अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू !) खोटे जीव और खरे जीव आपके खुद के ही पैदा किए हुए हैं। आप स्वयं ही सारे जीवों (की करतूतों) को परखता रहता है। खरे जीवों को परख के आप अपने खजाने में डाल लेता है (अपने चरणों में जोड़ लेता है) और खोटे जीवों को भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाल देता है। 6। (हे करतार !) मैं (आपका दास) किस तरह आपके दर्शन करूं? किस तरह आपकी सिफत-सालाह करूं? (यदि आपकी अपनी ही मेहर हो, और आप मुझे गुरू मिला दे, तो) गुरू की कृपा से गुरू के शबद में लग के आपकी सिफत सलाह कर सकता हूँ। (हे प्रभू !) आपके हुकमि से ही आपका अमृत नाम (जीव के हृदय में) बसता है। आप अपने हुकम अनुसार ही अपना नाम-अंमृत (जीवों को) पिलाता है। 7। तब ही आत्मिक जीवन देने वाला गुरू शबद तब ही आत्मिक जीवन दाती सिफत सलाह की बाणी मनुष्य के हृदय में बस सकती है (हे भाई !) अगर सतिगुरू का आसरा-परना लिया जाए, जब हे नानक ! आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम सदा आत्मिक आनंद देने वाला है। ये नाम अंमृत पीने से (माया की) सारी भूख उतर जाती है। 8। 15। 16।
माझ महला 3 ॥ अंम्रितु वरसै सहजि सुभाए ॥ गुरमुखि विरला कोई जनु पाए ॥ अंम्रितु पी सदा त्रिपतासे करि किरपा त्रिसना बुझावणिआ ॥1॥ हउ वारी जीउ वारी गुरमुखि अंम्रितु पीआवणिआ ॥ रसना रसु चाखि सदा रहै रंगि राती सहजे हरि गुण गावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥ गुर परसादी सहजु को पाए ॥ दुबिधा मारे इकसु सिउ लिव लाए ॥ नदरि करे ता हरि गुण गावै नदरी सचि समावणिआ ॥2॥ सभना उपरि नदरि प्रभ तेरी ॥ किसै थोड़ी किसै है घणेरी ॥ तुझ ते बाहरि किछु न होवै गुरमुखि सोझी पावणिआ ॥3॥ गुरमुखि ततु है बीचारा ॥ अंम्रिति भरे तेरे भंडारा ॥ बिनु सतिगुर सेवे कोई न पावै गुर किरपा ते पावणिआ ॥4॥ सतिगुरु सेवै सो जनु सोहै ॥ अंम्रित नामि अंतरु मनु मोहै ॥ अंम्रिति मनु तनु बाणी रता अंम्रितु सहजि सुणावणिआ ॥5॥ मनमुखु भूला दूजै भाइ खुआए ॥ नामु न लेवै मरै बिखु खाए ॥ अनदिनु सदा विसटा महि वासा बिनु सेवा जनमु गवावणिआ ॥6॥ अंम्रितु पीवै जिस नो आपि पीआए ॥ गुर परसादी सहजि लिव लाए ॥ पूरन पूरि रहिआ सभ आपे गुरमति नदरी आवणिआ ॥7॥ आपे आपि निरंजनु सोई ॥ जिनि सिरजी तिनि आपे गोई ॥ नानक नामु समालि सदा तूं सहजे सचि समावणिआ ॥8॥16॥17॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ जब मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिकता है, प्रभू प्रेम में जुड़ता है, तब उसके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल बरखा करता है। पर (ये दाति) कोई वह विरला मनुष्य हासिल करता है, जो गुरू के बताए हुए रास्ते पे चलता है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पी के मनुष्य सदा के लिए (माया की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। (प्रभू) मेहर करके उनकी तृष्णा बुझा देता है। 1। मैं सदा उनके सदके हूँ कुर्बान हूँ, जो गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीते हैं। जिनकी जीभ नाम रस चख के प्रभू के प्रेम रंग में सदा रंगी रहती है, वह आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 1। रहाउ। गुरू की कृपा से कोई विरला मनुष्य आत्मिक अडोलता हासिल करता है। (जिसकी बरकति से) वह मन का दुचिक्तापन मार के सिर्फ परमात्मा (के चरणों) के साथ लगन लगाए रखता है। जब परमात्मा (किसी जीव पर मिहर की) निगाह करता है तब वह परमात्माके गुण गाता है, और प्रभू की मेहर की नजर सेसदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 2। हे प्रभू ! आपकी मेहर की निगाह सब जीवों पर ही है। किसी पे थोड़ी किसी पे बहुती। आपसे बाहर (आपकी मेहर की निगाह के बगैर) कुछ नहीं होता- ये समझ उस मनुष्य को होती है जो गुरू की शरण पड़ता है। 3। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य ने इस अस्लियत को समझा है। हे प्रभू ! आत्मिक जीवन देने वाले आपके नाम जलसे आपके खजाने भरे पड़े हैं। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य जानता है कि) गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य नाम-अंमृत नही ले सकता। गुरू की कृपा से ही हासिल कर सकता है। 4। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है, वह मनुष्य सुहाने जीवन वाला बन जाता है। आत्मिक जीवन देने वाले नाम में उसका अंदरूनी मन मस्त रहता है। उस मनुष्य का मन उस का तन नाम अंमृत से सिफत-सालाह की बाणी से रंगा जाता है। आत्मिक अडोलता में टिक के वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली नाम धुनि को सुनता रहता है। 5। पर अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ जाता है। माया के प्यार में (खचित हो के) सही जीवन राह से वंचित हो जाता है। वह परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। वह (माया का मोह रूपी) जहर खा के आत्मिक मौत ले लेता है। (गंदगी के कीड़े की तरह) उस मनुष्य का निवास सदा हर वक्त (विकारों के) गंद में ही रहता है। परमातमा की सेवा भक्ति के बिना वह अपना मानस जनम बरबाद कर लेता है। 6। (पर जीवों के भी क्या वश?) वही मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीता है, जिसे परमात्मा स्वयं मिलाता है। गुरू की कृपा से वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़े रखता है। सतिगुरू की मति ले कर फिर उसे ये प्रत्यक्ष दिखता है कि हर जगह स्वयं मौजूद है। 7। (हे भाई !) माया के प्रभाव से ऊँचा रहने वाला परमात्मा हर जगह स्वयं ही मौजूद है। जिस परमात्मा ने ये सृष्टि पैदा की है वह स्वयं ही इसका नाश करता है। हे नानक ! आप उस परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में संभाल के रख। (नाम सिमरन की बरकति से) आत्मिक अडोलता में टिक के उस सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 8। 16। 17।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे प्रभू !) जो लोग आपको अच्छे लगते हैं वह (आपके) सदा-स्थिर नाम में जुड़े रहते हैं। वे आत्मिक अडोलता के भाव में (टिक के) सदा (आपके) सदा स्थिर रहने वाले नाम को सिमरते हैं। (हे भाई ! यदि प्रभू की मेहर हो तो) मैं भी सदा स्थिर प्रभू के सिफत सालाह के शबद के द्वारा उस सदा स्थिर प्रभू की सिफत सालाह करता रहूँ। (जो सिफत सालाह करते हैं) वे सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के चरणों में जुड़े रहते हैं। 1। मैं उनसे सदके हूँ कुर्बान हूँ, जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह करते हैं। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का ध्यान धरते हैं, वे उस सदा स्थिर में रंगे रहते हैं वे सदा ही सदा स्थिर में लीन रहते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) मैं जिधर देखता हूँ, सदा स्थिर परमात्मा हर जगह बसता है। गुरू की कृपा से ही मैं अपने मन में बसा सकता हूँ। जो मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभू का नाम सुन के, उच्चार के, उसके गुण कथन करते हैं, उनकी जीभ सदा स्थिर रहने वाले प्रभू (के नाम रंग) में ही रंगी जाती है, उनके ज्ञानेंद्रियां अडोल हो जाती हैं। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू !) खोटे जीव और खरे जीव आपके खुद के ही पैदा किए हुए हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।