाता है) वे मनुष्य माया के मोह के बँधनों से मुक्ति हासिल कर लेते हैं। परमात्थ्मा के भगत परमात्मा का नाम सिमरते हैं- यही उसके साथ मिलाप का सही तरीका है। 2। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन कर के (मनुष्य की) आँखों को (पराया रूप देखने की लालसा खत्म हो जाती है) संतोष आ जाता है। (ज्यों-ज्यों मनुष्य की) जीभ परमात्मा के अनेकों गुण गाती है। गुरू की कृपा से (उसके अंदर से माया की) तृष्णा (-अग्नि) बुझ जाती है। उसका मन हरी-नाम-रस के स्वाद से (माया के प्रति) तृप्त हो जाता है। 3। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! जो आपका) सेवक (आपके) चरणों की सेवा में लगता है। हे सबके आदि प्रभू ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! हे परे से परे प्रभू ! हे प्रकाश-रूप प्रभू ! आपका नाम सब जीवों का पार-उतारा (उद्धार) करने वाला है। उसको (आपका) ये नाम-खजाना मिल जाता है। 4। 6।
बसंतु महला 5 ॥ तुम बड दाते दे रहे ॥ जीअ प्राण महि रवि रहे ॥ दीने सगले भोजन खान ॥ मोहि निरगुन इकु गुनु न जान ॥1॥ हउ कछू न जानउ तेरी सार ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे प्रभू ! आप सबसे बड़ा दाता है। (सब जीवों को आप सब पदार्थ) दे रहा है। आप सबकी जिंद में सबके प्राणों में व्यापक है। आप खाने के लिए सारे पदार्थ दे रहा है। पर। मैंने गुणहीन ने आपका एक भी उपकार नहीं समझा। 1। हे दयालु प्रभू ! मैं आपकी रक्ती भर भी कद्र नहीं जानता।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बसंतु महला 5॥ हे प्रभू ! (सब जीवों को) जिंद।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।