Lulla Family

अंग 1160

अंग
1160
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
है हजूरि कत दूरि बतावहु ॥
दुंदर बाधहु सुंदर पावहु ॥1॥ रहाउ ॥
काजी सो जु काइआ बीचारै ॥
काइआ की अगनि ब्रहमु परजारै ॥
सुपनै बिंदु न देई झरना ॥
तिसु काजी कउ जरा न मरना ॥2॥
सो सुरतानु जु दुइ सर तानै ॥
बाहरि जाता भीतरि आनै ॥
गगन मंडल महि लसकरु करै ॥
सो सुरतानु छत्रु सिरि धरै ॥3॥
जोगी गोरखु गोरखु करै ॥
हिंदू राम नामु उचरै ॥
मुसलमान का एकु खुदाइ ॥
कबीर का सुआमी रहिआ समाइ ॥4॥3॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे मुल्ला !) रॅब हर जगह हाजर-नाज़र है। आप उसको दूर (किसी सातवें आसमान पर) क्यों (बैठा) बताते हैं। अगर उस सुंदर रॅब को मिलना है। तो कामादिक शोर डालने वाले विकारों को काबू में रखो। 1। रहाउ। असली काज़ी वह है जो अपने शरीर को खोजे। शरीर में प्रभू की ज्योति को रौशन करे। सपने में भी काम की वासना मन में ना आने दे। ऐसे काज़ी को बुढ़ापे और मौत का डर नहीं रह जाता। 2। असल सुल्तान (बादशाह) वह है जो (ज्ञान और वैराग के) दो तीर तानता है। बाहरी दुनियाँ के पदार्थों की ओर भटकते मन को अंदर की ओर मोड़ लेता है। प्रभू-चरणों में जुड़ के अपने अंदर भले गुण पैदा करता है। वह सुल्तान अपने सिर पर (असल) छत्र झुलवाता है। 3। जोगी (प्रभू को विसार के) गोरख-गोरख जपता है। हिन्दू (श्री रामचंद्र जी की मूर्ति में ही मिथे हुए) राम का नाम उचारता है। मुसलमान ने (सातवें आसमान में बैठा हुआ) निरा अपना (मुसलमानों का ही) रॅब मान रखा है। पर मेरा कबीर का प्रभू वह है। जो सबमें व्यापक है (और सबका सांझा है)। 4। 3। 11।
महला 5 ॥
जो पाथर कउ कहते देव ॥
ता की बिरथा होवै सेव ॥
जो पाथर की पांई पाइ ॥
तिस की घाल अजांई जाइ ॥1॥
ठाकुरु हमरा सद बोलंता ॥
सरब जीआ कउ प्रभु दानु देता ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरि देउ न जानै अंधु ॥
भ्रम का मोहिआ पावै फंधु ॥
न पाथरु बोलै ना किछु देइ ॥
फोकट करम निहफल है सेव ॥2॥
जे मिरतक कउ चंदनु चड़ावै ॥
उस ते कहहु कवन फल पावै ॥
जे मिरतक कउ बिसटा माहि रुलाई ॥
तां मिरतक का किआ घटि जाई ॥3॥
कहत कबीर हउ कहउ पुकारि ॥
समझि देखु साकत गावार ॥
दूजै भाइ बहुतु घर गाले ॥
राम भगत है सदा सुखाले ॥4॥4॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ जो मनुष्य पत्थर (की मूर्ति) को ईश्वर कहते हैं। उनकी की हुई सेवा व्यर्थ जाती है। जो मनुष्य पत्थर (की मूर्ति) के पैरों में नत्मस्तक होते हैं। उनकी मेहनत बेकार चली जाती है। 1। हमारा ठाकुर सदा बोलता है। वह प्रभू सारे जीवों को दातें देने वाला है। 1। रहाउ। अंधा मूर्ख अपने अंदर बसते रॅब को नहीं पहचानता। भ्रम का मारा हुआ और-और जाल बिछाता है। यह पत्थर ना बोलता है। ना कुछ दे सकता है। (इसको स्नान करवाने और भोग आदि लगवाने के) सारे काम व्यर्थ हैं। (इसकी सेवा में से कोई फल नहीं मिलता)। 2। यदि कोई मनुष्य मुर्दे को चंदन (रगड़ के) लगा दे। उस मुर्दे को (इस सेवा का) कोई फल नहीं मिल सकता। और। यदि कोई मुर्दे को विष्टा में पलीत कर दे। तो भी उस मुर्दे का कुछ बिगड़ने वाला नहीं। 3। कबीर कहता है- मैं पुकार-पुकार के कहता हूँ हे ईश्वर से टूटे हुए मूर्ख ! समझ के देख। रॅब को छोड़ के औरों से प्यार डाल के बहुत सारे जीव तबाह हो गए। सदा सुखी जीवन वाले सिर्फ वही हैं जो प्रभू के भक्त हैं। 4। 4। 12।
जल महि मीन माइआ के बेधे ॥
दीपक पतंग माइआ के छेदे ॥
काम माइआ कुंचर कउ बिआपै ॥
भुइअंगम भ्रिंग माइआ महि खापे ॥1॥
माइआ ऐसी मोहनी भाई ॥
जेते जीअ तेते डहकाई ॥1॥ रहाउ ॥
पंखी म्रिग माइआ महि राते ॥
साकर माखी अधिक संतापे ॥
तुरे उसट माइआ महि भेला ॥
सिध चउरासीह माइआ महि खेला ॥2॥
छिअ जती माइआ के बंदा ॥
नवै नाथ सूरज अरु चंदा ॥
तपे रखीसर माइआ महि सूता ॥
माइआ महि कालु अरु पंच दूता ॥3॥
सुआन सिआल माइआ महि राता ॥
बंतर चीते अरु सिंघाता ॥
मांजार गाडर अरु लूबरा ॥
बिरख मूल माइआ महि परा ॥4॥
माइआ अंतरि भीने देव ॥
सागर इंद्रा अरु धरतेव ॥
कहि कबीर जिसु उदरु तिसु माइआ ॥
तब छूटे जब साधू पाइआ ॥5॥5॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पानी में रहने वाली मछलियाँ माया में भेदी हुई हैं। दीयों पर (जलने वाले) पतंगे माया में परोए हुए हैं। काम-वासना रूपी माया हाथी को अपने वश में किए रखती है; साँप और भौरे भी माया में दुखी हो रहे हैं। 1। हे भाई ! माया इतनी बलवान। मोहने वाली है कि जितने भी जीव (जगत में) हैं। सब को डोला देती है। 1। रहाउ। पंछी। जंगल के पशू सब माया में रंगे पड़े हैं। शक्कर-रूपी माया मक्खी को बड़ा दुखी कर रही है। घोड़े-ऊँठ सब माया में फसे हुए हैं। चौरासी सिध भी माया में खेल रहे हैं। 2। जती भी माया के ही गुलाम हैं। नौ नाथ सूरज (देवता) और चंद्रमा (देवता) बड़े-बड़े तपी और ऋषि सब माया में सोए पड़े हैं। मौत (का सहम) और पाँचों विकार भी माया में ही (जीवों को व्यापते हैं)। 3। कुत्ते। गीदड़। बंदर। चीते। शेर सब माया में रंगे हुए हैं। बिल्ले। भेड़ें। लोमड़ी। वृक्ष। कंद-मूल सब माया के अधीन हैं। 4। देवतागण भी माया (के मोह) में भीगे हुए हैं। समुंद्र। स्वर्ग। धरती इन सबके जीव भी माया में ही हैं। कबीर कहता है- (सिरे की बात यह है कि) जिसके भी पेट लगा हुआ है उसको (भाव। हरेक जीव को) माया व्याप रही है। जब गुरू मिले तब ही जीव माया के प्रभाव से बचता है। 5। 5। 13।
जब लगु मेरी मेरी करै ॥
तब लगु काजु एकु नही सरै ॥
जब मेरी मेरी मिटि जाइ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जब तक मनुष्य ममता के चक्कर में रहता है। तब तक इसके (आत्मिक जीवन का) एक भी काम नहीं सँवरता। जब इसकी ममता मिट जाती है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे मुल्ला !) रॅब हर जगह हाजर-नाज़र है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।