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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1180 · बसंत

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अंग
1180
बसंत
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  1. गुरु सेवउ करि नमसकार ॥
  2. हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥
  3. तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

गुरु सेवउ करि नमसकार ॥

बसंतु महला 5 घरु 1 दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सेवउ करि नमसकार ॥
आजु हमारै मंगलचार ॥
आजु हमारै महा अनंद ॥
चिंत लथी भेटे गोबिंद ॥1॥
आजु हमारै ग्रिहि बसंत ॥
गुन गाए प्रभ तुम॑ बेअंत ॥1॥ रहाउ ॥
आजु हमारै बने फाग ॥
प्रभ संगी मिलि खेलन लाग ॥
होली कीनी संत सेव ॥
रंगु लागा अति लाल देव ॥2॥
मनु तनु मउलिओ अति अनूप ॥
सूकै नाही छाव धूप ॥
सगली रूती हरिआ होइ ॥
सद बसंत गुर मिले देव ॥3॥
बिरखु जमिओ है पारजात ॥
फूल लगे फल रतन भांति ॥
त्रिपति अघाने हरि गुणह गाइ ॥
जन नानक हरि हरि हरि धिआइ ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 घरु 1 दुतुके ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई! यह सारी मेहर गुरू की ही है। इस वास्ते) मैं गुरू के आगे सीस झुका के गुरू की सेवा करता हूँ। अब मेरे अंदर खुशियां ही खुशियां हैं। अब मेरे हृदय में बहुत आनंद बन गया है। हे भाई! (गुण गाने की बरकति से) मुझे गोबिंद जी मिल गए हैं। मेरी चिंता दूर हो गई है। 1। हे बेअंत प्रभू! जब से मैंने आपकी सिफत सालाह के गीत गाने शुरू किए हैं, तब से अब मेरे हृदय-घर में आत्मिक आनंद बना रहता है। 1। रहाउ। हे भाई! (परमात्मा की सिफतसालाह की बरकति से) मेरे अंदर (मानो) फागुन की होली बनी हुई है। प्रभू के संत-जन (साध-संगति में) मिल के (ये होली) खेलने लग पड़े हैं। (हे भाई! यह होली क्या है।) संत जनों की सेवा को मैंने होली बनाया है (संतजनों की संगति की बरकति से) मेरे साथ परमात्मा के प्यार का गाढ़ा (आत्मिक) रंग चढ़ गया है। 2। हे भाई! (प्रभू के गुण गाने की बरकति से) मेरा मन सुंदर खिल उठा है मेरा तन बहुत सुंदर पुल्कित हो गया है। अब सुख हों चाहे दुख हों (मेरे तन में) आत्मिक उमंग की तरावट कभी समाप्त नहीं होती। (अब मेरा मन) सारे समय ही आत्मिक जीवन से भरपूर रहता है। मुझे गुरदेव जी मिल गए हैं। मेरे अंदर सदा खिलाव बना रहता है। 3। हे भाई! (सिफत-सालाह की बरकति से मेरे अंदर से। जैसे, सारी मनोकामना पूरी करने वाला स्वर्ग वाला) पारजात वृक्ष उग गया है। जिसको भांति-भांति के कीमती फूल और फल लगे हुए हैं। सदा हरी के गुण गा-गा के (मनुष्य माया के मोह से) पूरी तरह से तृप्त हो जाते हैं। हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) सदा परमात्मा का नाम सिमर के। 4। 1।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥

बसंतु महला 5 ॥
हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥
जूआरी जूए माहि चीतु ॥
अमली जीवै अमलु खाइ ॥
तिउ हरि जनु जीवै हरि धिआइ ॥1॥
अपनै रंगि सभु को रचै ॥
जितु प्रभि लाइआ तितु तितु लगै ॥1॥ रहाउ ॥
मेघ समै मोर निरतिकार ॥
चंद देखि बिगसहि कउलार ॥
माता बारिक देखि अनंद ॥
तिउ हरि जन जीवहि जपि गोबिंद ॥2॥
सिंघ रुचै सद भोजनु मास ॥
रणु देखि सूरे चित उलास ॥
किरपन कउ अति धन पिआरु ॥
हरि जन कउ हरि हरि आधारु ॥3॥
सरब रंग इक रंग माहि ॥
सरब सुखा सुख हरि कै नाइ ॥
तिसहि परापति इहु निधानु ॥
नानक गुरु जिसु करे दानु ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई! (जैसे कोई) दुकानदार (अपने मन-पसंद के) धन-माल की दुकान चलाता है। (जैसे किसी) जुआरिए का मन जूए में मगन रहता है। जैसे कोई अफीमची अफीम खा के सुख प्रतीत करता है, वैसे परमात्मा का भगत परमात्मा का नाम सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करता है। 1। हे भाई! हरेक जीव अपने-अपने मन-भाते स्वाद में मस्त रहता है। (पर) प्रभू ने (ही) जिस (स्वाद) में लगाया है। उस उस (स्वाद) में (हरेक जीव) लगा रहता है। 1। रहाउ। हे भाई! घटाएं चढ़ती हैं और मोर नृत्य करते हैं। चाँद को देख के कुसम खिलती हैं। (अपने) बच्चे को देख के माँ खुश होती है। वैसे ही परमात्मा का नाम जप के परमात्मा के भक्त आत्मिक उत्साह में आते हैं। 2। हे भाई! मास का भोजन मिले तो शेर सदा खुश होता है। युद्ध देख के शूरवीर के चित्त को जोश आता है। कंजूस को धन का बहुत लोभ होता है। (वैसे ही) परमात्मा के भगत को परमात्मा के नाम का आसरा होता है। 3। पर, हे भाई! (दुनिया के) सारे स्वाद परमात्मा के नाम के स्वाद में ही आ जाते हैं (नाम-रस से घटिया हैं)। सारे बड़े से बड़े सुख परमात्मा के नाम में ही हैं। हे नानक! यह नाम-खजाना उस मनुष्य को ही मिलता है। जिसको गुरू देता है। 4। 2।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग बसंत

तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥

बसंतु महला 5 ॥
तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥
तिसु बसंतु जिसु गुरु दइआलु ॥
मंगलु तिस कै जिसु एकु कामु ॥
तिसु सद बसंतु जिसु रिदै नामु ॥1॥
ग्रिहि ता के बसंतु गनी ॥
जा कै कीरतनु हरि धुनी ॥1॥ रहाउ ॥
प्रीति पारब्रहम मउलि मना ॥
गिआनु कमाईऐ पूछि जनां ॥
सो तपसी जिसु साधसंगु ॥
सद धिआनी जिसु गुरहि रंगु ॥2॥
से निरभउ जिन॑ भउ पइआ ॥
सो सुखीआ जिसु भ्रमु गइआ ॥
सो इकांती जिसु रिदा थाइ ॥
सोई निहचलु साच ठाइ ॥3॥
एका खोजै एक प्रीति ॥
दरसन परसन हीत चीति ॥
हरि रंग रंगा सहजि माणु ॥
नानक दास तिसु जन कुरबाणु ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई! आत्मिक खिलाव उस मनुष्य को प्राप्त होता है। जिस पर प्रभू दयावान होता है। जिस पर गुरू दयावान होता है। हे भाई! उस मनुष्य के हृदय में खुशी पैदा होती है। जिसको एक हरी-नाम सिमरन का सदा आहर रहता है। उस मनुष्य को खिलाव सदा ही मिला रहता है जिसके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है। 1। हे भाई! मैं तो उस मनुष्य के हृदय में उमंग (खिड़ाव पैदा हुआ) समझता हूँ। जिसके हृदय में प्रभू की सिफत-सालाह टिकी हुई है। जिसके हृदय में परमात्मा (के नाम) की लगन है। 1। रहाउ। हे मेरे मन! परमात्मा (के चरणों) के साथ प्रीति डाल के सदा खिले रहें। हे मन! संत-जनों को पूछ के आत्मिक जीवन की सूझ हासिल की जाती है। हे भाई! (असल) तपस्वी वह मनुष्य है जिसको गुरू की संगति प्राप्त होती है। वह मनुष्य सदा जुड़ी हुई सुरति वाला जानें। जिसके अंदर गुर (-चरणों) का प्यार है। 2। हे भाई! वह लोग (दुनिया के) डरों से ऊपर हैं जिनके मन में परमात्मा का डर बसता है। वह मनुष्य सुखी जीवन वाला है जिस (के मन) की भटकना दूर हो गई। सिर्फ वह मनुष्य एकांत जगह में रहता है जिसका हृदय शांत है (एक जगह पर टिका हुआ है)। वही मनुष्य अडोल चित्त वाला है। जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 3। जो (हर जगह) एक परमात्मा को ही तलाशता है। जिसके मन में एक परमात्मा का ही प्यार है। जिसके चित्त में एक प्रभू के दर्शनों की छूह की तमन्ना है। जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के सब रसों से श्रेष्ठ हरी-नाम-रस भोगता है। हे दास नानक! (कहें: हे भाई!) मैं उस मनुष्य पर से बलिहार जाता हूँ। 4। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1180 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।