इस पृष्ठ पर
अंग
1152
भैरों
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
· शबद · राग भैरों
निंदक का कहिआ कोइ न मानै ॥
निंदक का कहिआ कोइ न मानै ॥
निंदक झूठु बोलि पछुताने ॥
हाथ पछोरहि सिरु धरनि लगाहि ॥
निंदक कउ दई छोडै नाहि ॥2॥
हरि का दासु किछु बुरा न मागै ॥
निंदक कउ लागै दुख सांगै ॥
बगुले जिउ रहिआ पंख पसारि ॥
मुख ते बोलिआ तां कढिआ बीचारि ॥3॥
अंतरजामी करता सोइ ॥
हरि जनु करै सु निहचलु होइ ॥
हरि का दासु साचा दरबारि ॥
जन नानक कहिआ ततु बीचारि ॥4॥41॥54॥
निंदक झूठु बोलि पछुताने ॥
हाथ पछोरहि सिरु धरनि लगाहि ॥
निंदक कउ दई छोडै नाहि ॥2॥
हरि का दासु किछु बुरा न मागै ॥
निंदक कउ लागै दुख सांगै ॥
बगुले जिउ रहिआ पंख पसारि ॥
मुख ते बोलिआ तां कढिआ बीचारि ॥3॥
अंतरजामी करता सोइ ॥
हरि जनु करै सु निहचलु होइ ॥
हरि का दासु साचा दरबारि ॥
जन नानक कहिआ ततु बीचारि ॥4॥41॥54॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! संतजनों पर दूषण लगाने वालों की बात को कोई भी मनुष्य सच नहीं मानता। तोहमतें लगाने वाले झूठ बोल के (फिर) अफसोस ही करते हैं। (सच्चाई सामने आ जाने पर निंदक) हाथ माथे पर मारते हैं और अपना सिर धरती पर पटकते हैं (भाव। बहुत ही शर्मिन्दे होते हैं)। (पर ऊजें लगाने की दूषण लगाने की बाज़ी में दोखी मनुष्य ऐसा फसता है कि) परमात्मा उस दोखी को (अपने ही बुने हुए निंदा के जाल में से) छुटकारा नहीं देता। 2। हे भाई ! परमात्मा का भक्त (उस दोखी का भी) रत्ती भर भी बुरा नहीं माँगता (ये नहीं चाहता कि उसका कोई नुकसान हो। फिर भी) दोखी को (अपनी ही करतूत का ऐसा) दुख मिलता है (जैसे) बरछी (के लगने) की (असह्य पीड़ा होती है)। हे भाई ! संतजनों पर दूषण लगाने वाला मनुष्य खुद ही बगुले की तरह पंख पसार के रखता है (अपने आप को अच्छे जीवन वाला जतलाता फिरता है। पर जैसे ही वह) मुँह से (दूषण भरे) बचन बोलता है तब वह (झूठा दोखी) मिथा जाता है (और लोगों द्वारा) दुत्कारा जाता है। 3। हे भाई ! वह करतार स्वयं ही हरेक के दिल की जानता है। उसका सेवक जो कुछ करता है वह पत्थर की लकीर होता है (उस में रत्ती भर भी झूठ नहीं होता। वह किसी की बुराई वास्ते नहीं होता)। हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने विचार करके यह सार कहा है कि परमात्मा का सेवक उनकी हजूरी में सुर्ख-रू होता है। 4। 41। 54।
· शबद · राग भैरों
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥
भैरउ महला 5 ॥
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥
जीउ पिंडु धनु तिस की रासि ॥
सोई मेरा सुआमी करनैहारु ॥
कोटि बार जाई बलिहार ॥1॥
साधू धूरि पुनीत करी ॥
मन के बिकार मिटहि प्रभ सिमरत जनम जनम की मैलु हरी ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै ग्रिह महि सगल निधान ॥
जा की सेवा पाईऐ मानु ॥
सगल मनोरथ पूरनहार ॥
जीअ प्रान भगतन आधार ॥2॥
घट घट अंतरि सगल प्रगास ॥
जपि जपि जीवहि भगत गुणतास ॥
जा की सेव न बिरथी जाइ ॥
मन तन अंतरि एकु धिआइ ॥3॥
गुर उपदेसि दइआ संतोखु ॥
नामु निधानु निरमलु इहु थोकु ॥
करि किरपा लीजै लड़ि लाइ ॥
चरन कमल नानक नित धिआइ ॥4॥42॥55॥
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥
जीउ पिंडु धनु तिस की रासि ॥
सोई मेरा सुआमी करनैहारु ॥
कोटि बार जाई बलिहार ॥1॥
साधू धूरि पुनीत करी ॥
मन के बिकार मिटहि प्रभ सिमरत जनम जनम की मैलु हरी ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै ग्रिह महि सगल निधान ॥
जा की सेवा पाईऐ मानु ॥
सगल मनोरथ पूरनहार ॥
जीअ प्रान भगतन आधार ॥2॥
घट घट अंतरि सगल प्रगास ॥
जपि जपि जीवहि भगत गुणतास ॥
जा की सेव न बिरथी जाइ ॥
मन तन अंतरि एकु धिआइ ॥3॥
गुर उपदेसि दइआ संतोखु ॥
नामु निधानु निरमलु इहु थोकु ॥
करि किरपा लीजै लड़ि लाइ ॥
चरन कमल नानक नित धिआइ ॥4॥42॥55॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (गुरू की शरण की बरकति से) मैं दोनों हाथ जोड़ के (प्रभू के दर पे) अरजोई करता रहता हूँ। मेरी यह जिंद। मेरा यह शरीर यह धन- सब कुछ उस परमात्मा की बख्शी हुई पूँजी है। मेरा वह मालिक स्वयं ही सब कुछ कर सकने में समर्थ है। मैं करोड़ों बार उससे सदके जाता हूँ। 1। हे भाई ! गुरू की चरण-धूल (मनुष्य के जीवन को) पवित्र कर देती है। (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू का नाम सिमरने से (मनुष्य के) मन के विकार दूर हो जाते हैं। अनेकों जन्मों के (किए हुए कुकर्मों) की मैल उतर जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की शरण में आ के ही ये समझ आती है कि) जिस परमात्मा के घर में सारे खजाने हैं। जिसकी सेवा-भक्ति करने से (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है। वह परमात्मा (जीवों की) सारी आवश्यकताएँ पूरी कर सकने वाला है। वह अपने भक्तों की जिंद का प्राणों का सहारा है। 2। हे भाई ! (गुरू की शरण में आ के ही ये समझ आती है कि) परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है। सब जीवों के अंदर (अपनी ज्योति का) प्रकाश करता है। उस गुणों के खजाने प्रभू का नाम जप-जप के उसके भगत आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। हे भाई ! जिस प्रभू की की हुई भगती व्यर्थ नहीं जाती। आप अपने मन में अपने तन में उस एक का नाम सिमरा करें। 3। हे भाई ! गुरू की शिक्षा पर चलने से (मनुष्य के हृदय में) दया पैदा होती है संतोष पैदा होता है। नाम-खजाना प्रकट हो जाता है। यह (नाम-खजाना ऐसा) पदार्थ है कि यह जीवन को पवित्र कर देता है। हे नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास किया करें और कहें- हे प्रभू !) मेहर कर के (मुझे अपने) पल्ले से लगाए रखें। (मैं) आपके सुंदर चरणों का हमेशा ध्यान धरता रहूँ। 4। 42। 55।
· शबद · राग भैरों
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥
भैरउ महला 5 ॥
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥
कारजु आइआ सगला रासि ॥
मन तन अंतरि प्रभू धिआइआ ॥
गुर पूरे डरु सगल चुकाइआ ॥1॥
सभ ते वड समरथ गुरदेव ॥
सभि सुख पाई तिस की सेव ॥ रहाउ ॥
जा का कीआ सभु किछु होइ ॥
तिस का अमरु न मेटै कोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरु अनूपु ॥
सफल मूरति गुरु तिस का रूपु ॥2॥
जा कै अंतरि बसै हरि नामु ॥
जो जो पेखै सु ब्रहम गिआनु ॥
बीस बिसुए जा कै मनि परगासु ॥
तिसु जन कै पारब्रहम का निवासु ॥3॥
तिसु गुर कउ सद करी नमसकार ॥
तिसु गुर कउ सद जाउ बलिहार ॥
सतिगुर के चरन धोइ धोइ पीवा ॥
गुर नानक जपि जपि सद जीवा ॥4॥43॥56॥
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥
कारजु आइआ सगला रासि ॥
मन तन अंतरि प्रभू धिआइआ ॥
गुर पूरे डरु सगल चुकाइआ ॥1॥
सभ ते वड समरथ गुरदेव ॥
सभि सुख पाई तिस की सेव ॥ रहाउ ॥
जा का कीआ सभु किछु होइ ॥
तिस का अमरु न मेटै कोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरु अनूपु ॥
सफल मूरति गुरु तिस का रूपु ॥2॥
जा कै अंतरि बसै हरि नामु ॥
जो जो पेखै सु ब्रहम गिआनु ॥
बीस बिसुए जा कै मनि परगासु ॥
तिसु जन कै पारब्रहम का निवासु ॥3॥
तिसु गुर कउ सद करी नमसकार ॥
तिसु गुर कउ सद जाउ बलिहार ॥
सतिगुर के चरन धोइ धोइ पीवा ॥
गुर नानक जपि जपि सद जीवा ॥4॥43॥56॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! प्यारे गुरू ने (जिस मनुष्य की) विनती सुन ली। उसका (हरेक) काम मुकम्मल तौर पर सफल हो जाता है। वह मनुष्य अपने मन में अपने हृदय में परमात्मा का ध्यान धरता रहता है। पूरा गुरू उसका (हरेक) डर सारे का सारा दूर कर देता है। 1। हे भाई ! गुरू सब (देवताओं) से बहुत बड़ी ताकत वाला है। मैं (तो) उस (गुरू) की शरण पड़ कर सारे सुख प्राप्त कर रहा हूँ। रहाउ। हे भाई ! (जगत में) जिस (परमात्मा) का किया हुआ ही हरेक काम हो रहा है। उस (परमात्मा) का हुकम कोई जीव मोड़ नहीं सकता। वह प्रभू परमेश्वर (ऐसा है कि उस) जैसा और कोई नहीं। उसके स्वरूप का दीदार सारे मनोरथ पूरे करता है। हे भाई ! गुरू उस परमात्मा का रूप है। 2। हे भाई ! (गुरू के द्वारा) जिस (मनुष्य) के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। (वह मनुष्य जगत में) जो कुछ भी देखता है वह (देखा हुआ पदार्थ उसकी) परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनाता है। हे भाई ! (गुरू के द्वारा) जिस मनुष्य के मन में आत्मिक जीवन का मुकम्मल प्रकाश हो जाता है। उस मनुष्य के अंदर परमात्मा का निवास हो जाता है। 3। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) उस गुरू को मैं सदा सिर झुकाता रहता हूँ उस गुरू से मैं सदा कुर्बान जाता हूँ। मैं उस गुरू के चरण धो धो के पीता हूँ (भाव। मैं उस गुरू से अपना आपा सदके करता हूँ)। उस गुरू को सदा चेते करके मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहता हूँ। 4। 43। 56।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1152 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।