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भैरों
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· शबद · राग भैरों
जिसु लड़ि लाइ लए सो लागै ॥
जिसु लड़ि लाइ लए सो लागै ॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥3॥
तेरे भगत भगतन का आपि ॥
अपणी महिमा आपे जापि ॥
जीअ जंत सभि तेरै हाथि ॥
नानक के प्रभ सद ही साथि ॥4॥16॥29॥
जनम जनम का सोइआ जागै ॥3॥
तेरे भगत भगतन का आपि ॥
अपणी महिमा आपे जापि ॥
जीअ जंत सभि तेरै हाथि ॥
नानक के प्रभ सद ही साथि ॥4॥16॥29॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं अपने लड़ लगा लेता है। वही लगता है। वही मनुष्य (माया के मोह की नींद में से) अनेकों जन्मों में सोया हुआ जाग उठता है। 3। हे प्रभू ! आपके भगत (आपके सहारे हैं)। आप स्वयं अपने भक्तों के (सदा रखवाले हैं)। (भक्तों में बैठ के) आप स्वयं ही वडिआई करते हैं। हे नानक के प्रभू ! सारे ही जीव-जंतु आपके ही वश में हैं। आप सब जीवों के सदा अंग-संग रहते हैं। 4। 16। 29।
· शबद · राग भैरों
नामु हमारै अंतरजामी ॥
भैरउ महला 5 ॥
नामु हमारै अंतरजामी ॥
नामु हमारै आवै कामी ॥
रोमि रोमि रविआ हरि नामु ॥
सतिगुर पूरै कीनो दानु ॥1॥
नामु रतनु मेरै भंडार ॥
अगम अमोला अपर अपार ॥1॥ रहाउ ॥
नामु हमारै निहचल धनी ॥
नाम की महिमा सभ महि बनी ॥
नामु हमारै पूरा साहु ॥
नामु हमारै बेपरवाहु ॥2॥
नामु हमारै भोजन भाउ ॥
नामु हमारै मन का सुआउ ॥
नामु न विसरै संत प्रसादि ॥
नामु लैत अनहद पूरे नाद ॥3॥
प्रभ किरपा ते नामु नउ निधि पाई ॥
गुर किरपा ते नाम सिउ बनि आई ॥
धनवंते सेई परधान ॥
नानक जा कै नामु निधान ॥4॥17॥30॥
नामु हमारै अंतरजामी ॥
नामु हमारै आवै कामी ॥
रोमि रोमि रविआ हरि नामु ॥
सतिगुर पूरै कीनो दानु ॥1॥
नामु रतनु मेरै भंडार ॥
अगम अमोला अपर अपार ॥1॥ रहाउ ॥
नामु हमारै निहचल धनी ॥
नाम की महिमा सभ महि बनी ॥
नामु हमारै पूरा साहु ॥
नामु हमारै बेपरवाहु ॥2॥
नामु हमारै भोजन भाउ ॥
नामु हमारै मन का सुआउ ॥
नामु न विसरै संत प्रसादि ॥
नामु लैत अनहद पूरे नाद ॥3॥
प्रभ किरपा ते नामु नउ निधि पाई ॥
गुर किरपा ते नाम सिउ बनि आई ॥
धनवंते सेई परधान ॥
नानक जा कै नामु निधान ॥4॥17॥30॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ (अब) सबके दिल की जानने वाले हरी का नाम मेरे हृदय में बस रहा है। हरी-नाम मेरे सारे काम सँवार रहा है। (गुरू की कृपा से) हरी-नाम मेरे रोम-रोम में बस गया है। हे भाई ! पूरे गुरू ने मुझे (हरी-नाम रतन का) दान दिया है। 1। हे भाई ! (पूरे गुरू की कृपा से) अपहुँच और बेअंत परमात्मा का कीमती नाम मेरे हृदय में आ बसा है। यह ऐसा खजाना है जो किसी कीमत से नहीं मिल सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! अब परमात्मा का नाम ही (मेरे सिर पर) सदा कायम रहने वाला मालिक है। हरी-नाम की महिमा ही सब जीवों के अंदर शोभा दे रही है। हे भाई ! अब परमात्मा का नाम ही (मेरे लिए वह) शाह है जिसके घर में कोई कमी नहीं। हरी-नाम ही (मेरे सिर पर वह) मालिक है जिसको किसी की मुथाजी नहीं। 2। हे भाई ! (जब से पूरे गुरू ने मुझे नाम का दान दिया है। तब से) परमात्मा का नाम परमात्मा के नाम का प्यार ही मेरी आत्मिक खुराक बन गई है। हरी-नाम ही हर वक्त मेरे मन की मुराद हो गई है। हे भाई ! गुरू-संत की कृपा से परमात्मा का नाम मुझे कभी नहीं भूलता। हे भाई ! नाम जपते हुए (अंतरात्मे में ऐसा प्रतीत होता है कि) सारे संगीतमयी साज़ एक-रस बजने लग पड़े हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा की किरपा से मुझे (उसका) नाम मिल गया है (जो मेरे लिए। मानो। धरती के सारे) नौ खजाने हैं। गुरू की कृपा से मेरा प्यार परमात्मा के नाम से बन गया है। हे नानक ! जिन मनुष्यों के हृदय में नाम-खजाना (आ बसता है)। वही (असल) धनाढ हैं। वही (लोक-परलोक में) सम्मानीय व्यक्ति हैं। 4। 17। 30।
· शबद · राग भैरों
तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥
भैरउ महला 5 ॥
तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥
तू मेरे जीअ प्रान सुखदाता ॥
तू मेरा ठाकुरु हउ दासु तेरा ॥
तुझ बिनु अवरु नही को मेरा ॥1॥
करि किरपा करहु प्रभ दाति ॥
तुम॑री उसतति करउ दिन राति ॥1॥ रहाउ ॥
हम तेरे जंत तू बजावनहारा ॥
हम तेरे भिखारी दानु देहि दातारा ॥
तउ परसादि रंग रस माणे ॥
घट घट अंतरि तुमहि समाणे ॥2॥
तुम॑री क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥
साधसंगि तुमरे गुण गाउ ॥
तुम॑री दइआ ते होइ दरद बिनासु ॥
तुमरी मइआ ते कमल बिगासु ॥3॥
हउ बलिहारि जाउ गुरदेव ॥
सफल दरसनु जा की निरमल सेव ॥
दइआ करहु ठाकुर प्रभ मेरे ॥
गुण गावै नानकु नित तेरे ॥4॥18॥31॥
तू मेरा पिता तूहै मेरा माता ॥
तू मेरे जीअ प्रान सुखदाता ॥
तू मेरा ठाकुरु हउ दासु तेरा ॥
तुझ बिनु अवरु नही को मेरा ॥1॥
करि किरपा करहु प्रभ दाति ॥
तुम॑री उसतति करउ दिन राति ॥1॥ रहाउ ॥
हम तेरे जंत तू बजावनहारा ॥
हम तेरे भिखारी दानु देहि दातारा ॥
तउ परसादि रंग रस माणे ॥
घट घट अंतरि तुमहि समाणे ॥2॥
तुम॑री क्रिपा ते जपीऐ नाउ ॥
साधसंगि तुमरे गुण गाउ ॥
तुम॑री दइआ ते होइ दरद बिनासु ॥
तुमरी मइआ ते कमल बिगासु ॥3॥
हउ बलिहारि जाउ गुरदेव ॥
सफल दरसनु जा की निरमल सेव ॥
दइआ करहु ठाकुर प्रभ मेरे ॥
गुण गावै नानकु नित तेरे ॥4॥18॥31॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! मेरे वास्ते आप ही पिता हैं। मेरे वास्ते आप ही माँ हैं। आप ही मुझे जिंद देने वाले हैं। आप ही मुझे प्राण देने वाले हैं। आप ही मुझे सारे सुख देने वाले हैं। आप मेरे मालिक हैं। मैं आपका सेवक हूँ। आपके बिना और कोई मेरा (आसरा) नहीं। 1। हे प्रभू ! मेहर कर के (मुझे यह) दाति बख्श (कि) मैं दिन-रात आपकी सिफत-सालाह करता रहूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हम जीव आपके (संगीतक) साज़ हैं। आप (इन साज़ों को) बजाने वाले हैं। हे दातार ! हम आपके (दर के) मंगते हैं। आप हमें दान देते हैं। आपकी मेहर से ही हम (बेअंत) रंग-रस पा रहे हैं। हे प्रभू ! हरेक शरीर में आप ही मौजूद हैं। 2। हे प्रभू ! आपकी मेहर से ही आपका नाम जपा जा सकता है। (मेहर कर कि) मैं साध-संगति में टिक के आपके गुण गाता रहूँ। हे प्रभू ! आपकी मेहर से (ही) मेरे हरेक दर्द का नाश होता है। आपकी मेहर से (ही) मेरा हृदय-कमल खिलता है (मुझे प्रसन्नता मिलती है)। 3। हे भाई ! मैं अपने गुरू से सदा सदके जाता हूँ। उस गुरू का दर्शन मुरादें पूरी करने वाला है। उस गुरू की सेवा जीवन को पवित्र बनाती है। हे मेरे ठाकुर ! हे मेरे प्रभू ! मेहर कर। (आपका दास) नानक सदा आपके गुण गाता रहे। 4। 18। 31।
· शबद · राग भैरों
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
भैरउ महला 5 ॥
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
सदा सदा ता कउ जोहारु ॥
ऊचे ते ऊचा जा का थान ॥
कोटि अघा मिटहि हरि नाम ॥1॥
तिसु सरणाई सदा सुखु होइ ॥
करि किरपा जा कउ मेलै सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा के करतब लखे न जाहि ॥
जा का भरवासा सभ घट माहि ॥
प्रगट भइआ साधू कै संगि ॥
भगत अराधहि अनदिनु रंगि ॥2॥
देदे तोटि नही भंडार ॥
खिन महि थापि उथापनहार ॥
जा का हुकमु न मेटै कोइ ॥
सिरि पातिसाहा साचा सोइ ॥3॥
जिस की ओट तिसै की आसा ॥
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
सदा सदा ता कउ जोहारु ॥
ऊचे ते ऊचा जा का थान ॥
कोटि अघा मिटहि हरि नाम ॥1॥
तिसु सरणाई सदा सुखु होइ ॥
करि किरपा जा कउ मेलै सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा के करतब लखे न जाहि ॥
जा का भरवासा सभ घट माहि ॥
प्रगट भइआ साधू कै संगि ॥
भगत अराधहि अनदिनु रंगि ॥2॥
देदे तोटि नही भंडार ॥
खिन महि थापि उथापनहार ॥
जा का हुकमु न मेटै कोइ ॥
सिरि पातिसाहा साचा सोइ ॥3॥
जिस की ओट तिसै की आसा ॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस (परमात्मा) का दरबार सब (पातिशाहियों के दरबारों) से ऊँचा है। उस (प्रभू-पातशाह) को सदा ही सदा नमस्कार करनी चाहिए। हे भाई ! जिस प्रभू-पातशाह का महल ऊँचे से ऊँचा है। उस हरी-पातिशाह के नाम की बरकति से करोड़ों पाप खत्म हो जाते हैं। 1। उस (प्रभू) की शरण में (रह के) उसको सदा आनंद बना रहता है। हे भाई ! वह प्रभू स्वयं ही मेहर कर के जिस मनुष्य को अपने चरणों में जोड़ता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू-पातशाह के चोज-तमाशे समझे नहीं जा सकते। जिस परमात्मा का सहारा हरेक जीव के हृदय में है। वह प्रभू-पातशाह गुरू की संगति में रहने से (मनुष्य के हृदय में) प्रकट हो जाता है। उस के भगत हर वक्त प्रेम से उसका नाम जपते रहते हैं। 2। (जीवों को बेअंत दातें) देते हुए भी (उसके) खजानों में कभी कोई कमी नहीं आती। वह एक छिन में पैदा करके नाश करने की समर्था रखता है। हे भाई ! कोई भी जीव उसका हुकम मोड़ नहीं सकता। हे भाई ! (दुनिया के) पातिशाहों के सिर पर सदा कायम रहने वाला (पातिशाह) वह (परमात्मा) ही है। 3। हे भाई ! (दुखों से बचने के लिए हम जीवों को) जिस (परमात्मा) का आसरा है। (सुखों की प्राप्ति के लिए भी) उसी की (सहायता की) आस है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1144 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।