पंडित मुलां छाडे दोऊ ॥1॥ रहाउ ॥ बुनि बुनि आप आपु पहिरावउ ॥ जह नही आपु तहा होइ गावउ ॥2॥ पंडित मुलां जो लिखि दीआ ॥ छाडि चले हम कछू न लीआ ॥3॥ रिदै इखलासु निरखि ले मीरा ॥ आपु खोजि खोजि मिले कबीरा ॥4॥7॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (ज्यों-ज्यों मैं नाम-सिमरन की ताणी उन रहा हूँ) मैंने पंडित और मुल्ला दोनों ही छोड़ दिए हैं। 1। रहाउ। (प्रभू चरणों में टिकी सुरति की ताणी) उन-उन के मैं अपने आप को पहना रहा हूँ। मैं वहाँ पहुँच के प्रभू की सिफत-सालाहकर रहा हूँ जहाँ स्वै भाव नहीं। 2। (कर्म-काण्ड और शरह के बारे में) पण्डितों और मौलवियों ने जो कुछ लिखा है। मुझे किसी की भी आवश्यक्ता नहीं रही। मैंने ये सब कुछ छोड़ दिया है। 3। अगर हृदय में प्रेम हो। तो ही प्रभू के दीदार हो सकते हैं (कर्म-काण्ड और शरह सहायता नहीं करते)। हे कबीर ! जो भी प्रभू को मिले हैं स्वै को खोज-खोज के ही मिले हैं (कर्म-काण्ड और शरह की सहायता से नहीं मिले)। 4। 7।
निरधन आदरु कोई न देइ ॥ लाख जतन करै ओहु चिति न धरेइ ॥1॥ रहाउ ॥ जउ निरधनु सरधन कै जाइ ॥ आगे बैठा पीठि फिराइ ॥1॥ जउ सरधनु निरधन कै जाइ ॥ दीआ आदरु लीआ बुलाइ ॥2॥ निरधनु सरधनु दोनउ भाई ॥ प्रभ की कला न मेटी जाई ॥3॥ कहि कबीर निरधनु है सोई ॥ जा के हिरदै नामु न होई ॥4॥8॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: कोई (धनी) मनुष्य किसी कंगाल मनुष्य का आदर नहीं करता। कंगाल मनुष्य चाहे लाखों यतन (धनवान को प्रसन्न करने के) करे। वह धनी मनुष्य (उसके यत्नों की) परवाह नहीं करता। 1। रहाउ। यदि कभी कोई गरीब बंदा किसी धनवान के घर चला जाए। आगे वह धनवान बैठा (उस गरीब से) पीठ मोड़ लेता है। 1। पर अगर धनी मनुष्य गरीब के घर जाए। वह आदर देता है। स्वागत करता है। 2। वैसे कंगाल और धनवान दोनों भाई भाई ही हैं (धनी को इतना गुमान नहीं करना चाहिए)। प्रभू की यह रजा (जिसके कारण कोई गरीब रह गया और कोई धनी बन गया) मिटाई नहीं जा सकती। 3। कबीर कहता है- (असल में) वह मनुष्य ही कंगाल है जिसके हृदय में प्रभूका नाम नहीं है (क्योंकि धन यहीं रह जाता है। और नाम-धन ने साथ निभना है; दूसरा। कितना ही धन मनुष्य इकट्ठा करता जाए। कभी संतुष्ट नहीं होता। मन भूखा कंगाल ही रहता है)। 4। 8।
गुर सेवा ते भगति कमाई ॥ तब इह मानस देही पाई ॥ इस देही कउ सिमरहि देव ॥ सो देही भजु हरि की सेव ॥1॥ भजहु गोुबिंद भूलि मत जाहु ॥ मानस जनम का एही लाहु ॥1॥ रहाउ ॥ जब लगु जरा रोगु नही आइआ ॥ जब लगु कालि ग्रसी नही काइआ ॥ जब लगु बिकल भई नही बानी ॥ भजि लेहि रे मन सारिगपानी ॥2॥ अब न भजसि भजसि कब भाई ॥ आवै अंतु न भजिआ जाई ॥ जो किछु करहि सोई अब सारु ॥ फिरि पछुताहु न पावहु पारु ॥3॥ सो सेवकु जो लाइआ सेव ॥ तिन ही पाए निरंजन देव ॥ गुर मिलि ता के खुल॑े कपाट ॥ बहुरि न आवै जोनी बाट ॥4॥ इही तेरा अउसरु इह तेरी बार ॥ घट भीतरि तू देखु बिचारि ॥ कहत कबीरु जीति कै हारि ॥ बहु बिधि कहिओ पुकारि पुकारि ॥5॥1॥9॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अगर आप गुरू की सेवा से बँदगी की कमाई करे। तो ही यह मनुष्य-शरीर मिला हुआ समझ। इस शरीर के लिए तो देवते भी तरसते हैं। आपको ये शरीर (मिला है। इससे) नाम सिमर। हरी का भजन कर। 1। हे भाई ! गोबिंद को सिमरो। ये बात भुला ना देनी। यह सिमरन ही मनुष्य-जन्म की कमाई है। 1। रहाउ। जब तक बुढ़ापा-रूपी रोग नहीं आ गया। जब तक आपके शरीर को मौत ने नहीं जकड़ा। जब तक आपकी ज़बान थिरकने नहीं लग जाती। (उससे पहले पहले ही) हे मेरे मन ! परमात्मा का भजन कर ले। 2। हे भाई ! यदि आप इस वक्त भजन नहीं करता। तो फिर कब करेगा। जब मौत (सिर पर) आ पहुँची उस वक्त तो भजन हैं नहीं सकेगा। जो कुछ (भजन-सिमरन) आप करना चाहता है। अभी ही कर ले। (यदि समय गुजर गया) तो फिर अफसोस ही करेगा। और इस पछतावे में से खलासी नहीं होगी। 3। (पर जीव के भी क्या वश।) जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं बँदगी में जोड़ता है। वही उसका सेवक बनता है। उसी को प्रभू मिलता है। सतिगुरू को मिल के उसके मन के किवाड़ खुलते हैं। और वह दोबारा जनम (मरण) के चक्कर में नहीं आता। 4। यही बारी है (यहाँ से टूट के समय नहीं मिलना)। आप अपने हृदय में विचार करके देख ले (प्रभू को मिलने का) यह मानस-जनम ही मौका है। (आपकी मर्जी है इस मनुष्य जनम की बाज़ी) जीत के जा चाहे हार के जा। कबीर कहता है- हे भाई ! मैं आपको कई तरीकों से चिल्ला-चिल्ला के बता रहा हूँ। 5। 1। 9।
सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥ तह तुम॑ मिलि कै करहु बिचारु ॥ ईत ऊत की सोझी परै ॥ कउनु करम मेरा करि करि मरै ॥1॥ निज पद ऊपरि लागो धिआनु ॥ राजा राम नामु मोरा ब्रहम गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥ मूल दुआरै बंधिआ बंधु ॥ रवि ऊपरि गहि राखिआ चंदु ॥ पछम दुआरै सूरजु तपै ॥ मेर डंड सिर ऊपरि बसै ॥2॥ पसचम दुआरे की सिल ओड़ ॥ तिह सिल ऊपरि खिड़की अउर ॥ खिड़की ऊपरि दसवा दुआरु ॥ कहि कबीर ता का अंतु न पारु ॥3॥2॥10॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (इस नाम की बरकति से) मेरी मति श्रेष्ठ (बन के) कल्याण-स्वरूप प्रभू के देश में बसने लग गई है। (हे जोगी !) आप भी उस देश में पहुँच के प्रभू के नाम की ही विचार करो। (जो मनुष्य उस देश में पहुँचता है। भाव। जो मनुष्य प्रभू-चरणों में जुड़ा रहता है उसको) ये समझ आ जाती है कि अब वाला जीवन कैसा होना चाहिए। और इसका असर अगले जीवन पर क्या पड़ता है; उस देश में पहुँचा हुआ कोई भी मनुष्य ममता में फंसने वाले काम नहीं करता। 1। (हे जोगी !) मेरी सुरति उस (प्रभू के चरण-रूप) घर में जुड़ी हुई है जो मेरा अपना असली घर है। प्रकाश-रूप प्रभू का नाम (हृदय में बसना) ही मेरे लिए ब्रहम-ज्ञान है। 1। रहाउ। (हे जोगी ! इस नाम की बरकति से) मैंने जगत के मूल प्रभू के दर पर टिक के (माया की बाढ़ के आगे) बाँध लगा लिया है। मैंने शांति-स्वभाव को ग्रहण करके इसको (अपने) तमो गुणी स्वभाव पर टिका दिया है। जहाँ (पहले अज्ञानता का) अंधेरा ही अंधेरा था। उसके दरवाजे पर अब ज्ञान का सूरज चमक रहा है। वह प्रभू। जिसके हुकम में सारा जगत है। अब मेरे मन में बस रहा है। 2। (नाम की बरकति से। हे जोगी !) मुझे उस शिला का आखिरी सिरा (मिल गया है) जो अज्ञानता की अंधेरी जगह के दरवाजे (के आगे जड़ा हुआ था)। क्योंकि इस शिला पर मुझे (रोशनी देने वाली) एक और खिड़की मिल गई है। इस खिड़की के ऊपर ही है दसवाँ द्वार (जहाँ मेरा प्रभू बसता है)। कबीर कहता है-अब ऐसी दशा बनी हुई है जो खत्म नहीं हो सकती। 3। 2। 10।
सो मुलां जो मन सिउ लरै ॥ गुर उपदेसि काल सिउ जुरै ॥ काल पुरख का मरदै मानु ॥ तिसु मुला कउ सदा सलामु ॥1॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: असल मुल्ला वह है जो अपने मन से मुकाबला करता है (भाव। मन को वश में करने का प्रयत्न करता है)। गुरू के बताए हुए उपदेश पर चल के मौत (और सहम) का मुकाबला करता है। जो जम-राज का (यह) मान (कि सारा जगत उससे थर-थर काँपता है) नाश कर देता है। मैं ऐसे मुल्ला के आगे सदा सिर झुकाता हूँ। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ज्यों-ज्यों मैं नाम-सिमरन की ताणी उन रहा हूँ) मैंने पंडित और मुल्ला दोनों ही छोड़ दिए हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।