Lulla Family

अंग 1158

अंग
1158
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामु राजा नउ निधि मेरै ॥
संपै हेतु कलतु धनु तेरै ॥1॥ रहाउ ॥
आवत संग न जात संगाती ॥
कहा भइओ दरि बांधे हाथी ॥2॥
लंका गढु सोने का भइआ ॥
मूरखु रावनु किआ ले गइआ ॥3॥
कहि कबीर किछु गुनु बीचारि ॥
चले जुआरी दुइ हथ झारि ॥4॥2॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! मेरे लिए तो जगत के मालिक प्रभू का नाम ही जगत का सारा धन-माल है (भाव। प्रभू मेरे हृदय में बसता है। यही मेरे लिए सब कुछ है)। पर आपके लिए ऐश्वर्य का मोह। स्त्री धन- (यही जिंदगी का सहारा हैं)। 1। रहाउ। (यह अपना शरीर भी) जो जन्म के समय साथ आता है (चलने के वक्त) साथ नहीं जाता। अगर दरवाजे पर हाथी बँधे हुए हैं। तो भी क्या हुआ। (इनका हमारे साथ जाना तो कहीं रहा।) 2। (लोग कहते हैं कि) लंका का किला सोने का बना हुआ था (पर इसके गुमान में रहने वाला) मूर्ख रावण (मरने के वक्त) अपने साथ कुछ भी नहीं ले के गया। 3। कबीर कहता है- हे भाई ! कोई भलाई की बात भी विचार। (धन पर गुमान करने वाला बँदा) जुआरिए की तरह (जगत से) खाली हाथ चल पड़ता है। 4। 2।
मैला ब्रहमा मैला इंदु ॥
रवि मैला मैला है चंदु ॥1॥
मैला मलता इहु संसारु ॥
इकु हरि निरमलु जा का अंतु न पारु ॥1॥ रहाउ ॥
मैले ब्रहमंडाइ कै ईस ॥
मैले निसि बासुर दिन तीस ॥2॥
मैला मोती मैला हीरु ॥
मैला पउनु पावकु अरु नीरु ॥3॥
मैले सिव संकरा महेस ॥
मैले सिध साधिक अरु भेख ॥4॥
मैले जोगी जंगम जटा सहेति ॥
मैली काइआ हंस समेति ॥5॥
कहि कबीर ते जन परवान ॥ निरमल ते जो रामहि जान ॥6॥3॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: ब्रहमा (भले ही जगत को पैदा करने वाला मिथा जाता है पर) ब्रहमा भी मैला। इन्द्र भी मैला (चाहे वह देवताओं का राजा माना गया है)। (दुनिया को रौशनी देने वाले) सूर्य और चंद्रमा भी मैले हैं। 1। ये (सारा) संसार मैला है। मलीन है। केवल परमात्मा ही पवित्र है। (इतना पवित्र है कि उसकी पवित्रता का) अंत नहीं पाया जा सकता। उस पार का छोर नहीं मिल सकता। 1। रहाउ। ब्रहमण्डों के राजा (भी हो जाएं तो भी) मैले हैं; रात-दिन। महीने के तीसों दिन सब मैले हैं (बेअंत जीव-जंतु विकारों से इनको मैला किए जा रहे हैं)। 2। (इतने कीमती होते हुए भी) मोती के हीरे भी मैले हैं। हवा। आग और पानी भी मैले हैं। 3। शिव-शंकर-महेश भी मैले हैं (भले ही ये महान देवता मिथे गए हैं)। सिध। साधक और भेखधारी साधू सब मैले हैं। 4। जोगी। जंगम। जटाधारी सब अपवित्र हैं; यह शरीर भी मैला और जीवात्मा भी मैला हुआ पड़ा है। 5। कबीर कहता है- सिर्फ वह मनुष्य (प्रभू के दर पर) कबूल हैं। सिर्फ वह मनुष्य पवित्र हैं जिन्होंने परमात्मा के साथ सांझ डाली है। 6। 3।
मनु करि मका किबला करि देही ॥
बोलनहारु परम गुरु एही ॥1॥
कहु रे मुलां बांग निवाज ॥
एक मसीति दसै दरवाज ॥1॥ रहाउ ॥
मिसिमिलि तामसु भरमु कदूरी ॥
भाखि ले पंचै होइ सबूरी ॥2॥
हिंदू तुरक का साहिबु एक ॥
कह करै मुलां कह करै सेख ॥3॥
कहि कबीर हउ भइआ दिवाना ॥
मुसि मुसि मनूआ सहजि समाना ॥4॥4॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे मुल्ला ! मन को मक्का और परमात्मा को किबला बना। (अंतहकर्ण मक्का है और सब शरीरों का स्वामी करतार उसमें पूज्य है)। बोलने वाला जीवात्मा बाँग देने वाला और नायक हो के नमाज़ पढ़ने वाला परम गुरू (इमाम) है। 1। हे मुल्ला ! यह दस दरवाजों (इन्द्रियों) वाला शरीर ही असल मस्जिद है। इसमें टिक के बाँग दे और नमाज़ पढ़। 1। रहाउ। (हे मुल्ला ! पशू की कुर्बानी देने की जगह अपने अंदर से) क्रोध भरा स्वभाव। भटकना और कदूरत दूर कर। कामादिक पाँचों को समाप्त कर दे। आपके अंदर शांति पैदा होगी। 2। हिन्दू व मुसलमान दोनों का मालिक प्रभू स्वयं ही है। मुल्ला व शेख (बनने से प्रभू की हजूरी में) कोई खास बड़ा मरतबा नहीं मिल जाता। 3। कबीर कहता है- (मेरी ये बातें तंग-दिल लोगों को पागलों वाली लगती हैं; लोगों के लिए तो) मैं पागल हो गया हूँ। पर मेरा मन आहिस्ता-आहिस्ता (अंदर से हॅज कर के ही) अडोल अवस्था में टिक गया है। 4। 4।
गंगा कै संगि सलिता बिगरी ॥ सो सलिता गंगा होइ निबरी ॥1॥
बिगरिओ कबीरा राम दुहाई ॥
साचु भइओ अन कतहि न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
चंदन कै संगि तरवरु बिगरिओ ॥
सो तरवरु चंदनु होइ निबरिओ ॥2॥
पारस कै संगि तांबा बिगरिओ ॥
सो तांबा कंचनु होइ निबरिओ ॥3॥
संतन संगि कबीरा बिगरिओ ॥
सो कबीरु रामै होइ निबरिओ ॥4॥5॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: (अगर जिंद के मालिक प्रभू के चरणों से लगना बिगड़ना ही है तो) नदी भी गंगा के साथ मिल के बिगड़ जाती है। पर वह नदी तो गंगा का रूप हो के अपना आप समाप्त कर देती है। 1। कबीर अपने प्रभू का सिमरन हर वक्त कर रहा है (पर लोगों की बाबत) कबीर बिगड़ गया है (लोग नहीं जानते कि राम की दोहाई दे दे के) कबीर राम का रूप हो गया है। अब (राम को छोड़ के) किसी और तरफ़ नहीं भटकता। 1। रहाउ। (साधारण) वृक्ष भी चँदन के साथ (लग के) बिगड़ जाता है। पर वह वृक्ष चँदन का रूप हो के अपना आप मिटा लेता है। 2। ताँबा भी पारस से छू के रूप बदल लेता है। पर वह ताँबा सोना ही बन जाता है और अपना आप खत्म कर देता है। 3। (इसी तरह) कबीर भी संतों की संगति में रह के बिगड़ गया है। पर। यह कबीर अब प्रभूके साथ ऐक-मेक हो गया है। और स्वै भाव समाप्त कर चुका है। 4। 5।
माथे तिलकु हथि माला बानां ॥
लोगन रामु खिलउना जानां ॥1॥
जउ हउ बउरा तउ राम तोरा ॥
लोगु मरमु कह जानै मोरा ॥1॥ रहाउ ॥
तोरउ न पाती पूजउ न देवा ॥
राम भगति बिनु निहफल सेवा ॥2॥
सतिगुरु पूजउ सदा सदा मनावउ ॥
ऐसी सेव दरगह सुखु पावउ ॥3॥
लोगु कहै कबीरु बउराना ॥
कबीर का मरमु राम पहिचानां ॥4॥6॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: (लोग) माथे पर तिलक लगा लेते हैं। हाथ में माला पकड़ लेते हैं। धार्मिक पहरावा बना लेते हैं। (और समझते हैं कि परमात्मा के भगत बन गए हैं) लोगों ने परमात्मा को खिलौना (भाव। अंजान बालक) समझ लिया है (कि इन बातों से उसे परचाया जा सकता है)। 1। (मैं) कोई धार्मिक भेष नहीं बनाता। मैं मन्दिर आदि में जा के किसी देवते की पूजा नहीं करता। लोग मुझे पागल कहते हैं; पर हे मेरे राम ! अगर मैं (लोगों के हिसाब से) पागल हूँ। तो भी (मुझे इस बात से संतुष्टि है कि) मैं आपका (सेवक) हूँ। दुनिया भला मेरे दिल का भेद क्या जान सकती है। 1। रहाउ। (देवताओं के आगे भेटा धरने के लिए) ना ही मैं (फूल) पत्र तोड़ता हूँ। ना ही मैं किसी देवी-देवता की पूजा करता हूँ। (मैं जानता हूँ कि) प्रभू की बँदगी के बिना किसी और की पूजा (करनी) व्यर्थ है। 2। मैं अपने सतिगुरू के आगे सिर झुकाता हॅूं। उसी को सदा प्रसन्न करता हूँ। और इस सेवा की बरकति से प्रभू की हजूरी में जुड़ के सुख भोगता हूँ। 3। (हिन्दू-) जगत कहता है। कबीर पागल हो गया है (क्योंकि ना ये तिलक आदि चिन्ह का इस्तेमाल करता है और ना ही फूल-पत्ते आदि ले के किसी मन्दिर में भेट करने जाता है)। पर कबीर के दिल का भेद कबीर का परमात्मा जानता है। 4। 6।
उलटि जाति कुल दोऊ बिसारी ॥
सुंन सहज महि बुनत हमारी ॥1॥
हमरा झगरा रहा न कोऊ ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: (नाम की बरकति से मन को माया से) उल्टा के मैंने जाति और कुल दोनों ही बिसार दिए हैं (मुझे ये बात समझ आ गई है कि प्रभू-मिलाप का किसी विशेष जाति व कुल से सम्बँध नहीं है)। मेरी लिव अब उस अवस्था में टिकी हुई है। जहाँ माया के फुरने नहीं हैं। जहाँ अडोलता ही अडोलता है। 1। दोनों (के द्वारा बताए गए कर्म-काण्ड और शरहके रास्ते) के साथ अब मेरा कोई वास्ता नहीं रहा (भाव। कर्म-काण्ड और शरह ये दोनों ही नाम-सिमरन के मुकाबले में तुच्छ हैं)।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! मेरे लिए तो जगत के मालिक प्रभू का नाम ही जगत का सारा धन-माल है (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।