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अंग ११६ · माझ

अंग
116
माझ
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  1. मनमुख खोटी रासि खोटा पासारा ॥
  2. तेरीआ खाणी तेरीआ बाणी ॥
  3. ऐथै साचे सु आगै साचे ॥

मनमुख खोटी रासि खोटा पासारा ॥

अंग ११५ से चला आ रहा अंश

मनमुख खोटी रासि खोटा पासारा ॥
कूड़ु कमावनि दुखु लागै भारा ॥
भरमे भूले फिरनि दिन राती मरि जनमहि जनमु गवावणिआ ॥7॥
सचा साहिबु मै अति पिआरा ॥
पूरे गुर कै सबदि अधारा ॥
नानक नामि मिलै वडिआई दुखु सुखु सम करि जानणिआ ॥8॥10॥11॥

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य वही पूँजी जोड़ते हैं, वही पसारा पसारते हैं, जो ईश्वरीय टकसाल में खोटा माना जाता है। वे निरी नाशवंत कमाई ही करते हैं और बहुत आत्मिक दुख कलेश पाते हैं। वे माया की भटकना में पड़ के दिनरात कुमार्ग पर चलते हैं और मानस जनम व्यर्थ गवा जाते हैं।7। (हे भाई !) सदा स्थिर रहने वाला मालिक मुझे (अब) बहुत प्यारा लगता है। पूरे गुरू के शबद में जुड़ के मैंने उस मालिक को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना लिया है। हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़ने से (लोक परलोक में) इज्जत मिलती है। प्रभू नाम में जुड़ने वाले लोग दुनिया के दुख सुख को एक समान ही जानते हैं।8।10।11।

तेरीआ खाणी तेरीआ बाणी ॥

माझ महला 3 ॥
तेरीआ खाणी तेरीआ बाणी ॥
बिनु नावै सभ भरमि भुलाणी ॥
गुर सेवा ते हरि नामु पाइआ बिनु सतिगुर कोइ न पावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी हरि सेती चितु लावणिआ ॥
हरि सचा गुर भगती पाईऐ सहजे मंनि वसावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु सेवे ता सभ किछु पाए ॥
जेही मनसा करि लागै तेहा फलु पाए ॥
सतिगुरु दाता सभना वथू का पूरै भागि मिलावणिआ ॥2॥
इहु मनु मैला इकु न धिआए ॥
अंतरि मैलु लागी बहु दूजै भाए ॥
तटि तीरथि दिसंतरि भवै अहंकारी होरु वधेरै हउमै मलु लावणिआ ॥3॥
सतिगुरु सेवे ता मलु जाए ॥
जीवतु मरै हरि सिउ चितु लाए ॥
हरि निरमलु सचु मैलु न लागै सचि लागै मैलु गवावणिआ ॥4॥
बाझु गुरू है अंध गुबारा ॥
अगिआनी अंधा अंधु अंधारा ॥
बिसटा के कीड़े बिसटा कमावहि फिरि बिसटा माहि पचावणिआ ॥5॥
मुकते सेवे मुकता होवै ॥
हउमै ममता सबदे खोवै ॥
अनदिनु हरि जीउ सचा सेवी पूरै भागि गुरु पावणिआ ॥6॥
आपे बखसे मेलि मिलाए ॥
पूरे गुर ते नामु निधि पाए ॥
सचै नामि सदा मनु सचा सचु सेवे दुखु गवावणिआ ॥7॥
सदा हजूरि दूरि न जाणहु ॥
गुर सबदी हरि अंतरि पछाणहु ॥
नानक नामि मिलै वडिआई पूरे गुर ते पावणिआ ॥8॥11॥12॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ हे प्रभू ! अंडज, जेरज, सेतज व उतभुज-चौरासी लाख जीवों की उत्पक्ति की ये) खाणियां आपकी ही बनाई हुई हैं। सब जीवों की बनतर (रचना) आपकी ही रची हुई है। (पर हे भाई ! उस रचनहार प्रभू के) नाम के बिना सारी सृष्टि गलत रास्ते पे जा रही है। परतात्मा का नाम गुरू की बताई हुई सेवा करने से मिलता है। गुरू (की शरण) के बिना कोई मनुष्य (परमात्मा की भक्ति) प्राप्त नहीं कर सकता।1। (हे भाई !) मैं उन (भाग्यशाली लोगों से) सदके कुर्बान जाता हूँ, जो परमात्मा (के चरणों) के साथ अपना चित्त जोड़ते हैं। (पर) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा गुरू पर श्रद्धा रखने से ही मिलता है। (जो मनुष्य गुरू पर श्रद्धा बनाते हैं वे) आत्मिक अडोकलता में टिक के (परमात्मा के नाम को अपने) मन में बसाते हैं।1।रहाउ। अगर मनुष्य गुरू का पल्ला पकड़े तो वह हरेक चीज प्राप्त कर लेता है। मनुष्य जिस तरह की कामना मन में धार के (गुरू की चरणी लगता है, वैसा ही फल पा लेता है)। गुरू सब पदार्थों को देने वाला है। (परमात्मा जीव को उसकी) पूरी किस्मत के सदका (गुरू के साथ) मिलाता है।2। (जितना समय मनुष्य का) ये मन (विकारों की मैल से) मैला (रहता) है, (तब तक मनुष्य) एक परमात्मा को नहीं सिमरता। माया से प्यार पड़ने के कारण मनुष्य के अंदर (मन में विकारों की) बहुत मैल लगी रहती है। (ऐसे जीवन वाला मनुष्य किसी) नदी के किनारे पर जाता है, (किसी) तीर्थ पर (भी) जाता है। देश-देशांतरों में भ्रमण करता है (पर इस तरह वह तीर्थ यात्राओं आदि के गुमान से) और भी ज्यादा अहंकारी हो जाता है। वह अपने अंदर अधिक अहंकार की मैल एकत्र कर लेता है।3। जब मनुष्य गुरू की शरण में आता है, तब (उसके मन में से अहंकार) की मैल दूर हो जाती है। वह दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ भी स्वै भाव (घमण्ड) से मरा रहता है, और परमात्मा (के चरणों) से अपना चित्त जोड़े रखता है। परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है, और पवित्र स्वरूप है, उसको (अहम् आदि विकारों की) मैल छू नही सकती। जो मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभू (की याद) में लगता है, वह (अपने अंदर से विकारों की) मैल दूर कर लेता है।4। गुरू के बिना (जगत में माया के मोह का) घोर अंधकार छाया रहता है। गुरू के ज्ञान के बगैर मनुष्य (उस मोह में) अंधा हुआ रहता है। (मोह के अंधेरे में फंसे हुए की वही हालत होती है जैसे) गंदगी के कीड़े गंदगी (खाने की) कमाई ही करते हैं और फिर गंदगी में ही दुखी होते रहते हैं।5। जो मनुष्य (माया के मोह से) मुक्त (गुरू) की शरण लेता है, वह भी माया के मोह से स्वतंत्र हो जाता है। वह गुरू शबद में जुड़ के (अपने अंदर से) अहंकार व ममता को दूर कर लेता है। (गुरू की शरण की बरकति से) वह हर रोज सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करता है। पर, गुरू (भी) पूरी किस्मत से ही मिलता है।6। जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही बख्शिश करता है और गुरू चरणों में मिलाता है, वह मनुष्य पूरे गुरू से नाम खजाना हासिल कर लेता है। सदा स्थिर प्रभू के नाम में सदा टिके रहने के कारण उसका मन (विकारों की तरफ से) अडोल हो जाता है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का सिमरन करके वह अपना (हरेक किस्म का) दुख मिटा लेता है।7। (हे भाई !) परमात्मा सदैव (सब जीवों के) अंग-संग (बसता) है। उसे अपने से दूर बसता ना समझो। गुरू के शबद में जुड़ के उस परमात्मा के साथ अपने हृदय में जान-पहिचान बनाओ ! हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़ने से (लोक परलोक में) सत्कार मिलता है, (पर, प्रभू का नाम) पूरे गुरू से ही मिलता है।8।11।12।

ऐथै साचे सु आगै साचे ॥

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माझ महला 3 ॥
ऐथै साचे सु आगै साचे ॥
मनु सचा सचै सबदि राचे ॥
सचा सेवहि सचु कमावहि सचो सचु कमावणिआ ॥1॥
हउ वारी जीउ वारी सचा नामु मंनि वसावणिआ ॥
सचे सेवहि सचि समावहि सचे के गुण गावणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
पंडित पड़हि सादु न पावहि ॥
दूजै भाइ माइआ मनु भरमावहि ॥
माइआ मोहि सभ सुधि गवाई करि अवगण पछोतावणिआ ॥2॥
सतिगुरु मिलै ता ततु पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥

हिन्दी अर्थ: माझ महला 3 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य इस लोक में अडोल चित्त रहते हैं, वे परलोक में भी प्रभू के साथ एकमेक हो के रहते हैं। जो लोग सदा स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद में रचे रहते हैं, उनका मन अडोल हो जाता है। वे सदा ही सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करते हैं, सिमरन की ही कमाई करते हैं, सदा स्थिर प्रभू को ही सिमरते रहते हैं।1। मैं उनसे सदके जाता हूँ, जो सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम अपने मन में बसाए रखते हैं। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभू का सिमरन करते हैं, सदा स्थिर प्रभू के गुण गाते हैं, वे सदा स्थिर प्रभू में लीन रहते हैं।1।रहाउ। पंडित लोग (वेद आदि पुस्तकें) पढ़ते (तो) हैं, पर, आत्मिक आनंद नही ले सकते। (क्योंकि) वे माया के मोह में फंस के माया की ओर ही अपने मन को दौड़ाते रहते हैं। माया के मोह के कारण उन्होंने (उच्च आत्मिक जीवन के बारे में) सारी सूझ गवा ली होती है, (और माया की खातिर) औगुण कर करके पछताते रहते हैं।2। जब मनुष्य को गुरू मिल जाए तो वह असलियत समझ लेता है, वह परमात्मा का नाम (अपने) मन में बसा लेता है। वह गुरू के शबद में जुड़ के माया के मोह की तरफ से अडोल हो जाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ११६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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