ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिनि करतै इकु चलतु उपाइआ ॥
अनहद बाणी सबदु सुणाइआ ॥
मनमुखि भूले गुरमुखि बुझाइआ ॥
कारणु करता करदा आइआ ॥1॥
गुर का सबदु मेरै अंतरि धिआनु ॥
हउ कबहु न छोडउ हरि का नामु ॥1॥ रहाउ ॥
पिता प्रहलादु पड़ण पठाइआ ॥
लै पाटी पाधे कै आइआ ॥
नाम बिना नह पड़उ अचार ॥
मेरी पटीआ लिखि देहु गोबिंद मुरारि ॥2॥
पुत्र प्रहिलाद सिउ कहिआ माइ ॥
परविरति न पड़हु रही समझाइ ॥
निरभउ दाता हरि जीउ मेरै नालि ॥
जे हरि छोडउ तउ कुलि लागै गालि ॥3॥
प्रहलादि सभि चाटड़े विगारे ॥
हमारा कहिआ न सुणै आपणे कारज सवारे ॥
सभ नगरी महि भगति द्रिड़ाई ॥
दुसट सभा का किछु न वसाई ॥4॥
संडै मरकै कीई पूकार ॥
सभे दैत रहे झख मारि ॥
भगत जना की पति राखै सोई ॥
कीते कै कहिऐ किआ होई ॥5॥
किरत संजोगी दैति राजु चलाइआ ॥
हरि न बूझै तिनि आपि भुलाइआ ॥
पुत्र प्रहलाद सिउ वादु रचाइआ ॥
अंधा न बूझै कालु नेड़ै आइआ ॥6॥
प्रहलादु कोठे विचि राखिआ बारि दीआ ताला ॥
निरभउ बालकु मूलि न डरई मेरै अंतरि गुर गोपाला ॥
कीता होवै सरीकी करै अनहोदा नाउ धराइआ ॥
जो धुरि लिखिआ सोु आइ पहुता जन सिउ वादु रचाइआ ॥7॥
पिता प्रहलाद सिउ गुरज उठाई ॥
कहां तुम॑ारा जगदीस गुसाई ॥
जगजीवनु दाता अंति सखाई ॥
जह देखा तह रहिआ समाई ॥8॥
थंम॑ु उपाड़ि हरि आपु दिखाइआ ॥
अहंकारी दैतु मारि पचाइआ ॥
भगता मनि आनंदु वजी वधाई ॥
अपने सेवक कउ दे वडिआई ॥9॥
जंमणु मरणा मोहु उपाइआ ॥
आवणु जाणा करतै लिखि पाइआ ॥
प्रहलाद कै कारजि हरि आपु दिखाइआ ॥
भगता का बोलु आगै आइआ ॥10॥
देव कुली लखिमी कउ करहि जैकारु ॥
माता नरसिंघ का रूपु निवारु ॥
लखिमी भउ करै न साकै जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “भैरउ महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! (यह जगत) उस करतार ने एक तमाशा रचा हुआ है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।