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अंग 1148

अंग
1148
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरमुखि जपिओ हरि का नाउ ॥
बिसरी चिंत नामि रंगु लागा ॥
जनम जनम का सोइआ जागा ॥1॥
करि किरपा अपनी सेवा लाए ॥
साधू संगि सरब सुख पाए ॥1॥ रहाउ ॥
रोग दोख गुर सबदि निवारे ॥
नाम अउखधु मन भीतरि सारे ॥
गुर भेटत मनि भइआ अनंद ॥
सरब निधान नाम भगवंत ॥2॥
जनम मरण की मिटी जम त्रास ॥
साधसंगति ऊंध कमल बिगास ॥
गुण गावत निहचलु बिस्राम ॥
पूरन होए सगले काम ॥3॥
दुलभ देह आई परवानु ॥
सफल होई जपि हरि हरि नामु ॥
कहु नानक प्रभि किरपा करी ॥
सासि गिरासि जपउ हरि हरी ॥4॥29॥42॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपना शुरू कर दिया। (उसके मन की) चिंता समाप्त हो गई। परमात्मा के नाम में उसका प्यार बन गया। अनेकों जन्मों के माया के मोह की नींद में सोया हुआ अब वह जाग गया (उसको जीवन-जुगति की समझ आ गई)। 1। हे भाई ! मेहर करके परमात्मा (जिस मनुष्य को) अपनी सेवा-भक्ति में जोड़ता है। वह मनुष्य संगत में टिक के सारे आत्मिक आनंद पाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के (अपने मन में से) रोग और विकार दूर कर लिए। जो मनुष्य नाम-औषधि अपने मन में संभाल के रखता है। गुरू को मिल के उसके मन में आनंद बन आता है। हे भाई ! भगवान का नाम सारे सुखों का खजाना है। 2। हे भाई ! (मेहर करके प्रभू जिस मनुष्य को अपनी सेवा-भगती में जोड़ता है। उसके मन में से) जनम-मरण के चक्करों का सहम जम-राज का डर मिट जाता है। साध-संगति की बरकति से उसका (पहले माया केमोह की ओर) उल्टा हुआ कमल-हृदय खिल उठता है। परमात्मा के गुण गाते हुए (उसको वह आत्मिक) ठिकाना (मिल जाता है जो माया के हमलों के मुकाबले पर) अडोल रहता है। उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। 3। उस का यह दुर्लभ शरीर (लोक-परलोक में) कबूल हो जाता है। हे भाई ! (मेहर करके प्रभू जिस मनुष्य को अपनी सेवा-भगती में जोड़ता है) परमात्मा का नाम सदा जपके उस का आया सफल हो जाता है हे नानक ! कह- (हे भाई !) प्रभू ने (मेरे पर) मेहर की है। मैं भी हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ उसका नाम जप रहा हॅूँ। 4। 29। 42।
भैरउ महला 5 ॥
सभ ते ऊचा जा का नाउ ॥
सदा सदा ता के गुण गाउ ॥
जिसु सिमरत सगला दुखु जाइ ॥
सरब सूख वसहि मनि आइ ॥1॥
सिमरि मना तू साचा सोइ ॥
हलति पलति तुमरी गति होइ ॥1॥ रहाउ ॥
पुरख निरंजन सिरजनहार ॥
जीअ जंत देवै आहार ॥
कोटि खते खिन बखसनहार ॥
भगति भाइ सदा निसतार ॥2॥
साचा धनु साची वडिआई ॥
गुर पूरे ते निहचल मति पाई ॥
करि किरपा जिसु राखनहारा ॥
ता का सगल मिटै अंधिआरा ॥3॥
पारब्रहम सिउ लागो धिआन ॥
पूरन पूरि रहिओ निरबान ॥
भ्रम भउ मेटि मिले गोपाल ॥
नानक कउ गुर भए दइआल ॥4॥30॥43॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस परमात्मा की वडिआई सबसे ऊँची है। आप सदा ही उसके गुण गाया कर। जिसका सिमरन करते हुए सारे दुख दूर हैं जाते हैं और सारे आनंद मन में आ बसते हैं। 1। हे (मेरे) मन ! आप उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को ही सिमरा कर (सिमरन की बरकति से) इस लोक में और परलोक में आपकी ऊँची आत्मिक अवस्था बनी रहेगी। 1। रहाउ। हे मन ! (आप सदा उस सदा-स्थिर प्रभूका सिमरन किया कर) जो सर्व-व्यापक है। जो माया के मोह की कालिख़ से रहित है। जो सबको पैदा करने वाला है। जो सब जीवों को खाने के लिए ख़ुराक देता है। जो (जीवों के) करोड़ों पाप एक छिन में बख्श सकने वाला है। जो उन जीवों को सदा संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है जो प्रेम में टिक के उसकी भक्ति करते हैं। 2। उसको सदा कायम रहने वाला नाम-धन मिल गया। उसको सदा-स्थिर रहने वाली (लोक-परलोक की) शोभा मिल गई। हे भाई ! जिस मनुष्य ने पूरे गुरू से विकारों से अडोल रहने वाली सिमरन की मति प्राप्त कर ली। हे भाई ! रक्षा करने वाला प्रभू जिस मनुष्य को मेहर कर के (सिमरन की दाति देता है) उसके अंदर से माया के मोह का सारा अंधेरा दूर हो जाता है। 3। उसकी सुरति परमात्मा के चरणों में जुड़ी रहती है। उसको वासना-रहित प्रभू हर जगह बसता दिखाई देता है (व्यापक दिखता है)। वह मनुष्य (अपने अंदर से) हरेक किस्म की भटकना और डर मिटा के सृष्टि के पालक प्रभू को मिल जाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर सतिगुरू जी दयावान होते हैं। 4। 30। 43।
भैरउ महला 5 ॥
जिसु सिमरत मनि होइ प्रगासु ॥
मिटहि कलेस सुख सहजि निवासु ॥
तिसहि परापति जिसु प्रभु देइ ॥
पूरे गुर की पाए सेव ॥1॥
सरब सुखा प्रभ तेरो नाउ ॥
आठ पहर मेरे मन गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जो इछै सोई फलु पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
आवण जाण रहे हरि धिआइ ॥
भगति भाइ प्रभ की लिव लाइ ॥2॥
बिनसे काम क्रोध अहंकार ॥
तूटे माइआ मोह पिआर ॥
प्रभ की टेक रहै दिनु राति ॥
पारब्रहमु करे जिसु दाति ॥3॥
करन करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥
करि किरपा अपनी सेवा लाइ ॥
नानक दास तेरी सरणाइ ॥4॥31॥44॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से (मनुष्य के) मन में आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो जाती है (जिसका सिमरन करके सारे) कलेश मिट जाते हैं। सुखों में आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। वह परमात्मा जिस मनुष्य को (सिमरन की दाति) देता है उसी को मिलती है। (परमात्मा उस मनुष्य को) पूरे गुरू की सेवा में जोड़ देता है। 1। हे प्रभू ! आपका नाम सारे सुखों का मूल है। हे मेरे मन ! आठों पहर (हर वक्त) प्रभू के गुण गाया कर। 1। रहाउ। वह मनुष्य जो कुछ (परमात्मा से) माँगता है वही फल हासिल कर लेता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम (अपने) मन में बसाता है। प्रभू का ध्यान धर के उसके जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। भगती-भाव से प्रभू में सुरति जोड़ के 2। (उसके अंदर से) काम क्रोध अहंकार (ये सारे विकार) नाश हो जाते हैं। (उसके अंदर से) माया के मोह की तारें टूट जाती हैं। वह मनुष्य दिन-रात परमात्मा के ही आसरे रहता है हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य को (अपने नाम की) दाति देता है। 3। हे सब कुछ करने योग्य स्वामी ! हे जीवों से सब कुछ करा सकनेकी समर्थावाले स्वामी ! सब जीवों के दिल की जानने वाले ! हे मेहर कर के (मुझे) अपनी सेवा-भगती में जोड़े रख। हे नानक ! (प्रभू के दर पर अरदास किया कर और कहा कर- (मैं आपका) दास आपकी शरण आया हूँ। 4। 31। 44।
भैरउ महला 5 ॥
लाज मरै जो नामु न लेवै ॥
नाम बिहून सुखी किउ सोवै ॥
हरि सिमरनु छाडि परम गति चाहै ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जो परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। वह अपने आप में शर्म से हल्का पड़ जाता है (शर्म से मर जाए। जो नाम नहीं सिमरता)। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना मनुष्य सुख की नींद नहीं सो सकता। (जो मनुष्य) हरी-नाम का सिमरन छोड़ के सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था (हासिल करनी) चाहता है

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपना शुरू कर दिया।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।