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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1181 · बसंत

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अंग
1181
बसंत
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  1. जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥
  2. प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥
  3. मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥
  4. तुम बड दाते दे रहे ॥

जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥

बसंतु महला 5 ॥
जीअ प्राण तुम॑ पिंड दीन॑ ॥
मुगध सुंदर धारि जोति कीन॑ ॥
सभि जाचिक प्रभ तुम॑ दइआल ॥
नामु जपत होवत निहाल ॥1॥
मेरे प्रीतम कारण करण जोग ॥
हउ पावउ तुम ते सगल थोक ॥1॥ रहाउ ॥
नामु जपत होवत उधार ॥
नामु जपत सुख सहज सार ॥
नामु जपत पति सोभा होइ ॥
नामु जपत बिघनु नाही कोइ ॥2॥
जा कारणि इह दुलभ देह ॥
सो बोलु मेरे प्रभू देहि ॥
साधसंगति महि इहु बिस्रामु ॥
सदा रिदै जपी प्रभ तेरो नामु ॥3॥
तुझ बिनु दूजा कोइ नाहि ॥
सभु तेरो खेलु तुझ महि समाहि ॥
जिउ भावै तिउ राखि ले ॥
सुखु नानक पूरा गुरु मिले ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे प्रभू ! (सब जीवों को) जिंद, प्राण। शरीर आपने ही दिए हैं। अपनी ज्योति आपने (शरीरों में) टिका के मूर्खों को सुंदर बना दिया है। हे प्रभू ! सारे जीव (आपके दर पर) मंगते हैं। आप सब के ऊपर दया करने वाले हैं। आपका नाम जपते हुए जीव प्रसन्न-चित्त हो जाते हैं। 1। हे सब कुछ कर सकने की शक्ति वाले ! हे मेरे प्रीतम ! मैं आपसे ही सारे पदार्थ हासिल करता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए (जगत से) पार-उतारा होता है। आत्मिक अडोलता के श्रेष्ठ सुख प्राप्त हो जाते हैं। (लोक-परलोक में) इज्जत शोभा मिलती है। (जीवन-यात्रा में विकारों से) कोई रुकावट नहीं पड़ती। 2। हे मेरे प्रभू ! जिस हरी-नाम को जपने के लिए (आपकी मेहर से) ये दुर्लभ मनुष्य-शरीर मिला हुआ है। वह हरी-नाम मुझे बख्शें। (मेरा) यह (मन) साध-संगति में ठिकाना प्राप्त किए रहे। हे प्रभू ! (मेहर करें) मैं सदा आपका नाम जपता रहूँ। 3। हे प्रभू ! आपके बिना मेरा कोई और (आसरा) नहीं। ये सारा जगत-तमाशा आपका ही बनाया हुआ है। सारे जीव आपमें ही लीन हो जाते हैं। जैसे आपको अच्छा लगे (मेरी) रक्षा करें। हे नानक ! जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है। उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 4। 4।

प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥

बसंतु महला 5 ॥
प्रभ प्रीतम मेरै संगि राइ ॥
जिसहि देखि हउ जीवा माइ ॥
जा कै सिमरनि दुखु न होइ ॥
करि दइआ मिलावहु तिसहि मोहि ॥1॥
मेरे प्रीतम प्रान अधार मन ॥
जीउ प्रान सभु तेरो धन ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ खोजहि सुरि नर देव ॥
मुनि जन सेख न लहहि भेव ॥
जा की गति मिति कही न जाइ ॥
घटि घटि घटि घटि रहिआ समाइ ॥2॥
जा के भगत आनंद मै ॥
जा के भगत कउ नाही खै ॥
जा के भगत कउ नाही भै ॥
जा के भगत कउ सदा जै ॥3॥
कउन उपमा तेरी कही जाइ ॥
सुखदाता प्रभु रहिओ समाइ ॥
नानकु जाचै एकु दानु ॥
करि किरपा मोहि देहु नामु ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे माँ ! प्रीतम प्रभू। प्रभू पातशाह (वैसे तो हर वक्त) मेरे साथ बसता है (पर मुझे दिखाई नहीं देता)। जिसको देख के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर सकूँ। जिसके सिमरन से कोई दुख छू नहीं सकता। हे माँ ! मेहर करके मुझे उस प्रभू से मिला दें। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे मेरी जिंद और मन के आसरे प्रभू ! मेरी ये जिंद मेरे यह प्राण- सब कुछ आपका ही दिया हुआ सरमाया है। 1। रहाउ। हे माँ ! जिस परमात्मा को दैवी गुणों वाले मनुष्य और देवते तलाशते रहते हैं। जिसका भेद मुनि जन और शेष-नाग भी नहीं पा सकते। जिसकी उच्च आत्मिक अवस्था और बड़प्पन बयान नहीं किए जा सकते। हे माँ ! वह परमात्मा हरेक शरीर में व्याप रहा है। 2। हे माँ ! जिस परमात्मा के भगत सदा आनंद-भरपूर रहते हैं। जिस परमात्मा के भक्तों को कभी आत्मिक मौत नहीं आती। जिस परमात्मा के भक्तों को (दुनिया का कोई) डर सता नहीं सकता। जिस परमात्मा के भक्तों की (विकारों के मुकाबले में) सदा जीत होती है (वह परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है)। 3। हे प्रभू ! आपकी कोई उपमा कही नहीं जा सकती (आपके जैसा कोई कहा नहीं जा सकता)। आप (सब जीवों को) सुख देने वाले मालिक हैं। आप हर जगह मौजूद हैं। हे प्रभू ! (आपके पास से) एक ख़ैर माँगता हूँ- मेहर करके मुझे अपना नाम बख्शें। 4। 5।

मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥

बसंतु महला 5 ॥
मिलि पाणी जिउ हरे बूट ॥
साधसंगति तिउ हउमै छूट ॥
जैसी दासे धीर मीर ॥
तैसे उधारन गुरह पीर ॥1॥
तुम दाते प्रभ देनहार ॥
निमख निमख तिसु नमसकार ॥1॥ रहाउ ॥
जिसहि परापति साधसंगु ॥
तिसु जन लागा पारब्रहम रंगु ॥
ते बंधन ते भए मुकति ॥
भगत अराधहि जोग जुगति ॥2॥
नेत्र संतोखे दरसु पेखि ॥
रसना गाए गुण अनेक ॥
त्रिसना बूझी गुर प्रसादि ॥
मनु आघाना हरि रसहि सुआदि ॥3॥
सेवकु लागो चरण सेव ॥
आदि पुरख अपरंपर देव ॥
सगल उधारण तेरो नामु ॥
नानक पाइओ इहु निधानु ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! जैसे पानी को मिल के पौधे हरे हो जाते हैं (और उनका सूखापन समाप्त हो जाता है) वैसे ही साध-संगति में मिल के (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। हे भाई ! जैसे किसी दास को अपने मालिक का धैर्य होता है। वैसे ही गुरू-पीर (जीवों को) पार उतारने के लिए आसरा होता है। 1। हे प्रभू ! आप (जीवों को) सब कुछ दे सकने वाले दातार हैं। हे भाई ! मैं पल-पल उस (दातार प्रभू) को नमस्कार करता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू की संगति प्राप्त होती है। उस मनुष्य (के मन) को परमात्मा का प्रेम-रंग चढ़ जाता है। हे भाई ! (जिन मनुष्यों को नाम-रंग चढ़ जाता है) वे मनुष्य माया के मोह के बँधनों से मुक्ति हासिल कर लेते हैं। परमात्मा के भगत परमात्मा का नाम सिमरते हैं- यही उसके साथ मिलाप का सही तरीका है। 2। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन कर के (मनुष्य की) आँखों को (पराया रूप देखने की लालसा खत्म हो जाती है) संतोष आ जाता है। (ज्यों-ज्यों मनुष्य की) जीभ परमात्मा के अनेकों गुण गाती है। गुरू की कृपा से (उसके अंदर से माया की) तृष्णा (-अग्नि) बुझ जाती है। उसका मन हरी-नाम-रस के स्वाद से (माया के प्रति) तृप्त हो जाता है। 3। हे सबके आदि प्रभू ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! हे परे से परे प्रभू ! हे प्रकाश-रूप प्रभू ! आपका नाम सब जीवों का पार-उतारा (उद्धार) करने वाला है। हे नानक ! (कहें- हे प्रभू ! जो आपका) सेवक (आपके) चरणों की सेवा में लगता है, उसको (आपका) यह नाम-खजाना मिल जाता है। 4। 6।

तुम बड दाते दे रहे ॥

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बसंतु महला 5 ॥
तुम बड दाते दे रहे ॥
जीअ प्राण महि रवि रहे ॥
दीने सगले भोजन खान ॥
मोहि निरगुन इकु गुनु न जान ॥1॥
हउ कछू न जानउ तेरी सार ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे प्रभू ! आप सबसे बड़े दाता हैं। (सब जीवों को आप सब पदार्थ) दे रहे हैं। आप सबकी जिंद में सबके प्राणों में व्यापक हैं। आप खाने के लिए सारे पदार्थ दे रहे हैं। पर। मैंने गुणहीन ने आपका एक भी उपकार नहीं समझा। 1। हे दयालु प्रभू ! मैं आपकी रत्ती भर भी कद्र नहीं जानता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1181 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।