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अंग 1149

अंग
1149
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मूल बिना साखा कत आहै ॥1॥
गुरु गोविंदु मेरे मन धिआइ ॥
जनम जनम की मैलु उतारै बंधन काटि हरि संगि मिलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
तीरथि नाइ कहा सुचि सैलु ॥
मन कउ विआपै हउमै मैलु ॥
कोटि करम बंधन का मूलु ॥
हरि के भजन बिनु बिरथा पूलु ॥2॥
बिनु खाए बूझै नही भूख ॥
रोगु जाइ तां उतरहि दूख ॥
काम क्रोध लोभ मोहि बिआपिआ ॥
जिनि प्रभि कीना सो प्रभु नही जापिआ ॥3॥
धनु धनु साध धंनु हरि नाउ ॥
आठ पहर कीरतनु गुण गाउ ॥
धनु हरि भगति धनु करणैहार ॥
सरणि नानक प्रभ पुरख अपार ॥4॥32॥45॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (उसकी यह चाहत व्यर्थ है।जैसे वृक्ष की) जड़ के बिना (उस पर) कोई टहनी। शाखा नहीं उगती। 1। हे मेरे मन ! गुरू को गोविंद को (सदा) सिमरा करो। (यह सिमरन) अनेकों जन्मों की (विकारों की) मैल दूर कर देता है। माया के मोह के फंदों को काट के (मनुष्य को) परमात्मा के साथ जोड़ देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! पत्थर (पत्थर-दिल मनुष्य) तीर्थ पर स्नान करके (आत्मिक) पवित्रता हासिल नहीं कर सकता। (उसके) मन को (यही) अहंकार की मैल चिपकी रहती है (कि मैं तीर्थ-यात्रा कर आया हूँ)। हे भाई ! (तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए धार्मिक कर्म मनुष्य के सिर पर) व्यर्थ के गठड़ी हैं । 2। हे भाई ! (भोजन) खाए बिना (पेट की) भूख (की आग) नहीं बुझती (रोग से पैदा हुए) शारीरिक दुख तब ही दूर होते हैं। अगर (अंदर से) रोग दूर हो जाए। वह सदा काम क्रोध लोभ मोह में फसा रहता है। हे भाई ! जिस परमात्मा ने पैदा किया है जो मनुष्य उसका नाम नहीं जपता। 3। हे भाई ! वे गुरमुख मनुष्य भाग्यशाली हैं। जो परमात्मा का नाम जपते हैं। जो आठों पहर परमात्मा की सिफत-सालाह करते हैं। परमात्मा के गुणों का गायन करते हैं। हे नानक ! जो मनुष्य बेअंत और सर्व-व्यापक प्रभू की शरण पड़े रहते हैं। उनके पास परमात्मा की भक्ति का धन सृजनहार के नाम का धन (सदा मौजूद) है। 4। 32। 45।
भैरउ महला 5 ॥
गुर सुप्रसंन होए भउ गए ॥
नाम निरंजन मन महि लए ॥
दीन दइआल सदा किरपाल ॥
बिनसि गए सगले जंजाल ॥1॥
सूख सहज आनंद घने ॥
साधसंगि मिटे भै भरमा अंम्रितु हरि हरि रसन भने ॥1॥ रहाउ ॥
चरन कमल सिउ लागो हेतु ॥
खिन महि बिनसिओ महा परेतु ॥
आठ पहर हरि हरि जपु जापि ॥
राखनहार गोविद गुर आपि ॥2॥
अपने सेवक कउ सदा प्रतिपारै ॥
भगत जना के सास निहारै ॥
मानस की कहु केतक बात ॥
जम ते राखै दे करि हाथ ॥3॥
निरमल सोभा निरमल रीति ॥
पारब्रहमु आइआ मनि चीति ॥
करि किरपा गुरि दीनो दानु ॥
नानक पाइआ नामु निधानु ॥4॥33॥46॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! सतिगुरू जिस मनुष्य पर बहुत प्रसन्न होता है। उसका हरेक डर दूर हो जाता है (क्योंकि) वह मनुष्य (हर वक्त) माया-रहित परमात्मा का नाम अपने मन में बसाए रखता है। हे भाई ! दीनों पर दया करने वाला प्रभू जिस मनुष्य पर कृपा करता है। (उसके अंदर से) माया के मोह के सारे बंधन नाश हो जाते हैं। 1। हे भाई ! साध-संगति में रह के जो मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम उचारता रहता है। उसके सारे डर-वहम दूर हो जाते हैं (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता के बड़े सुख-आनंद बने रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू के सुंदर चरणों से जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है। उसके अंदर से (खोटा स्वभाव रूपी) बड़ा प्रेत एक छिन में खत्म हो जाता है। हे भाई ! आप आठों पहर परमात्मा के नाम का जाप जपा कर। सबकी रक्षा कर सकने वाला गुरू गोविंद स्वयं (आपकी भी रक्षा करेगा)। 2। हे भाई ! प्रभू अपने सेवक की आप रक्षा करता है। प्रभू अपने भकतों की सांसों को ध्यान से देखता रहता है (भाव। बड़े ध्यान से भगत-जनों की रक्षा करता है)। हे भाई ! बता। मनुष्य बेचारे भगत-जनों का क्या बिगाड़ सकते हैं। परमात्मा तो उनको हाथ दे के जमों से भी बचा लेता है। 3। उसकी हर जगह बेदाग़ शोभा बनी रहती है। उसकी जीवन-जुगति सदा पवित्र होती है। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में चित्त में परमात्मा आ बसता है। हे नानक ! (कह-हे भाई !) मेहर करके गुरू ने जिस मनुष्य को (नाम की) दाति बख्शी। उसने नाम-खजाना हासिल कर लिया। 4। 33। 46।
भैरउ महला 5 ॥
करण कारण समरथु गुरु मेरा ॥
जीअ प्राण सुखदाता नेरा ॥
भै भंजन अबिनासी राइ ॥
दरसनि देखिऐ सभु दुखु जाइ ॥1॥
जत कत पेखउ तेरी सरणा ॥
बलि बलि जाई सतिगुर चरणा ॥1॥ रहाउ ॥
पूरन काम मिले गुरदेव ॥
सभि फलदाता निरमल सेव ॥
करु गहि लीने अपुने दास ॥
राम नामु रिद दीओ निवास ॥2॥
सदा अनंदु नाही किछु सोगु ॥
दूखु दरदु नह बिआपै रोगु ॥
सभु किछु तेरा तू करणैहारु ॥
पारब्रहम गुर अगम अपार ॥3॥
निरमल सोभा अचरज बाणी ॥
पारब्रहम पूरन मनि भाणी ॥
जलि थलि महीअलि रविआ सोइ ॥
नानक सभु किछु प्रभ ते होइ ॥4॥34॥47॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! मेरा गुरू-परमेश्वर सारी सृष्टि का मूल है। सब ताकतों का मालिक है। (सबको) जिंद देने वाला है। प्राण देने वाला है। सारे सुख देने वाला है। (सबके) नजदीक (बसता है)। हे भाई ! वह पातिशाह (जीवों के सारे) डर दूर करने वाला है। वह स्वयं नाश रहित है। अगर उसके दर्शन हो जाएं। (तो मनुष्य का) सारा दुख दूर हो जाता है। 1। हे प्रभू ! मैं (अपने) गुरू के चरणों से सदा सदके जाता हूँ (जिसने मुझे आपके चरणों में जोड़ा है। अब) मैं हर जगह आपका ही आसरा देखता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरदेव-प्रभू को मिल के सारी कामनाएं पूरी हो जाती हैं। वह प्रभू सारे फल देने वाला है। उसकी सेवा-भक्ति जीवन पवित्र कर देती है। हे भाई !प्रभू अपने दासों का हाथ पकड़ के उनको अपने बना लेता है। और उनके हृदय में अपना नाम टिका देता है। 2। जिसके हृदय में आप अपना नाम टिकाता है (उसके अंदर) सदा आनंद बना रहता है। उसको कोई ग़म (छू नहीं सकता)। कोई दुख कोई दर्द कोई रोग उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। (जो कुछ दिखाई दे रहा है। यह) सब कुछ आपका पैदा किया हुआ है। आप ही सब कुछ पैदा करने की समर्था वाला है। हे गुरू-पारब्रहम ! हे अपहुँच ! हे बेअंत ! 3। हे भाई !सर्व-व्यापक परमात्मा की विस्माद पैदा करने वालीसिफत-सालाह जिस मनुष्य के मन को मीठी लगने लग जाती है। उसकी बे-दाग़ शोभा (हर जगह पसर जाती है)। हे नानक ! वह प्रभू जल में धरती में आकाश में हर जगह मौजूद है (जो कुछ जगत में हो रहा है) सब कुछ प्रभू से (प्रभूके हुकम से ही) हो रहा है। 4। 34। 47।
भैरउ महला 5 ॥
मनु तनु राता राम रंगि चरणे ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ उसका मन उसका तन परमात्मा के चरणों के प्यार में मस्त रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।