इस पृष्ठ पर
अंग
1163
भैरों
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश
· अष्टपदी · राग भैरों
सुर तेतीसउ जेवहि पाक ॥
सुर तेतीसउ जेवहि पाक ॥
नव ग्रह कोटि ठाढे दरबार ॥
धरम कोटि जा कै प्रतिहार ॥2॥
पवन कोटि चउबारे फिरहि ॥
बासक कोटि सेज बिसथरहि ॥
समुंद कोटि जा के पानीहार ॥
रोमावलि कोटि अठारह भार ॥3॥
कोटि कमेर भरहि भंडार ॥
कोटिक लखमी करै सीगार ॥
कोटिक पाप पुंन बहु हिरहि ॥
इंद्र कोटि जा के सेवा करहि ॥4॥
छपन कोटि जा कै प्रतिहार ॥
नगरी नगरी खिअत अपार ॥
लट छूटी वरतै बिकराल ॥
कोटि कला खेलै गोपाल ॥5॥
कोटि जग जा कै दरबार ॥
गंध्रब कोटि करहि जैकार ॥
बिदिआ कोटि सभै गुन कहै ॥
तऊ पारब्रहम का अंतु न लहै ॥6॥
बावन कोटि जा कै रोमावली ॥ रावन सैना जह ते छली ॥
सहस कोटि बहु कहत पुरान ॥
दुरजोधन का मथिआ मानु ॥7॥
कंद्रप कोटि जा कै लवै न धरहि ॥
अंतर अंतरि मनसा हरहि ॥
कहि कबीर सुनि सारिगपान ॥
देहि अभै पदु मांगउ दान ॥8॥2॥18॥20॥
नव ग्रह कोटि ठाढे दरबार ॥
धरम कोटि जा कै प्रतिहार ॥2॥
पवन कोटि चउबारे फिरहि ॥
बासक कोटि सेज बिसथरहि ॥
समुंद कोटि जा के पानीहार ॥
रोमावलि कोटि अठारह भार ॥3॥
कोटि कमेर भरहि भंडार ॥
कोटिक लखमी करै सीगार ॥
कोटिक पाप पुंन बहु हिरहि ॥
इंद्र कोटि जा के सेवा करहि ॥4॥
छपन कोटि जा कै प्रतिहार ॥
नगरी नगरी खिअत अपार ॥
लट छूटी वरतै बिकराल ॥
कोटि कला खेलै गोपाल ॥5॥
कोटि जग जा कै दरबार ॥
गंध्रब कोटि करहि जैकार ॥
बिदिआ कोटि सभै गुन कहै ॥
तऊ पारब्रहम का अंतु न लहै ॥6॥
बावन कोटि जा कै रोमावली ॥ रावन सैना जह ते छली ॥
सहस कोटि बहु कहत पुरान ॥
दुरजोधन का मथिआ मानु ॥7॥
कंद्रप कोटि जा कै लवै न धरहि ॥
अंतर अंतरि मनसा हरहि ॥
कहि कबीर सुनि सारिगपान ॥
देहि अभै पदु मांगउ दान ॥8॥2॥18॥20॥
हिन्दी अर्थ: जिसके दर पर तैतीस करोड़ देवते भोजन करते हैं। करोड़ों ही नौ ग्रह जिसके दरबार में खड़े हुए हैं। और करोड़ों ही धर्म-राज जिसके दरबान हैं। 2। (मैं केवल उस प्रभू के दर का मँगता हूँ) जिसके चौबारे में करोड़ों हवाएं चलती हैं। करोड़ों शेषनाग जिसकी सेज बिछाते हैं। करोड़ों समुंद्र जिसका पानी भरने वाले हैं। और बनस्पति के करोड़ों ही अठारह भार जिसके जिस्म के। मानो। रोम हैं। 3। (मैं उस प्रभू से ही माँगता हूँ) जिसके खजाने करोड़ों ही कुबेर देवते भरते हैं। जिसके दर पर करोड़ों ही लक्ष्मियाँ श्रृंगार कर रही हैं। करोड़ों ही पाप और पुन्य जिसकी ओर ताक रहे हैं (कि हमें आज्ञा करें) और करोड़ों ही इन्द्र देवते जिसके दर पर सेवा कर रहे हैं। 4। (मैं केवल उस गोपाल का जाचक हूँ) जिसके दर पर छप्पन करोड़ बादल दरबान हैं। और जो जगह-जगह पर चमक रहे हैं; जिस गोपाल के दर पर करोड़ों शक्तियाँ खेल कर रही हैं। और करोड़ों ही कालिका (देवियां) केस खोल के भयानक रूप धार के जिसके दर पर मौजूद हैं। 5। (मैं उस प्रभू से ही माँगता हूँ) जिसके दरबार में करोड़ों ही यज्ञ हो रहे हैं। और करोड़ों गंधर्व जै-जैकार गा रहे हैं। करोड़ों ही विद्याएं जिसके बेअंत गुण बयान कर रही हैं। पर फिर भी परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पा सकती। 6। (मैं उस प्रभू का जाचक हूँ) करोड़ों ही वामन अवतार जिसके शरीर के। मानो। रोम हैं। जिसके दर पर करोड़ों ही वह (श्री रामचंद्र जी) हैं जिससे रावण की सेना हारी थी; जिसके दर पर करोड़ों ही वह (कृष्ण जी) हैं जिसको भागवत पुराण बयान कर रहा है। और जिसने दुर्योधन का अहंकार तोड़ा था। 7। कबीर कहता है- (मैं उससे माँगता हूँ) जिसकी सुंदरता की बराबरी वह करोड़ों कामदेव भी नहीं कर सकते जो नित्य जीवों के हृदयों की अंदरूनी वासना चुराते रहते हैं; (और। मैं माँगता क्या हूँ। वह भी) सुनें। हे धनुर्धारी प्रभू ! मुझे वह आत्मिक अवस्था बख्शें जहाँ मुझे कोई किसी (देवी-देवते) का डर ना रहे। (बस) मैं यही दान माँगता हूँ। 8। 2। 18। 20।
· शबद · राग भैरों
रे जिहबा करउ सत खंड ॥
भैरउ बाणी नामदेउ जीउ की घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे जिहबा करउ सत खंड ॥
जामि न उचरसि स्री गोबिंद ॥1॥
रंगी ले जिहबा हरि कै नाइ ॥
सुरंग रंगीले हरि हरि धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ जिहबा अवरें काम ॥
निरबाण पदु इकु हरि को नामु ॥2॥
असंख कोटि अन पूजा करी ॥
एक न पूजसि नामै हरी ॥3॥
प्रणवै नामदेउ इहु करणा ॥
अनंत रूप तेरे नाराइणा ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे जिहबा करउ सत खंड ॥
जामि न उचरसि स्री गोबिंद ॥1॥
रंगी ले जिहबा हरि कै नाइ ॥
सुरंग रंगीले हरि हरि धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
मिथिआ जिहबा अवरें काम ॥
निरबाण पदु इकु हरि को नामु ॥2॥
असंख कोटि अन पूजा करी ॥
एक न पूजसि नामै हरी ॥3॥
प्रणवै नामदेउ इहु करणा ॥
अनंत रूप तेरे नाराइणा ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ बाणी नामदेउ जीउ की घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! अगर अब कभी मेरी जीभ प्रभू का नाम ना जपे तो मैं इसके सौ टुकड़े कर दूँ (भाव। मेरी जीभ इस तरह नाम के रंग में रंगी गई है कि मुझे अब यकीन है कि ये कभी नाम को नहीं बिसारेगी)। 1। मैंने अपनी जीभ को परमात्मा के नाम में रंग लिया है। प्रभू का नाम सिमर-सिमर के मैंने इसको सुंदर रंग में रंग लिया है। 1। रहाउ। अन्य आहरों में लगी हुई जीभ व्यर्थ है (क्योंकि) परमात्मा का नाम ही वासना-रहित अवस्था पैदा करता है (और-और आहर बल्कि वासना पैदा करते हैं)। 2। अगर मैं करोड़ों असंखों अन्य (देवी-देवताओं की) पूजा करूँ। तो भी वह (सारी मिल के) परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते। 3। नामदेव विनती करता है- (मेरी जीभ के लिए) यही काम करने योग्य है (कि प्रभू के गुण गाए और कहे-) हे नारायण ! आपके बेअंत रूप हैं। 4। 1।
· शबद · राग भैरों
पर धन पर दारा परहरी ॥
पर धन पर दारा परहरी ॥
ता कै निकटि बसै नरहरी ॥1॥
जो न भजंते नाराइणा ॥
तिन का मै न करउ दरसना ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कै भीतरि है अंतरा ॥
जैसे पसु तैसे ओइ नरा ॥2॥
प्रणवति नामदेउ नाकहि बिना ॥
ना सोहै बतीस लखना ॥3॥2॥
ता कै निकटि बसै नरहरी ॥1॥
जो न भजंते नाराइणा ॥
तिन का मै न करउ दरसना ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कै भीतरि है अंतरा ॥
जैसे पसु तैसे ओइ नरा ॥2॥
प्रणवति नामदेउ नाकहि बिना ॥
ना सोहै बतीस लखना ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: (नारायण का भजन करके) जिस मनुष्य ने पराए धन व पराई स्त्री का त्याग किया है। परमात्मा उसके अंग-संग बसता है। 1। जो मनुष्य परमात्मा का भजन नहीं करते। मैं उनके दर्शन नहीं करता (भाव। मैं उनकी संगति में नहीं बैठता। मैं उनके साथ उठना-बैठना नहीं रखता)। 1। रहाउ। (पर) जिन मनुष्यों के अंदर परमात्मा से दूरी बनी हुई है वे मनुष्य पशुओं के समान ही हैं। 2। नामदेव विनती करता है- मनुष्य में सुंदरता के बत्तीस के बत्तीस लक्षण हों, फिर भी नाक के बिना वह सुंदर नहीं लगता। वैसे ही सारे गुण और धन आदि होने पर भी नाम-सिमरन के बिना उनका कोई लाभ नहीं होता। 3। 2।
· शबद · राग भैरों
दूधु कटोरै गडवै पानी ॥ कपल गाइ नामै दुहि आनी ॥1॥
दूधु कटोरै गडवै पानी ॥ कपल गाइ नामै दुहि आनी ॥1॥
दूधु पीउ गोबिंदे राइ ॥
दूधु पीउ मेरो मनु पतीआइ ॥
नाही त घर को बापु रिसाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सोुइन कटोरी अंम्रित भरी ॥
लै नामै हरि आगै धरी ॥2॥
एकु भगतु मेरे हिरदे बसै ॥ नामे देखि नराइनु हसै ॥3॥
दूधु पीआइ भगतु घरि गइआ ॥
दूधु पीउ गोबिंदे राइ ॥
दूधु पीउ मेरो मनु पतीआइ ॥
नाही त घर को बापु रिसाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सोुइन कटोरी अंम्रित भरी ॥
लै नामै हरि आगै धरी ॥2॥
एकु भगतु मेरे हिरदे बसै ॥ नामे देखि नराइनु हसै ॥3॥
दूधु पीआइ भगतु घरि गइआ ॥
हिन्दी अर्थ: (हे गोबिंद राय ! आपके सेवक) नामे (नामदेव) ने गोरी गाय दुही है। लोटे में पानी डाला है और कटोरे में दूध डाला है। 1। हे प्रकाश-रूप गोबिंद ! दूध पी लें (ताकि) मेरे मन में ठंड पड़ जाए; (हे गोबिंद ! आप अगर दूध) नहीं (पिएँगे) तो मेरी आत्मा दुखी होगी। 1। रहाउ। नाम-अमृत की भरी हुई पवित्र हृदय-रूप कटोरी नामे ने ले के (अपने) हरी के आगे रख दी है। (भाव। प्रभू की याद से निर्मल हुआ हृदय नामदेव ने अपने प्रभू के आगे खोल के रख दिया। नामदेव दिल की उमंगों से प्रभू के आगे अरदास करता है और कहता है कि मेरा दूध पी लें)। 2। मेरा अनन्य भगत सदा मेरे हृदय में बसता है। नामे को देख-देख के परमात्मा खुश होता है 3। (गोबिंद राय को) दूध पिला के भगत (नामदेव) स्वै-स्वरूप में टिक गया।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; भगत नामदेव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1163 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।