प्रहलादु जनु चरणी लागा आइ ॥11॥ सतिगुरि नामु निधानु द्रिड़ाइआ ॥ राजु मालु झूठी सभ माइआ ॥ लोभी नर रहे लपटाइ ॥ हरि के नाम बिनु दरगह मिलै सजाइ ॥12॥ कहै नानकु सभु को करे कराइआ ॥ से परवाणु जिनी हरि सिउ चितु लाइआ ॥ भगता का अंगीकारु करदा आइआ ॥ करतै अपणा रूपु दिखाइआ ॥13॥1॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: (परमात्मा का) भगत प्रहलाद (नरसिंह के) चरणों में आ लगा। 11। हे भाई ! गुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में) परमात्मा का नाम खजाना पक्का कर दिया (उसको दिखाई दे जाता है कि) दुनिया का राज-माल और सारी माया -ये सब कुछ नाशवंत है। पर लालची लोग इसके साथ ही चिपके रहते हैं। परमात्मा के नाम के बिना (उनको) परमात्मा की हजूरी में सजा मिलती है। 12। हे भाई ! नानक कहता है- (जीवों के भी क्या वश।) हरेक जीव परमात्मा का प्रेरित हुआ ही (कर्म) करता है। जिन्होंने (यहाँ) परमात्मा (के नाम) से चित्त जोड़ा। वे प्रभू की हजूरी में कबूल हो गए। हे भाई ! धुर से ही परमात्मा अपने भक्तों का पक्ष करता । करतार ने (स्वयं ही अपने भक्तों को) अपना दर्शन दिए हैं (और उनकी सहायता की है)। 13। 1। 2।
भैरउ महला 3 ॥ गुर सेवा ते अंम्रित फलु पाइआ हउमै त्रिसन बुझाई ॥ हरि का नामु ह्रिदै मनि वसिआ मनसा मनहि समाई ॥1॥ हरि जीउ क्रिपा करहु मेरे पिआरे ॥ अनदिनु हरि गुण दीन जनु मांगै गुर कै सबदि उधारे ॥1॥ रहाउ ॥ संत जना कउ जमु जोहि न साकै रती अंच दूख न लाई ॥ आपि तरहि सगले कुल तारहि जो तेरी सरणाई ॥2॥ भगता की पैज रखहि तू आपे एह तेरी वडिआई ॥ जनम जनम के किलविख दुख काटहि दुबिधा रती न राई ॥3॥ हम मूड़ मुगध किछु बूझहि नाही तू आपे देहि बुझाई ॥ जो तुधु भावै सोई करसी अवरु न करणा जाई ॥4॥ जगतु उपाइ तुधु धंधै लाइआ भूंडी कार कमाई ॥ जनमु पदारथु जूऐ हारिआ सबदै सुरति न पाई ॥5॥ मनमुखि मरहि तिन किछू न सूझै दुरमति अगिआन अंधारा ॥ भवजलु पारि न पावहि कब ही डूबि मुए बिनु गुर सिरि भारा ॥6॥ साचै सबदि रते जन साचे हरि प्रभि आपि मिलाए ॥ गुर की बाणी सबदि पछाती साचि रहे लिव लाए ॥7॥ तूं आपि निरमलु तेरे जन है निरमल गुर कै सबदि वीचारे ॥ नानकु तिन कै सद बलिहारै राम नामु उरि धारे ॥8॥2॥3॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ के आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम फल प्राप्त कर लिया। उसने (अपने अंदर से) अहंकार और तृष्णा (की आग) बुझा ली। परमात्मा का नाम उसके हृदय में उसके मन में बस गया। उसके मन का (मायावी) फुरना मन में ही लीन हो गया। 1। हे मेरे प्यारे प्रभू जी ! (मुझ गरीब पर) मेहर कर। (आपके दर का) गरीब सेवक (आपसे) हर वक्त आपके गुण (गाने की दाति) माँगता है। हे प्रभू ! मुझे गुरू के शबद के द्वारा (विकारों से) बचाए रख। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोगों की तरफ जमराज (भी) ताक नहीं सकता। (दुनिया के) दुखों का रक्ती भर भी सेका (उनको) लग नहीं सकता। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी शरण आ पड़ते हैं। वह स्वयं (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाते हैं। अपनी सारी कुलों को भी पार लंघा लेते हैं। 2। हे प्रभू ! अपने भकतों की (लोक-परलोक में) इज्जत आप स्वयं ही रखता है। यह आपकी बुजुर्गी है। आप उनके (पिछले) अनेकों ही जन्मों के पाप और दुख काट देता है। उनके अंदर रक्ती भर भी राई भर भी मेर-तेर नहीं रह जाती (दुबिधा समाप्त हो जाती है)। 3। हे भाई ! हम (जीव) मूर्ख हैं अन्जान हैं। हम (आत्मिक जीवन का सही रास्ता) (रक्ती भर) नहीं समझते। आप स्वयं ही (हमें यह) समझा देता है। हे प्रभू ! जो काम आपको अच्छा लगता है। वह (हरेक जीव) करता है। (उससे उलट) और कोई काम नहीं किया जा सकता। 4। हे प्रभू ! (तूने स्वयं ही) जगत को पैदा करके (तूने स्वयं ही इसको माया के) धंधे में लगा रखा है। (आपकी प्रेरणा से जगत माया के मोह की) बुरी कार कर रहा है। (माया के मोह में फस के जगत ने) कीमती मानस जनम को (जुआरिए की तरह) जूए में हार दिया है। गुरू के शबद से (जगत ने) आत्मिक जीवन की सूझ हासिल नहीं की। 5। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। उनको आत्मिक जीवन की रक्ती भर भी समझ नहीं पड़ती। बुरी मति का। आत्मिक जीवन के प्रति बेसमझी का (उनके अंदर) अंधकार छाया रहता है। वे मनुष्य गुरू की शरण पड़ बिना विकारों में सिर के भार डूब के आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं। वे कभी भी संसार-समुंद्र से पार नहीं लांघ सकते। 6। हे भाई !जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह के शबद में रंगे रहते हैं वे सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाते हैं। प्रभू ने स्वयं ही उनको अपने साथ मिला लिया होता है। गुरू के शबद से उन्होंने गुरू के आत्म-तरंग के साथ सांझ पा ली होती है। वे मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखते हैं। 7। हे प्रभू ! आप स्वयं पवित्र स्वरूप है। आपके सेवक गुरू के शबद द्वारा (आपके गुणों का) विचार कर के पवित्र जीवन वाले हैं जाते हैं। हे भाई !नानक उन मनुष्यों से सदा सदके जाता है। जो परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाए रखते हैं। 8। 2। 3।
भैरउ महला 5 असटपदीआ घरु 2 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जिसु नामु रिदै सोई वड राजा ॥ जिसु नामु रिदै तिसु पूरे काजा ॥ जिसु नामु रिदै तिनि कोटि धन पाए ॥ नाम बिना जनमु बिरथा जाए ॥1॥ तिसु सालाही जिसु हरि धनु रासि ॥ सो वडभागी जिसु गुर मसतकि हाथु ॥1॥ रहाउ ॥ जिसु नामु रिदै तिसु कोट कई सैना ॥ जिसु नामु रिदै तिसु सहज सुखैना ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5 असटपदीआ घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! जिस मनुष्यके हृदय में परमात्मा का नाम बसता है वही (सब राजाओं से) बड़ा राजा है। उस मनुष्य के सारे काम सफल हो जाते हैं। उसने (मानो) करोड़ों किस्मों के धन प्राप्त कर लिए। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना मनुष्यका जीवन व्यर्थ चला जाता है। 1। हे भाई ! मैं उस मनुष्य की सराहना करता हूँ जिसके पास परमात्मा का नाम-धन सरमाया है। जिस मनुष्य के माथे पर गुरू का हाथ टिका हुआ हो। वह बहुत भाग्यशाली है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बसता है। वह (मानो) कई किलों और फौजों (का मालिक हो जाता है)। उसको आत्मिक अडोलता के सारे सुख मिल जाते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(परमात्मा का) भगत प्रहलाद (नरसिंह के) चरणों में आ लगा।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।