Lulla Family

अंग 1142

अंग
1142
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरामखोर निरगुण कउ तूठा ॥
मनु तनु सीतलु मनि अंम्रितु वूठा ॥
पारब्रहम गुर भए दइआला ॥
नानक दास देखि भए निहाला ॥4॥10॥23॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! पराया हक खाने वाले गुण-हीन मनुष्य पर भी जब परमात्मा दयालु हो जाता है। उसका मन। उसका तन शांत हो जाता है। उसके मन में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है। हे नानक ! जिन सेवकों पर गुरू परमात्मा दयालु होते हैं वे दर्शन करके निहाल हो जाते हैं। 4। 1। 23।
भैरउ महला 5 ॥
सतिगुरु मेरा बेमुहताजु ॥
सतिगुर मेरे सचा साजु ॥
सतिगुरु मेरा सभस का दाता ॥
सतिगुरु मेरा पुरखु बिधाता ॥1॥
गुर जैसा नाही को देव ॥
जिसु मसतकि भागु सु लागा सेव ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु मेरा सरब प्रतिपालै ॥
सतिगुरु मेरा मारि जीवालै ॥
सतिगुर मेरे की वडिआई ॥ प्रगटु भई है सभनी थाई ॥2॥
सतिगुरु मेरा ताणु निताणु ॥
सतिगुरु मेरा घरि दीबाणु ॥
सतिगुर कै हउ सद बलि जाइआ ॥
प्रगटु मारगु जिनि करि दिखलाइआ ॥3॥
जिनि गुरु सेविआ तिसु भउ न बिआपै ॥
जिनि गुरु सेविआ तिसु दुखु न संतापै ॥
नानक सोधे सिंम्रिति बेद ॥
पारब्रहम गुर नाही भेद ॥4॥11॥24॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! प्यारे गुरू को किसी की मुथाजी नहीं (गुरू की अपनी कोई जाती गरज़ नहीं अपना व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं) गुरू की यह सदा कायम रहने वाली मर्यादा है (कि वह सदा बेगर्ज है)। हे भाई ! गुरू सब जीवों को (दातें) देने वाला है। गुरू और सृजनहार अकाल-पुरख एक-रूप है। 1। हे भाई ! गुरू जैसा कोई और देवता नहीं। जिस (मनुष्य) के माथे पर अच्छी किस्मत (जाग उठे) वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्यारा गुरू सब जीवों की रक्षा करता है। (जो मनुष्य उसके दर पर आता है। उसको माया के मोह से उपराम करके) मार के आत्मिक जीवन दे देता है। हे भाई ! गुरू की यह ऊँची शोभा हर जगह रौशन हो गई है। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य का और कोई भी आसरा नहीं (जब वह गुरू की शरण आ पड़ता है) गुरू (उसका) आसरा बन जाता है। गुरू उसके हृदय-घर को सहारा देता है। हे भाई ! जिस (गुरू) ने आत्मिक जीवन का सीधा रास्ता दिखा दिया है। मैं उससे सदा कुर्बान जाता हूँ। 3। हे भाई ! जिस (मनुष्य) ने गुरू की शरण ली है। कोई डर उस पर अपना जोर नहीं डाल सकता। हे नानक ! (कह- हे भाई !) स्मृतियां-वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) खोज के देख लिए हैं (गुरू सबसे ऊँचा है) गुरू और परमात्मा में कोई अंतर नहीं। 4। 11। 24।
भैरउ महला 5 ॥
नामु लैत मनु परगटु भइआ ॥
नामु लैत पापु तन ते गइआ ॥
नामु लैत सगल पुरबाइआ ॥
नामु लैत अठसठि मजनाइआ ॥1॥
तीरथु हमरा हरि को नामु ॥
गुरि उपदेसिआ ततु गिआनु ॥1॥ रहाउ ॥
नामु लैत दुखु दूरि पराना ॥
नामु लैत अति मूड़ सुगिआना ॥
नामु लैत परगटि उजीआरा ॥
नामु लैत छुटे जंजारा ॥2॥
नामु लैत जमु नेड़ि न आवै ॥
नामु लैत दरगह सुखु पावै ॥
नामु लैत प्रभु कहै साबासि ॥
नामु हमारी साची रासि ॥3॥
गुरि उपदेसु कहिओ इहु सारु ॥
हरि कीरति मन नामु अधारु ॥
नानक उधरे नाम पुनहचार ॥
अवरि करम लोकह पतीआर ॥4॥12॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए (मनुष्य का) मन (विकारों के अंधकार में से निकल के) रौशन हो जाता है (क्योंकि) नाम सिमरते हुए (हरेक किस्म का) पाप शरीर से दूर हो जाता है। हे भाई ! नाम सिमरते हुए (मानो) सारे पर्व मनाए गए। नाम जपते हुए अढ़सठ तीर्थों का स्नान हो गया। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही हमारा तीर्थ है। गुरू ने (हमें) आत्मिक जीवन की सूझ का यह निचोड़ समझा दिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए (मनुष्य का) मन (विकारों के अंधेरे से निकल के) प्रकाशमान हो जाता है। प्रभु का नाम लेने से मूर्ख भी ज्ञानवान बन जाता है। हे भाई ! नाम सिमरने से (जैसे) मन में आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है (क्योंकि) नाम जपते हुए (मन के माया के मोह के सारे) बँधन कट जाते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपने से जम (मनुष्य के) नजदीक नहीं आता। मनुष्य परमात्मा की हजूरी में टिक के आत्मिक आनंद लेता है। नाम सिमरने से परमात्मा (भी) आदर-मान देता है। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही हम जीवों के लिए सदा कायम रहने वाली राशि-पूँजी है। 3। हे भाई ! गुरू ने (मुझे) यह सबसे बढ़िया उपदेश दे दिया है कि परमात्मा की सिफतसालाह परमात्मा का नाम (ही) मन का आसरा है। हे नानक ! वह मनुष्य (विकारों की लहरों से) पार लांघ जाते हैं। जो नाम जपने का प्रायश्चित कर्म करते हैं। और सारे (प्रायश्चित) कर्म लोगों की तसल्ली करवाने के लिए हैं (कि हम धार्मिक बन गए हैं)। 4। 12। 25।
भैरउ महला 5 ॥
नमसकार ता कउ लख बार ॥
इहु मनु दीजै ता कउ वारि ॥
सिमरनि ता कै मिटहि संताप ॥
होइ अनंदु न विआपहि ताप ॥1॥
ऐसो हीरा निरमल नाम ॥
जासु जपत पूरन सभि काम ॥1॥ रहाउ ॥
जा की द्रिसटि दुख डेरा ढहै ॥
अंम्रित नामु सीतलु मनि गहै ॥
अनिक भगत जा के चरन पूजारी ॥
सगल मनोरथ पूरनहारी ॥2॥
खिन महि ऊणे सुभर भरिआ ॥
खिन महि सूके कीने हरिआ ॥
खिन महि निथावे कउ दीनो थानु ॥
खिन महि निमाणे कउ दीनो मानु ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! उस परमात्मा के आगे लाखों बार सिर झुकाना चाहिए। अपना यह मन उस परमात्मा के आगे भेट कर देना चाहिए। हे भाई ! उस परमात्मा के नाम के सिमरन की बरकति से (सारे) दुख-कलेश मिट जाते हैं। (मन में) खुशी पैदा होती है। कोई भी दुख अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। 1। हे भाई ! (जीवों के हृदय) पवित्र करने वाला हरी-नाम ऐसा कीमती पदार्थ है कि उसको जपते हुए सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा की मेहर की निगाह से (मनुष्य के अंदर से) दुखों का डेरा ढहि जाता है। (जो मनुष्य उसका) आत्मिक जीवन देने वाला नाम (अपने) मन में बसाता है (उसका हृदय) ठंडा-ठार हो जाता है। हे भाई ! अनेकों ही भक्त जिस परमात्मा के चरण पूज रहे हैं। वह प्रभू (अपने भक्तों के) सारे मनोरथ पूरे करने वाला है। 2। हे भाई ! (उस परमात्मा का नाम) खाली (हृदयों) को एक छिन में (गुणों से) लबा-लब भर देता है। (आत्मिक जीवन वाले) सूखे हुओं को एक छिन में हरे कर देता है। जिसको कहीं कोई आदर-सत्कार नहीं देता। वह परमात्मा उसको एक छिन में आदर-मान बख्श देता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! पराया हक खाने वाले गुण-हीन मनुष्य पर भी जब परमात्मा दयालु हो जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।