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अंग 1146

अंग
1146
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भैरउ महला 5 ॥
निरधन कउ तुम देवहु धना ॥
अनिक पाप जाहि निरमल मना ॥
सगल मनोरथ पूरन काम ॥
भगत अपुने कउ देवहु नाम ॥1॥
सफल सेवा गोपाल राइ ॥
करन करावनहार सुआमी ता ते बिरथा कोइ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रोगी का प्रभ खंडहु रोगु ॥
दुखीए का मिटावहु प्रभ सोगु ॥
निथावे कउ तुम॑ थानि बैठावहु ॥
दास अपने कउ भगती लावहु ॥2॥
निमाणे कउ प्रभ देतो मानु ॥
मूड़ मुगधु होइ चतुर सुगिआनु ॥
सगल भइआन का भउ नसै ॥
जन अपने कै हरि मनि बसै ॥3॥
पारब्रहम प्रभ सूख निधान ॥
ततु गिआनु हरि अंम्रित नाम ॥
करि किरपा संत टहलै लाए ॥
नानक साधू संगि समाए ॥4॥23॥36॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आप (जिस) कंगाल को (अपना नाम-) धन देता है। उसके अनेकों पाप दूर हैं जाते हैं। उसका मन पवित्र हो जाता है। उसकी सारी माँगें पूरी हो जाती हैं। उसके सारेकाम सफल हो जाते हैं। हे प्रभू ! आप अपने भगत को (स्वयं ही) अपना नाम देता है। 1। हे भाई ! सृष्टि के मालिक-प्रभू-पातिशाह की भक्ति (सदा) फल दायक है। वह मालिक-प्रभू सब कुछ कर सकने की समर्था वाला है और जीवों से सब कुछ करवा सकता है। उसके दर से कोई खाली नहीं जाता। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप (अपना नाम-दारू दे के) रोगी का रोग नाश कर देता है। दुखिए का ग़म मिटा देता है। जिसको कहीं भी सहारा नहीं मिलता आप उसको (अपना नाम बख्श के) आदर वाली जगह पर बैठा देता है। हे प्रभू ! अपने सेवक को आप स्वयं ही अपनी भक्ति में जोड़ता है। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को कहीं भी आदर-सत्कार नहीं मिलता। उसको आप (अपनी भक्ति की दाति दे के हर जगह) इज्जत बख्शता है। (आपकी भक्ति की बरकति से) महामूर्ख मनुष्य समझदार हैं जाता है ज्ञानवान हैं जाता है। (उसके मन में से) सारे डराने वाले डर दूर हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक के (सदा) मन में बसता है। 3। हे नानक ! परमेश्वर प्रभू सारें सुखों का खजाना है। उसका आत्मिक जीवन देने वाला नाम आत्मिक जीवन की सूझ देता है राज़ समझाता है। मेहर करके जिस मनुष्य को वह स्वयं संत जनों की सेवा में जोड़ता है। वह मनुष्य (सदा) साध-संगति में टिका रहता है। 4। 23। 36।
भैरउ महला 5 ॥
संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥
संत मंडल महि दुरतु सभु नसै ॥
संत मंडल महि निरमल रीति ॥
संतसंगि होइ एक परीति ॥1॥
संत मंडलु तहा का नाउ ॥
पारब्रहम केवल गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
संत मंडल महि जनम मरणु रहै ॥
संत मंडल महि जमु किछू न कहै ॥
संतसंगि होइ निरमल बाणी ॥
संत मंडल महि नामु वखाणी ॥2॥
संत मंडल का निहचल आसनु ॥
संत मंडल महि पाप बिनासनु ॥
संत मंडल महि निरमल कथा ॥
संतसंगि हउमै दुख नसा ॥3॥
संत मंडल का नही बिनासु ॥
संत मंडल महि हरि गुणतासु ॥
संत मंडल ठाकुर बिस्रामु ॥
नानक ओति पोति भगवानु ॥4॥24॥37॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! साध-संगति में (रहने से) परमात्मा (मनुष्य के) मनमें आ बसता है (प्रकट हो जाता है)। साध-संगति में टिकने से (हृदय में से) हरेककिस्म के पाप दूर हो जाते हैं। साध-संगति में रहने से (मनुष्य की) जीवन-जुगति विकारों की मैल से स्वच्छ रखने वाली बन जाती है। साध-संगति की बरकति से एक परमात्मा का प्यार (हृदय में पैदा) हो जाता है। 1। हे भाई ! साध-संगति उस जगह का नाम है जहाँ सिर्फ एक परमात्मा की सिफतसालाह होती है। 1। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में रहने से जनम-मरण (का चक्र) समाप्त हो जाता है। साध-संगतिमें रहने से जमराज कोई डरावा नहीं दे सकता (क्योंकि) साध-संगति में (जीवन को) पवित्र करने वाली बाणी का उच्चारण होता है। (वहाँ) परमात्मा का नाम (ही) उचारा जाता है। 2। हे भाई ! साध-संगति का ठिकाना (ऐसा है कि वहाँ टिकने वाले विकारों के हमलों से) अडोल (रहते हैं)। साध-संगति में रहने से (सारे) पापों का नाश हो जाता है। साध-संगति में परमात्मा की सिफत-सालाह होती रहती है जो (मनुष्य को) विकारों की मैल से बचाए रखती है। साध-संगति में रह के अहंकार (से पैदा होने वाले सारे) दुख दूर हो जाते हैं। 3। साध-संगति के वायु-मण्डल का कभी नाश नहीं होता। हे भाई ! साध-संगति में गुणों का खजाना परमात्मा (सदा) बसता है। हे नानक ! साध-संगति में सदा मालिक-प्रभू का निवास है। भगवान-प्रभू (साध-संगति में) ताने-पेटे की तरह मिला रहता है। 4। 24। 37।
भैरउ महला 5 ॥
रोगु कवनु जां राखै आपि ॥
तिसु जन होइ न दूखु संतापु ॥
जिसु ऊपरि प्रभु किरपा करै ॥
तिसु ऊपर ते कालु परहरै ॥1॥
सदा सखाई हरि हरि नामु ॥
जिसु चीति आवै तिसु सदा सुखु होवै निकटि न आवै ता कै जामु ॥1॥ रहाउ ॥
जब इहु न सो तब किनहि उपाइआ ॥
कवन मूल ते किआ प्रगटाइआ ॥
आपहि मारि आपि जीवालै ॥
अपने भगत कउ सदा प्रतिपालै ॥2॥
सभ किछु जाणहु तिस कै हाथ ॥
प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
दुख भंजनु ता का है नाउ ॥
सुख पावहि तिस के गुण गाउ ॥3॥
सुणि सुआमी संतन अरदासि ॥
जीउ प्रान धनु तुम॑रै पासि ॥
इहु जगु तेरा सभ तुझहि धिआए ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जब परमात्मा स्वयं (किसी मनुष्य की) रक्षा करता है। उसको कोई रोग व्याप नहीं सकता। कोई दुख कोई कलेश उसको छू नहीं सकता। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर करता है। उसके सिर पर से वह मौत (का डर। आत्मिक मौत) दूर कर देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही (मनुष्य का) सदा साथी है। जिस मनुष्य के चित्त में हरी-नाम आ बसता है। वह सदा आत्मिक आनंद माणता है। जमराज उसके नज़दीक नहीं आता (उसको मौत का डर नहीं रहता। आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती)। 1। रहाउ। हे भाई ! जब ये जीव पहले था ही नहीं। तब (परमात्मा के बिना और) किसने इसको पैदा कर सकना था। (देखो।) किस आदि से (पिता की बूँद से) इसकी कैसी सुंदर सूरत (परमात्मा ने) बना दी। हे भाई ! वह आप ही (जीव को) मारता है आप ही पैदा करता है। परमात्मा अपने भगत की रक्षा करता है। 2। हे भाई ! यह सच जानोकि हरेकताकत उस परमात्मा के हाथों में है। हे भाई ! वह प्यारा प्रभू अनाथों का नाथ है। उसका नाम ही है ‘दुख-भंजन’ (भाव। दुखों को नाश करने वाला)। हे भाई ! उसके गुण गाया कर। सारे सुख प्राप्त करेगा। 3। हे स्वामी ! आप अपने संतजनों की आरजू सुन लेता है। संत जन अपनी जिंद अपने प्राण अपना धन सब कुछ आपके हवाले करे रखते हैं। हे प्रभू ! यह सारा जगत आपका पैदा किया हुआ है। सारी लुकाई आपका ही ध्यान धरती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आप (जिस) कंगाल को (अपना नाम-) धन देता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।