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अंग 1162

अंग
1162
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भगवत भीरि सकति सिमरन की कटी काल भै फासी ॥
दासु कमीरु चड़ि॑ओ गड़॑ ऊपरि राजु लीओ अबिनासी ॥6॥9॥17॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: प्रभू का दास कबीर अब किले के ऊपर चढ़ बैठा है (शरीर को वश में कर चुका है)। और कभी ना नाश होने वाली आत्मिक बादशाहियत हासिल कर चुका है। 6। 9। 17।
गंग गुसाइनि गहिर गंभीर ॥
जंजीर बांधि करि खरे कबीर ॥1॥
मनु न डिगै तनु काहे कउ डराइ ॥
चरन कमल चितु रहिओ समाइ ॥ रहाउ ॥
गंगा की लहरि मेरी टुटी जंजीर ॥
म्रिगछाला पर बैठे कबीर ॥2॥
कहि कंबीर कोऊ संग न साथ ॥
जल थल राखन है रघुनाथ ॥3॥10॥18॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गहरी गंभीर गंगा माता में (डुबोने के लिए) ले गए (ये विरोधी लोग) मुझे कबीर को जंजीरों से बाँध के (भाव। उस गंगा में ले गए जिसको ये ‘माता’ कहते हैं और उस माता से जान से मरवाने का अपराध करवाने लगे)। 1। उसका मन (किसी कष्ट के समय) डोलता नहीं। उसके शरीर को (कष्ट दे दे के) डराने का कोई लाभ नहीं हो सकता। (हे भाई !) जिस मनुष्य का मन प्रभू के सुंदर चरणों में लीन रहे। रहाउ। (पर डूबने की बजाए) गंगा की लहरों से मेरी जंजीर टूट गई। मैं कबीर (उस जल पर इस प्रकार तैरने लग पड़ा जैसे) मृगछाला पर बैठा हुआ हूँ। 2। कबीर कहता है- (हे भाई ! आपके मिथे हुए कर्म-काण्ड व तीर्थ स्नान) कोई भी संगी नहीं बन सकते। कोई भी साथी नहीं हैं सकते। पानी और धरती हर जगह एक परमात्मा ही रखने-योग्य है। 3। 10। 18।
भैरउ कबीर जीउ असटपदी घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अगम द्रुगम गड़ि रचिओ बास ॥
जा महि जोति करे परगास ॥
बिजुली चमकै होइ अनंदु ॥
जिह पउड़॑े प्रभ बाल गोबिंद ॥1॥
इहु जीउ राम नाम लिव लागै ॥
जरा मरनु छूटै भ्रमु भागै ॥1॥ रहाउ ॥
अबरन बरन सिउ मन ही प्रीति ॥
हउमै गावनि गावहि गीत ॥
अनहद सबद होत झुनकार ॥
जिह पउड़॑े प्रभ स्री गोपाल ॥2॥
खंडल मंडल मंडल मंडा ॥
त्रिअ असथान तीनि त्रिअ खंडा ॥
अगम अगोचरु रहिआ अभ अंत ॥
पारु न पावै को धरनीधर मंत ॥3॥
कदली पुहप धूप परगास ॥
रज पंकज महि लीओ निवास ॥
दुआदस दल अभ अंतरि मंत ॥
जह पउड़े स्री कमला कंत ॥4॥
अरध उरध मुखि लागो कासु ॥
सुंन मंडल महि करि परगासु ॥
ऊहां सूरज नाही चंद ॥
आदि निरंजनु करै अनंद ॥5॥
सो ब्रहमंडि पिंडि सो जानु ॥
मान सरोवरि करि इसनानु ॥
सोहं सो जा कउ है जाप ॥
जा कउ लिपत न होइ पुंन अरु पाप ॥6॥
अबरन बरन घाम नही छाम ॥
अवर न पाईऐ गुर की साम ॥
टारी न टरै आवै न जाइ ॥
सुंन सहज महि रहिओ समाइ ॥7॥
मन मधे जानै जे कोइ ॥
जो बोलै सो आपै होइ ॥
जोति मंत्रि मनि असथिरु करै ॥
कहि कबीर सो प्रानी तरै ॥8॥1॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ कबीर जीउ असटपदी घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ वह मनुष्य एक ऐसे किले में बसेरा बना लेता है जहाँ (विकार आदि की) पहुँच नहीं हो सकती। जहाँ (विकारों का) पहुँचना बहुत मुश्किल होता है। 1। जिस मनुष्य के अंदर प्रभू अपनी ज्योति की रौशनी करता है उसके अंदर। मानो। बिजली चमक उठती है। वहाँ सदा खिड़ाव ही खिड़ाव हो जाता है। (नाम सिमरन की बरकति से) जिस हृदय में बाल-स्वभाव प्रभू गोबिंद आ बसता है। (जब) यह जीव परमात्मा के नाम में सुरति जोड़ता है। तो इसका बुढ़ापा (बुढ़ापे का डर) समाप्त हो जाता है। मौत (का सहम) समाप्त हो जाता है और भटकना दूर हो जाती है। 1। रहाउ। पर।जिन मनुष्यों के मन में इसी ख्याल की लगन है कि फलाना नीच जाति का फलाना उच्च जाति का है। वे सदा अहंकार भरी बातें करते रहते हैं। वहाँ प्रभू की सिफत-सालाह का एक रस। मानो। राग होता रहता है। जिस हृदय में श्री गोपाल प्रभू जी बसते हैं। 2। जो प्रभू सारे खंडों का। मंडलों का सृजन करने वाला है। जो (फिर) तीनों भवनों का। तीन गुणों का नाश करने वाला भी है। जिस तक मनुष्य की इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। वह प्रभू उस मनुष्य के हृदय में बसता है (जिसने परमात्मा के नाम के साथ लिव लगाई हुई है)। पर। कोई जीव धरती-के-आसरे उस प्रभू के भेद का अंत नहीं पा सकता। 3। केले के फूलों में सुगंधि का वास होता है। जैसे कमल-फूल में मकरंद आ निवास करता है। (सिमरन की बरकति से) उस मनुष्य के पूरी तौर पर खिले हुए हृदय में प्रभू का मंत्र इस प्रकार बस जाता है जिस हृदय में माया-का-पति प्रभू आ बसता है 4। (जो मनुष्य प्रभू के नाम में लिव लगाता है) उसको आकाश-पाताल हर जगह प्रभू का ही प्रकाश दिखाई देता है। उसकी अफुर समाधि में (भाव। उसके टिके हुए मन में) परमात्मा अपनी रौशनी करता है (इतनी रौशनी कि) सूरज और चँद्रमा का प्रकाश उसकी बराबरी नहीं कर सकता (वह रोशनी सूरज और चाँद जैसी नहीं है)। सारे जगत का मूल माया-रहित प्रभू उसके हृदय में उमाह पैदा करता है। 5। जिस मनुष्य के हृदय में सदा ये लगन है कि वह प्रभू और मैं एक हूँ (भाव। मेरे अंदर प्रभू की ज्योति बस रही है)। वह (प्रभू नाम-रूप) मान-सरोवर में स्नान करता है। वह मनुष्य (लिव की बरकति से) सारे जगत में उसी प्रभू को पहचानता है जिसको अपने शरीर में (बसता देखता है)। (इस लगन की बरकति से) जिस पर ना पुन्य ना पाप कोई भी प्रभाव नहीं पड़ सकता (भाव। जिसको ना कोई पाप-विकार आकर्षित कर सकते हैं। और ना ही पुन्य कर्मों के फल की लालसा है) 6। उस मनुष्य के अंदर किसी ऊँची-नीच जाति का भेदभाव नहीं रहता। कोई दुख-सुख उसको नहीं व्यापते। पर यह आत्मिक हालत गुरू की शरण पड़ने से मिलती है। यह अवस्था किसी के हटाए नहीं हट सकती। सदा कायम रहती है। (लिव के सदका) वह मनुष्य सदा अफुर अवस्था में टिका रहता है। सहज अवस्था में जुड़ा रहता है। 7। कबीर कहता है- जो मनुष्य प्रभू को अपने मन में बसता पहचान लेता है। जो मनुष्य प्रभू की सिफत-सालाह करता है। वह प्रभू का ही रूप हो जाता है; जो मनुष्य गुरू के शबद से प्रभू की ज्योति को अपने मन में पक्का करके टिका लेता है। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 8। 1।
कोटि सूर जा कै परगास ॥
कोटि महादेव अरु कबिलास ॥
दुरगा कोटि जा कै मरदनु करै ॥
ब्रहमा कोटि बेद उचरै ॥1॥
जउ जाचउ तउ केवल राम ॥
आन देव सिउ नाही काम ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि चंद्रमे करहि चराक ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (मैं उस प्रभू के दर से माँगता हूँ) जिस के दर पे करोड़ों सूरज रौशनी कर रहे हैं। जिसके दर पर करोड़ों शिव जी और कैलाश हैं; करोड़ों दुर्गा देवियाँ जिसकी चरण-सेवा में लीन हैं, और करोड़ों ही ब्रहमा जिसके दर पर वेद उचार रहे हैं। 1। मैं जब भी माँगता हूँ। सिर्फ प्रभू के दर से ही माँगता हूँ। मुझे किसी और देवते के साथ कोई गर्ज नहीं। 1। रहाउ। (मैं उस प्रभू का जाचक हूँ) जिस के दर पर करोड़ों चँद्रमा रौशनी करते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू का दास कबीर अब किले के ऊपर चढ़ बैठा है (शरीर को वश में कर चुका है)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।