तब प्रभ काजु सवारहि आइ ॥1॥ ऐसा गिआनु बिचारु मना ॥ हरि की न सिमरहु दुख भंजना ॥1॥ रहाउ ॥ जब लगु सिंघु रहै बन माहि ॥ तब लगु बनु फूलै ही नाहि ॥ जब ही सिआरु सिंघ कउ खाइ ॥ फूलि रही सगली बनराइ ॥2॥ जीतो बूडै हारो तिरै ॥ गुर परसादी पारि उतरै ॥ दासु कबीरु कहै समझाइ ॥ केवल राम रहहु लिव लाइ ॥3॥6॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: तब प्रभू जी (इसके हृदय में) बस के जीवन-मनोरथ पूरा कर देते हैं। 1। हे मेरे मन ! सब दुखों का नाश करने वाले प्रभू को क्यों नहीं सिमरता। हे मन ! कोई ऐसी ऊँची समझ की बात सोच (जिससे आप सिमरन की ओर पलट सके)। 1। रहाउ। जब तक हृदय-रूपी जंगल में अहंकार-शेर रहता है तब तक ये हृदय-फुलवाड़ी खिलती नहीं (हृदय में कोमल गुण उघड़ते नहीं)। पर। जब (नम्रता रूप) गीदड़ (अहंकार-) शेर को खा जाता है। तब (हृदय की सारी) बनस्पति को बहार आ जाती है। 2। जो मनुष्य (किसी अहंकार में आ के) यह समझता है कि मैंने बाज़ी जीत ली है। वह संसार समुंद्र में डूब जाता है। पर जो मनुष्य गरीबी स्वभाव में चलता है। वह तैर जाता है वह अपने गुरू की मेहर से पार लांघ जाता है। सेवक कबीर समझा के कहता है- हे भाई ! सिर्फ परमात्मा के चरणों में मन जोड़े रखो। 3। 6। 14।
सतरि सैइ सलार है जा के ॥ सवा लाखु पैकाबर ता के ॥ सेख जु कहीअहि कोटि अठासी ॥ छपन कोटि जा के खेल खासी ॥1॥ मो गरीब की को गुजरावै ॥ मजलसि दूरि महलु को पावै ॥1॥ रहाउ ॥ तेतीस करोड़ी है खेल खाना ॥ चउरासी लख फिरै दिवानां ॥ बाबा आदम कउ किछु नदरि दिखाई ॥ उनि भी भिसति घनेरी पाई ॥2॥ दिल खलहलु जा कै जरद रू बानी ॥ छोडि कतेब करै सैतानी ॥ दुनीआ दोसु रोसु है लोई ॥ अपना कीआ पावै सोई ॥3॥ तुम दाते हम सदा भिखारी ॥ देउ जबाबु होइ बजगारी ॥ दासु कबीरु तेरी पनह समानां ॥ भिसतु नजीकि राखु रहमाना ॥4॥7॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस खुदा के सात हजार फरिश्ते (जैसा कि आप बताता है)। उसके सवा लाख पैग़ंबर (आप कहता है)। अठासी करोड़ उसके (दर पर रहने वाले) बुजुर्ग आलिम शेख कहे जा रहे हैं। और छप्पन करोड़ जिसके मुसाहिब (आप बताता है। उसके दरबार तक)। 1। ;मेरी ग़रीब की अर्ज कौन पहुँचाएगा। (फिर आप कहता है कि उसका) दरबार दूर (सातवें आसमान पर) है। (मैं तो गरीब जुलाहा हूँ। उसका) घर (मेरा) कौन ढूँढेगा। 1। रहाउ। (बैकुंठ की बाते बताने वाले भी कहते हैं कि) तैतीस करोड़ देवते उसके सेवक हैं (उन्होंने ने भी मेरी कहाँ सुननी है।) चौरासी लाख जूनियों के जीव (उससे टूट के) झल्ले हुए फिरते हैं। (हे भाई ! आप बताते हैं कि खुदा ने बाबा आदम को बहिश्त में रखा था। पर। आपके ही कहने के मुताबिक) जब बाबा आदम को रॅब ने (उसकी हुकम-अदूली पर। आज्ञा ना मानने पर) थोड़ी सी आँख दिखाई। तो वह आदम भी बहिश्त में थोड़ा समय ही रह पाया (वहाँ से जल्दी ही निकाल दिया गया। और जो बाबा आदम जैसे निकाल दिए गए। तो बताओ। मुझ गरीब को वहाँ कोई कितना वक्त रहने देगा।)। 2। जिसके भी दिल में (विकारों की) गडबड़ है। उसके मुँह की रंगत पीली पड़ जाती है (भाव। वह ही प्रभू-दर से धकेला जाता है); (हे भाई !) जो भी मनुष्य अपनी धर्म-पुस्तकों (के बताए हुए राह) को छोड़ के गलत रास्ते पर चलता है। पर (अंजान-पने में) दुनिया को दोष देता है। जगत पर गुस्सा करता है। मनुष्य अपना किया आप ही पाता है। 3। (हे मेरे प्रभू ! मुझे किसी बहिश्त व बैकुंठ की आवश्यक्ता नहीं है) आप मेरा दाता है। मैं सदा (आपके दर का) मंगता हूँ (जो कुछ आप मुझे दे रहा है वही ठीक है। आपकी किसी भी दाति के आगे) अगर मैं ना-नुकर करूँ तो यह मेरी गुनहगारी होगी। मैं आपका दास कबीर आपकी शरण में आया हूँ। हे रहम करने वाले ! मुझे अपने चरणों के नजदीक रख। (यही मेरे लिए) बहिश्त है। 4। 7। 15।
सभु कोई चलन कहत है ऊहां ॥ ना जानउ बैकुंठु है कहां ॥1॥ रहाउ ॥ आप आप का मरमु न जानां ॥ बातन ही बैकुंठु बखानां ॥1॥ जब लगु मन बैकुंठ की आस ॥ तब लगु नाही चरन निवास ॥2॥ खाई कोटु न परल पगारा ॥ ना जानउ बैकुंठ दुआरा ॥3॥ कहि कमीर अब कहीऐ काहि ॥ साधसंगति बैकुंठै आहि ॥4॥8॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हर कोई कह रहा है कि मैंने उस बैकुंठ में पहुँचना है। पर मुझे समझ नहीं आई। (इनका वह) बैकुंठ कहाँ है। 1। रहाउ। (इन लोगों ने) अपने आप का तो भेद नहीं पाया। निरी बातों से ही ‘बैकुंठ’ कह रहे हैं। 1। हे मन ! जब तक आपकी बैकुंठ पहुँचने की उम्मीदें हैं। तब तक प्रभू के चरणों में निवास नहीं हैं सकता। 2। मुझे तो पता नहीं (इन लोगों के) बैकुंठ का दरवाजा कैसा है। किस तरह का शहर है। कैसी उसकी फसील है। और किस तरह की उसके चारों तरफ की खाई है। 3। कबीर कहता है- (ये लोग समझते नहीं कि आगे कहीं बैकुंठ नहीं है) अब किसे कहें कि साध-संगति ही बैकुंठ है। (और वह बैकुंठ यहीं है)। 4। 8। 16।
किउ लीजै गढु बंका भाई ॥ दोवर कोट अरु तेवर खाई ॥1॥ रहाउ ॥ पांच पचीस मोह मद मतसर आडी परबल माइआ ॥ जन गरीब को जोरु न पहुचै कहा करउ रघुराइआ ॥1॥ कामु किवारी दुखु सुखु दरवानी पापु पुंनु दरवाजा ॥ क्रोधु प्रधानु महा बड दुंदर तह मनु मावासी राजा ॥2॥ स्वाद सनाह टोपु ममता को कुबुधि कमान चढाई ॥ तिसना तीर रहे घट भीतरि इउ गढु लीओ न जाई ॥3॥ प्रेम पलीता सुरति हवाई गोला गिआनु चलाइआ ॥ ब्रहम अगनि सहजे परजाली एकहि चोट सिझाइआ ॥4॥ सतु संतोखु लै लरने लागा तोरे दुइ दरवाजा ॥ साधसंगति अरु गुर की क्रिपा ते पकरिओ गढ को राजा ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! यह (शरीर-रूप) पक्का किला काबू करना बहुत मुश्किल है। इसे चारों तरफ द्वैत की दोहरी दीवार और तीन गुणों की तिहरी खाई है। 1। रहाउ। बलशाली माया का आसरा ले के पाँच कामादिक। पचीस तत्व। मोह। अहंकार। ईष्या (की फौज लड़ने को तैयार है)। हे प्रभू ! मेरी गरीब की कोई पेश नहीं चलती। (बताओ।) मैं क्या करूँ। 1। काम (इस किले के) दरवाजे का मालिक है। दुख और सुख पहरेदार हैं। पाप और पुन्य (किले के) दरवाजे हैं। बड़ा ही झगड़ालू क्रोध (किले का) चौधरी है। ऐसे किले में मन राजा आकी हो के बैठा है। 2। (जीभ के) चस्के (मन राजे ने) संजोअ (पहनी हुई है)। ममता का टोप (पहना हुआ है)। दुर्मति की कमान कसी हुई है। तृष्णा के तीर अंदर ही अंदर कसे हुए हैं। ऐसा किला (मुझसे) जीता नहीं जा सकता। 3। (पर जब मैंने प्रभू-चरणों के) प्रेम का पलीता लगाया। (प्रभू-चरणों में जुड़ी) सुरति को हवाई बनाया। (गुरू के बख्शे) ज्ञान का गोला चलाया। सहज अवस्था में पहुँच के अंदर ईश्वरीय-ज्योति जलाई। तो एक ही चोट से कामयाबी हो गई। 4। सत और संतोष को ले के मैंने काल के फंदे। दुनियां के डरों के फंदे। काट डाले हैं। सतगुरु व सत्संग की मेहर से मैंने क़िले का बाग़ी राजा पकड़ लिया है। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “तब प्रभू जी (इसके हृदय में) बस के जीवन-मनोरथ पूरा कर देते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।