लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1177 · बसंत

इस पृष्ठ पर
अंग
1177
बसंत
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. इन बिधि इहु मनु हरिआ होइ ॥
  2. गुर की बाणी विटहु वारिआ भाई गुर सबद विटहु बलि जाई ॥
  3. जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥
  4. रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥

गुरु अमर दास जी · शबद · राग बसंत

इन बिधि इहु मनु हरिआ होइ ॥

अंग 1176 से चला आ रहा अंश

इन बिधि इहु मनु हरिआ होइ ॥
हरि हरि नामु जपै दिनु राती गुरमुखि हउमै कढै धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर बाणी सबदु सुणाए ॥
इहु जगु हरिआ सतिगुर भाए ॥2॥
फल फूल लागे जां आपे लाए ॥
मूलि लगै तां सतिगुरु पाए ॥3॥
आपि बसंतु जगतु सभु वाड़ी ॥
नानक पूरै भागि भगति निराली ॥4॥5॥17॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई! इस तरीके से (उसका) यह मन आत्मिक जीवन से भरपूर हो जाता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार धो के निकाल देता है और दिन-रात हर वक्त परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ। हे भाई! जब यह जगत गुरू की बाणी सुनता है गुरू का शबद सुनता है और गुरू के प्यार में मगन होता है तब यह आत्मिक जीवन से हरा-भरा हो जाता है। 2। हे भाई! (जीव के अपने वश की बात नहीं। मनुष्य जीवन के वृक्ष को आत्मिक गुणों के) फूल-फल (तब ही) लगते हैं जब परमात्मा स्वयं ही लगाता है। (जब प्रभू की मेहर से मनुष्य को) गुरू मिलता है, तब मनुष्य सारे जगत के सृजनहार में जुड़ता है। 3। हे भाई! यह सारा जगत (परमात्मा की) बगीची है। (इसको हरा-भरा करने वाला) बसंत भी वह स्वयं ही है। हे नानक! (माया के मोह से) निर्लिप करने वाली हरी की भक्ति बड़ी किस्मत से ही (किसी मनुष्य को मिलती है)। 4। 5। 17।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग बसंत

गुर की बाणी विटहु वारिआ भाई गुर सबद विटहु बलि जाई ॥

बसंतु हिंडोल महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर की बाणी विटहु वारिआ भाई गुर सबद विटहु बलि जाई ॥
गुरु सालाही सद अपणा भाई गुर चरणी चितु लाई ॥1॥
मेरे मन राम नामि चितु लाइ ॥
मनु तनु तेरा हरिआ होवै इकु हरि नामा फलु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरि राखे से उबरे भाई हरि रसु अंम्रितु पीआइ ॥
विचहु हउमै दुखु उठि गइआ भाई सुखु वुठा मनि आइ ॥2॥
धुरि आपे जिन॑ा नो बखसिओनु भाई सबदे लइअनु मिलाइ ॥
धूड़ि तिन॑ा की अघुलीऐ भाई सतसंगति मेलि मिलाइ ॥3॥
आपि कराए करे आपि भाई जिनि हरिआ कीआ सभु कोइ ॥
नानक मनि तनि सुखु सद वसै भाई सबदि मिलावा होइ ॥4॥1॥18॥12॥18॥30॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 3 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! मैं गुरू की बाणी से गुरू के शबद से बलिहार जाता हूँ। हे भाई! मैं सदा अपने गुरू को सलाहता हूँ। मैं अपने गुरू के चरणों में चित्त जोड़ता हूँ। 1। हे मेरे मन! परमात्मा के नाम में चित्त जोड़ें। हे भाई! परमात्मा का नाम-फल प्राप्त करके आपका मन खिल उठेगा आपका तन खिल उठेगा। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू ने जिन गुरमुखों की रक्षा की वे (माया के मोह के पँजे से) बच गए गुरू ने उनको आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पिला के (बचा लिया)। हे भाई! उनके अंदर से अहंकार का दुख दूर हो गया। उनके मन में आनंद आ बसा। 2। हे भाई! धुर-दरगाह से परमात्मा ने स्वयं ही जिन पर बख्शिश की। उनको उसने (गुरू के) शबद में जोड़ दिया। हे भाई! उनके चरण-धूड़ की बरकति से (माया से) निर्लिप हुआ जाता है (जिन पर बख्शिश करता है उन्हें) साध-संगति में मिला के (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। 3। हे भाई! जिस परमात्मा ने हरेक जीव को जिंद दी है वह स्वयं ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है स्वयं ही (सबमें व्यापक हो के सब कुछ) करता है। हे नानक! (कहें:) हे भाई! गुरू के शबद से जिस मनुष्य का मिलाप परमात्मा के साथ हो जाता है। उसके मन में उसके तन में सदा आनंद बना रहता है। 4। 1। 18। 12। 18। 30।

गुरु राम दास जी · शबद · राग बसंत

जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥

रागु बसंतु महला 4 घरु 1 इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥
तिउ घटि घटि रमईआ ओति पोति ॥1॥
एको हरि रविआ स्रब थाइ ॥
गुर सबदी मिलीऐ मेरी माइ ॥1॥ रहाउ ॥
घटि घटि अंतरि एको हरि सोइ ॥
गुरि मिलिऐ इकु प्रगटु होइ ॥2॥
एको एकु रहिआ भरपूरि ॥
साकत नर लोभी जाणहि दूरि ॥3॥
एको एकु वरतै हरि लोइ ॥
नानक हरि एकोु करे सु होइ ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु बसंतु महला 4 घरु 1 इक तुके ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरी माँ! जैसे सूरज के किरण की रौशनी (सारे जगत में) बिखरी हुई है, वैसे ही सुंदर राम ताने-पेटे की तरह हरेक शरीर में मौजूद (ओत-प्रोत) है। 1। हे मेरी माँ! (चाहे सिर्फ) एक परमात्मा ही हर जगह मौजूद है। (फिर भी) गुरू के शबद के द्वारा ही (उसको) मिला जा सकता है। 1। रहाउ। हे माँ! वह एक परमात्मा ही हरेक शरीर के अंदर व्यापक है। अगर (जीव को) गुरू मिल जाए, तब वह परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है। 2। हे माँ! एक परमात्मा ही हर जगह ज़ॅरे-ज़ॅरे में बस रहा है। पर परमात्मा से टूटे हुए माया के लालची मनुष्य समझते हैं कि वह कहीं दूर बसता है। 3। हे नानक! एक परमात्मा ही सारे जगत में बरत रहा है। वह सर्व-व्यापक प्रभू ही जो कुछ करता है वह होता है। 4। 1।

गुरु राम दास जी · शबद · राग बसंत

रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

बसंतु महला 4 ॥
रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥
मन हरि सिमरहु अंति सदा रखि लए ॥1॥
हरि हरि चेति सदा मन मेरे ॥
सभु आलसु दूख भंजि प्रभु पाइआ गुरमति गावहु गुण प्रभ केरे ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख फिरि फिरि हउमै मुए ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 4॥ हे मेरे मन! रात और दिन दोनों मौत का संदेशा दे रहे हैं (कि उम्र बीत रही है। और, मौत नज़दीक आ रही है)। हे मन! परमात्मा का नाम सिमरा करें। हरी-नाम ही अंत में सदा रक्षा करता है। 1। हे मेरे मन! सदा परमात्मा को याद किया करें। गुरू की मति ले के परमात्मा के गुण गाया करें। (जिस मनुष्य ने ये उद्यम किया। उसने) सारा आलस दूर करके अपने सारे दुख नाश कर के परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया। 1। रहाउ। हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य बार-बार अहंकार के कारण आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1177 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।