लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1151 · भैरों

इस पृष्ठ पर
अंग
1151
भैरों
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. भै भ्रम बिनसि गए खिन माहि ॥
  2. भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥
  3. पंच मजमी जो पंचन राखै ॥
  4. निंदक कउ फिटके संसारु ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

भै भ्रम बिनसि गए खिन माहि ॥

अंग 1150 से चला आ रहा अंश

भै भ्रम बिनसि गए खिन माहि ॥
पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥1॥
राम राम संत सदा सहाइ ॥
घरि बाहरि नाले परमेसरु रवि रहिआ पूरन सभ ठाइ ॥1॥ रहाउ ॥
धनु मालु जोबनु जुगति गोपाल ॥
जीअ प्राण नित सुख प्रतिपाल ॥
अपने दास कउ दे राखै हाथ ॥
निमख न छोडै सद ही साथ ॥2॥
हरि सा प्रीतमु अवरु न कोइ ॥
सारि सम॑ाले साचा सोइ ॥
मात पिता सुत बंधु नराइणु ॥
आदि जुगादि भगत गुण गाइणु ॥3॥
तिस की धर प्रभ का मनि जोरु ॥
एक बिना दूजा नही होरु ॥
नानक कै मनि इहु पुरखारथु ॥
प्रभू हमारा सारे सुआरथु ॥4॥38॥51॥

हिन्दी अर्थ: एक छिन में उसके सारे डर-सहम दूर हो जाते हैं। हे भाई ! (जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा आ बसता है 1। (वह) परमात्मा अपने संत जनों का सदा मददगार है। हे भाई ! (जो) परमात्मा सब जगह पूरन तौर पर मौजूद है। घर में घर से बाहर हर जगह (संतजनों के साथ) होता है। 1। रहाउ। (सेवक के लिए भी) परमात्मा का नाम ही धन है। नाम ही माल है। नाम ही जवानी है और नाम जपना ही जीने की सुचॅजी जुगति है। हे भाई ! परमात्मा सेवक की जिंद की पालना करता है। सदा उसके प्राणों की रक्षा करता है। उसको सारे सुख देता है। अपने सेवक को हाथ दे के बचाता है। हे भाई ! परमात्मा आँख झपकने जितने समय के लिए भी अपने सेवक का साथ नहीं छोड़ता। सदा उसके साथ रहता है। 2। हे भाई ! परमात्मा जैसा प्यार करने वाला और कोई नहीं। वह सदा-स्थिर प्रभू बड़े ध्यान से (अपने भक्तों की) संभाल करता है। उनके लिए परमात्मा ही माँ है। परमात्मा ही पिता है। परमात्मा ही पुत्र है परमात्मा ही सम्बंधी है। हे भाई ! जगत के शुरू से जुगों के आरम्भ से भगत परमात्मा के गुणों का गायन करते आ रहे हैं। 3। हे भाई ! भगत जनों के मन में परमात्मा का ही आसरा है परमात्मा का ही ताण है। उस एक के सिवा दूसरा अन्य कोई नहीं। नानक के मन में (भी) यही पुरुषार्थ है कि परमात्मा हमारे हरेक काम सँवारता है। 4। 38। 51।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥

भैरउ महला 5 ॥
भै कउ भउ पड़िआ सिमरत हरि नाम ॥
सगल बिआधि मिटी त्रिहु गुण की दास के होए पूरन काम ॥1॥ रहाउ ॥
हरि के लोक सदा गुण गावहि तिन कउ मिलिआ पूरन धाम ॥
जन का दरसु बांछै दिन राती होइ पुनीत धरम राइ जाम ॥1॥
काम क्रोध लोभ मद निंदा साधसंगि मिटिआ अभिमान ॥
ऐसे संत भेटहि वडभागी नानक तिन कै सद कुरबान ॥2॥39॥52॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से डर को भी डर पड़ जाता है (डर सिमरन करने वाले के नजदीक नहीं जाता)। माया के तीनों ही गुणों से पैदा होने वाली हरेक बिमारी (भगत-जन के अंदर से) दूर हो जाती है। प्रभू के सेवक के सारे काम सफल होते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के भक्त सदा परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। उनको सर्व-व्यापक प्रभू के चरणों में ठिकाना मिला रहता है। हे भाई ! धर्मराज जम राज भी दिन-रात परमात्मा के भगत का दर्शन करने की अभिलाषा रखता है (क्योंकि उस दर्शन से वह) पवित्र हो सकता है। 1। हे भाई ! गुरमुखों की संगति में रहने से काम क्रोध लोभ मोह अहंकार (हरेक विकार मनुष्य के अंदर से) खत्म हो जाता है। पर ऐसे संत जन बड़े भाग्यों से ही मिलते हैं। हे नानक ! (कह-) मैं उन संतजनों से सदा सदके जाता हूँ। 2। 39। 52।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

पंच मजमी जो पंचन राखै ॥

भैरउ महला 5 ॥
पंच मजमी जो पंचन राखै ॥
मिथिआ रसना नित उठि भाखै ॥
चक्र बणाइ करै पाखंड ॥
झुरि झुरि पचै जैसे त्रिअ रंड ॥1॥
हरि के नाम बिना सभ झूठु ॥
बिनु गुर पूरे मुकति न पाईऐ साची दरगहि साकत मूठु ॥1॥ रहाउ ॥
सोई कुचीलु कुदरति नही जानै ॥
लीपिऐ थाइ न सुचि हरि मानै ॥
अंतरु मैला बाहरु नित धोवै ॥
साची दरगहि अपनी पति खोवै ॥2॥
माइआ कारणि करै उपाउ ॥
कबहि न घालै सीधा पाउ ॥
जिनि कीआ तिसु चीति न आणै ॥
कूड़ी कूड़ी मुखहु वखाणै ॥3॥
जिस नो करमु करे करतारु ॥
साधसंगि होइ तिसु बिउहारु ॥
हरि नाम भगति सिउ लागा रंगु ॥
कहु नानक तिसु जन नही भंगु ॥4॥40॥53॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ वह मनुष्य (दरअसल कामादिक) पाँच पीरों का उपासक होता है क्योंकि वह इन पाँचों को (अपने हृदय में) संभाल के रखता है। और सदा गिन-मिथ के अपनी जीभ से झूठ बोलता रहता है। 1। हे भाई ! (नाम सिमरन को छोड़ के जो मनुष्य शरीर पर) गणेश आदि का निशान बना के अपने धर्मी होने का दिखावा करता है। वह (असल में) अंदर-अंदर से माया की खातिर तरले ले-ले के जलता रहता है। जैसे विधवा स्त्री (पति के बिना सदा दुखी रहती है)। हे भाई ! परमात्मा के नाम सिमरन के बिना (और) सारी (दिखावे वाली धार्मिक क्रिया) झूठा उद्यम है। पूरे गुरू की शरण पड़े बिना विकारों से निजात नहीं मिलती। सदा कायम रहने वाले परमात्मा से टूटे हुए मनुष्यों का ठॅगी-ठोरी का पाज़ चल नहीं सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! असल में वही मनुष्य कुचील रहन-सहन वाला है जो इस सारी रचना में (इसके कारतार सृजनहार को बसता) नहीं पहचान सकता। अगर बाहर से चौका लीपा-पोता जाए। (तो उस बाहरी स्वच्छता को) परमात्मा स्वच्छ नहीं समझता। जिस मनुष्य का हृदय तो विकारों से गंदा होया हुआ है। पर वह अपने शरीर को (स्वच्छता। सुचि की खातिर) सदा धोता रहता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में अपनी इज्जत गवा लेता है। 2। हे भाई ! (अपने धर्मी होने का दिखावा करने वाले मनुष्य अंदर से) माया इकट्ठी करने की खातिर (भेष और स्वच्छता आदि का) प्रयास करता है (आडंबर करता है)। पर (पवित्र जीवन वाले रास्ते पर) कभी भी सीधा पैर नहीं रखता। जिस परमात्मा ने पैदा किया है। उसको अपने चित्त में नहीं बसाता। (हाँ) झूठ-मूठ (लोगों को ठगने के लिए अपने) मुँह से (राम-राम) उचारता रहता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य पर करतार-सृजनहार मेहर करता है। साध-संगति में उस मनुष्य का उठना-बैठना हो जाता है। परमात्मा के नाम से परमात्मा की भक्ति से उसका प्रेम बन जाता है। हे नानक ! उस मनुष्य को (आत्मिक आनंद में कभी) कमी नहीं आती। 4। 40। 53।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

निंदक कउ फिटके संसारु ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

भैरउ महला 5 ॥
निंदक कउ फिटके संसारु ॥
निंदक का झूठा बिउहारु ॥
निंदक का मैला आचारु ॥
दास अपुने कउ राखनहारु ॥1॥
निंदकु मुआ निंदक कै नालि ॥
पारब्रहम परमेसरि जन राखे निंदक कै सिरि कड़किओ कालु ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! संत जनों पर दूषण लगाने वाले मनुष्य को सारा जगत घिक्कारता है (क्योंकि जगत जानता है कि) तोहमतें लगाने वाले का ये व्यवहार (कसब) झूठा है। हे भाई ! (दूषण लगा-लगा के) दूषण लग्राने वाला का अपना आचरण ही गंदा हो जाता है। पर परमात्मा अपने सेवक को (विकारों में गिरने से) स्वयं बचाए रखता है। 1। हे भाई ! (संतजनों पर) दूषण लगाने वाला मनुष्य तोहमत लगाने वाले की सोहबत (संगति) में रह के आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। प्रभू-परमेश्वर ने (विकारों में गिरने से सदा ही अपने) सेवकों की रक्षा की है। पर उन पर तोहमतें लगाने वालों के सिर पर आत्मिक मौत (सदा) गरजती रहती है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1151 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।