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1145
भैरों
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· शबद · राग भैरों
दुखु सुखु हमरा तिस ही पासा ॥
दुखु सुखु हमरा तिस ही पासा ॥
राखि लीनो सभु जन का पड़दा ॥
नानकु तिस की उसतति करदा ॥4॥19॥32॥
राखि लीनो सभु जन का पड़दा ॥
नानकु तिस की उसतति करदा ॥4॥19॥32॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! दुख (से बचने के लिए। और) सुख (की प्राप्ति के लिए) हम जीवों की उसके पास ही (सदा अरदास) है। हे भाई ! अपने सेवक की इज्जत परमात्मा हर जगह रख लेता है। नानक उस की (ही सदा) सिफत-सालाह करता है। 4। 19। 32।
· शबद · राग भैरों
रोवनहारी रोजु बनाइआ ॥
भैरउ महला 5 ॥
रोवनहारी रोजु बनाइआ ॥
बलन बरतन कउ सनबंधु चिति आइआ ॥
बूझि बैरागु करे जे कोइ ॥
जनम मरण फिरि सोगु न होइ ॥1॥
बिखिआ का सभु धंधु पसारु ॥
विरलै कीनो नाम अधारु ॥1॥ रहाउ ॥
त्रिबिधि माइआ रही बिआपि ॥
जो लपटानो तिसु दूख संताप ॥
सुखु नाही बिनु नाम धिआए ॥
नाम निधानु बडभागी पाए ॥2॥
स्वांगी सिउ जो मनु रीझावै ॥
स्वागि उतारिऐ फिरि पछुतावै ॥
मेघ की छाइआ जैसे बरतनहार ॥
तैसो परपंचु मोह बिकार ॥3॥
एक वसतु जे पावै कोइ ॥
पूरन काजु ताही का होइ ॥
गुर प्रसादि जिनि पाइआ नामु ॥
नानक आइआ सो परवानु ॥4॥20॥33॥
रोवनहारी रोजु बनाइआ ॥
बलन बरतन कउ सनबंधु चिति आइआ ॥
बूझि बैरागु करे जे कोइ ॥
जनम मरण फिरि सोगु न होइ ॥1॥
बिखिआ का सभु धंधु पसारु ॥
विरलै कीनो नाम अधारु ॥1॥ रहाउ ॥
त्रिबिधि माइआ रही बिआपि ॥
जो लपटानो तिसु दूख संताप ॥
सुखु नाही बिनु नाम धिआए ॥
नाम निधानु बडभागी पाए ॥2॥
स्वांगी सिउ जो मनु रीझावै ॥
स्वागि उतारिऐ फिरि पछुतावै ॥
मेघ की छाइआ जैसे बरतनहार ॥
तैसो परपंचु मोह बिकार ॥3॥
एक वसतु जे पावै कोइ ॥
पूरन काजु ताही का होइ ॥
गुर प्रसादि जिनि पाइआ नामु ॥
नानक आइआ सो परवानु ॥4॥20॥33॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (किसी संबंधी के मरने से मायावी संबंधों के कारण ही) रोने वाली स्त्री (रोनेको) हर रोज नियम बनाए रखती है (क्योंकि उसको विछुड़े हुए संबंधी के साथ) वरतण-व्यवहार का संबंध याद आता रहता है। पर। अगर कोई प्राणी (यह) समझ के (कि ये मायावी संबंध सदा कायम नहीं रह सकते अपने अंदर) निर्मोहता पैदा कर ले। तो उसको (किसी के) जनम (की खुशी। और, किसी के) मरने का ग़म नहीं व्यापता। 1। हे भाई ! (जगत में) माया का ही सारा धंधा है। माया का ही सारा पसारा है। किसी विरले मनुष्य ने (माया का आसरा छोड़ के) परमात्मा के नाम का आसरा लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! यह त्रैगुणी माया (सारे जीवों पर अपना) जोर डाल रही है। जो मनुष्य (इस माया के साथ) चिपका रहता है। उसको (अनेकों) कलेश व्यापते रहते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरे बिना सुख हासिल नहीं होसकता। कोई विरला भाग्यशाली मनुष्य ही नाम-खजाना हासिल करता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य किसी स्वांगधारी (बहरूपिए। भेष करके दिखावा करने वाले) के साथ प्यार डाल लेता है। जब वह स्वांग उतार दिया जाता है तब वह (प्यार डालने वाला अस्लियत देख के) पछताता है। हे भाई ! जैसे बादलों की छाया (को ठहरी हुई छाया समझ के उसका) उपयोग करना है। वैसे ही यह जगत-पसारा मोह आदि विकारों का मूल है। 3। हे भाई ! अगर कोई मनुष्य परमात्मा का नाम खजाना हासिल कर ले। उसी का ही (जीवन का असल) काम सफल होता है। जिसने गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम हासिल कर लिया है। हे नानक ! जगत में पैदा हुआ वही मनुष्य (लोक-परलोक में) कबूल होता है 4। 20। 33।
· शबद · राग भैरों
संत की निंदा जोनी भवना ॥
भैरउ महला 5 ॥
संत की निंदा जोनी भवना ॥
संत की निंदा रोगी करना ॥
संत की निंदा दूख सहाम ॥
डानु दैत निंदक कउ जाम ॥1॥
संतसंगि करहि जो बादु ॥
तिन निंदक नाही किछु सादु ॥1॥ रहाउ ॥
भगत की निंदा कंधु छेदावै ॥
भगत की निंदा नरकु भुंचावै ॥
भगत की निंदा गरभ महि गलै ॥
भगत की निंदा राज ते टलै ॥2॥
निंदक की गति कतहू नाहि ॥
आपि बीजि आपे ही खाहि ॥
चोर जार जूआर ते बुरा ॥
अणहोदा भारु निंदकि सिरि धरा ॥3॥
पारब्रहम के भगत निरवैर ॥
सो निसतरै जो पूजै पैर ॥
आदि पुरखि निंदकु भोलाइआ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइआ ॥4॥21॥34॥
संत की निंदा जोनी भवना ॥
संत की निंदा रोगी करना ॥
संत की निंदा दूख सहाम ॥
डानु दैत निंदक कउ जाम ॥1॥
संतसंगि करहि जो बादु ॥
तिन निंदक नाही किछु सादु ॥1॥ रहाउ ॥
भगत की निंदा कंधु छेदावै ॥
भगत की निंदा नरकु भुंचावै ॥
भगत की निंदा गरभ महि गलै ॥
भगत की निंदा राज ते टलै ॥2॥
निंदक की गति कतहू नाहि ॥
आपि बीजि आपे ही खाहि ॥
चोर जार जूआर ते बुरा ॥
अणहोदा भारु निंदकि सिरि धरा ॥3॥
पारब्रहम के भगत निरवैर ॥
सो निसतरै जो पूजै पैर ॥
आदि पुरखि निंदकु भोलाइआ ॥
नानक किरतु न जाइ मिटाइआ ॥4॥21॥34॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! किसी गुरमुख के आचरण पर बेवजही दूषण लगाने से मनुष्य कई जूनियों में भटकता फिरता है। क्योंकि वह मनुष्य उन दुष्टों का जिकर करता-करता खुद ही अपने आप को उन दुष्टों का शिकार बना लेता है। (इसका नतीजा यह निकलता है कि यहाँ जगत में वह मनुष्य उस) निंदा के कारण (कई आत्मिक) दुख सहता रहता है (और आगे परलोक में भी) निंदक को जमराज सजा देता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के भक्त के साथ झगड़ा खड़ा किए रखते हैं। उन निंदकों को जीवन का कोई आत्मिक आनंद नहीं आता। 1। रहाउ। हे भाई ! किसी गुरमुख पर कीचड़ उछालने से मनुष्य अपने ही शरीर को उन दूषणों से परो लेता है (इस तरह) गुरमुख की निंदा (निंदा करने वाले को) नर्क (का दुख) भोगाती है। उस निंदा करने के कारण मनुष्य अनेकों जूनियों में गलता फिरता है। और उच्च आत्मिक पदवी से नीचे गिर जाता है। 2। हे भाई ! दूसरों पर सदा कीचड़ फेंकने वाले मनुष्य की अपनी ऊँची आत्मिक अवस्था कभी भी नहीं बनती (इस तरह निंदक। निंदा का यह बुरा बीज) बीज के खुद ही उसका फल खाता है। हे भाई ! निंदा करने वाला मनुष्य चोर से। व्यभचारी से जुआरी से भी बुरा साबित होता है। क्योंकि निंदक ने अपने सिर पर सदा उन विकारों का भार उठाया होता है जो पहले उसके अंदर नहीं थे। 3। हे भाई ! परमात्मा के भक्त किसी के साथ भी वैर नहीं रखते। जो भी मनुष्य उनकी शरण आता है वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। (पर। निंदक के भी क्या वश।) परमात्मा ने खुद ही निंदक को गलत राह पर डाल रखा है। हे नानक ! पिछले अनेकों जन्मों के किए हुए निंदा के कर्मों के संस्कारों का ढेर उसके अपने प्रयासों से मिटाया नहीं जा सकता। 4। 21। 34।
· शबद · राग भैरों
नामु हमारै बेद अरु नाद ॥
भैरउ महला 5 ॥
नामु हमारै बेद अरु नाद ॥
नामु हमारै पूरे काज ॥
नामु हमारै पूजा देव ॥
नामु हमारै गुर की सेव ॥1॥
गुरि पूरै द्रिड़िओ हरि नामु ॥
सभ ते ऊतमु हरि हरि कामु ॥1॥ रहाउ ॥
नामु हमारै मजन इसनानु ॥
नामु हमारै पूरन दानु ॥
नामु लैत ते सगल पवीत ॥
नामु जपत मेरे भाई मीत ॥2॥
नामु हमारै सउण संजोग ॥
नामु हमारै त्रिपति सुभोग ॥
नामु हमारै सगल आचार ॥
नामु हमारै निरमल बिउहार ॥3॥
जा कै मनि वसिआ प्रभु एकु ॥
सगल जना की हरि हरि टेक ॥
मनि तनि नानक हरि गुण गाउ ॥
साधसंगि जिसु देवै नाउ ॥4॥22॥35॥
नामु हमारै बेद अरु नाद ॥
नामु हमारै पूरे काज ॥
नामु हमारै पूजा देव ॥
नामु हमारै गुर की सेव ॥1॥
गुरि पूरै द्रिड़िओ हरि नामु ॥
सभ ते ऊतमु हरि हरि कामु ॥1॥ रहाउ ॥
नामु हमारै मजन इसनानु ॥
नामु हमारै पूरन दानु ॥
नामु लैत ते सगल पवीत ॥
नामु जपत मेरे भाई मीत ॥2॥
नामु हमारै सउण संजोग ॥
नामु हमारै त्रिपति सुभोग ॥
नामु हमारै सगल आचार ॥
नामु हमारै निरमल बिउहार ॥3॥
जा कै मनि वसिआ प्रभु एकु ॥
सगल जना की हरि हरि टेक ॥
मनि तनि नानक हरि गुण गाउ ॥
साधसंगि जिसु देवै नाउ ॥4॥22॥35॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जब से गुरू ने मेरे अंदर हरी-नाम दृढ़ किया है। तब से) परमात्मा का नाम ही मेरे लिए वेद (शास्त्र आदि की चर्चा है) और (जोगियों की सिंज्ञी आदि) बजाना हो चुका है। परमात्मा का नाम मेरे सारे काम सफल करता है। यह हरी-नाम ही मेरेवास्ते देव-पूजा है। हरी-नाम सिमरना ही मेरे लिए गुरू की सेवा भक्ति (करने के बराबर) है। 1। हे भाई ! पूरे गुरू ने (मेरे हृदय में) परमात्मा का नाम पक्का कर दिया है (अब मुझे निश्चय हो गया है कि) सब कामों से श्रेष्ठ काम परमात्मा के नाम का सिमरन है। 1। रहाउ। हे भाई ! (गुरू ने मेरे हृदय में नाम दृढ़ कर दिया है। अब) हरी-नाम जपना ही मेरेलिए पर्वों के समय तीर्थ-स्नान है। (तीर्थों पर जा कर) सब कुछ (ब्राहमणों को) दान कर देना- यह भी मेरे लिए नाम-सिमरन ही है। हे भाई ! जो मनुष्य नाम जपते हैं। वे सारे स्वच्छ आचरण वाले बन जाते हैं। नाम जपने वाले ही मेरे भाई हैं मेरे मित्र हैं। 2। हे भाई ! (कार्य-व्यवहारों की सफलता के लिए लोग) शगन (बिचारते हैं) महूरत (निकलवाते हैं)। पर मेरे लिए तो हरी-नाम ही सब कुछ है। दुनिया के स्वादिष्ट पदार्थों को खा-खा के तृप्त होना - (यह सारा स्वाद) मेरे लिए हरी-नाम का सिमरन है। हे भाई ! (तीर्थ-यात्रा आदि मिथे हुए) सारे धर्म-कर्म मेरे वास्ते परमात्मा का नाम ही है। यही है मेरे लिए पवित्र कार्य-व्यवहार। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में सिर्फ परमात्मा आ बसा है हे भाई ! परमात्मा (का नाम) ही सारे जीवों का सहारा है। जो मनुष्य मन से शरीर से प्रभू की सिफत सालाह करता रहता है (वह भाग्यशाली है। पर यह काम वही मनुष्य करता है) जिसको परमात्मा साध-संगति में रख के अपने नाम की दाति देता है। 4। 22। 35।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1145 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।