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1143
भैरों
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· शबद · राग भैरों
सभ महि एकु रहिआ भरपूरा ॥
सभ महि एकु रहिआ भरपूरा ॥
सो जापै जिसु सतिगुरु पूरा ॥
हरि कीरतनु ता को आधारु ॥
कहु नानक जिसु आपि दइआरु ॥4॥13॥26॥
सो जापै जिसु सतिगुरु पूरा ॥
हरि कीरतनु ता को आधारु ॥
कहु नानक जिसु आपि दइआरु ॥4॥13॥26॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सब जीवों में वह परमात्मा ही पूरे तौर पर बस रहा है। (पर उसका नाम) वह मनुष्य (ही) जपता है। जिसको पूरा गुरू (प्रेरित करता है)। उसके हृदय में परमात्मा की सिफत-सालाह आसरा बन जाती है हे नानक ! कह-हे भाई ! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं दयावान होता है । 4। 13। 26।
· शबद · राग भैरों
मोहि दुहागनि आपि सीगारी ॥
भैरउ महला 5 ॥
मोहि दुहागनि आपि सीगारी ॥
रूप रंग दे नामि सवारी ॥
मिटिओ दुखु अरु सगल संताप ॥
गुर होए मेरे माई बाप ॥1॥
सखी सहेरी मेरै ग्रसति अनंद ॥
करि किरपा भेटे मोहि कंत ॥1॥ रहाउ ॥
तपति बुझी पूरन सभ आसा ॥
मिटे अंधेर भए परगासा ॥
अनहद सबद अचरज बिसमाद ॥
गुरु पूरा पूरा परसाद ॥2॥
जा कउ प्रगट भए गोपाल ॥
ता कै दरसनि सदा निहाल ॥
सरब गुणा ता कै बहुतु निधान ॥
जा कउ सतिगुरि दीओ नामु ॥3॥
जा कउ भेटिओ ठाकुरु अपना ॥
मनु तनु सीतलु हरि हरि जपना ॥
कहु नानक जो जन प्रभ भाए ॥
ता की रेनु बिरला को पाए ॥4॥14॥27॥
मोहि दुहागनि आपि सीगारी ॥
रूप रंग दे नामि सवारी ॥
मिटिओ दुखु अरु सगल संताप ॥
गुर होए मेरे माई बाप ॥1॥
सखी सहेरी मेरै ग्रसति अनंद ॥
करि किरपा भेटे मोहि कंत ॥1॥ रहाउ ॥
तपति बुझी पूरन सभ आसा ॥
मिटे अंधेर भए परगासा ॥
अनहद सबद अचरज बिसमाद ॥
गुरु पूरा पूरा परसाद ॥2॥
जा कउ प्रगट भए गोपाल ॥
ता कै दरसनि सदा निहाल ॥
सरब गुणा ता कै बहुतु निधान ॥
जा कउ सतिगुरि दीओ नामु ॥3॥
जा कउ भेटिओ ठाकुरु अपना ॥
मनु तनु सीतलु हरि हरि जपना ॥
कहु नानक जो जन प्रभ भाए ॥
ता की रेनु बिरला को पाए ॥4॥14॥27॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे सहेलियो ! (मैं) बुरे भाग्यों वाली (थी) मुझे (पति-प्रभू ने) स्वयं (आत्मिक जीवन के गहनों से) सजा लिया। (मुझे सुंदर आत्मिक) रूप दे के (सुंदर) प्रेम बख्श कर (अपने) नाम में (जोड़ के उसने मुझे) सुंदर आत्मिक जीवन वाली बना लिया। हे सहेलियो ! (मेरे अंदर से) दुख मिट गया है सारे कलेश मिट गए हैं (ये सारी मेहर गुरू ने कराई है। गुरू ने ही कंत प्रभू से मिलाया है) सतिगुरू ही (मेरे वास्ते) मेरी माँ मेरा पिता बना है। 1। हे मेरी सखियो ! हे मेरी सहेलियो ! मेरे (हृदय-) घर में आत्मिक आनंद बन गया है। (क्योंकि) मेरे पति (प्रभू) जी मेहर कर के मुझे मिल गए हैं। 1। रहाउ। हे सहेलियो ! (अब मेरे अंदर से तृष्णा की आग की) जलन बुझ गई है। मेरी हरेक आशा पूरी हो गई है। (मेरे अंदर से माया के मोह के सारे) अंधेरे मिट गए हैं। (मेरे अंदर से आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो गया है (अब यूँ हो गया है जैसे) एक-रस सारे साजों के राग (मेरे अंदर हो रहे हैं) (मेरे अंदर) आश्चर्य और हैरान करने वाली (ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है)। (हे सहेलियो ! यह सब कुछ) पूरा गुरू ही (करने वाला है। यह) पूरे (गुरू की ही) मेहर हुई है। 2। हे सहेलियो ! जिस (सौभाग्यशाली) के अंदर गोपाल-प्रभू प्रकट हो जाता है। उसके दर्शन की बरकति से सदा निहाल हो जाया जाता है। उसके हृदय में सारे (आत्मिक) गुण पैदा हो जाते हैं उसके अंदर (मानो) भारा खजाना एकत्र हो जाता है। हे सहेलियो ! जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा का नाम (-खजाना) दे दिया। 3। हे सहेलियो ! जिस मनुष्य को अपना मालिक-प्रभू मिल जाता है। परमात्मा का नाम हर वक्त जपते हुए उसका मन उसका तन ठंडा-ठार हो जाता है। हे नानक ! कह-हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारे लगने लग जाते हैं। कोई विरला (भाग्यशाली) मनुष्य उनके चरणों की धूल हासिल करता है। 4। 14। 27।
· शबद · राग भैरों
चितवत पाप न आलकु आवै ॥
भैरउ महला 5 ॥
चितवत पाप न आलकु आवै ॥
बेसुआ भजत किछु नह सरमावै ॥
सारो दिनसु मजूरी करै ॥
हरि सिमरन की वेला बजर सिरि परै ॥1॥
माइआ लगि भूलो संसारु ॥
आपि भुलाइआ भुलावणहारै राचि रहिआ बिरथा बिउहार ॥1॥ रहाउ ॥
पेखत माइआ रंग बिहाइ ॥
गड़बड़ करै कउडी रंगु लाइ ॥
अंध बिउहार बंध मनु धावै ॥
करणैहारु न जीअ महि आवै ॥2॥
करत करत इव ही दुखु पाइआ ॥
पूरन होत न कारज माइआ ॥
कामि क्रोधि लोभि मनु लीना ॥
तड़फि मूआ जिउ जल बिनु मीना ॥3॥
जिस के राखे होइ हरि आपि ॥
हरि हरि नामु सदा जपु जापि ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥
नानक सतिगुरु पूरा पाइआ ॥4॥15॥28॥
चितवत पाप न आलकु आवै ॥
बेसुआ भजत किछु नह सरमावै ॥
सारो दिनसु मजूरी करै ॥
हरि सिमरन की वेला बजर सिरि परै ॥1॥
माइआ लगि भूलो संसारु ॥
आपि भुलाइआ भुलावणहारै राचि रहिआ बिरथा बिउहार ॥1॥ रहाउ ॥
पेखत माइआ रंग बिहाइ ॥
गड़बड़ करै कउडी रंगु लाइ ॥
अंध बिउहार बंध मनु धावै ॥
करणैहारु न जीअ महि आवै ॥2॥
करत करत इव ही दुखु पाइआ ॥
पूरन होत न कारज माइआ ॥
कामि क्रोधि लोभि मनु लीना ॥
तड़फि मूआ जिउ जल बिनु मीना ॥3॥
जिस के राखे होइ हरि आपि ॥
हरि हरि नामु सदा जपु जापि ॥
साधसंगि हरि के गुण गाइआ ॥
नानक सतिगुरु पूरा पाइआ ॥4॥15॥28॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (गलत राह पर पड़ा हुआ मनुष्य) पाप सोचते हुए (रक्ती भर भी) ढील नहीं करता। वैश्वा के द्वार पर जाने से भी थोड़ी सी शर्म नहीं करता। (माया की खातिर) सारा ही दिन मजदूरी कर सकता है। पर जब परमात्मा के सिमरन का वक्त होता है (तब ऐसा होता है जैसे इसके) सिर पर बिजली आ गिरी है। 1। हे भाई ! जगत माया के मोह में फस के गलत राह पर पड़ा रहता है। (पर। जगत के भी क्या वश।) गलत राह पर डालने वाले परमात्मा ने खुद (ही जगत को) गलत मार्ग पर डाला हुआ है (इस वास्ते जगत) व्यर्थ के व्यवहारों में ही मगन रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! माया के रंग-तमाशे देखते ही (गलत मार्ग पर पड़े मनुष्य की उम्र) बीत जाती है। तुच्छ सी माया से प्यार डाल के (रोजाना कार्य-व्यवहार में भी) हेरा-फेरी करता रहता है। हे भाई ! माया के मोह में अंधा कर देने वाला कार्य-व्यवहार के बँधनों की ओर (कुमार्ग पर पड़े मनुष्य का) मन दौड़ता रहता है। पर पैदा करने वाला परमात्मा इसके हृदय को याद नहीं आता। 2। हे भाई ! (कुमार्ग पर पड़ा मनुष्य) इस तरह करते-करते दुख भोगता है। माया वाले (इसके) काम कभी समाप्त नहीं होते। काम-वासना में। क्रोध में। लोभ में (इस का) मन डूबा रहता है; जैसे मछली पानी के बग़ैर तड़फ-तड़फ के मरती है। वैसे ही नाम के बिना विकारों में ग्रसित हो-हो के ये आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। 3। पर। हे भाई ! प्रभू जी स्वयं जिस मनुष्य के रक्षक बन गए। वह मनुष्य सदा ही प्रभू का नाम जपता है। वह साध-संगति में रह कर परमात्मा के गुण गाता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को (प्रभू की कृपा से) पूरा गुरू मिल जाता है। 4। 15। 28।
· शबद · राग भैरों
अपणी दइआ करे सो पाए ॥
भैरउ महला 5 ॥
अपणी दइआ करे सो पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
साच सबदु हिरदे मन माहि ॥
जनम जनम के किलविख जाहि ॥1॥
राम नामु जीअ को आधारु ॥
गुर परसादि जपहु नित भाई तारि लए सागर संसारु ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ लिखिआ हरि एहु निधानु ॥
से जन दरगह पावहि मानु ॥
सूख सहज आनंद गुण गाउ ॥
आगै मिलै निथावे थाउ ॥2॥
जुगह जुगंतरि इहु ततु सारु ॥
हरि सिमरणु साचा बीचारु ॥
अपणी दइआ करे सो पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
साच सबदु हिरदे मन माहि ॥
जनम जनम के किलविख जाहि ॥1॥
राम नामु जीअ को आधारु ॥
गुर परसादि जपहु नित भाई तारि लए सागर संसारु ॥1॥ रहाउ ॥
जिन कउ लिखिआ हरि एहु निधानु ॥
से जन दरगह पावहि मानु ॥
सूख सहज आनंद गुण गाउ ॥
आगै मिलै निथावे थाउ ॥2॥
जुगह जुगंतरि इहु ततु सारु ॥
हरि सिमरणु साचा बीचारु ॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) परमात्मा अपनी मेहर करता है। वह मनुष्य (हरी-नाम का सिमरन) प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा का नाम अपने मन में बसा लेता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू की सिफतसालाह का शबद अपने हृदय में अपने मन में टिकाए रखता है (जिसकी बरकति से मनुष्य के) अनेकों जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम (मनुष्य की) जिंद का आसरा है। (इसलिए) गुरू की कृपा से (यह नाम) सदा जपा करो। (प्रभू का नाम) संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों के माथे पर परमात्मा ने इस नाम-खजाने की प्राप्ति लिखी होती है। वह मनुष्य (नाम जप के) परमात्मा की हजूरी में आदर पाते हैं। हे भाई ! परमात्मा के गुण गाया करो। (गुण गाने की बरकति से) आत्मिक अडोलता के सुख आनंद (प्राप्त होते हैं)। (जिस मनुष्य को जगत में) कोई भी जीव सहारा नहीं देता। उसको परमात्मा की हजूरी में जगह मिलती है। 2। हे भाई ! (युग चाहे कोई भी हो) (यह नाम-सिमरन ही जीवन-जुगति का) तत्व है निचोड़ है। पर। हरेक युग में परमात्मा का सिमरन ही (आत्मिक जीवन जीने की) सही विचार है
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1143 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।