गुर पूरे ते पाइआ जाई ॥ नामि रते सदा सुखु पाई ॥ बिनु नामै हउमै जलि जाई ॥3॥ वडभागी हरि नामु बीचारा ॥ छूटै राम नामि दुखु सारा ॥ हिरदै वसिआ सु बाहरि पासारा ॥ नानक जाणै सभु उपावणहारा ॥4॥12॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: यह नाम पूरे गुरू के पास से मिलता है। हरी-नाम (के प्यार-रंग) में रंगे जा के मनुष्य सदा (हरेक युग में) सुख भोगता है। नाम के बिना मनुष्य अहंकार की आग में अपना आत्मिक जीवन राख कर लेता है। 3। हे भाई ! जो भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा के नाम को अपनी सोच-मण्डल में बसाता है। नाम की बरकति से उसका सारा दुख समाप्त हो जाता है। हे नानक ! वह मनुष्य हर जगह सृजनहार को बसता समझता है (वह जानता है कि जो प्रभू) हृदय में बस रहा है। बाहर जगत में भी वही पसरा हुआ है। 4। 12।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3 इक तुके॥ हे प्रभू ! मैं आपका ही पैदा किया हुआ तुच्छ जीव हूँ। अगर आप स्वयं ही दे। तब ही मैं आपका सतिनाम-मंत्र जप सकता हूँ। 1। हे माँ ! (मेरी तमन्ना ये है कि) मैं परमात्मा के गुण उचार के उनको अपने मन में बसाए रखूँ। हरी-नाम जप-जप के हरी के चरणों में जुड़ा रहूँ। 1। रहाउ। मानव गुरू की कृपा के साथ (ही) नाम के रस में लग सकता है। वैर में वव िरोध में क्यों अपनी ज़िंदगी गुमा रहे हैं। (गुरू की सरन पड़ो) । 2। हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू ने मेहर की। उसके अंदर से अहंकार समाप्त हो गया। उसने आत्मिक अडोलता देने वाले प्रेम में टिक के परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया। 3। हे भाई ! प्रभू की सिफत-सालाह की बाणी पढ़ने वाला काम (और सारे कामों से) उक्तम और ऊँचा है। (तभी तो) नानक सदा-स्थिर प्रभू का नाम उचारता रहता है। 4। 13।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! (जैसे जब) बसंत चढ़ता है तो सारी धरती हरी-भरी हो जाती है। (वैसे ही) गुरू की संगति में रह के यह मन (आत्मिक जीवन से) हरा-भरा हो जाता है। 1। हे (मेरे) मूर्ख मन ! आप सदा कायम रहने वाले परमात्मा को सिमरा कर। तब ही। हे मेरे मन ! आप आनंद पा सकेगा। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिस मनुष्य ने गुरू की संगति में) गोबिंद का नाम हासिल कर लिया। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल प्राप्त कर लिया। उसका ये मन खिल उठने से उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो गया है। 2। हे भाई ! वैसे तो हरेक मनुष्य कहता फिरता है कि (सब जगह) परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। पर जब मनुष्य परमात्मा की रज़ा को समझता है। तब ही उसके साथ गहरी सांझ डालता है। 3। हे भाई ! नानक कहता है- (जब मनुष्य परमात्मा की रज़ा को समझ लेता है तब) मनुष्य ‘मैं मैं’ नहीं करता (तब उसे यह समझ आ जाती है कि) जीव वही कुछ कहता-देखता है जो मालिक की तरफ़ से प्रेरणा होती है। 4। 2। 14।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे प्रभू ! सारे जुग (सारे समय) आपके ही बनाए हुए हैं (आपके नाम की प्राप्ति युगों के भेदभाव अर्थात किसी विशेष युग में पैदा होने व भक्ति करने से नहीं होती। जिस मनुष्य को आपकी मेहर से) गुरू मिल जाता है (उसके अंदर नाम जपने वाली) मति बुद्धि पैदा हैं जाती है। 1। हे प्रभू जी ! (जिस मनुष्य को) आप स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। गुरू के शबद द्वारा (वह मनुष्य) (आपके) सदा कायम रहने वाले नाम में लीन रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जिन मनुष्यों के) मन में सदा खिले रहने वाला प्रभू आ बसता है। वह सारे ही इस जगत में आत्मिक जीवन वाले हो जाते हैं। वह मनुष्य दुनियां में भी कामयाब होते हैं। परमात्मा के नाम की बरकति से उनके अंदर आत्मिक आनंद (भी) बना रहता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को मन में बसाता है परमात्मा के नाम को दिल में टिकाए रखता है। उसके अंदर सदा आत्मिक उमंग बनी रहती है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में सदा खिले रहने वाला हरी आ बसता है। उसका तन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है उसका मन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे नानक ! ये शरीर (मानो) वृक्ष है। (जिसके मन में बसंत आ जाती है) उस मनुष्य का ये शरीर-वृक्ष हरी-नाम-फल प्राप्त कर लेता है। 4। 15।
बसंतु महला 3 ॥ तिन॑ बसंतु जो हरि गुण गाइ ॥ पूरै भागि हरि भगति कराइ ॥1॥ इसु मन कउ बसंत की लगै न सोइ ॥ इहु मनु जलिआ दूजै दोइ ॥1॥ रहाउ ॥ इहु मनु धंधै बांधा करम कमाइ ॥ माइआ मूठा सदा बिललाइ ॥2॥ इहु मनु छूटै जां सतिगुरु भेटै ॥ जमकाल की फिरि आवै न फेटै ॥3॥ इहु मनु छूटा गुरि लीआ छडाइ ॥ नानक माइआ मोहु सबदि जलाइ ॥4॥4॥16॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! जो जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता रहता है। उनके अंदर आत्मिक उमंग बनी रहती है। (पर जीव के वश की बात नहीं है) बड़ी किस्मत से परमात्मा (स्वयं ही जीव से) भक्ति करवाता है। 1। हे भाई ! (उस मनुष्य के) इस मन को आत्मिक उमंग की छोह प्राप्त नहीं होती। (जिस मनुष्य का) यह मन माया के मोह में (फस के) मेर-तेर में (फस के) आत्मिक मौत सहेड़ लेता है 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य का यह मन माया के धंधे में बँधा रहता है (और इस हालत में टिका रह के) कर्म कमाता है। माया (का मोह) उसके आत्मिक जीवन को लूट लेता है। वह सदा दुखी रहता है। 2। हे भाई ! जब मनुष्य को गुरू मिल जाता है तब मनुष्य का यह मन (माया के मोह के पँजे में से) बच निकलता है। फिर वह आत्मिक मौत की मार के काबू में नहीं आता। 3। पर। हे भाई ! (माया के मोह में से निकलना जीव के अपने वश की बात नहीं। जिस मनुष्य को) गुरू ने (माया के पँजे में से) छुड़ा लिया। उसका ये मन (माया के मोह से) बच गया। हे नानक ! वह मनुष्य माया के मोह को गुरू के शबद की सहायता से जला देता है। 4। 16।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! (जैसे जब) बसंत का मौसम शुरू होता है तब सारी बनस्पति खिल उठती है (वैसे) ये सारे जीव परमात्मा में चित्त जोड़ के आत्मिक जीवन से खिल उठते हैं। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यह नाम पूरे गुरू के पास से मिलता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।