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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1175 · बसंत

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अंग
1175
बसंत
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  1. दरि साचै सचु सोभा होइ ॥
  2. बिनु करमा सभ भरमि भुलाई ॥
  3. क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥
  4. गुर सबदी हरि चेति सुभाइ ॥

दरि साचै सचु सोभा होइ ॥

अंग 1174 से चला आ रहा अंश

दरि साचै सचु सोभा होइ ॥
निज घरि वासा पावै सोइ ॥3॥
आपि अभुलु सचा सचु सोइ ॥
होरि सभि भूलहि दूजै पति खोइ ॥
साचा सेवहु साची बाणी ॥
नानक नामे साचि समाणी ॥4॥9॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा के दर पर उसको आदर मिलता है। सदा-स्थिर हरी-नाम (जिसके मन में बसता है) सदा-स्थिर-प्रभू के दर पर उसकी शोभा होती है। वह मनुष्य अपने घर में टिका रहता है (भटकना से बचा रहता है)। 3। हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा स्वयं भूलें करने वाला नहीं। और सारे जीव माया के मोह में इज्जत गवा के (जिंदगी के) गलत राह पर पड़े रहते हैं। हे भाई ! सदा-स्थिर-प्रभू की भक्ति करते रहा करो। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह (टिकी रहती है) उस मनुष्य की सुरति सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन रहती है। 4। 9।

बिनु करमा सभ भरमि भुलाई ॥

बसंतु महला 3 ॥
बिनु करमा सभ भरमि भुलाई ॥
माइआ मोहि बहुतु दुखु पाई ॥
मनमुख अंधे ठउर न पाई ॥
बिसटा का कीड़ा बिसटा माहि समाई ॥1॥
हुकमु मंने सो जनु परवाणु ॥
गुर कै सबदि नामि नीसाणु ॥1॥ रहाउ ॥
साचि रते जिन॑ा धुरि लिखि पाइआ ॥
हरि का नामु सदा मनि भाइआ ॥
सतिगुर की बाणी सदा सुखु होइ ॥
जोती जोति मिलाए सोइ ॥2॥
एकु नामु तारे संसारु ॥
गुर परसादी नाम पिआरु ॥
बिनु नामै मुकति किनै न पाई ॥
पूरे गुर ते नामु पलै पाई ॥3॥
सो बूझै जिसु आपि बुझाए ॥
सतिगुर सेवा नामु द्रिड़॑ाए ॥
जिन इकु जाता से जन परवाणु ॥
नानक नामि रते दरि नीसाणु ॥4॥10॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! प्रभू की बख्शिश के बिना सारी (लोकाई) को भटकना में गलत राह पर डाल रखा है। माया के मोह में फस के (लोकाई) बहुत दुख पाती है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (माया के मोह में) अंधे हुए रहते हैं। (मोह-ग्रसित मनुष्य) आत्मिक शांति का ठिकाना प्राप्त नहीं कर सकता (विकारों में ही फसा रहता है। जैसे) गंदगी का कीड़ा गंदगी में ही मस्त रहता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य (परमात्मा की) रज़ा को (मीठा करके) मानता है। वह मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाता है। गुरू के शबद से परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। आदर प्राप्त करता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन के माथे पर धुर-दरगाह से भक्ति का लेख लिखा होता है। वे सदा-स्थिर हरी-नाम में रंगे रहते हैं। परमात्मा का नाम सदा उनको अपने मन में प्यारा लगता है। गुरू की बाणी की बरकति से उनके अंदर सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। बाणी उनकी जिंद को परमात्मा की ज्योति में मिला देती है। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम जगत को (विकारों भरे समुंद्र से) पार लंघाता है। पर नाम का प्यार गुरू की कृपा से बनता है। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना किसी मनुष्य ने विकारों से मुक्ति हासिल नहीं की। नाम पूरे गुरू से मिलता है। 3। हे भाई ! (आत्मिक जीवन का सही रास्ता) वह मनुष्य समझता है जिसको परमात्मा स्वयं समझाता है। परमात्मा उसको गुरू की शरण डाल के उसके हृदय में अपना नाम दृढ़ करवाता है। हे नानक ! जिन्होंने एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली। वे परमात्मा के दर पर कबूल हो गए। वह मनुष्य परमात्मा के नाम में रंगे गए। परमात्मा के दर पर उनको आदर मिला। 4। 10।

क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥

बसंतु महला 3 ॥
क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥
आपे आपि वसै मनि आए ॥
निहचल मति सदा मन धीर ॥
हरि गुण गावै गुणी गहीर ॥1॥
नामहु भूले मरहि बिखु खाइ ॥
ब्रिथा जनमु फिरि आवहि जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
बहु भेख करहि मनि सांति न होइ ॥
बहु अभिमानि अपणी पति खोइ ॥
से वडभागी जिन सबदु पछाणिआ ॥
बाहरि जादा घर महि आणिआ ॥2॥
घर महि वसतु अगम अपारा ॥
गुरमति खोजहि सबदि बीचारा ॥
नामु नव निधि पाई घर ही माहि ॥
सदा रंगि राते सचि समाहि ॥3॥
आपि करे किछु करणु न जाइ ॥
आपे भावै लए मिलाइ ॥
तिस ते नेड़ै नाही को दूरि ॥
नानक नामि रहिआ भरपूरि ॥4॥11॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है उसको गुरू मिलाता है (और गुरू के द्वारा) स्वयं ही उसके मन में आ बसता है। उसकी मति (विकारों के हमलों के प्रति) अडोल रहती है। उसके मन में सदा धैर्य बना रहता है। वह मनुष्य गुणों के खजाने बड़े जिगरे वाले हरी के गुण गाता रहता है 1। हे भाई ! परमात्मा के नाम से टूटे हुए मनुष्य (आत्मिक मौत लाने वाला माया के मोह का) जहर खा के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। उनकी जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। बार-बार जूनियों में पड़े रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! (नाम में टूट के जो मनुष्य निरे) कई धार्मिकभेष करते हैं उनके मन में शांति नहीं आ सकती। (बल्कि भेष के) बहुत अहंकार के कारण (भेखधारी मनुष्य लोक-परलोक में) अपनी इज्जत गवा लेता है। हे भाई ! वे मनुष्य बहुत भाग्यशाली हैं जिन्होंने गुरू के शबद से गहरी सांझ डाल ली है (और। शबद की बरकति से अपने) बाहर भटकते मन को अंदर की ओर मोड़ के ले आते हैं। 2। हे भाई !अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम पदार्थ (मनुष्य के) हृदय में ही बसता है। गुरू की मति पर चल के गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा के गुणों की) विचार करके (जो मनुष्य नाम-पदार्थ की) तलाश करते हैं। उन्होंने (धरती के) नौ-खजानों के तूल्य हरी-नाम को अपने हृदय में ही पा लिया। वे मनुष्य सदा प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। सदा-स्थिर हरी-नाम में लीन रहते हैं। 3। पर। हे भाई ! (नाम से टूटे रहना व नाम में लीन रहना- ये सब कुछ) परमात्मा स्वयं ही करता है (जीव द्वारा अपने आप) कुछ नहीं किया जा सकता। जिस पर प्रभू स्वयं ही मेहर करता है उसको अपने साथ जोड़ लेता है। (अपने उद्यम के आसरे) ना कोई मनुष्य उसके नज़दीक है। ना कोई मनुष्य उससे दूर है। हे नानक ! (जो मनुष्य उसकी मेहर से उसके) नाम में टिक जाता है। उसको वह हर जगह व्यापक दिखता है। 4। 11।

गुर सबदी हरि चेति सुभाइ ॥

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बसंतु महला 3 ॥
गुर सबदी हरि चेति सुभाइ ॥
राम नाम रसि रहै अघाइ ॥
कोट कोटंतर के पाप जलि जाहि ॥
जीवत मरहि हरि नामि समाहि ॥1॥
हरि की दाति हरि जीउ जाणै ॥
गुर कै सबदि इहु मनु मउलिआ हरि गुणदाता नामु वखाणै ॥1॥ रहाउ ॥
भगवै वेसि भ्रमि मुकति न होइ ॥
बहु संजमि सांति न पावै कोइ ॥
गुरमति नामु परापति होइ ॥
वडभागी हरि पावै सोइ ॥2॥
कलि महि राम नामि वडिआई ॥

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 3॥ हे भाई ! गुरू के शबद से प्रेम से परमात्मा को याद कर-कर के। मनुष्य हरी-नाम के स्वाद की बरकति से (माया की तृष्णा से) तृप्त रहता है। उनके अनेकों जन्मों के पाप जल जाते हैं। जो मनुष्य हरी-नाम में लीन रहते हैं। वे दुनिया की किरत-कार करते हुए ही माया के मोह से बचे रहते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही जानता है कि अपने नाम की दाति किसको देनी है। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के गुणों की बख्शिश करने वाला हरी-नाम उचारता है। उसका ये मन आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! भगवे रंगों के भेष से (धरती पर) भ्रमण करने से विकारों से खलासी नहीं होती। कठिन तपस्या से निरे विकारों के प्रयत्नों से भी कोई मनुष्य आत्मिक शांति प्राप्त नहीं कर सकता। जो मनुष्य गुरू की मति लेता है। उसको प्रभू का नाम प्राप्त होता है। वह भाग्यशाली मनुष्य परमात्मा को मिल जाता है। 2। हे भाई ! इस बखेड़ों भरे जगत में परमात्मा के नाम से ही (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1175 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।