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भैरों
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· शबद · राग भैरों
करि किरपा नानक सुखु पाए ॥4॥25॥38॥
करि किरपा नानक सुखु पाए ॥4॥25॥38॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कहें- हे प्रभू !) मेहर कर के (जिसको आप अपना नाम बख्शते हैं। वह मनुष्य) आत्मिक आनंद पाता है। 4। 25। 38।
· शबद · राग भैरों
तेरी टेक रहा कलि माहि ॥
भैरउ महला 5 ॥
तेरी टेक रहा कलि माहि ॥
तेरी टेक तेरे गुण गाहि ॥
तेरी टेक न पोहै कालु ॥
तेरी टेक बिनसै जंजालु ॥1॥
दीन दुनीआ तेरी टेक ॥
सभ महि रविआ साहिबु एक ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी टेक करउ आनंद ॥
तेरी टेक जपउ गुर मंत ॥
तेरी टेक तरीऐ भउ सागरु ॥
राखणहारु पूरा सुख सागरु ॥2॥
तेरी टेक नाही भउ कोइ ॥
अंतरजामी साचा सोइ ॥
तेरी टेक तेरा मनि ताणु ॥
ईहां ऊहां तू दीबाणु ॥3॥
तेरी टेक तेरा भरवासा ॥
सगल धिआवहि प्रभ गुणतासा ॥
जपि जपि अनदु करहि तेरे दासा ॥
सिमरि नानक साचे गुणतासा ॥4॥26॥39॥
तेरी टेक रहा कलि माहि ॥
तेरी टेक तेरे गुण गाहि ॥
तेरी टेक न पोहै कालु ॥
तेरी टेक बिनसै जंजालु ॥1॥
दीन दुनीआ तेरी टेक ॥
सभ महि रविआ साहिबु एक ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी टेक करउ आनंद ॥
तेरी टेक जपउ गुर मंत ॥
तेरी टेक तरीऐ भउ सागरु ॥
राखणहारु पूरा सुख सागरु ॥2॥
तेरी टेक नाही भउ कोइ ॥
अंतरजामी साचा सोइ ॥
तेरी टेक तेरा मनि ताणु ॥
ईहां ऊहां तू दीबाणु ॥3॥
तेरी टेक तेरा भरवासा ॥
सगल धिआवहि प्रभ गुणतासा ॥
जपि जपि अनदु करहि तेरे दासा ॥
सिमरि नानक साचे गुणतासा ॥4॥26॥39॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! इस विकार भरे जगत में मैं आपके आसरे ही जीवित हूँ। हे प्रभू ! (सब जीव) आपके ही सहारे हैं। आपके ही गुण गाते हैं। हे प्रभू !जिस मनुष्य को आपका आसरा है उस पर आत्मिक मौत अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। आपके आसरे (मनुष्य की) माया के मोह का फंदा टूट जाता है। 1। हे प्रभू ! इस लोक में और परलोक में (हम जीवों को) आपका ही सहारा है। हे भाई ! सारी सृष्टि में मालिक प्रभू ही व्यापक है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मैं आपके नाम का आसरा ले के ही आत्मिक आनंद पाता हूँ और गुरू का दिया हुआ आपका नाम-मंत्र जपता रहता हूँ। हे प्रभू !आपके (नाम के) सहारे संसार-समुंद्र से पार लांघ जाया जाता है। आप सबकी रक्षा करने के समर्थ हैं। आप सारे सुखों का (मानो) समुंद्र हैं। 2। हे प्रभू ! जिस को आपके नाम का आसरा है उसको कोई डर व्याप नहीं सकता। हे भाई ! वह सदा कायम रहने वाला प्रभू ही सब के दिल की जानने वाला है। हे प्रभू ! सब जीवों को आपका ही आसरा है। सबके मन में आपके नाम का ही सहारा है। इस लोक में और परलोक में आप ही जीवों का आसरा हैं। 3। हे गुणों के खजाने प्रभू ! (हम जीवों को) आपकी ही टेक है आपका ही आसरा है। सब जीव आपका ही ध्यान धरते हैं। आपके दास आपका नाम जप-जप के आत्मिक आनंद पाते हैं। हे नानक ! (आप भी) सदा कायम रहने वाले और गुणों के खजाने प्रभू का नाम सिमरा करें। 4। 26। 39।
· शबद · राग भैरों
प्रथमे छोडी पराई निंदा ॥
भैरउ महला 5 ॥
प्रथमे छोडी पराई निंदा ॥
उतरि गई सभ मन की चिंदा ॥
लोभु मोहु सभु कीनो दूरि ॥
परम बैसनो प्रभ पेखि हजूरि ॥1॥
ऐसो तिआगी विरला कोइ ॥
हरि हरि नामु जपै जनु सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
अहंबुधि का छोडिआ संगु ॥
काम क्रोध का उतरिआ रंगु ॥
नाम धिआए हरि हरि हरे ॥
साध जना कै संगि निसतरे ॥2॥
बैरी मीत होए संमान ॥
सरब महि पूरन भगवान ॥
प्रभ की आगिआ मानि सुखु पाइआ ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥3॥
करि किरपा जिसु राखै आपि ॥
सोई भगतु जपै नाम जाप ॥
मनि प्रगासु गुर ते मति लई ॥
कहु नानक ता की पूरी पई ॥4॥27॥40॥
प्रथमे छोडी पराई निंदा ॥
उतरि गई सभ मन की चिंदा ॥
लोभु मोहु सभु कीनो दूरि ॥
परम बैसनो प्रभ पेखि हजूरि ॥1॥
ऐसो तिआगी विरला कोइ ॥
हरि हरि नामु जपै जनु सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
अहंबुधि का छोडिआ संगु ॥
काम क्रोध का उतरिआ रंगु ॥
नाम धिआए हरि हरि हरे ॥
साध जना कै संगि निसतरे ॥2॥
बैरी मीत होए संमान ॥
सरब महि पूरन भगवान ॥
प्रभ की आगिआ मानि सुखु पाइआ ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥3॥
करि किरपा जिसु राखै आपि ॥
सोई भगतु जपै नाम जाप ॥
मनि प्रगासु गुर ते मति लई ॥
कहु नानक ता की पूरी पई ॥4॥27॥40॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ (वह मनुष्य बाहर की स्वच्छता की जगह अंदर की पवित्रता कायम रख सकने के लिए) सबसे पहले दूसरों के ऐब ढूँढने छोड़ देता है (इस तरह उसके अपने) मन की सारी चिंता उतर जाती है (मन से विकारों का चिंतन उतर जाता है)। वह मनुष्य (अपने अंदर से) लोभ और मोह सारे का सारा दूर कर देता है। हे भाई ! परमात्मा को अंग-संग बसता देख के (मनुष्य) सबसे ऊँचा वैष्णव बन जाता है। 1। हे भाई ! (इस तरह का वैष्णव ही असल त्यागी है। पर) ऐसा त्यागी (जगत में) कोई विरला मनुष्य ही होता है। वही मनुष्य (सही अर्थों में) परमात्मा का नाम जपता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को हाज़र-नाज़र देख के असल वैष्णव बन जाता है। वह) अहंकार का साथ छोड़ देता है। (उसके मन से) काम और क्रोध का असर दूर हो जाता है। वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता है। हे भाई ! ऐसे मनुष्य साध-संगति में रह के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 2। हे भाई ! पूरे गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम पक्के तौर पर टिका दिया, उसने परमात्मा की रजा को मीठा जानकर सदा आत्मिक आनंद पाया है। उसको भगवान सब जीवों में व्यापक दिखाई देता है। इसीलिए उसको वैरी और मित्र एक समान (मित्र ही) दिखाई देते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा अपनी मेहर करके जिस मनुष्य की स्वयं रक्षा करता है। वही है असल भगत। वही उस के नाम का जाप जपता है। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू से (जीवन-जुगति की) शिक्षा ले ली उसके मन में (आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो गया। हे नानक ! कहें- उस मनुष्य का जीवन सफल हो गया। 4। 27। 40।
· शबद · राग भैरों
सुखु नाही बहुतै धनि खाटे ॥
भैरउ महला 5 ॥
सुखु नाही बहुतै धनि खाटे ॥
सुखु नाही पेखे निरति नाटे ॥
सुखु नाही बहु देस कमाए ॥
सरब सुखा हरि हरि गुण गाए ॥1॥
सूख सहज आनंद लहहु ॥
साधसंगति पाईऐ वडभागी गुरमुखि हरि हरि नामु कहहु ॥1॥ रहाउ ॥
बंधन मात पिता सुत बनिता ॥
बंधन करम धरम हउ करता ॥
बंधन काटनहारु मनि वसै ॥
तउ सुखु पावै निज घरि बसै ॥2॥
सभि जाचिक प्रभ देवनहार ॥
गुण निधान बेअंत अपार ॥
जिस नो करमु करे प्रभु अपना ॥
हरि हरि नामु तिनै जनि जपना ॥3॥
गुर अपने आगै अरदासि ॥
करि किरपा पुरख गुणतासि ॥
कहु नानक तुमरी सरणाई ॥
जिउ भावै तिउ रखहु गुसाई ॥4॥28॥41॥
सुखु नाही बहुतै धनि खाटे ॥
सुखु नाही पेखे निरति नाटे ॥
सुखु नाही बहु देस कमाए ॥
सरब सुखा हरि हरि गुण गाए ॥1॥
सूख सहज आनंद लहहु ॥
साधसंगति पाईऐ वडभागी गुरमुखि हरि हरि नामु कहहु ॥1॥ रहाउ ॥
बंधन मात पिता सुत बनिता ॥
बंधन करम धरम हउ करता ॥
बंधन काटनहारु मनि वसै ॥
तउ सुखु पावै निज घरि बसै ॥2॥
सभि जाचिक प्रभ देवनहार ॥
गुण निधान बेअंत अपार ॥
जिस नो करमु करे प्रभु अपना ॥
हरि हरि नामु तिनै जनि जपना ॥3॥
गुर अपने आगै अरदासि ॥
करि किरपा पुरख गुणतासि ॥
कहु नानक तुमरी सरणाई ॥
जिउ भावै तिउ रखहु गुसाई ॥4॥28॥41॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! बहुत धन कमाने से (आत्मिक) आनंद नहीं मिलता। नाटकों के नाच देखने से भी आत्मिक आनंद प्राप्त नहीं होता। हे भाई ! बहुत सारे देशों को जीत लेने से भी सुख नहीं मिलता। पर। हे भाई ! परमात्मा की सिफतसालाह करने से सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं। 1। हे भाई ! आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद पाएँ। (साध-संगति में) गुरू की शरण पड़ कर सदा परमात्मा का नाम जपें। पर हे भाई ! बड़ी किस्मत से ही साध-संगति मिलती है। 1। रहाउ। हे भाई ! माता। पिता। पुत्र, स्त्री (आदि सम्बंधी) माया के मोह के फंदे डालते हैं। (तीर्थ आदि मिथे हुए) धार्मिक कर्म भी फंदे पैदा करते हैं (क्योंकि इनके कारण मनुष्य) अहंकार करता है (कि मैंने तीर्थ यात्रा आदि कर्म किए हैं)। पर जब ये फंदे काट सकने वाला परमात्मा (मनुष्य के) मन में आ बसता है तब (माता-पिता-पुत्र-स्त्री आदि सम्बंधियों में रहते हुए ही) आत्मिक आनंद पाता है (क्योंकि तब मनुष्य) परमात्मा के चरणों में जुड़ा रहता है। 2। हे भाई ! सारे जीव सब कुछ दे सकने वाले प्रभू (के दर) के (ही) मंगते हैं। वह परमात्मा सारे गुणों का खजाना है। बेअंत है। उसकी हस्ती का परला छोर नहीं पाया जा सकता। हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्यारा प्रभू बख्शिश करता है। उसी ही मनुष्य ने सदा परमात्मा का नाम जपा है। 3। अपने गुरू के दर पे (सदा) अरजोई किया करें। और, हे सृष्टि के मालिक ! हे गुणों के खजाने अकाल पुरख ! नानक कहता है- मैं आपकी शरण आया हूँ। मेहर कर के जैसे आपकी रज़ा है वैसे मुझे (अपने चरणों में) रखें। 4। 28। 41।
· शबद · राग भैरों
गुर मिलि तिआगिओ दूजा भाउ ॥
भैरउ महला 5 ॥
गुर मिलि तिआगिओ दूजा भाउ ॥
गुर मिलि तिआगिओ दूजा भाउ ॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के (अपने अंदर से) माया का मोह छोड़ दिया।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1147 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।