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अंग ११७ · माझ

अंग
117
माझ
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  1. सबदि मरै मनु मारै अपुना मुकती का दरु पावणिआ ॥3॥
  2. उतपति परलउ सबदे होवै ॥
  3. सतिगुर साची सिख सुणाई ॥

सबदि मरै मनु मारै अपुना मुकती का दरु पावणिआ ॥3॥

अंग ११६ से चला आ रहा अंश

सबदि मरै मनु मारै अपुना मुकती का दरु पावणिआ ॥3॥
किलविख काटै क्रोधु निवारे ॥
गुर का सबदु रखै उर धारे ॥
सचि रते सदा बैरागी हउमै मारि मिलावणिआ ॥4॥
अंतरि रतनु मिलै मिलाइआ ॥
त्रिबिधि मनसा त्रिबिधि माइआ ॥
पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके चउथे पद की सार न पावणिआ ॥5॥
आपे रंगे रंगु चड़ाए ॥
से जन राते गुर सबदि रंगाए ॥
हरि रंगु चड़िआ अति अपारा हरि रसि रसि गुण गावणिआ ॥6॥
गुरमुखि रिधि सिधि सचु संजमु सोई ॥
गुरमुखि गिआनु नामि मुकति होई ॥
गुरमुखि कार सचु कमावहि सचे सचि समावणिआ ॥7॥
गुरमुखि थापे थापि उथापे ॥
गुरमुखि जाति पति सभु आपे ॥
नानक गुरमुखि नामु धिआए नामे नामि समावणिआ ॥8॥12॥13॥

हिन्दी अर्थ: अपने मन को काबू कर लेता है, और मोह से छुटकारा पाने का दरवाजा ढूँढ लेता है।3। वह (अपने अंदर से) पाप काट लेता है, क्रोध दूर कर लेता है। जब मनुष्य गुरू का शबद अपने हृदय में टिका के रखता है, जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू (के प्रेम रंग) में रंगे रहते हैं, वे माया के मोह से सदैव उपराम रहते हैं। वे (अपने अंदर से) अहंकार मार के (प्रभू चरणों में) मिले रहते हैं।4। (हे भाई ! हरेक जीव) के अंदर (प्रभू की जोति) रत्न मौजूद है, पर ये रतन तभी मिलता है यदि (गुरू) मिला दे (मनुष्य अपनी कोशिशों, सियानप, बुद्धिमक्ता से हासिल नही कर सकता, क्योंकि) तीन गुणों वाली माया के प्रभाव में मनुष्य की मनोकामना तीन गुणों अनुसार (बंटी रहती) है। पण्डित व अन्य सियाने समाधियां लगाने वाले (वेद आदि धर्म पुस्तकें) पढ़ पढ़ के थक जाते हैं (पर, त्रिगुणी माया के प्रभाव के कारण) वे उस आत्मिक अवस्था की सूझ प्राप्त नही कर सकते जो माया के तीन गुणों के प्रभाव से ऊपर टिकी रहती है।5। (हे भाई ! इस त्रिगुणी माया के सामने जीवों की पेश नही जा सकती, जीवों को) प्रभू स्वयं ही (अपने नाम रंग में) रंगता है, स्वयं ही (अपना प्रेम-) रंग (जीवों के हृदयों पर) चढ़ाता है। जिन मनुष्यों को प्रभू गुरू के शबद में रंगता है, वे मनुष्य उसके प्रेम में मस्त रहते हैं। उन्हें उस बेअंत हरी का बहुत प्रेम रंग चढ़ा रहता है। वे हरी के नाम में (भीग के) आत्मिक आनंद से परमात्मा के गुण गाते रहते हैं।6। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहते हैं, उनके वास्ते सदा स्थिर प्रभू (का नाम) ही रिद्धियां सिद्धियां और संजम है। गुरू के सन्मुख रह के वे परमात्मा के साथ गहरी सांझ पाते हैं। परमात्मा के नाम में लीन होने के कारण उन्हें माया के मोह से मुक्ति मिली रहती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोग सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरन (की) कार (नित्य) करते है। (इस तरह) वे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू में सदा लीन रहते हैं।7। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ये निष्चय रखता है कि प्रभू स्वयं ही सृष्टि रचता है। रच के स्वयं ही नाश करता है। परमात्मा स्वयं ही गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के लिए (उच्च) जाति है और (लोक परलोक की) इज्जत है। हे नानक ! गुरू के आसरे रहने वाला मनुष्य (सदा प्रभू का) नाम सिमरता है, और सदा प्रभू के नाम में ही लीन रहता है।8।12।13।

उतपति परलउ सबदे होवै ॥

माझ महला 3 ॥
उतपति परलउ सबदे होवै ॥
सबदे ही फिरि ओपति होवै ॥
गुरमुखि वरतै सभु आपे सचा गुरमुखि उपाइ समावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी गुरु पूरा मंनि वसावणिआ ॥
गुर ते साति भगति करे दिनु राती गुण कहि गुणी समावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि धरती गुरमुखि पाणी ॥
गुरमुखि पवणु बैसंतरु खेलै विडाणी ॥
सो निगुरा जो मरि मरि जंमै निगुरे आवण जावणिआ ॥2॥
तिनि करतै इकु खेलु रचाइआ ॥
काइआ सरीरै विचि सभु किछु पाइआ ॥
सबदि भेदि कोई महलु पाए महले महलि बुलावणिआ ॥3॥
सचा साहु सचे वणजारे ॥
सचु वणंजहि गुर हेति अपारे ॥
सचु विहाझहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणिआ ॥4॥
बिनु रासी को वथु किउ पाए ॥
मनमुख भूले लोक सबाए ॥
बिनु रासी सभ खाली चले खाली जाइ दुखु पावणिआ ॥5॥
इकि सचु वणंजहि गुर सबदि पिआरे ॥
आपि तरहि सगले कुल तारे ॥
आए से परवाणु होए मिलि प्रीतम सुखु पावणिआ ॥6॥
अंतरि वसतु मूड़ा बाहरु भाले ॥
मनमुख अंधे फिरहि बेताले ॥
जिथै वथु होवै तिथहु कोइ न पावै मनमुख भरमि भुलावणिआ ॥7॥
आपे देवै सबदि बुलाए ॥
महली महलि सहज सुखु पाए ॥
नानक नामि मिलै वडिआई आपे सुणि सुणि धिआवणिआ ॥8॥13॥14॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ परमात्मा के हुकम में ही जगत की उत्पक्ति होती है, और जगत का नाश होता है। (नाश के उपरान्त) पुनः प्रभू के हुकम में ही जगत की उत्पक्ति होती है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि हरेक जगह सदा स्थिर परमात्मा स्वयं मौजूद है। जगत पैदा करके उसमें लीन हो रहा है।1। मैं उन लोगों से सदके और कुर्बान जाता हूँ जो पूरे गुरू को अपने मन में बसाते हैं। गुरू से आत्मिक अडोलता मिलती है, (गुरू की शरण पड़ कर) मनुष्य दिन रात प्रभू की भक्ति करता है। प्रभू के गुण उचार के गुणों के मालिक प्रभू में लीन रहता है।1।रहाउ। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जानता है कि धरती, पानी, हवा, आग (-रूप हो के) परमात्मा (जगत रूप) आश्चर्य खेल रहा है। वह मनुष्य जो गुरू से बेमुख है आत्मिक मौत का शिकार हो के पैदा होता मरता है। निगुरे को जनम मरण का चक्कर पड़ा रहता है।2। (हे भाई !) उस करतार ने (ये जगत) एक तमाशा रचा हुआ है, उसने मानस शरीर में हरेक गुण भर दिया है। जो कोई मनुष्य गुरू के शबद द्वारा (अपने स्वै की) खोज करके परमात्मा की हजूरी हासिल कर लेता है, परमात्मा उसको अपनी हजूरी में ही टिकाए रखता है।3। परमात्मा सदा कायम रहने वाला एक शाहूकार है। (जगत के सारे जीव) उस सदा स्थिर शाह के (भेजे हुए) व्यापारी हैं। वही जीव वणजारे सदा स्थिर नाम का सौदा करते हैं, जो बेअंत प्रभू के रूप, गुरू के प्रेम में टिके रहते हैं। वे सदा स्थिर रहने वाले नाम का व्यापार करते हैं, नाम सिमरन की कमाई करते हैं, सदा टिके रहने वाला नाम ही नाम कमाते रहते हैं।4। पर, जिस मनुष्य के पल्ले आत्मिक गुणों का सरमाया नही है, वह नाम-धन कैसे ले सकता है? अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सारे ही कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। आत्मिक गुणों की पूँजी के बिना सब जीव (जगत से) खाली हाथ जाते हैं। खाली हाथ जा के दु:ख बर्दाश्त करते हैं।5। जो मनुष्य गुरू शबद में जुड़ते हैं, गुरू के प्यार में टिके रहते हैं, वे सदैव सदा स्थिर प्रभू के नाम का व्यापार करते है। वे अपनी सारी कुलों को तैरा के स्वयं (भी) तैर जाते हैं, जगत में आए वे मनुष्य (प्रभू की हजूरी में) कबूल हो जाते हैं, प्रीतम प्रभू को मिल के वो आत्मिक आनंद का रस लेते हैं।6। परमात्मा का नाम-पदार्थ हरेक के हृदय में है। पर, मूर्ख मनुष्य बाहरी पदार्थ ढूँढता फिरता है। अपने मन के पीछे चलने वाले (और बाहर के पदार्थों के मोह में) अंधे हुए मनुष्य सही जीवन चाल से भटके हुए फिरते हैं। जिस (गुरू) के पास ये नाम पदार्थ मौजूद है, कोई (मनमुख) वहाँ से प्राप्त नहीं करता। अपने मन के पीछे चलने वाले माया की भटकना में पड़ कर कुमार्ग पर चलते फिरते हैं।7। (पर, जीवों के भी क्या वश?) परमात्मा स्वयं ही गुरू के शबद में जोड़ के (ये नाम वस्तु) देता है और स्वयं ही (जीवों को अपने नजदीक) बुलाता है। (जिसे बुलाता है, वो) महल के मालिक प्रभू की हजूरी में (पहुँच के) आत्मिक अडोलता का आनंद लेता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रभू नाम में जुड़ता है, उसे (प्रभू की दरगाह में) सत्कार मिलता है। (उसे यकीन बन जाता है कि प्रभू) स्वयं ही (जीवों की आरजोई) सुन-सुन के खुद ही उनका ध्यान रखता है।8।13।14।

सतिगुर साची सिख सुणाई ॥

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माझ महला 3 ॥
सतिगुर साची सिख सुणाई ॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे भाई ! मैंने आपको) गुरू की सदा अटॅल रहने वाली शिक्षा सुनाई है (कि)

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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