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भैरों
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· शबद · राग भैरों
निरधन कउ तुम देवहु धना ॥
भैरउ महला 5 ॥
निरधन कउ तुम देवहु धना ॥
अनिक पाप जाहि निरमल मना ॥
सगल मनोरथ पूरन काम ॥
भगत अपुने कउ देवहु नाम ॥1॥
सफल सेवा गोपाल राइ ॥
करन करावनहार सुआमी ता ते बिरथा कोइ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रोगी का प्रभ खंडहु रोगु ॥
दुखीए का मिटावहु प्रभ सोगु ॥
निथावे कउ तुम॑ थानि बैठावहु ॥
दास अपने कउ भगती लावहु ॥2॥
निमाणे कउ प्रभ देतो मानु ॥
मूड़ मुगधु होइ चतुर सुगिआनु ॥
सगल भइआन का भउ नसै ॥
जन अपने कै हरि मनि बसै ॥3॥
पारब्रहम प्रभ सूख निधान ॥
ततु गिआनु हरि अंम्रित नाम ॥
करि किरपा संत टहलै लाए ॥
नानक साधू संगि समाए ॥4॥23॥36॥
निरधन कउ तुम देवहु धना ॥
अनिक पाप जाहि निरमल मना ॥
सगल मनोरथ पूरन काम ॥
भगत अपुने कउ देवहु नाम ॥1॥
सफल सेवा गोपाल राइ ॥
करन करावनहार सुआमी ता ते बिरथा कोइ न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
रोगी का प्रभ खंडहु रोगु ॥
दुखीए का मिटावहु प्रभ सोगु ॥
निथावे कउ तुम॑ थानि बैठावहु ॥
दास अपने कउ भगती लावहु ॥2॥
निमाणे कउ प्रभ देतो मानु ॥
मूड़ मुगधु होइ चतुर सुगिआनु ॥
सगल भइआन का भउ नसै ॥
जन अपने कै हरि मनि बसै ॥3॥
पारब्रहम प्रभ सूख निधान ॥
ततु गिआनु हरि अंम्रित नाम ॥
करि किरपा संत टहलै लाए ॥
नानक साधू संगि समाए ॥4॥23॥36॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आप (जिस) कंगाल को (अपना नाम-) धन देते हैं। उसके अनेकों पाप दूर हो जाते हैं। उसका मन पवित्र हो जाता है। उसकी सारी माँगें पूरी हो जाती हैं। उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। हे प्रभू ! आप अपने भगत को (स्वयं ही) अपना नाम देते हैं। 1। हे भाई ! सृष्टि के मालिक-प्रभू-पातिशाह की भक्ति (सदा) फल दायक है। वह मालिक-प्रभू सब कुछ कर सकने की समर्थता वाला है और जीवों से सब कुछ करवा सकता है। उसके दर से कोई खाली नहीं जाता। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आप (अपना नाम-दारू दे के) रोगी का रोग नाश कर देते हैं। दुखिए का ग़म मिटा देते हैं। जिसको कहीं भी सहारा नहीं मिलता आप उसको (अपना नाम बख्श के) आदर वाली जगह पर बैठा देते हैं। हे प्रभू ! अपने सेवक को आप स्वयं ही अपनी भक्ति में जोड़ते हैं। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को कहीं भी आदर-सत्कार नहीं मिलता। उसको आप (अपनी भक्ति की दाति दे के हर जगह) इज्जत बख्शते हैं। (आपकी भक्ति की बरकति से) महामूर्ख मनुष्य समझदार हो जाता है ज्ञानवान हो जाता है। (उसके मन में से) सारे डराने वाले डर दूर हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक के (सदा) मन में बसता है। 3। हे नानक ! परमेश्वर प्रभू सारे सुखों का खजाना है। उसका आत्मिक जीवन देने वाला नाम आत्मिक जीवन की सूझ देता है राज़ समझाता है। मेहर करके जिस मनुष्य को वह स्वयं संत जनों की सेवा में जोड़ता है। वह मनुष्य (सदा) साध-संगति में टिका रहता है। 4। 23। 36।
· शबद · राग भैरों
संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥
भैरउ महला 5 ॥
संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥
संत मंडल महि दुरतु सभु नसै ॥
संत मंडल महि निरमल रीति ॥
संतसंगि होइ एक परीति ॥1॥
संत मंडलु तहा का नाउ ॥
पारब्रहम केवल गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
संत मंडल महि जनम मरणु रहै ॥
संत मंडल महि जमु किछू न कहै ॥
संतसंगि होइ निरमल बाणी ॥
संत मंडल महि नामु वखाणी ॥2॥
संत मंडल का निहचल आसनु ॥
संत मंडल महि पाप बिनासनु ॥
संत मंडल महि निरमल कथा ॥
संतसंगि हउमै दुख नसा ॥3॥
संत मंडल का नही बिनासु ॥
संत मंडल महि हरि गुणतासु ॥
संत मंडल ठाकुर बिस्रामु ॥
नानक ओति पोति भगवानु ॥4॥24॥37॥
संत मंडल महि हरि मनि वसै ॥
संत मंडल महि दुरतु सभु नसै ॥
संत मंडल महि निरमल रीति ॥
संतसंगि होइ एक परीति ॥1॥
संत मंडलु तहा का नाउ ॥
पारब्रहम केवल गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
संत मंडल महि जनम मरणु रहै ॥
संत मंडल महि जमु किछू न कहै ॥
संतसंगि होइ निरमल बाणी ॥
संत मंडल महि नामु वखाणी ॥2॥
संत मंडल का निहचल आसनु ॥
संत मंडल महि पाप बिनासनु ॥
संत मंडल महि निरमल कथा ॥
संतसंगि हउमै दुख नसा ॥3॥
संत मंडल का नही बिनासु ॥
संत मंडल महि हरि गुणतासु ॥
संत मंडल ठाकुर बिस्रामु ॥
नानक ओति पोति भगवानु ॥4॥24॥37॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! साध-संगति में (रहने से) परमात्मा (मनुष्य के) मन में आ बसता है (प्रकट हो जाता है)। साध-संगति में टिकने से (हृदय में से) हरेक किस्म के पाप दूर हो जाते हैं। साध-संगति में रहने से (मनुष्य की) जीवन-जुगति विकारों की मैल से स्वच्छ रखने वाली बन जाती है। साध-संगति की बरकति से एक परमात्मा का प्यार (हृदय में पैदा) हो जाता है। 1। हे भाई ! साध-संगति उस जगह का नाम है जहाँ सिर्फ एक परमात्मा की सिफतसालाह होती है। 1। रहाउ। हे भाई ! साध-संगति में रहने से जनम-मरण (का चक्र) समाप्त हो जाता है। साध-संगति में रहने से जमराज कोई डरावा नहीं दे सकता (क्योंकि) साध-संगति में (जीवन को) पवित्र करने वाली बाणी का उच्चारण होता है। (वहाँ) परमात्मा का नाम (ही) उचारा जाता है। 2। हे भाई ! साध-संगति का ठिकाना (ऐसा है कि वहाँ टिकने वाले विकारों के हमलों से) अडोल (रहते हैं)। साध-संगति में रहने से (सारे) पापों का नाश हो जाता है। साध-संगति में परमात्मा की सिफत-सालाह होती रहती है जो (मनुष्य को) विकारों की मैल से बचाए रखती है। साध-संगति में रह के अहंकार (से पैदा होने वाले सारे) दुख दूर हो जाते हैं। 3। साध-संगति के वायु-मण्डल का कभी नाश नहीं होता। हे भाई ! साध-संगति में गुणों का खजाना परमात्मा (सदा) बसता है। हे नानक ! साध-संगति में सदा मालिक-प्रभू का निवास है। भगवान-प्रभू (साध-संगति में) ताने-पेटे की तरह मिला रहता है। 4। 24। 37।
· शबद · राग भैरों
रोगु कवनु जां राखै आपि ॥
भैरउ महला 5 ॥
रोगु कवनु जां राखै आपि ॥
तिसु जन होइ न दूखु संतापु ॥
जिसु ऊपरि प्रभु किरपा करै ॥
तिसु ऊपर ते कालु परहरै ॥1॥
सदा सखाई हरि हरि नामु ॥
जिसु चीति आवै तिसु सदा सुखु होवै निकटि न आवै ता कै जामु ॥1॥ रहाउ ॥
जब इहु न सो तब किनहि उपाइआ ॥
कवन मूल ते किआ प्रगटाइआ ॥
आपहि मारि आपि जीवालै ॥
अपने भगत कउ सदा प्रतिपालै ॥2॥
सभ किछु जाणहु तिस कै हाथ ॥
प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
दुख भंजनु ता का है नाउ ॥
सुख पावहि तिस के गुण गाउ ॥3॥
सुणि सुआमी संतन अरदासि ॥
जीउ प्रान धनु तुम॑रै पासि ॥
इहु जगु तेरा सभ तुझहि धिआए ॥
रोगु कवनु जां राखै आपि ॥
तिसु जन होइ न दूखु संतापु ॥
जिसु ऊपरि प्रभु किरपा करै ॥
तिसु ऊपर ते कालु परहरै ॥1॥
सदा सखाई हरि हरि नामु ॥
जिसु चीति आवै तिसु सदा सुखु होवै निकटि न आवै ता कै जामु ॥1॥ रहाउ ॥
जब इहु न सो तब किनहि उपाइआ ॥
कवन मूल ते किआ प्रगटाइआ ॥
आपहि मारि आपि जीवालै ॥
अपने भगत कउ सदा प्रतिपालै ॥2॥
सभ किछु जाणहु तिस कै हाथ ॥
प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
दुख भंजनु ता का है नाउ ॥
सुख पावहि तिस के गुण गाउ ॥3॥
सुणि सुआमी संतन अरदासि ॥
जीउ प्रान धनु तुम॑रै पासि ॥
इहु जगु तेरा सभ तुझहि धिआए ॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जब परमात्मा स्वयं (किसी मनुष्य की) रक्षा करता है। उसको कोई रोग व्याप नहीं सकता। कोई दुख कोई कलेश उसको छू नहीं सकता। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर करता है। उसके सिर पर से वह मौत (का डर, आत्मिक मौत) दूर कर देता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही (मनुष्य का) सदा साथी है। जिस मनुष्य के चित्त में हरी-नाम आ बसता है। वह सदा आत्मिक आनंद माणता है। जमराज उसके नज़दीक नहीं आता (उसको मौत का डर नहीं रहता। आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती)। 1। रहाउ। हे भाई ! जब ये जीव पहले था ही नहीं। तब (परमात्मा के बिना और) किसने इसको पैदा कर सकना था। (देखें।) किस मूल से (पिता की बूँद से) इसकी कैसी सुंदर सूरत (परमात्मा ने) बना दी। हे भाई ! वह आप ही (जीव को) मारता है आप ही पैदा करता है। परमात्मा अपने भगत की रक्षा करता है। 2। हे भाई ! यह सच जानें कि हरेक ताकत उस परमात्मा के हाथों में है। हे भाई ! वह प्यारा प्रभू अनाथों का नाथ है। उसका नाम ही है 'दुख-भंजन' (भाव। दुखों को नाश करने वाला)। हे भाई ! उसके गुण गाया करें। सारे सुख प्राप्त करेंगे। 3। हे स्वामी ! आप अपने संतजनों की आरजू सुन लेते हैं। संत जन अपनी जिंद अपने प्राण अपना धन सब कुछ आपके हवाले करे रखते हैं। हे प्रभू ! यह सारा जगत आपका पैदा किया हुआ है। सारी लुकाई आपका ही ध्यान धरती है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1146 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।