लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1161 · भैरों

इस पृष्ठ पर
अंग
1161
भैरों
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. तब प्रभ काजु सवारहि आइ ॥1॥
  2. सतरि सैइ सलार है जा के ॥
  3. सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥
  4. किउ लीजै गढु बंका भाई ॥

तब प्रभ काजु सवारहि आइ ॥1॥

अंग 1160 से चला आ रहा अंश

तब प्रभ काजु सवारहि आइ ॥1॥
ऐसा गिआनु बिचारु मना ॥
हरि की न सिमरहु दुख भंजना ॥1॥ रहाउ ॥
जब लगु सिंघु रहै बन माहि ॥
तब लगु बनु फूलै ही नाहि ॥
जब ही सिआरु सिंघ कउ खाइ ॥
फूलि रही सगली बनराइ ॥2॥
जीतो बूडै हारो तिरै ॥
गुर परसादी पारि उतरै ॥
दासु कबीरु कहै समझाइ ॥
केवल राम रहहु लिव लाइ ॥3॥6॥14॥

हिन्दी अर्थ: तब प्रभू जी (इसके हृदय में) बस के जीवन-मनोरथ पूरा कर देते हैं। 1। हे मेरे मन ! सब दुखों का नाश करने वाले प्रभू को क्यों नहीं सिमरते। हे मन ! कोई ऐसी ऊँची समझ की बात सोचें (जिससे आप सिमरन की ओर पलट सकें)। 1। रहाउ। जब तक हृदय-रूपी जंगल में अहंकार-शेर रहता है तब तक ये हृदय-फुलवाड़ी खिलती नहीं (हृदय में कोमल गुण उघड़ते नहीं)। पर। जब (नम्रता रूप) गीदड़ (अहंकार-) शेर को खा जाता है। तब (हृदय की सारी) बनस्पति को बहार आ जाती है। 2। जो मनुष्य (किसी अहंकार में आ के) यह समझता है कि मैंने बाज़ी जीत ली है। वह संसार समुंद्र में डूब जाता है। पर जो मनुष्य गरीबी स्वभाव में चलता है। वह तैर जाता है वह अपने गुरू की मेहर से पार लांघ जाता है। सेवक कबीर समझा के कहता है- हे भाई ! सिर्फ परमात्मा के चरणों में मन जोड़े रखें। 3। 6। 14।

सतरि सैइ सलार है जा के ॥

सतरि सैइ सलार है जा के ॥
सवा लाखु पैकाबर ता के ॥
सेख जु कहीअहि कोटि अठासी ॥
छपन कोटि जा के खेल खासी ॥1॥
मो गरीब की को गुजरावै ॥
मजलसि दूरि महलु को पावै ॥1॥ रहाउ ॥
तेतीस करोड़ी है खेल खाना ॥
चउरासी लख फिरै दिवानां ॥
बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई ॥
उनि भी भिसति घनेरी पाई ॥2॥
दिल खलहलु जा कै जरद रू बानी ॥
छोडि कतेब करै सैतानी ॥
दुनीआ दोसु रोसु है लोई ॥
अपना कीआ पावै सोई ॥3॥
तुम दाते हम सदा भिखारी ॥
देउ जबाबु होइ बजगारी ॥
दासु कबीरु तेरी पनह समानां ॥
भिसतु नजीकि राखु रहमाना ॥4॥7॥15॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस खुदा के सात हजार फरिश्ते (जैसा कि आप बताते हैं)। उसके सवा लाख पैग़ंबर (आप कहते हैं)। अठासी करोड़ उसके (दर पर रहने वाले) बुजुर्ग आलिम शेख कहे जा रहे हैं। और छप्पन करोड़ जिसके मुसाहिब (आप बताते हैं। उसके दरबार तक)। 1। मेरी ग़रीब की अर्ज कौन पहुँचाएगा। (फिर आप कहते हैं कि उसका) दरबार दूर (सातवें आसमान पर) है। (मैं तो गरीब जुलाहा हूँ। उसका) घर (मेरा) कौन ढूँढेगा। 1। रहाउ। (बैकुंठ की बाते बताने वाले भी कहते हैं कि) तैतीस करोड़ देवते उसके सेवक हैं (उन्होंने भी मेरी कहाँ सुननी है।) चौरासी लाख जूनियों के जीव (उससे टूट के) झल्ले हुए फिरते हैं। (हे भाई ! आप बताते हैं कि खुदा ने बाबा आदम को बहिश्त में रखा था। पर। आपके ही कहने के मुताबिक) जब बाबा आदम को रॅब ने (उसकी हुकम-अदूली पर। आज्ञा ना मानने पर) थोड़ी सी आँख दिखाई। तो वह आदम भी बहिश्त में थोड़ा समय ही रह पाया (वहाँ से जल्दी ही निकाल दिया गया। और जो बाबा आदम जैसे निकाल दिए गए। तो बताएँ। मुझ गरीब को वहाँ कोई कितना वक्त रहने देगा।)। 2। जिसके भी दिल में (विकारों की) गडबड़ है। उसके मुँह की रंगत पीली पड़ जाती है (भाव। वह ही प्रभू-दर से धकेला जाता है); (हे भाई !) जो भी मनुष्य अपनी धर्म-पुस्तकों (के बताए हुए राह) को छोड़ के गलत रास्ते पर चलता है। पर (अंजान-पने में) दुनिया को दोष देता है। जगत पर गुस्सा करता है। मनुष्य अपना किया आप ही पाता है। 3। (हे मेरे प्रभू ! मुझे किसी बहिश्त व बैकुंठ की आवश्यकता नहीं है) आप मेरे दाता हैं। मैं सदा (आपके दर का) मंगता हूँ (जो कुछ आप मुझे दे रहे हैं वही ठीक है। आपकी किसी भी दाति के आगे) अगर मैं ना-नुकर करूँ तो यह मेरी गुनहगारी होगी। मैं आपका दास कबीर आपकी शरण में आया हूँ। हे रहम करने वाले ! मुझे अपने चरणों के नजदीक रखें। (यही मेरे लिए) बहिश्त है। 4। 7। 15।

सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥

सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥
ना जानउ बैकुंठु है कहां ॥1॥ रहाउ ॥
आप आप का मरमु न जानां ॥
बातन ही बैकुंठु बखानां ॥1॥
जब लगु मन बैकुंठ की आस ॥
तब लगु नाही चरन निवास ॥2॥
खाई कोटु न परल पगारा ॥
ना जानउ बैकुंठ दुआरा ॥3॥
कहि कमीर अब कहीऐ काहि ॥
साधसंगति बैकुंठै आहि ॥4॥8॥16॥

हिन्दी अर्थ: हर कोई कह रहा है कि मैंने उस बैकुंठ में पहुँचना है। पर मुझे समझ नहीं आई। (इनका वह) बैकुंठ कहाँ है। 1। रहाउ। (इन लोगों ने) अपने आप का तो भेद नहीं पाया। निरी बातों से ही 'बैकुंठ' कह रहे हैं। 1। हे मन ! जब तक आपकी बैकुंठ पहुँचने की उम्मीदें हैं। तब तक प्रभू के चरणों में निवास नहीं हो सकता। 2। मुझे तो पता नहीं (इन लोगों के) बैकुंठ का दरवाजा कैसा है। किस तरह का शहर है। कैसी उसकी फसील है। और किस तरह की उसके चारों तरफ की खाई है। 3। कबीर कहता है- (ये लोग समझते नहीं कि आगे कहीं बैकुंठ नहीं है) अब किसे कहें कि साध-संगति ही बैकुंठ है। (और वह बैकुंठ यहीं है)। 4। 8। 16।

किउ लीजै गढु बंका भाई ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

किउ लीजै गढु बंका भाई ॥
दोवर कोट अरु तेवर खाई ॥1॥ रहाउ ॥
पांच पचीस मोह मद मतसर आडी परबल माइआ ॥
जन गरीब को जोरु न पहुचै कहा करउ रघुराइआ ॥1॥
कामु किवारी दुखु सुखु दरवानी पापु पुंनु दरवाजा ॥
क्रोधु प्रधानु महा बड दुंदर तह मनु मावासी राजा ॥2॥
स्वाद सनाह टोपु ममता को कुबुधि कमान चढाई ॥
तिसना तीर रहे घट भीतरि इउ गढु लीओ न जाई ॥3॥
प्रेम पलीता सुरति हवाई गोला गिआनु चलाइआ ॥
ब्रहम अगनि सहजे परजाली एकहि चोट सिझाइआ ॥4॥
सतु संतोखु लै लरने लागा तोरे दुइ दरवाजा ॥
साधसंगति अरु गुर की क्रिपा ते पकरिओ गढ को राजा ॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! यह (शरीर-रूप) पक्का किला काबू करना बहुत मुश्किल है। इसे चारों तरफ द्वैत की दोहरी दीवार और तीन गुणों की तिहरी खाई है। 1। रहाउ। बलशाली माया का आसरा ले के पाँच कामादिक। पचीस तत्व, मोह, अहंकार, ईर्ष्या (की फौज लड़ने को तैयार है)। हे प्रभू ! मेरी गरीब की कोई पेश नहीं चलती। (बताएँ।) मैं क्या करूँ। 1। काम (इस किले के) दरवाजे का मालिक है। दुख और सुख पहरेदार हैं। पाप और पुन्य (किले के) दरवाजे हैं। बड़ा ही झगड़ालू क्रोध (किले का) चौधरी है। ऐसे किले में मन राजा आकी हो के बैठा है। 2। (जीभ के) चस्के (मन राजे ने) संजोअ (पहनी हुई है)। ममता का टोप (पहना हुआ है)। दुर्मति की कमान कसी हुई है। तृष्णा के तीर अंदर ही अंदर कसे हुए हैं। ऐसा किला (मुझसे) जीता नहीं जा सकता। 3। (पर जब मैंने प्रभू-चरणों के) प्रेम का पलीता लगाया। (प्रभू-चरणों में जुड़ी) सुरति को हवाई बनाया। (गुरू के बख्शे) ज्ञान का गोला चलाया। सहज अवस्था में पहुँच के अंदर ईश्वरीय-ज्योति जलाई। तो एक ही चोट से कामयाबी हो गई। 4। सत और संतोष को ले के मैंने काल के फंदे। दुनियां के डरों के फंदे। काट डाले हैं। सतगुरु व सत्संग की मेहर से मैंने क़िले का बाग़ी राजा पकड़ लिया है। 5।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1161 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।