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अंग 1180

अंग
1180
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बसंतु महला 5 घरु 1 दुतुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुरु सेवउ करि नमसकार ॥
आजु हमारै मंगलचार ॥
आजु हमारै महा अनंद ॥
चिंत लथी भेटे गोबिंद ॥1॥
आजु हमारै ग्रिहि बसंत ॥
गुन गाए प्रभ तुम॑ बेअंत ॥1॥ रहाउ ॥
आजु हमारै बने फाग ॥
प्रभ संगी मिलि खेलन लाग ॥
होली कीनी संत सेव ॥
रंगु लागा अति लाल देव ॥2॥
मनु तनु मउलिओ अति अनूप ॥
सूकै नाही छाव धूप ॥
सगली रूती हरिआ होइ ॥
सद बसंत गुर मिले देव ॥3॥
बिरखु जमिओ है पारजात ॥
फूल लगे फल रतन भांति ॥
त्रिपति अघाने हरि गुणह गाइ ॥
जन नानक हरि हरि हरि धिआइ ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5 घरु 1 दुतुके सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई ! यह सारी मेहर गुरू की ही है। इस वास्ते) मैं गुरू के आगे सीस झुका के गुरू की सेवा करता हूँ। अब मेरे अंदर खुशियां ही खुशियां हैं। अब मेरे हृदय में बहुत आनंद बन गया है। हे भाई ! (गुण गाने की बरकति से) मुझे गोबिंद जी मिल गए हैं। मेरी चिंता दूर हो गई है। 1। हे बेअंत प्रभू ! जब से मैंने आपकी सिफत सालाह के गीत गाने शुरू किए हैं। तब से अब मेरे हृदय-घर में आत्मिक आनंद बना रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा की सिफतसालाह की बरकति से) मेरे अंदर (मानो) फागुन की होली बनी हुई है। प्रभू के संत-जन (साध-संगति में) मिल के (ये होली) खेलने लग पड़े हैं। (हे भाई ! यह होली क्या है।) संत जनों की सेवा को मैंने होली बनाया है (संतजनों की संगति की बरकति से) मेरे साथ परमात्मा के प्यार का गाढ़ा (आत्मिक) रंग चढ़ गया है। 2। हे भाई ! (प्रभू के गुण गाने की बरकति से) मेरा मन सुंदर खिल उठा है मेरा तन बहुत सुंदर पुल्कित हो गया है। अब सुख हों चाहे दुख हों (मेरे तन में) आत्मिक उमंग की तरावट कभी समाप्त नहीं होती। (अब मेरा मन) सारे समय ही आत्मिक जीवन से भरपूर रहता है। मुझे गुरदेव जी मिल गए हैं। मेरे अंदर सदा खिलाव बना रहता है। 3। हे भाई ! (सिफत-सालाह की बरकति से मेरे अंदर से। जैसे। सारी मनोकामना पूरी करने वाला स्वर्ग वाला) पारजात वृक्ष उग गया है। जिसको भांति-भांति के कीमती फूल और फल लगे हुए हैं। सदा हरी के गुण गा-गा के (मनुष्य माया के मोह से) पूरी तरह से तृप्त हो जाते हैं। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) सदा परमात्मा का नाम सिमर के। 4। 1।
बसंतु महला 5 ॥
हटवाणी धन माल हाटु कीतु ॥
जूआरी जूए माहि चीतु ॥
अमली जीवै अमलु खाइ ॥
तिउ हरि जनु जीवै हरि धिआइ ॥1॥
अपनै रंगि सभु को रचै ॥
जितु प्रभि लाइआ तितु तितु लगै ॥1॥ रहाउ ॥
मेघ समै मोर निरतिकार ॥
चंद देखि बिगसहि कउलार ॥
माता बारिक देखि अनंद ॥
तिउ हरि जन जीवहि जपि गोबिंद ॥2॥
सिंघ रुचै सद भोजनु मास ॥
रणु देखि सूरे चित उलास ॥
किरपन कउ अति धन पिआरु ॥
हरि जन कउ हरि हरि आधारु ॥3॥
सरब रंग इक रंग माहि ॥
सरब सुखा सुख हरि कै नाइ ॥
तिसहि परापति इहु निधानु ॥
नानक गुरु जिसु करे दानु ॥4॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! (जैसे कोई) दुकानदार (अपने मन-पसंद के) धन-माल की दुकान चलाता है। (जैसे किसी) जुआरिए का मन जूए में मगन रहता है। जैसे कोई अफीमची अफीम खा के सुख प्रतीत करता है। वैसे परमात्मा का भगत परमात्मा का नाम सिमर के आत्मिक जीवन हासिल करता है। 1। हे भाई ! हरेक जीव अपने-अपने मन-भाते स्वाद में मस्त रहता है। (पर) प्रभू ने (ही) जिस (स्वाद) में लगाया है। उस उस (स्वाद) में (हरेक जीव) लगा रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! घटाएं चढ़ती हैं और मोर नृत्य करते हैं। चाँद को देख के कुसम खिलती हैं। (अपने) बच्चे को देख के माँ खुश होती है। वैसे ही परमात्मा का नाम जप के परमात्मा के भक्त आत्मिक उत्साह में आते हैं। 2। हे भाई ! मास का भोजन मिले तो शेर सदा खुश होता है। युद्ध देख के शूरवीर के चित्त को जोश आता है। कंजूस को धन का बहुत लोभ होता है। (वैसे ही) परमात्मा के भगत को परमात्मा के नाम का आसरा होता है। 3। पर। हे भाई ! (दुनिया के) सारे स्वाद परमात्मा के नाम के स्वाद में ही आ जाते हैं (नाम-रस से घटिया हैं)। सारे बड़े से बड़े सुख परमात्मा के नाम में ही हैं। हे नानक ! यह नाम-खजाना उस मनुष्य को ही मिलता है। जिसको गुरू देता है। 4। 2।
बसंतु महला 5 ॥
तिसु बसंतु जिसु प्रभु क्रिपालु ॥
तिसु बसंतु जिसु गुरु दइआलु ॥
मंगलु तिस कै जिसु एकु कामु ॥
तिसु सद बसंतु जिसु रिदै नामु ॥1॥
ग्रिहि ता के बसंतु गनी ॥
जा कै कीरतनु हरि धुनी ॥1॥ रहाउ ॥
प्रीति पारब्रहम मउलि मना ॥
गिआनु कमाईऐ पूछि जनां ॥
सो तपसी जिसु साधसंगु ॥
सद धिआनी जिसु गुरहि रंगु ॥2॥
से निरभउ जिन॑ भउ पइआ ॥
सो सुखीआ जिसु भ्रमु गइआ ॥
सो इकांती जिसु रिदा थाइ ॥
सोई निहचलु साच ठाइ ॥3॥
एका खोजै एक प्रीति ॥
दरसन परसन हीत चीति ॥
हरि रंग रंगा सहजि माणु ॥
नानक दास तिसु जन कुरबाणु ॥4॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 5॥ हे भाई ! आत्मिक खिलाव उस मनुष्य को प्राप्त होता है। जिस पर प्रभू दयावान होता है। जिस पर गुरू दयावान होता है। हे भाई ! उस मनुष्य के हृदय में खुशी पैदा होती है। जिसको एक हरी-नाम सिमरन का सदा आहर रहता है। उस मनुष्य को खिलाव सदा ही मिला रहता है जिसके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है। 1। हे भाई ! मैं तो उस मनुष्य के हृदय में उमंग (खिड़ाव पैदा हुआ) समझता हूँ। जिसके हृदय में प्रभू की सिफत-सालाह टिकी हुई है। जिसके हृदय में परमात्मा (के नाम) की लगन है। 1। रहाउ। हे मेरे मन ! परमात्मा (के चरणों) के साथ प्रीति डाल के सदा खिला रह। हे मन ! संत-जनों को पूछ के आत्मिक जीवन की सूझ हासिल की जाती है। हे भाई ! (असल) तपस्वी वह मनुष्य है जिसको गुरू की संगति प्राप्त होती है। वह मनुष्य सदा जुड़ी हुई सुरति वाला जानो। जिसके अंदर गुर (-चरणों) का प्यार है। 2। हे भाई ! वह लोग (दुनिया के) डरों से ऊपर हैं जिनके मन में परमात्मा का डर बसता है। वह मनुष्य सुखी जीवन वाला है जिस (के मन) की भटकना दूर हो गई। सिर्फ वह मनुष्य एकांत जगह में रहता है जिसका हृदय शांत है (एक जगह पर टिका हुआ है)। वही मनुष्य अडोल चित्त वाला है। जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 3। जो (हर जगह) एक परमात्मा को ही तलाशता है। जिसके मन में एक परमात्मा का ही प्यार है। जिसके चित्त में एक प्रभू के दर्शनों की छूह की तमन्ना है। जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के सब रसों से श्रेष्ठ हरी-नाम-रस भोगता है। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) मैं उस मनुष्य पर से बलिहार जाता हूँ। 4। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बसंतु महला 5 घरु 1 दुतुके सतिगुर प्रसादि॥ (हे भाई ! यह सारी मेहर गुरू की ही है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।