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अंग 1152

अंग
1152
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
निंदक का कहिआ कोइ न मानै ॥
निंदक झूठु बोलि पछुताने ॥
हाथ पछोरहि सिरु धरनि लगाहि ॥
निंदक कउ दई छोडै नाहि ॥2॥
हरि का दासु किछु बुरा न मागै ॥
निंदक कउ लागै दुख सांगै ॥
बगुले जिउ रहिआ पंख पसारि ॥
मुख ते बोलिआ तां कढिआ बीचारि ॥3॥
अंतरजामी करता सोइ ॥
हरि जनु करै सु निहचलु होइ ॥
हरि का दासु साचा दरबारि ॥
जन नानक कहिआ ततु बीचारि ॥4॥41॥54॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! संतजनों पर दूषण लगाने वालों की बात को कोई भी मनुष्य सच नहीं मानता। तोहमतें लगाने वाले झूठ बोल के (फिर) अफसोस ही करते हैं। (सच्चाई सामने आ जाने पर निंदक) हाथ माथे पर मारते हैं और अपना सिर धरती पर पटकते हैं (भाव। बहुत ही शर्मिन्दे होते हैं)। (पर ऊजें लगाने की दूषण लगाने की बाज़ी में दोखी मनुष्य ऐसा फसता है कि) परमात्मा उस दोखी को (अपने ही बुने हुए निंदा के जाल में से) छुटकारा नहीं देता। 2। हे भाई ! परमात्मा का भक्त (उस दोखी का भी) रक्ती भर भी बुरा नहीं माँगता (ये नहीं चाहता कि उसका कोई नुकसान हो। फिर भी) दोखी को (अपनी ही करतूत का ऐसा) दुख मिलता है (जैसे) बरछी (के लगने) की (असहि पीड़ा होती है)। हे भाई ! संतजनों पर दूषण लगाने वाला मनुष्य खुद ही बगुले की तरह पंख पसार के रखता है (अपने आप को अच्छे जीवन वाला जतलाता फिरता है। पर जैसे ही वह) मुँह से (दूषण भरे) बचन बोलता है तब वह (झूठा दोखी) मिथा जाता है (और लोगों द्वारा) दुत्कारा जाता है। 3। हे भाई ! वह करतार स्वयं ही हरेक के दिल की जानता है। उसका सेवक जो कुछ करता है वह पत्थर की लकीर होता है (उस में रक्ती भर भी झूठ नहीं होता। वह किसी की बुराई वास्ते नहीं होता)। परमात्मा का सेवक परमात्मा की हजूरी में सुर्ख-रू होता है। हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने विचार के ये तॅत-सार कह दिया है कि 4। 41। 54।
भैरउ महला 5 ॥
दुइ कर जोरि करउ अरदासि ॥
जीउ पिंडु धनु तिस की रासि ॥
सोई मेरा सुआमी करनैहारु ॥
कोटि बार जाई बलिहार ॥1॥
साधू धूरि पुनीत करी ॥
मन के बिकार मिटहि प्रभ सिमरत जनम जनम की मैलु हरी ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै ग्रिह महि सगल निधान ॥
जा की सेवा पाईऐ मानु ॥
सगल मनोरथ पूरनहार ॥
जीअ प्रान भगतन आधार ॥2॥
घट घट अंतरि सगल प्रगास ॥
जपि जपि जीवहि भगत गुणतास ॥
जा की सेव न बिरथी जाइ ॥
मन तन अंतरि एकु धिआइ ॥3॥
गुर उपदेसि दइआ संतोखु ॥
नामु निधानु निरमलु इहु थोकु ॥
करि किरपा लीजै लड़ि लाइ ॥
चरन कमल नानक नित धिआइ ॥4॥42॥55॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (गुरू की शरण की बरकति से) मैं दोनों हाथ जोड़ के (प्रभू के दर पे) अरजोई करता रहता हूँ। मेरी यह जिंद। मेरा यह शरीर यह धन- सब कुछ उस परमात्मा की बख्शी हुई पूँजी है। मेरा वह मालिक स्वयं ही सब कुछ कर सकने में समर्थ है। मैं करोड़ों बार उससे सदके जाता हूँ। 1। हे भाई ! गुरू की चरण-धूल (मनुष्य के जीवन को) पवित्र कर देती है। (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू का नाम सिमरने से (मनुष्य के) मन के विकार दूर हो जाते हैं। अनेकों जन्मों के (किए हुए कुकर्मों) की मैल उतर जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू की शरण में आ के ही ये समझ आती है कि) जिस परमात्मा के घर में सारे खजाने हैं। जिसकी सेवा-भक्ति करने से (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है। वह परमात्मा (जीवों की) सारी आवश्यक्ताएं पूरी कर सकने वाला है। वह अपने भक्तों की जिंद का प्राणों का सहारा है। 2। हे भाई ! (गुरू की शरण में आ के ही ये समझ आती है कि) परमात्मा हरेक शरीर में बस रहा है। सब जीवों के अंदर (अपनी ज्योति का) प्रकाश करता है। उस गुणों के खजाने प्रभूका नाम जप-जप के उसके भगत आत्मिक जीवन हासिल करते हैं। हे भाई ! जिस प्रभू की की हुई भगती व्यर्थ नहीं जाती। आप अपने मन में अपने तन में उस एक का नाम सिमरा कर। 3। हे भाई ! गुरू की शिक्षा पर चलने से (मनुष्य के हृदय में) दया पैदा होती है संतोष पैदा होता है। नाम-खजाना प्रकट हो जाता है। यह (नाम-खजाना ऐसा) पदार्थ है कि यह जीवन को पवित्र कर देता है। हे नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास किया कर और कह- हे प्रभू !) मेहर कर के (मुझे अपने) पल्ले से लगाए रख। (मैं) आपके सुंदर चरणों का हमेशा ध्यान धरता रहूँ। 4। 42। 55।
भैरउ महला 5 ॥
सतिगुर अपुने सुनी अरदासि ॥
कारजु आइआ सगला रासि ॥
मन तन अंतरि प्रभू धिआइआ ॥
गुर पूरे डरु सगल चुकाइआ ॥1॥
सभ ते वड समरथ गुरदेव ॥
सभि सुख पाई तिस की सेव ॥ रहाउ ॥
जा का कीआ सभु किछु होइ ॥
तिस का अमरु न मेटै कोइ ॥
पारब्रहमु परमेसरु अनूपु ॥
सफल मूरति गुरु तिस का रूपु ॥2॥
जा कै अंतरि बसै हरि नामु ॥
जो जो पेखै सु ब्रहम गिआनु ॥
बीस बिसुए जा कै मनि परगासु ॥
तिसु जन कै पारब्रहम का निवासु ॥3॥
तिसु गुर कउ सद करी नमसकार ॥
तिसु गुर कउ सद जाउ बलिहार ॥
सतिगुर के चरन धोइ धोइ पीवा ॥
गुर नानक जपि जपि सद जीवा ॥4॥43॥56॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! प्यारे गुरू ने (जिस मनुष्य की) विनती सुन ली। उसका (हरेक) काम मुकम्मल तौर पर सफल हो जाता है। वह मनुष्य अपने मन में अपने हृदय में परमात्मा का ध्यान धरता रहता है। पूरा गुरू उसका (हरेक) डर सारे का सारा दूर कर देता है। 1। हे भाई ! गुरू सब (देवताओं) से बहुत बड़ी ताकत वाला है। मैं (तो) उस (गुरू) की शरण पड़ कर सारे सुख प्राप्त कर रहा हूँ। रहाउ। हे भाई ! (जगत में) जिस (परमात्मा) का किया हुआ ही हरेक काम हो रहा है। उस (परमात्मा) का हुकम कोई जीव मोड़ नहीं सकता। वह प्रभू परमेश्वर (ऐसा है कि उस) जैसा और कोई नहीं। उसके स्वरूप का दीदार सारे मनोरथ पूरे करता है। हे भाई ! गुरू उस परमात्मा का रूप है। 2। हे भाई ! (गुरू के द्वारा) जिस (मनुष्य) के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। (वह मनुष्य जगत में) जो कुछ भी देखता है वह (देखा हुआ पदार्थ उसकी) परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनाता है। हे भाई ! (गुरू के द्वारा) जिस मनुष्य के मन में आत्मिक जीवन का मुकम्मल प्रकाश हो जाता है। उस मनुष्य के अंदर परमात्मा का निवास हो जाता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) उस गुरू को मैं सदा सिर झुकाता रहता हूँ उस गुरू से मैं सदा कुर्बान जाता हूँ। मैं उस गुरू के चरण धो धो के पीता हूँ (भाव। मैं उस गुरू से अपना आपा सदके करता हूँ)। उस गुरू को सदा चेते करके मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहता हूँ। 4। 43। 56।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! संतजनों पर दूषण लगाने वालों की बात को कोई भी मनुष्य सच नहीं मानता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।