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अंग 1168

अंग
1168
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु बसंतु महला 1 घरु 1 चउपदे दुतुके
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
माहा माह मुमारखी चड़िआ सदा बसंतु ॥
परफड़ु चित समालि सोइ सदा सदा गोबिंदु ॥1॥
भोलिआ हउमै सुरति विसारि ॥
हउमै मारि बीचारि मन गुण विचि गुणु लै सारि ॥1॥ रहाउ ॥
करम पेडु साखा हरी धरमु फुलु फलु गिआनु ॥
पत परापति छाव घणी चूका मन अभिमानु ॥2॥
अखी कुदरति कंनी बाणी मुखि आखणु सचु नामु ॥
पति का धनु पूरा होआ लागा सहजि धिआनु ॥3॥
माहा रुती आवणा वेखहु करम कमाइ ॥
नानक हरे न सूकही जि गुरमुखि रहे समाइ ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु बसंतु महला 1 घरु 1 चउपदे दुतुके ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह कर्ता पुरुष है, सर्वशक्तिमान है,सब पर सम-दृष्टि होने के कारण वह निर्वेर है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर है, वह योनि-चक्र से रहित है, स्वजन्मा है, गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। (हे मन ! अगर आप अहंकार वाली बिरती भुला दे तो आपको) बड़ी-बड़ी मुबारकें (हों। आपके अंदर सदा चढ़दीकला टिकी रहे। क्योंकि आपके अंदर) सदा खिले रहने वाला परमात्मा प्रकट हैं जाए। हे मेरे चित्त ! सृष्टि की सार लेने वाले प्रभू को आप सदा (अपने अंदर) संभाल के रख और (इसकी बरकति से) खिला रह। 1। हे कमले मन ! मैं-मैं करने वाली बिरती भुला दे। हे मन ! होश कर। अहंकार को (अपने अंदर से) खत्म कर दे। (अहंकार को खत्म करने वाला यह) सबसे श्रेष्ठ गुण (अपने अंदर) संभाल ले। 1। रहाउ। (हे मन ! अगर आप अहंकार भुलाने वाले रोजाना) काम (करने लग जाए। यह आपके अंदर एक ऐसा) वृक्ष (उग जाएगा। जिसको) हरी-नाम (सिमरन) की टहनियाँ (फूटेंगीं। जिसको) धार्मिक जीवन का फूल (लगेगा और प्रभू से) गहरी जान-पहचान वाला फल (लगेगा)। परमात्मा की प्राप्ति (उस वृक्ष के) पत्ते (होंगे। और) विनम्रता (उस वृक्ष की) घनी छाया होगी। 2। (जो भी मनुष्य अहंकार को भुलाने वाले रोजाना कर्म करेगा उसको) कुदरति में बसता ईश्वर अपनी आँखों से दिखेगा। उसके कानों में प्रभू की सिफत-सालाह बसेगी। उसके मुँह में सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू का नाम ही बोल होंगे। उसको लोक-परलोक की इज्जत का सम्पूर्ण धन मिल जाएगा। अडोलता में सदा उसकी सुरति टिकी रहेगी। 3। (हे भाई ! अहंकार को बिसारने वाले) काम करके देख लो। ये दुनियावी ऋतुएं और महीने तो सदा आने-जाने वाले हैं (पर वह सदा प्रफुल्लित रहने वाली आत्मिक अवस्था वाली ऋतु कभी अलोप नहीं होगी)। हे नानक ! जो लोग गुरू के बताए हुए रास्ते पर चल के प्रभू-याद में टिके रहते हैं। उनकी आत्मा सदा खिली रहती है और यह खिलाव कभी सूखता नहीं। 4। 1।
महला 1 बसंतु ॥
रुति आईले सरस बसंत माहि ॥
रंगि राते रवहि सि तेरै चाइ ॥
किसु पूज चड़ावउ लगउ पाइ ॥1॥
तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥
जगजीवन जुगति न मिलै काइ ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी मूरति एका बहुतु रूप ॥
किसु पूज चड़ावउ देउ धूप ॥
तेरा अंतु न पाइआ कहा पाइ ॥
तेरा दासनि दासा कहउ राइ ॥2॥
तेरे सठि संबत सभि तीरथा ॥
तेरा सचु नामु परमेसरा ॥
तेरी गति अविगति नही जाणीऐ ॥
अणजाणत नामु वखाणीऐ ॥3॥
नानकु वेचारा किआ कहै ॥
सभु लोकु सलाहे एकसै ॥
सिरु नानक लोका पाव है ॥
बलिहारी जाउ जेते तेरे नाव है ॥4॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: महला 1 बसंतु॥ हे प्रभू ! जो बंदे आपके प्यार-रंग में रंगे जाते हैं। जो आपको सिमरते हैं। वे आपके मिलाप की खुशी में रहते हैं। उनके लिए (ये मानस जन्म। मानो। बसंत की) ऋतु आई हुई है। वह (मनुष्य जन्म वाली) इस ऋतु में सदा खिले रहते हैं। आपके बिना) मैं और किस की पूजा के लिए (फूल) भेट करूँ। (आपके बिना) मैं और किसके चरणों में लगूँ। 1। (लोग बसंत ऋतु में खिले हुए फूल ले के देवी-देवताओं की भेट चढ़ा के पूजा करते हैं। पर। मैं आपके दासों का दास बन के आपको सिमरता हूँ। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! मैं आपके दासों का दास बन के आपको सिमरता हूँ। हे जगत के जीवन प्रभू ! आपके मिलाप की जुगती (आपके दासों के बिना) किसी और जगह से नहीं मिल सकती। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपकी हस्ती एक है। आपके रूप अनेकों हैं। आपको छोड़ के मैं और किस को धूप दूँ। आपको छोड़ के मैं और किस की पूजा के लिए (फूल आदि) भेटा रखूँ। हे प्रभू ! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! मैं तो आपके दासों का दास बन के आपको ही सिमरता हूँ। 2। मेरे लिए आपके साठ साल (ब्रहमा-विष्णू-शिव की बीसियाँ) और सारे तीर्थ – हे परमेश्वर ! आपका सदा-स्थिर रहने वाला नाम ही हैं। आप किस प्रकार का है- ये बात समझी नहीं जा सकती। जानी नहीं जा सकती। ये समझने का यत्न किए बिना ही (आपके दासों का दास बन के) आपका नाम सिमरना चाहिए। 3। (सिर्फ मैं नानक ही नहीं कह रहा कि आप बेअंत है) गरीब नानक कह भी क्या सकता है। सारा संसार ही आप एक का सराहना कर रहा है (आपकी सिफत-सालाह कर रहा है)। (आपके ये बेअंत नाम आपके बेअंत गुणों को देख-देख के आपके बंदों ने बनाए हैं)। हे प्रभू ! जितने भी आपके नाम हैं मैं उनसे बलिहार जाता हूँ । 4। 2।
बसंतु महला 1 ॥
सुइने का चउका कंचन कुआर ॥
रुपे कीआ कारा बहुतु बिसथारु ॥
गंगा का उदकु करंते की आगि ॥
गरुड़ा खाणा दुध सिउ गाडि ॥1॥
रे मन लेखै कबहू न पाइ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ (जो कोई मनुष्य) सोने का चौका (तैयार करे)। सोने के ही (उसमें) बरतन (बरते)। (चौके को शुद्ध रखने के लिए उसके चारों तरफ) चाँदी की लकीरें (डाले) (और शुद्धि के वास्ते) इस तरह के अनेकों प्रकार के कामों का पसारा (पसारे); (भोजन तैयार करने के लिए अगर वह) गंगा का (पवित्र) जल (लाए)। और अरणी की लकड़ी की आग (तैयार करे); और फिर वह दूध में मिला के पके हुए चावलों का भोजन करे; (तो भी) हे मन ! ऐसी सुचि का कोई भी आडंबर प्रवान नहीं होता।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु बसंतु महला 1 घरु 1 चउपदे दुतुके ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह कर्ता पुरुष है, सर्वशक्तिमान है,सब पर सम-दृष्टि होने के कारण वह निर्वेर है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर्ति सदा अमर ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।