हरि चेतहु अंति होइ सखाई ॥ हरि अगमु अगोचरु अनाथु अजोनी सतिगुर कै भाइ पावणिआ ॥1॥ हउ वारी जीउ वारी आपु निवारणिआ ॥ आपु गवाए ता हरि पाए हरि सिउ सहजि समावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥ पूरबि लिखिआ सु करमु कमाइआ ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ ॥ बिनु भागा गुरु पाईऐ नाही सबदै मेलि मिलावणिआ ॥2॥ गुरमुखि अलिपतु रहै संसारे ॥ गुर कै तकीऐ नामि अधारे ॥ गुरमुखि जोरु करे किआ तिस नो आपे खपि दुखु पावणिआ ॥3॥ मनमुखि अंधे सुधि न काई ॥ आतम घाती है जगत कसाई ॥ निंदा करि करि बहु भारु उठावै बिनु मजूरी भारु पहुचावणिआ ॥4॥ इहु जगु वाड़ी मेरा प्रभु माली ॥ सदा समाले को नाही खाली ॥ जेही वासना पाए तेही वरतै वासू वासु जणावणिआ ॥5॥ मनमुखु रोगी है संसारा ॥ सुखदाता विसरिआ अगम अपारा ॥ दुखीए निति फिरहि बिललादे बिनु गुर सांति न पावणिआ ॥6॥ जिनि कीते सोई बिधि जाणै ॥ आपि करे ता हुकमि पछाणै ॥ जेहा अंदरि पाए तेहा वरतै आपे बाहरि पावणिआ ॥7॥ तिसु बाझहु सचे मै होरु न कोई ॥ जिसु लाइ लए सो निरमलु होई ॥ नानक नामु वसै घट अंतरि जिसु देवै सो पावणिआ ॥8॥14॥15॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: परमातमा का चिंतन करता रह (जब और सारे साथ समाप्त हो जाते हैं तब) अंत समय में (प्रभू का नाम ही) साथी बनता है। वह परमात्मा (वैसे तो) अपहुँच है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों की उस तक पहुँच नही हो सकती। उस प्रभू के सिर पे और कोई मालिक नहीं। वह योनियों में नहीं पड़ता। गुरू के अनुसार हो के उससे मिला जा सकता है। 1। मैं सदके कुर्बान हूँ उनसे, जो स्वैभाव दूर करते हैं। जब मनुष्य स्वै भाव दूर करता है, तो परमात्मा मिल पड़ता है, परमात्मा से मिल के आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 1। रहाउ। (पर ये स्वैभाव दूर करने का) श्रेष्ठ काम वह मनुष्य (ही) करता है, जिसके अंदर पूर्बले जन्म में किए कर्मों के अनुसार स्वै भाव दूर करने के संस्कार के लेख मौजूद हों। वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ के सदैव आत्मिक आनंदका आनंद लेता है। गुरू भी पूरी किस्मत के बगैर नहीं मिलता। (जिसे गुरू मिल जाता है, उसे गुरू अपने) शबद से परमात्मा के मिलाप में मिला देता है। 2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जगत में निर्मोह रहता है। गुरमुख गुरू का सहारा ले प्रभू के नाम आसरा लेता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है, उस पर कोई और मनुष्य दबाव नहीं डाल सकता, वह बल्कि खुद ही ख्वार हो के दुख सहता है। 3। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है, जो माया के मोह में अंधा हुआ रहता है, उसको (ये स्वै भाव निवारण की) कोई समझ नही रहती। (इस तरह वह) अपना आत्मिक जीवन (भी) तबाह कर लेता है और जगत का वैरी (भी बना रहता है)। वह औरों की निंदा कर कर के अपने सिर पे (विकारों का) बहुत भार उठाए जाता है (वह मनमुख को उस मजदूर की तरह समझो जो) भाड़ा लिए बगैर ही दूसरों का भार (उठा उठा के) पहुँचाता रहता है। 4। (पर, हे भाई ! जीवों के भी क्या वश?) ये जगत फूलों की बगीची के (समान) है, प्रभू स्वयं (इस बगीची का) माली है। हरेक की सदा संभाल करता है। उसकी संभाल से कोई जीव अलग थलग नहीं रहता। (पर) जैसी सुगंधि (जीव-फूल के अंदर) माली प्रभू डालता है वैसी उसके अंदर काम करती है। (प्रभू माली द्वारा जीव फूल के अंदर डाली गई) सुगंधी से ही बाहर उसकी सुगंधि प्रगट होती है। 5। अपने मन के पीछे चलने वाला जगत (विकारों में पड़ के) रोगी हो रहा है (क्योंकि) इसे सुखों का दाता अपहुँच व बेअंत प्रभू बिसर गया है। मनमुख जीवदुखी हो हो के तरले लेते फिरते हैं। गुरू की शरण के बगैर उन्हें आत्मिक अडोलता प्राप्त नहीं हो सकती। 6। जिस परमात्मा ने जीव पैदा किए हैं वही इन्हें ठीक करने का ढंग जानता है। जब किसी को ठीक कर देता है तो वह प्रभू के हुकम में रहके उसके साथ सांझ पाता है। जिस तरह का आत्मिक जीवन परमात्मा किसी जीव के अंदर टिकाता है, उसी तरह वह जीव कार-व्यवहार करता है। प्रभू स्वयं ही जीवों को दिखाई देते संसार की ओर प्रेरता रहता है। 7। (हे भाई !) मुझे उस सदा स्थिर प्रभू के बिना कोई और नहीं दिखता (जो जीव को बाहर भटकने से बचा सके)। जिस मनुष्य को वह अपने चरणों में जोड़ता है, वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। हे नानक ! (उसकी मेहर से ही) उसका नाम जीव के हृदय में बसता है। जिस मनुष्य को (अपने नाम की दाति) बख्शता है वह हासल कर लेता है। 8। 14। 15।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ जो मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाले प्रभू का नाम अपने मन में बसाता है, वह (अपने अंदर से) अहंकार व ममता का दुख दूर कर लेता है। वह आत्मिक जीवन देने वाली सिफत-सालाह की बाणी के द्वारा सदा प्रभू की सिफत-सालाह करता है और हर वक्त नाम अंम्रित (के घूट) ही पीता है। 1। मैं उस मनुष्य से सदा कुबान जाता हूं, जो आत्मिक जीवन देने वाली सिफत-सालाह की बाणी के द्वारा (परमात्मा को) अपने मन में बसाता है। जो अमृत बाणी मन में बसाता है और आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू-नाम सदा सिमरता है। 1। रहाउ। जो मनुष्य मुंह से बचनों से आत्मिक जीवन दाता प्रभू-नाम सदैव उचारता है, वह आँखों से भी सदा जीवन दाते परमात्मा को ही (हर जगह) देखता पहचानता है वह जीवन दाते प्रभू की सिफत-सालाह सदा दिन रात करता है और औरों को भी बोल के सुनाता है। 2। जो मनुष्य जीवन दाते प्रभू के प्रेम रंग में रंगा हुआ प्रभू चरणों में सुरति जोड़ता है, वह गुरू की कृपा से उस जीवन दाते को मिल लेता है। वह अपनी जीभ से भी दिन रात आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम ही उचारता है। वह अपने मन के द्वारा और अपनी ज्ञानेंद्रियों द्वारा नाम-अमृत पीता रहता है। 3। (हे भाई !) परमात्मा वह कुछ कर देता है जो (जीवों को) चिक्त-चेते भी नहीं होता। कोई भी जीव उस करतार का हुकम (भी) मोड़ नहीं सकता। उसके हुकम अनुसार ही (किसी भाग्यशाली मनुष्य के हृदय में) उसकी जीवन दाती सिफत-सालाह की बाणी बस जाती है। वह अपने हुकम अनुसार ही (किसी भाग्यशाली को) अपना अमृतनाम पिलाता है। 4। (हे भाई !) उस हरी करतार के चमत्कार आश्चर्यजनक हैं, (जीवों के) कुमार्ग पर पडत्र के भटकते इस मन को (भी) वह करतार मोड़ ले आता है। उस मन को प्रभू अपनी आत्मिक जीवन दाती सिफत-सालाह की बाणी से जोड़ देता है, और सिफत-सालाह के शबद के द्वारा अपना नाम (उसके अंदर) प्रगट कर देता है। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमातमा का चिंतन करता रह (जब और सारे साथ समाप्त हो जाते हैं तब) अंत समय में (प्रभू का नाम ही) साथी बनता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।