निरधन कउ तुम देवहु धना ॥
अनिक पाप जाहि निरमल मना ॥
सगल मनोरथ पूरन काम ॥
भगत अपुने कउ देवहु नाम ॥1॥
सफल सेवा गोपाल राइ ॥
करन करावनहार सुआमी ता ते बिरथा कोइ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रोगी का प्रभ खंडहु रोगु ॥
दुखीए का मिटावहु प्रभ सोगु ॥
निथावे कउ तुम॑ थानि बैठावहु ॥
दास अपने कउ भगती लावहु ॥2॥
निमाणे कउ प्रभ देतो मानु ॥
मूड़ मुगधु होइ चतुर सुगिआनु ॥
सगल भइआन का भउ नसै ॥
जन अपने कै हरि मनि बसै ॥3॥
पारब्रहम प्रभ सूख निधान ॥
ततु गिआनु हरि अंम्रित नाम ॥
करि किरपा संत टहलै लाए ॥
नानक साधू संगि समाए ॥4॥23॥36॥
संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥
संत मंडल महि दुरतु सभु नसै ॥
संत मंडल महि निरमल रीति ॥
संतसंगि होइ एक परीति ॥1॥
संत मंडलु तहा का नाउ ॥
पारब्रहम केवल गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
संत मंडल महि जनम मरणु रहै ॥
संत मंडल महि जमु किछू न कहै ॥
संतसंगि होइ निरमल बाणी ॥
संत मंडल महि नामु वखाणी ॥2॥
संत मंडल का निहचल आसनु ॥
संत मंडल महि पाप बिनासनु ॥
संत मंडल महि निरमल कथा ॥
संतसंगि हउमै दुख नसा ॥3॥
संत मंडल का नही बिनासु ॥
संत मंडल महि हरि गुणतासु ॥
संत मंडल ठाकुर बिस्रामु ॥
नानक ओति पोति भगवानु ॥4॥24॥37॥
रोगु कवनु जां राखै आपि ॥
तिसु जन होइ न दूखु संतापु ॥
जिसु ऊपरि प्रभु किरपा करै ॥
तिसु ऊपर ते कालु परहरै ॥1॥
सदा सखाई हरि हरि नामु ॥
जिसु चीति आवै तिसु सदा सुखु होवै निकटि न आवै ता कै जामु ॥1॥ रहाउ ॥
जब इहु न सो तब किनहि उपाइआ ॥
कवन मूल ते किआ प्रगटाइआ ॥
आपहि मारि आपि जीवालै ॥
अपने भगत कउ सदा प्रतिपालै ॥2॥
सभ किछु जाणहु तिस कै हाथ ॥
प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
दुख भंजनु ता का है नाउ ॥
सुख पावहि तिस के गुण गाउ ॥3॥
सुणि सुआमी संतन अरदासि ॥
जीउ प्रान धनु तुम॑रै पासि ॥
इहु जगु तेरा सभ तुझहि धिआए ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आप (जिस) कंगाल को (अपना नाम-) धन देता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।