जनम जनम का सोइआ जागै ॥3॥
तेरे भगत भगतन का आपि ॥
अपणी महिमा आपे जापि ॥
जीअ जंत सभि तेरै हाथि ॥
नानक के प्रभ सद ही साथि ॥4॥16॥29॥
नामु हमारै अंतरजामी ॥
नामु हमारै आवै कामी ॥
रोमि रोमि रविआ हरि नामु ॥
सतिगुर पूरै कीनो दानु ॥1॥
नामु रतनु मेरै भंडार ॥
अगम अमोला अपर अपार ॥1॥ रहाउ ॥
नामु हमारै निहचल धनी ॥
नाम की महिमा सभ महि बनी ॥
नामु हमारै पूरा साहु ॥
नामु हमारै बेपरवाहु ॥2॥
नामु हमारै भोजन भाउ ॥
नामु हमारै मन का सुआउ ॥
नामु न विसरै संत प्रसादि ॥
नामु लैत अनहद पूरे नाद ॥3॥
प्रभ किरपा ते नामु नउ निधि पाई ॥
गुर किरपा ते नाम सिउ बनि आई ॥
धनवंते सेई परधान ॥
नानक जा कै नामु निधान ॥4॥17॥30॥
तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥
तू मेरे जीअ प्रान सुखदाता ॥
तू मेरा ठाकुरु हउ दासु तेरा ॥
तुझ बिनु अवरु नही को मेरा ॥1॥
करि किरपा करहु प्रभ दाति ॥
तुम॑री उसतति करउ दिन राति ॥1॥ रहाउ ॥
हम तेरे जंत तू बजावनहारा ॥
हम तेरे भिखारी दानु देहि दातारा ॥
तउ परसादि रंग रस माणे ॥
घट घट अंतरि तुमहि समाणे ॥2॥
तुम॑री क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥
साधसंगि तुमरे गुण गाउ ॥
तुम॑री दइआ ते होइ दरद बिनासु ॥
तुमरी मइआ ते कमल बिगासु ॥3॥
हउ बलिहारि जाउ गुरदेव ॥
सफल दरसनु जा की निरमल सेव ॥
दइआ करहु ठाकुर प्रभ मेरे ॥
गुण गावै नानकु नित तेरे ॥4॥18॥31॥
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
सदा सदा ता कउ जोहारु ॥
ऊचे ते ऊचा जा का थान ॥
कोटि अघा मिटहि हरि नाम ॥1॥
तिसु सरणाई सदा सुखु होइ ॥
करि किरपा जा कउ मेलै सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा के करतब लखे न जाहि ॥
जा का भरवासा सभ घट माहि ॥
प्रगट भइआ साधू कै संगि ॥
भगत अराधहि अनदिनु रंगि ॥2॥
देदे तोटि नही भंडार ॥
खिन महि थापि उथापनहार ॥
जा का हुकमु न मेटै कोइ ॥
सिरि पातिसाहा साचा सोइ ॥3॥
जिस की ओट तिसै की आसा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं अपने लड़ लगा लेता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।