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अंग 1177

अंग
1177
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इन बिधि इहु मनु हरिआ होइ ॥
हरि हरि नामु जपै दिनु राती गुरमुखि हउमै कढै धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुर बाणी सबदु सुणाए ॥
इहु जगु हरिआ सतिगुर भाए ॥2॥
फल फूल लागे जां आपे लाए ॥
मूलि लगै तां सतिगुरु पाए ॥3॥
आपि बसंतु जगतु सभु वाड़ी ॥
नानक पूरै भागि भगति निराली ॥4॥5॥17॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! इस तरीके से (उसका) यह मन आत्मिक जीवन से भरपूर हो जाता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार धो के निकाल देता है और दिन-रात हर वक्त परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब यह जगत गुरू की बाणी सुनता है गुरू का शबद सुनता है और गुरू के प्यार में मगन होता है तब यह आत्मिक जीवन से हरा-भरा हो जाता है। 2। हे भाई ! (जीव के अपने वश की बात नहीं। मनुष्य जीवन के वृक्ष को आत्मिक गुणों के) फूल-फल (तब ही) लगते हैं जब परमात्मा स्वयं ही लगाता है। (जब प्रभू की मेहर से मनुष्य को) गुरू मिलता है। तब मनुष्य सारे जगत के सृजनहार में जुड़ता है। 3। हे भाई ! यह सारा जगत (परमात्मा की) बगीची है। (इसको हरा-भरा करने वाला) बसंत भी वह स्वयं ही है। हे नानक ! (माया के मोह से) निर्लिप करने वाली हरी की भक्ति बड़ी किस्मत से ही (किसी मनुष्य को मिलती है)। 4। 17।
बसंतु हिंडोल महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर की बाणी विटहु वारिआ भाई गुर सबद विटहु बलि जाई ॥
गुरु सालाही सद अपणा भाई गुर चरणी चितु लाई ॥1॥
मेरे मन राम नामि चितु लाइ ॥
मनु तनु तेरा हरिआ होवै इकु हरि नामा फलु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरि राखे से उबरे भाई हरि रसु अंम्रितु पीआइ ॥
विचहु हउमै दुखु उठि गइआ भाई सुखु वुठा मनि आइ ॥2॥
धुरि आपे जिन॑ा नो बखसिओनु भाई सबदे लइअनु मिलाइ ॥
धूड़ि तिन॑ा की अघुलीऐ भाई सतसंगति मेलि मिलाइ ॥3॥
आपि कराए करे आपि भाई जिनि हरिआ कीआ सभु कोइ ॥
नानक मनि तनि सुखु सद वसै भाई सबदि मिलावा होइ ॥4॥1॥18॥12॥18॥30॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! मैं गुरू की बाणी से गुरू के शबद से बलिहार जाता हूँ। हे भाई ! मैं सदा अपने गुरू को सलाहता हूँ। मैं अपने गुरू के चरणों में चित्त जोड़ता हूँ। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम में चित्त जोड़। हे भाई ! परमात्मा का नाम-फल प्राप्त करके आपका मन खिल उठेगा आपका तन खिल उठेगा। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू ने जिन गुरमुखों की रक्षा की वे (माया के मोह के पँजे से) बच गए गुरू ने उनको आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पिला के (बचा लिया)। हे भाई ! उनके अंदर से अहंकार का दुख दूर हो गया। उनके मन में आनंद आ बसा। 2। हे भाई ! धुर-दरगाह से परमात्मा ने स्वयं ही जिन पर बख्शिश की। उनको उसने (गुरू के) शबद में जोड़ दिया। हे भाई ! उनके चरण-धूड़ की बरकति से (माया से) निर्लिप हुआ जाता है (जिन पर बख्शिश करता है उन्हें) साध-संगति में मिला के (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। 3। हे भाई ! जिस परमात्मा ने हरेक जीव को जिंद दी है वह स्वयं ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है स्वयं ही (सबमें व्यापक हो के सब कुछ) करता है। हे नानक ! (कह-) हे भाई ! गुरू के शबद से जिस मनुष्य का मिलाप परमात्मा के साथ हो जाता है। उसके मन में उसके तन में सदा आनंद बना रहता है। 4। 1। 18। 12। 18। 30।
रागु बसंतु महला 4 घरु 1 इक तुके
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिउ पसरी सूरज किरणि जोति ॥
तिउ घटि घटि रमईआ ओति पोति ॥1॥
एको हरि रविआ स्रब थाइ ॥
गुर सबदी मिलीऐ मेरी माइ ॥1॥ रहाउ ॥
घटि घटि अंतरि एको हरि सोइ ॥
गुरि मिलिऐ इकु प्रगटु होइ ॥2॥
एको एकु रहिआ भरपूरि ॥
साकत नर लोभी जाणहि दूरि ॥3॥
एको एकु वरतै हरि लोइ ॥
नानक हरि एकोु करे सु होइ ॥4॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: रागु बसंतु महला 4 घरु 1 इक तुके सतिगुर प्रसादि॥ हे मेरी माँ ! जैसे सूरज के किरण की रौशनी (सारे जगत में) बिखरी हुई है। वैसे ही सुंदर राम ताने-पेटे की तरह हरेक शरीर में मौजूद (ओत-प्रोत) है। 1। हे मेरी माँ ! (चाहे सिर्फ) एक परमात्मा ही हर जगह मौजूद है। (फिर भी) गुरू के शबद के द्वारा ही (उसको) मिला जा सकता है। 1। रहाउ। हे माँ ! वह एक परमात्मा ही हरेक शरीर के अंदर व्यापक है। अगर (जीव को) गुरू मिल जाए। तब वह परमात्मा प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है। 2। हे माँ ! एक परमात्मा ही हर जगह ज़ॅरे-ज़ॅरे में बस रहा है। पर परमात्मा से टूटे हुए माया के लालची मनुष्य समझते हैं कि वह कहीं दूर बसता है। 3। हे नानक ! एक परमात्मा ही सारे जगत में बरत रहा है। वह सर्व-व्यापक प्रभू ही जो कुछ करता है वह होता है। 4। 1।
बसंतु महला 4 ॥
रैणि दिनसु दुइ सदे पए ॥
मन हरि सिमरहु अंति सदा रखि लए ॥1॥
हरि हरि चेति सदा मन मेरे ॥
सभु आलसु दूख भंजि प्रभु पाइआ गुरमति गावहु गुण प्रभ केरे ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख फिरि फिरि हउमै मुए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 4॥ हे मेरे मन ! रात और दिन दोनों मौत का संदेशा दे रहे हैं (कि उम्र बीत रही है। और। मौत नज़दीक आ रही है)। हे मन ! परमात्मा का नाम सिमरा कर। हरी-नाम ही अंत में सदा रक्षा करता है। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा को याद किया कर। गुरू की मति ले के परमात्मा के गुण गाया कर। (जिस मनुष्य ने ये उद्यम किया। उसने) सारा आलस दूर करके अपने सारे दुख नाश कर के परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य बार-बार अहंकार के कारण आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! इस तरीके से (उसका) यह मन आत्मिक जीवन से भरपूर हो जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।