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अंग 1178

अंग
1178
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कालि दैति संघारे जम पुरि गए ॥2॥
गुरमुखि हरि हरि हरि लिव लागे ॥
जनम मरण दोऊ दुख भागे ॥3॥
भगत जना कउ हरि किरपा धारी ॥
गुरु नानकु तुठा मिलिआ बनवारी ॥4॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जब काल दैत्य ने उन्हें मार डाला। तब जमों के वश में पड़ गए। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर परमात्मा के नाम की लगन लगती है (जिसकी बरकति से) पैदा होने व मरने के उनके दोनों दुख दूर हो जाते हैं। 3। हे भाई ! अपने भक्तों पर परमात्मा स्वयं मेहर करता है (उनको गुरू से मिलाता है)। हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू नानक दयावान हुआ। उसको परमात्मा मिल गया। 4। 2।
बसंतु हिंडोल महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम नामु रतन कोठड़ी गड़ मंदरि एक लुकानी ॥
सतिगुरु मिलै त खोजीऐ मिलि जोती जोति समानी ॥1॥
माधो साधू जन देहु मिलाइ ॥
देखत दरसु पाप सभि नासहि पवित्र परम पदु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
पंच चोर मिलि लागे नगरीआ राम नाम धनु हिरिआ ॥
गुरमति खोज परे तब पकरे धनु साबतु रासि उबरिआ ॥2॥
पाखंड भरम उपाव करि थाके रिद अंतरि माइआ माइआ ॥
साधू पुरखु पुरखपति पाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥3॥
जगंनाथ जगदीस गुसाई करि किरपा साधु मिलावै ॥
नानक सांति होवै मन अंतरि नित हिरदै हरि गुण गावै ॥4॥1॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 4 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम श्रेष्ठ आत्मिक गुणों का सुंदर सा खजाना है। यह खजाना शरीर-किले में शरीर-मन्दिर में गुप्त पड़ा रहता है। जब (मनुष्य को) गुरू मिलता है तब (उस खजाने की) तलाश की जा सकती है। (गुरू को) मिल के मनुष्य की जिंद परमात्मा की ज्योति में लीन हो जाती है। 1। हे माया के पति प्रभू ! (मुझे) दास को गुरू मिला दे। गुरू के दर्शन करते हुए सारे पाप नाश हो जाते हैं। (जो मनुष्य गुरू के दर्शन करता है। वह) पवित्र और सबसे ऊँचा दर्जा हासिल कर लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य के इस शरीर-) नगर में (कामादिक) पाँच चोर के मिल के सेंध लगाए रखते हैं। और (मनुष्य के अंदर से) परमात्मा का नाम-धन चुरा लेते हैं। जब कोई मनुष्य गुरू की मति ले के इनका खुरा-निशान ढूँढता है तब (ये चोर) पकड़े जाते हैं। और उस मनुष्य का नाम-धन नाम-राशि सारे का सारा बच जाता है। 2। हे भाई ! धर्म का दिखावा करने वाले और वहमों-भरमों वाले उपाय करके (मनुष्य) थक जाते हैं उनके हृदय में सदा माया (की तृष्णा ही टिकी रहती है)। पर जिस मनुष्य को श्रेष्ठ पुरख गुरू मिल जाता है। वह मनुष्य अपने अंदर से आत्मिक जीवन के प्रति बेसमझी का अंधकार दूर कर लेता है। 3। हे नानक ! जगत का नाथ। जगत का मालिक। जगत का पति मेहर करके जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है। उस मनुष्य के मन में आत्मिक अडोलता बनी रहती है। वह मनुष्य अपने हृदय में सदा परमात्मा के गुण गाता रहता है। 4। 1। 3।
बसंतु महला 4 हिंडोल ॥
तुम॑ वड पुरख वड अगम गुसाई हम कीरे किरम तुमनछे ॥
हरि दीन दइआल करहु प्रभ किरपा गुर सतिगुर चरण हम बनछे ॥1॥
गोबिंद जीउ सतसंगति मेलि करि क्रिपछे ॥
जनम जनम के किलविख मलु भरिआ मिलि संगति करि प्रभ हनछे ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑रा जनु जाति अविजाता हरि जपिओ पतित पवीछे ॥
हरि कीओ सगल भवन ते ऊपरि हरि सोभा हरि प्रभ दिनछे ॥2॥
जाति अजाति कोई प्रभ धिआवै सभि पूरे मानस तिनछे ॥
से धंनि वडे वड पूरे हरि जन जिन॑ हरि धारिओ हरि उरछे ॥3॥
हम ढींढे ढीम बहुतु अति भारी हरि धारि क्रिपा प्रभ मिलछे ॥
जन नानक गुरु पाइआ हरि तूठे हम कीए पतित पवीछे ॥4॥2॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 4 हिंडोल॥ हे प्रभू ! आप अपहुँच है। आप जगत का मालिक है। आप सबसे बड़ा पुरख है। हम आपके पैदा किए हुए तुच्छ से जीव हैं। हे दीनों पर दया करने वाले हरी ! हे प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर (मुझे गुरू मिला) मैं गुरू सतिगुरू के चरणों (की धूड़) की तमन्ना रखता हूँ। 1। हे गोबिंद जी ! (मेरे पर) मेहर कर (मुझे साध-) संगति में मिला। मैं अनेकों जन्मों के पापों की मैल से लिबड़ा हुआ हूँ। हे प्रभू ! (मुझे साध-) संगति में मिला के पवित्र जीवन वाला बना। 1। रहाउ। हे हरी ! आपका सेवक उच्च जाति का हैं चाहे नीच जाति का। विकारियों को पवित्र करने वाला आपका नाम जिसने जपा है। हे हरी ! तूने उसको सारे जगत के जीवों से ऊँचा कर दिया। हे प्रभू ! तूने उसको (लोक-परलोक की) वडिआई बख्श दी। 2। हे भाई ! ऊँची जाति का हो चाहे नीच जाति का। जो जो भी मनुष्य प्रभू का नाम सिमरता है। उनके सारे मनोरथ पूरे हो जाते हैं। हे भाई ! प्रभू के जिन सेवकों ने हरी-प्रभू को अपने हृदय में बसा लिया। वे भाग्यशाली हैं। वे सबसे बड़े हैं। वे पूरन पुरख हैं। 3। हे हरी ! हम जीव नीच हैं। हम मूर्ख हैं। हम पापों के भार तले दबे हुए हैं। हे हरी ! मेहर कर। हमें मिल। हे दास नानक ! (कह-) प्रभू दयावान हुआ हमें मिल गया। (गुरू ने) हमें विकारियों को पवित्र बना दिया। 4। 2। 4।
बसंतु हिंडोल महला 4 ॥
मेरा इकु खिनु मनूआ रहि न सकै नित हरि हरि नाम रसि गीधे ॥
जिउ बारिकु रसकि परिओ थनि माता थनि काढे बिलल बिलीधे ॥1॥
गोबिंद जीउ मेरे मन तन नाम हरि बीधे ॥
वडै भागि गुरु सतिगुरु पाइआ विचि काइआ नगर हरि सीधे ॥1॥ रहाउ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोल महला 4॥ हे भाई ! (जब से मुझे गुरू मिला है। तब से) मेरा मन सदा परमात्मा के नाम के स्वाद में मस्त रहता है। अब यह मन एक छिन के वास्ते भी (उस स्वाद के बिना) रह नहीं सकता; जैसे छोटा बच्चा बड़े स्वाद से अपनी माँ के थन से चिपकता है। पर अगर थन (उसके मुँह में से) निकाल लें तो वह विलकने लग जाता है। 1। हे गोबिंद जी ! हे हरी ! (गुरू की मेहर से) मेरा मन मेरा तन आपके नाम में भेदे गए हैं। हे भाई ! बड़ी किस्मत से मुझे गुरू सतिगुरू मिल गया है। (गुरू की कृपा से अब मैंने) अपने शरीर-नगर में ही परमात्मा को पा लिया है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब काल दैत्य ने उन्हें मार डाला।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।