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अंग 1157

अंग
1157
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कोटि मुनीसर मोुनि महि रहते ॥7॥
अविगत नाथु अगोचर सुआमी ॥ पूरि रहिआ घट अंतरजामी ॥
जत कत देखउ तेरा वासा ॥
नानक कउ गुरि कीओ प्रगासा ॥8॥2॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: करोड़ों ही बड़े-बड़े मुनि मौन धारे रखते हैं। 7। हे भाई ! हमारा वह पति-प्रभू अदृष्य है। हमारा वह स्वामी ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। सब जीवों के दिल की जानने वाला वह प्रभू सब शरीरों में मौजूद है। हे प्रभू ! (मुझे) नानक को गुरू ने (ऐसा आत्मिक) प्रकाश बख्शा है कि मैं जिधर-किधर देखता हूँ मुझे आपका ही निवास दिखाई देता है। 8। 2। 5।
भैरउ महला 5 ॥
सतिगुरि मो कउ कीनो दानु ॥
अमोल रतनु हरि दीनो नामु ॥
सहज बिनोद चोज आनंता ॥
नानक कउ प्रभु मिलिओ अचिंता ॥1॥
कहु नानक कीरति हरि साची ॥
बहुरि बहुरि तिसु संगि मनु राची ॥1॥ रहाउ ॥
अचिंत हमारै भोजन भाउ ॥
अचिंत हमारै लीचै नाउ ॥
अचिंत हमारै सबदि उधार ॥
अचिंत हमारै भरे भंडार ॥2॥
अचिंत हमारै कारज पूरे ॥
अचिंत हमारै लथे विसूरे ॥
अचिंत हमारै बैरी मीता ॥
अचिंतो ही इहु मनु वसि कीता ॥3॥
अचिंत प्रभू हम कीआ दिलासा ॥
अचिंत हमारी पूरन आसा ॥
अचिंत हम॑ा कउ सगल सिधांतु ॥
अचिंतु हम कउ गुरि दीनो मंतु ॥4॥
अचिंत हमारे बिनसे बैर ॥
अचिंत हमारे मिटे अंधेर ॥
अचिंतो ही मनि कीरतनु मीठा ॥
अचिंतो ही प्रभु घटि घटि डीठा ॥5॥
अचिंत मिटिओ है सगलो भरमा ॥
अचिंत वसिओ मनि सुख बिस्रामा ॥
अचिंत हमारै अनहत वाजै ॥
अचिंत हमारै गोबिंदु गाजै ॥6॥
अचिंत हमारै मनु पतीआना ॥
निहचल धनी अचिंतु पछाना ॥
अचिंतो उपजिओ सगल बिबेका ॥
अचिंत चरी हथि हरि हरि टेका ॥7॥
अचिंत प्रभू धुरि लिखिआ लेखु ॥
अचिंत मिलिओ प्रभु ठाकुरु एकु ॥
चिंत अचिंता सगली गई ॥
प्रभ नानक नानक नानक मई ॥8॥3॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! गुरू ने मुझे (यह) दाति बख्शी है। (गुरू ने मुझे वह) नाम-रतन दिया है जो किसी भी मूल्य से नहीं मिल सकता। (अब मेरे अंदर) आत्मिक अडोलता के बेअंत आनंद-तमाशे बने रहते हैं। नानक को (गुरू की कृपा से) चिंता दूर करने वाला परमात्मा आ मिला है।1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा की सदा कायम रहने वाली उपमा किया कर। अपने मन को बार-बार उस (सिफत-सालाह) से जोड़े रख। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की कृपा से अब) चिंता दूर करने वाले प्रभूका प्यार ही मेरे लिए (आत्मिक जीवन की) ख़ुराक है। मेरे अंदर अचिंत प्रभू का नाम ही सदा लिया जा रहा है। अचिंत प्रभू की सिफतसालाह की बाणी द्वारा विकारों से मेरा बचाव हो रहा है। (गुरू की कृपा से) मेरे अंदर चिंता दूर करने वाले परमात्मा के नाम-खजाने भरे गए हैं। 2। हे भाई ! चिंता दूर करने वाले परमात्मा के नाम की बरकति से मेरे सारे काम सफल हो रहे हैं। (मेरे अंदर से सारे) चिंता-फिक्र समाप्त हो गए हैं। अब मुझे वैरी भी मित्र दिखाई दे रहे हैं। चिंता दूर करने वाला हरी-नाम ले कर ही मैंने अपना यह मन वश में कर लिया है। 3। हे भाई ! चिंता दूर करने वाले परमात्मा ने मुझे हौसला बख्शा है। मेरी सारी आशाएं पूरी हो गई हैं। चिंता दूर करने वाले प्रभू का नाम जपना ही मेरे वास्ते सारे धर्मों का निचोड़ है। हे भाई ! यह नाम-मंत्र मुझे गुरू ने दिया है। 4। हे भाई ! चिंता दूर करने वाले परमात्मा के नाम जप के (मेरे अंदर से सारे) वैर विरोध नाश हो गए हैं। (मेरे अंदर से) माया के मोह के अंधेरे दूर हो गए हैं। हे भाई ! चिंता दूर करने वाला हरी-नाम जप के ही मेरे मन को परमात्मा की सिफतसालाह प्यारी लग रही है। और उस परमात्मा को मैंने हरेक हृदय में बसता देख लिया है। 5। हे भाई ! चिंता दूर करने वाले हरी-नाम की बरकति से मेरी सारी भटकना समाप्त हो गई है। (जब से) अचिंत प्रभू मेरे मन में आ बसा है। मेरे अंदर आत्मिक आनंद का (पक्का) ठिकाना बन गया है। अब मेरे अंदर चिंता दूर करने वाले हरी-नाम का एक-रस निरंतर बाजा बज रहा है। मेरे अंदर गोबिंद का नाम ही हर वक्त गूँज रहा है। 6। हे भाई ! चिंता दूर करने वाले हरी-नाम की बरकति से मेरा मन भटकने से हट गया है। अचिंत हरी-नाम जप के मैंने सदा कायम रहने वाले मालिक-प्रभू के साथ सांझ डाल ली है। चिंता दूर करने वाला हरि-नाम जप के ही मेरे अंदर अच्छे-बुरे काम की सारी पहचान (करने की क्षमता अर्थात विवेक) पैदा हो गई है। इस अचिंत हरी-नामकी मुझे सदा के लिए टेक मिल गई है। 7। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर प्रभू ने चिंता दूर करने वाले हरी-नाम की प्राप्ति का लेख धुर दरगाह से लिख दिया है। उसको वह सबका मालिक प्रभू मिल जाता है। हे भाई ! चिंता दूर करने वाला हरी-नाम जप के मेरी सारी चिंता दूर हो गई है। अब मैं नानक सदा के लिए प्रभू में लीन हो गया हूँ। 8। 3। 6।
भैरउ बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु धनु मेरे हरि को नाउ ॥
गांठि न बाधउ बेचि न खाउ ॥1॥ रहाउ ॥
नाउ मेरे खेती नाउ मेरे बारी ॥
भगति करउ जनु सरनि तुम॑ारी ॥1॥
नाउ मेरे माइआ नाउ मेरे पूंजी ॥
तुमहि छोडि जानउ नही दूजी ॥2॥
नाउ मेरे बंधिप नाउ मेरे भाई ॥
नाउ मेरे संगि अंति होइ सखाई ॥3॥
माइआ महि जिसु रखै उदासु ॥
कहि कबीर हउ ता को दासु ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ बाणी भगता की॥ कबीर जीउ घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ प्रभू का यह नाम मेरे लिए धन है (जैसे लोग धन को जीवन का सहारा बना लेते हैं। मेरे जीवन का सहारा प्रभू का नाम ही है। पर) मैं ना तो इसे छुपा के रखता हूँ। और ना ही दिखावे के लिए इस्तेमाल करता हूँ। 1। रहाउ। (कोई मनुष्य खेती-बाड़ी को आसरा मानता है। पर) मेरे लिए प्रभू का नाम ही खेती है। और नाम ही बगीची है। हे प्रभू ! मैं आपका दास आपकी ही शरण हूँ। और आपकी भक्ति करता हूँ। 1। हे प्रभू ! आपका नाम ही मेरे लिए माया है और राशि पूँजी है (व्यापार करनेके लिए। भाव। व्यापार शारीरिक निर्वाह के वास्ते है। मेरी जिंदगी का सहारा नहीं है)। हे प्रभू ! आपको विसार के मैं किसी और राशि-पूँजी के साथ सांझ नहीं डालता। 2। प्रभू का नाम ही मेरे लिए रिश्तेदार है। नाम ही मेरा भाई है; नाम ही मेरा आखिर में सहायता करने वाला बन सकता है। 3। जिसको प्रभू माया में रहते हुए को माया से निर्लिप रखता है। कबीर कहता है- मैं उस मनुष्य का सेवक हूँ 4। 1।
नांगे आवनु नांगे जाना ॥
कोइ न रहिहै राजा राना ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (जगत में) नंगे आना है। और नंगे ही (यहाँ से) चले जाना है। कोई राजा हो। अमीर हो। किसी ने यहाँ सदा नहीं रहना। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “करोड़ों ही बड़े-बड़े मुनि मौन धारे रखते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।