मनु तनु सीतलु मनि अंम्रितु वूठा ॥
पारब्रहम गुर भए दइआला ॥
नानक दास देखि भए निहाला ॥4॥10॥23॥
सतिगुरु मेरा बेमुहताजु ॥
सतिगुर मेरे सचा साजु ॥
सतिगुरु मेरा सभस का दाता ॥
सतिगुरु मेरा पुरखु बिधाता ॥1॥
गुर जैसा नाही को देव ॥
जिसु मसतकि भागु सु लागा सेव ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु मेरा सरब प्रतिपालै ॥
सतिगुरु मेरा मारि जीवालै ॥
सतिगुर मेरे की वडिआई ॥ प्रगटु भई है सभनी थाई ॥2॥
सतिगुरु मेरा ताणु निताणु ॥
सतिगुरु मेरा घरि दीबाणु ॥
सतिगुर कै हउ सद बलि जाइआ ॥
प्रगटु मारगु जिनि करि दिखलाइआ ॥3॥
जिनि गुरु सेविआ तिसु भउ न बिआपै ॥
जिनि गुरु सेविआ तिसु दुखु न संतापै ॥
नानक सोधे सिंम्रिति बेद ॥
पारब्रहम गुर नाही भेद ॥4॥11॥24॥
नामु लैत मनु परगटु भइआ ॥
नामु लैत पापु तन ते गइआ ॥
नामु लैत सगल पुरबाइआ ॥
नामु लैत अठसठि मजनाइआ ॥1॥
तीरथु हमरा हरि को नामु ॥
गुरि उपदेसिआ ततु गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
नामु लैत दुखु दूरि पराना ॥
नामु लैत अति मूड़ सुगिआना ॥
नामु लैत परगटि उजीआरा ॥
नामु लैत छुटे जंजारा ॥2॥
नामु लैत जमु नेड़ि न आवै ॥
नामु लैत दरगह सुखु पावै ॥
नामु लैत प्रभु कहै साबासि ॥
नामु हमारी साची रासि ॥3॥
गुरि उपदेसु कहिओ इहु सारु ॥
हरि कीरति मन नामु अधारु ॥
नानक उधरे नाम पुनहचार ॥
अवरि करम लोकह पतीआर ॥4॥12॥25॥
नमसकार ता कउ लख बार ॥
इहु मनु दीजै ता कउ वारि ॥
सिमरनि ता कै मिटहि संताप ॥
होइ अनंदु न विआपहि ताप ॥1॥
ऐसो हीरा निरमल नाम ॥
जासु जपत पूरन सभि काम ॥1॥ रहाउ ॥
जा की द्रिसटि दुख डेरा ढहै ॥
अंम्रित नामु सीतलु मनि गहै ॥
अनिक भगत जा के चरन पूजारी ॥
सगल मनोरथ पूरनहारी ॥2॥
खिन महि ऊणे सुभर भरिआ ॥
खिन महि सूके कीने हरिआ ॥
खिन महि निथावे कउ दीनो थानु ॥
खिन महि निमाणे कउ दीनो मानु ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! पराया हक खाने वाले गुण-हीन मनुष्य पर भी जब परमात्मा दयालु हो जाता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।