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अंग 1154

अंग
1154
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भैरउ महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिनि करतै इकु चलतु उपाइआ ॥
अनहद बाणी सबदु सुणाइआ ॥
मनमुखि भूले गुरमुखि बुझाइआ ॥
कारणु करता करदा आइआ ॥1॥
गुर का सबदु मेरै अंतरि धिआनु ॥
हउ कबहु न छोडउ हरि का नामु ॥1॥ रहाउ ॥
पिता प्रहलादु पड़ण पठाइआ ॥
लै पाटी पाधे कै आइआ ॥
नाम बिना नह पड़उ अचार ॥
मेरी पटीआ लिखि देहु गोबिंद मुरारि ॥2॥
पुत्र प्रहिलाद सिउ कहिआ माइ ॥
परविरति न पड़हु रही समझाइ ॥
निरभउ दाता हरि जीउ मेरै नालि ॥
जे हरि छोडउ तउ कुलि लागै गालि ॥3॥
प्रहलादि सभि चाटड़े विगारे ॥
हमारा कहिआ न सुणै आपणे कारज सवारे ॥
सभ नगरी महि भगति द्रिड़ाई ॥
दुसट सभा का किछु न वसाई ॥4॥
संडै मरकै कीई पूकार ॥
सभे दैत रहे झख मारि ॥
भगत जना की पति राखै सोई ॥
कीते कै कहिऐ किआ होई ॥5॥
किरत संजोगी दैति राजु चलाइआ ॥
हरि न बूझै तिनि आपि भुलाइआ ॥
पुत्र प्रहलाद सिउ वादु रचाइआ ॥
अंधा न बूझै कालु नेड़ै आइआ ॥6॥
प्रहलादु कोठे विचि राखिआ बारि दीआ ताला ॥
निरभउ बालकु मूलि न डरई मेरै अंतरि गुर गोपाला ॥
कीता होवै सरीकी करै अनहोदा नाउ धराइआ ॥
जो धुरि लिखिआ सोु आइ पहुता जन सिउ वादु रचाइआ ॥7॥
पिता प्रहलाद सिउ गुरज उठाई ॥
कहां तुम॑ारा जगदीस गुसाई ॥
जगजीवनु दाता अंति सखाई ॥
जह देखा तह रहिआ समाई ॥8॥
थंम॑ु उपाड़ि हरि आपु दिखाइआ ॥
अहंकारी दैतु मारि पचाइआ ॥
भगता मनि आनंदु वजी वधाई ॥
अपने सेवक कउ दे वडिआई ॥9॥
जंमणु मरणा मोहु उपाइआ ॥
आवणु जाणा करतै लिखि पाइआ ॥
प्रहलाद कै कारजि हरि आपु दिखाइआ ॥
भगता का बोलु आगै आइआ ॥10॥
देव कुली लखिमी कउ करहि जैकारु ॥
माता नरसिंघ का रूपु निवारु ॥
लखिमी भउ करै न साकै जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (यह जगत) उस करतार ने एक तमाशा रचा हुआ है। (उसने स्वयं ही गुरू के द्वारा जीवों को) एक-रस वलवले वाला गुर-शबद सुनाया है। अपने मनके पीछे चलने वाले मनुष्य (सही जीवन के राह से) टूटे रहते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वालों को (परमात्मा आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श देता है। यह सबब करतार (सदा से ही) बनाता । 1। हे भाई ! (मेरे) गुरू का शबद मेरे अंदर बस रहा है। मेरी सुरति का निशाना बन चुका है। (गुरू के शबद द्वारा प्राप्त किया हुआ) परमात्मा का नाम मैं कभी नहीं छोड़ूंगा। 1। रहाउ। हे भाई ! (देखो। प्रहलाद के) पिता ने प्रहलाद को पढ़ने के लिए (पाठशाला में) भेजा। प्रहलाद तख़्ती लेकर अध्यापक (पांधे) के पास पहुँचा। (अध्यापक तो कुछ और ही पढ़ाने लगे। पर प्रहलाद ने कहा-) मैं परमात्मा के नाम के बिना और कोई कार्य-व्यवहार नहीं पढ़ूँगा। आप मेरी पट्टी पर परमात्मा का नाम ही लिख के दो। 2। हे भाई ! माँ ने (अपने) पुत्र प्रहलाद को कहा- आप जिस (हरी के नाम) में व्यस्त हुआ पड़ा है। वह ना पढ़ (बहुत) समझाती रही (पर। प्रहलाद ने उक्तर दिया-) किसी भी से ना डरने वाला परमात्मा (सदा) मेरे साथ है। अगर मैं परमात्मा (का नाम) छोड़ दूँ। तो सारी कुल को ही दाग़ लगेगा। 3। हे भाई ! (अध्यापकों ने सोचा कि) प्रहलाद ने (तो) सारे ही विद्यार्थी बिगाड़ दिए हैं। हमारा कहा ये सुनता ही नहीं। अपने काम ठीक किए जा रहा है। सारे शहर में इसने परमात्मा की भक्ति लोगों के दिलों में दृढ़ करवा दी है। हे भाई ! दुष्टों की जुण्डली का प्रहलाद पर कोई जोर नहीं चल रहा। 4। हे भाई ! (आखिर) संडे ने और अमरक ने (हर्णाकष्यप के पास) जाकर शिकायत की। सारे दैत्य अपना जोर लगा के थक गए (पर उनकी पेश ना पड़ी)। हे भाई ! अपने भक्तों की लाज वह स्वयं ही रखता है। उसके पैदा किए हुए किसी (दोखी) का जोर नहीं चल सकता। 5। हे भाई ! पिछले किए कर्मों के संजोग से दैत्य (हर्णाकश्यप) ने राज चला लिया। (राज के मद में) वह परमात्मा को (कुछ भी) नहीं था समझता (पर उसके भी क्या वश।) उस करतार ने (स्वयं ही) उसको गलत रास्ते पर डाल रखा था। (सो) उसने (अपने) पुत्र प्रहलाद के साथ झगड़ा खड़ा कर लिया। (राज के मद में) अंधा हुआ (हर्णाकश्यप यह) नहीं था समझता (कि उसकी) मौत नजदीक आ गई है। 6। हे भाई ! (हर्णाकश्यप ने) प्रहलाद को कोठे में बंद करवा दिया। और दरवाजे पर ताला लगवा दिया। पर निडर बालक बिल्कुल नहीं था डरता। (वह कहता था-) मेरा गुरू मेरा परमात्मा मेरे हृदय में बसता है। हे भाई ! परमात्मा का पैदा किया हुआ जो मनुष्य परमात्मा के साथ बराबरी करने लग जाता है। वह (अपनी) समर्थता से बड़ा अपना नाम रखवा लेता है। (हर्णाकश्यप ने) प्रभू के भगत से झगड़ा छेड़ लिया। धुर दरगाह से जो होनी लिखी थी। उसका समय आ पहुँचा। 7। सो। हे भाई ! पिता (हर्णाकश्यप) ने प्रहलाद पर गदा उठा ली। (और कहने लगा- बता।) कहाँ है आपका जगदीश। कहाँ है आपका गोसाई। (जो आपको अब बचाए)। (प्रहलाद ने उक्तर दिया-) जगत का आसरा दातार प्रभू ही आखिर (हरेक जीव का मददगार बनता है।) मैं तो जिधर देखता हूँ। वह उधर ही मौजूद है। 8। हे भाई ! (उस वक्त) खम्भा फाड़ के परमात्मा ने अपने आप को प्रकट कर दिया। (राज के मद में) मस्त हुए (हर्णाकश्यप) दैत्य का मार डाला। हे भाई ! भगतों के मन में (सदा) आनंद (सदा) चढ़दीकला बनी रहती है। (भगत जानते हैं कि) परमात्मा अपने भक्तों को (लोक-परलोक में) इज्जत देता है। 9। हे भाई ! करतार ने स्वयं ही जनम-मरण का चक्कर बनाया है। स्वयं ही जीवों के अंदर माया का मोह पैदा किया हुआ है। (जगत में) आना (जगत से) चले जाना-ये लेख करतार ने स्वयं ही हरेक जीव के माथे पर लिख रखा है। (हर्णाकश्यप के भी क्या वश।) प्रहलाद का काम संवारने के लिए परमात्मा ने अपने आप को (नरसिंह रूप में) प्रकट किया। (इस तरह) भगतों का वचन पूरा हैं गया (कि ‘अपुने सेवक कउ दे वडिआई’)। 10। हे भाई ! सारे देवताओं ने लक्ष्मी की उपमा की (और कहा-) हे माता ! (प्रेरणा कर के कह- हे प्रभू !) नरसिंह वाला रूपदूर कर। (पर) लक्ष्मी भी डरती थी। वह भी (नरसिंह के नजदीक) नहीं जा सकती थी।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “भैरउ महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (यह जगत) उस करतार ने एक तमाशा रचा हुआ है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।