गुरमुखि हरि हरि हरि लिव लागे ॥
जनम मरण दोऊ दुख भागे ॥3॥
भगत जना कउ हरि किरपा धारी ॥
गुरु नानकु तुठा मिलिआ बनवारी ॥4॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥
सतिगुरु मिलै त खोजीऐ मिलि जोती जोति समानी ॥1॥
माधो साधू जन देहु मिलाइ ॥
देखत दरसु पाप सभि नासहि पवित्र परम पदु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
पंच चोर मिलि लागे नगरीआ राम नाम धनु हिरिआ ॥
गुरमति खोज परे तब पकरे धनु साबतु रासि उबरिआ ॥2॥
पाखंड भरम उपाव करि थाके रिद अंतरि माइआ माइआ ॥
साधू पुरखु पुरखपति पाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥3॥
जगंनाथ जगदीस गुसाई करि किरपा साधु मिलावै ॥
नानक सांति होवै मन अंतरि नित हिरदै हरि गुण गावै ॥4॥1॥3॥
तुम॑ वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥
हरि दीन दइआल करहु प्रभ किरपा गुर सतिगुर चरण हम बनछे ॥1॥
गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि करि क्रिपछे ॥
जनम जनम के किलविख मलु भरिआ मिलि संगति करि प्रभ हनछे ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑रा जनु जाति अविजाता हरि जपिओ पतित पवीछे ॥
हरि कीओ सगल भवन ते ऊपरि हरि सोभा हरि प्रभ दिनछे ॥2॥
जाति अजाति कोई प्रभ धिआवै सभि पूरे मानस तिनछे ॥
से धंनि वडे वड पूरे हरि जन जिन॑ हरि धारिओ हरि उरछे ॥3॥
हम ढींढे ढीम बहुतु अति भारी हरि धारि क्रिपा प्रभ मिलछे ॥
जन नानक गुरु पाइआ हरि तूठे हम कीए पतित पवीछे ॥4॥2॥4॥
मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥
जिउ बारिकु रसकि परिओ थनि माता थनि काढे बिलल बिलीधे ॥1॥
गोबिंद जीउ मेरे मन तन नाम हरि बीधे ॥
वडै भागि गुरु सतिगुरु पाइआ विचि काइआ नगर हरि सीधे ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब काल दैत्य ने उन्हें मार डाला।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।