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भैरों
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· शबद · राग भैरों
तिसु जन के सभि काज सवारि ॥
तिसु जन के सभि काज सवारि ॥
तिस का राखा एको सोइ ॥
जन नानक अपड़ि न साकै कोइ ॥4॥4॥17॥
तिस का राखा एको सोइ ॥
जन नानक अपड़ि न साकै कोइ ॥4॥4॥17॥
हिन्दी अर्थ: उस सेवक के वह सारे काम सवारता है। उस मनुष्य का रखवाला वह परमात्मा स्वयं ही बना रहता है। हे दास नानक ! (जगत का कोई जीव) उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 4। 4। 17।
· शबद · राग भैरों
तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥
भैरउ महला 5 ॥
तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे विसरै नरहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा भाए ॥
किआ कड़ीऐ जां रहिआ समाए ॥1॥
माइआ मोहि कड़े कड़ि पचिआ ॥
बिनु नावै भ्रमि भ्रमि भ्रमि खपिआ ॥1॥ रहाउ ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा करता ॥
तउ कड़ीऐ जे अनिआइ को मरता ॥
तउ कड़ीऐ जे किछु जाणै नाही ॥
किआ कड़ीऐ जां भरपूरि समाही ॥2॥
तउ कड़ीऐ जे किछु होइ धिङाणै ॥
तउ कड़ीऐ जे भूलि रंञाणै ॥
गुरि कहिआ जो होइ सभु प्रभ ते ॥
तब काड़ा छोडि अचिंत हम सोते ॥3॥
प्रभ तूहै ठाकुरु सभु को तेरा ॥
जिउ भावै तिउ करहि निबेरा ॥
दुतीआ नासति इकु रहिआ समाइ ॥
राखहु पैज नानक सरणाइ ॥4॥5॥18॥
तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे विसरै नरहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा भाए ॥
किआ कड़ीऐ जां रहिआ समाए ॥1॥
माइआ मोहि कड़े कड़ि पचिआ ॥
बिनु नावै भ्रमि भ्रमि भ्रमि खपिआ ॥1॥ रहाउ ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा करता ॥
तउ कड़ीऐ जे अनिआइ को मरता ॥
तउ कड़ीऐ जे किछु जाणै नाही ॥
किआ कड़ीऐ जां भरपूरि समाही ॥2॥
तउ कड़ीऐ जे किछु होइ धिङाणै ॥
तउ कड़ीऐ जे भूलि रंञाणै ॥
गुरि कहिआ जो होइ सभु प्रभ ते ॥
तब काड़ा छोडि अचिंत हम सोते ॥3॥
प्रभ तूहै ठाकुरु सभु को तेरा ॥
जिउ भावै तिउ करहि निबेरा ॥
दुतीआ नासति इकु रहिआ समाइ ॥
राखहु पैज नानक सरणाइ ॥4॥5॥18॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! अगर (जीव को यह ख्याल बना रहे कि परमात्मा मुझसे अलग) कहीं दूर है। तब (हर बात पर) चिंता होती है। तब भी चिंता करते रहते हैं जब परमात्मा (हमारे मन से) भूल जाए। जब (परमात्मा के बिना) कोई और पदार्थ (परमात्मा से ज्यादा) प्यारा लगने लग जाता है। तब (भी बंदा) झुरता रहता है। पर जब (यह यकीन बना रहे कि परमात्मा) हरेक जगह व्यापक है। तब चिंता-फिकर समाप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य खिझ खिझ के आत्मिक मौत मरता रहता है। परमात्मा के नाम के बिना (माया की खातिर) भटक के भटक के भटक के दुखी होता रहता है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! अगर (ये ख्याल टिका रहे कि परमात्मा के बिना) कोई और कुछ कर सकने वाला है। तब चिंता-फिक्र में फसे रहते हैं। तब भी झुरते हैं जब ये ख्याल बना रहे कि कोई प्राणी परमात्मा के हुकम से बाहर मर सकता है। अगर यह यकीन टिक जाए कि परमात्मा हमारी आवश्यक्ताएं जानता नहीं। तब भी झुरते रहते हैं। पर। हे प्रभू ! आप तो हर जगह मौजूद हैं। फिर हम चिंता-फिक्र क्यों करें। 2। हे भाई ! कुछ भी परमात्मा के हुकम के बाहर नहीं होता। किसी को भी वह भुलेखे से दुखी नहीं करता। फिर चिंता-फिक्र क्यों किया जाऐ। हे भाई ! गुरू ने यह बताया है कि जो कुछ होता है सब प्रभू के हुकम से ही होता है। इस लिए हम तो चिंता-फिक्र छोड़ के (उसकी रज़ा में) बेफिक्र टिके हुए हैं। 3। हे प्रभू ! आप सब जीवों के मालिक हैं। हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है। जैसे आपकी रज़ा होती है। आप (जीवों की किस्मत का) फैसला करते हैं। हे प्रभू ! आपके बिना (आपके बराबर का) और कोई नहीं। आप ही हर जगह व्यापक हैं। हे नानक ! (प्रभू के ही दर पर अरदास किया कर कि। हे प्रभू !) मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी लाज रख। 4। 5। 18।
· शबद · राग भैरों
बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥
भैरउ महला 5 ॥
बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥
बिनु कंठै कैसे गावनहारी ॥
जील बिना कैसे बजै रबाब ॥
नाम बिना बिरथे सभि काज ॥1॥
नाम बिना कहहु को तरिआ ॥
बिनु सतिगुर कैसे पारि परिआ ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु जिहवा कहा को बकता ॥
बिनु स्रवना कहा को सुनता ॥
बिनु नेत्रा कहा को पेखै ॥
नाम बिना नरु कही न लेखै ॥2॥
बिनु बिदिआ कहा कोई पंडित ॥
बिनु अमरै कैसे राज मंडित ॥
बिनु बूझे कहा मनु ठहराना ॥
नाम बिना सभु जगु बउराना ॥3॥
बिनु बैराग कहा बैरागी ॥
बिनु हउ तिआगि कहा कोऊ तिआगी ॥
बिनु बसि पंच कहा मन चूरे ॥
नाम बिना सद सद ही झूरे ॥4॥
बिनु गुर दीखिआ कैसे गिआनु ॥
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ॥
बिनु भै कथनी सरब बिकार ॥
कहु नानक दर का बीचार ॥5॥6॥19॥
बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥
बिनु कंठै कैसे गावनहारी ॥
जील बिना कैसे बजै रबाब ॥
नाम बिना बिरथे सभि काज ॥1॥
नाम बिना कहहु को तरिआ ॥
बिनु सतिगुर कैसे पारि परिआ ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु जिहवा कहा को बकता ॥
बिनु स्रवना कहा को सुनता ॥
बिनु नेत्रा कहा को पेखै ॥
नाम बिना नरु कही न लेखै ॥2॥
बिनु बिदिआ कहा कोई पंडित ॥
बिनु अमरै कैसे राज मंडित ॥
बिनु बूझे कहा मनु ठहराना ॥
नाम बिना सभु जगु बउराना ॥3॥
बिनु बैराग कहा बैरागी ॥
बिनु हउ तिआगि कहा कोऊ तिआगी ॥
बिनु बसि पंच कहा मन चूरे ॥
नाम बिना सद सद ही झूरे ॥4॥
बिनु गुर दीखिआ कैसे गिआनु ॥
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ॥
बिनु भै कथनी सरब बिकार ॥
कहु नानक दर का बीचार ॥5॥6॥19॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (नृत्य के साथ) साज़ों के बिना नृत्य नहीं फबता। गले के बिना कोई गवईया गा नहीं सकता। तंदी के बिना रबाब नहीं बज सकती। (इसी तरह) परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (दुनिया वाले और) सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं। 1। हे भाई ! बताओ। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना कौन संसार समुंद्र से पार लांघ सकता है। गुरू की शरण पड़े बिना कैसे कोई पार लांघ सकता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ के बिना कोई बोलने योग्य नहीं हो सकता। कान के बिना कोई सुन नहीं सकता। आँखों के बिना कोई देख नहीं सकता। (इसी तरह) परमात्मा के नाम सिमरन के बिना मनुष्य की कोई बात नहीं पूछता। 2। हे भाई ! विद्या प्राप्ति के बगैर कोई पंडित नहीं बन सकता। (राजाओं के) हुकम के बिना राज की सजावटें किसी काम की नहीं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना मनुष्य का मन कहीं टिक नहीं सकता। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना सारा जगत पागल हुआ फिरता है। 3। हे भाई ! अगर वैरागी के अंदर माया के प्रति निर्मोह नहीं। तो वह वैरागी कैसा। अहंकार को त्यागे बिना कोई त्याग नहीं कहलवा सकता। कामादिक पाँचों को वश में किए बिना मन मारा नहीं जा सकता। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरन के बिना मनुष्य सदा ही सदा ही चिंता-फिक्र में पड़ा रहता है। 4। हे भाई ! गुरू के उपदेश के बिना आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ सकती। हे भाई ! वह समाधि कैसी। अगर अपने ईष्ट के दर्शन नहीं होते। हे भाई ! परमात्मा का डर-अदब हृदय में बसाए बिना मनुष्य का सारा चोंच-ज्ञान विकारों का मूल है। हे नानक ! कह- हे भाई ! परमात्मा के दर पर पहुँचाने वाली यही विचार है। 5। 6। 19।
· शबद · राग भैरों
हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥
भैरउ महला 5 ॥
हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥
काम रोगि मैगलु बसि लीना ॥
द्रिसटि रोगि पचि मुए पतंगा ॥
नाद रोगि खपि गए कुरंगा ॥1॥
जो जो दीसै सो सो रोगी ॥
रोग रहित मेरा सतिगुरु जोगी ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रोगि मीनु ग्रसिआनो ॥
बासन रोगि भवरु बिनसानो ॥
हेत रोग का सगल संसारा ॥
त्रिबिधि रोग महि बधे बिकारा ॥2॥
रोगे मरता रोगे जनमै ॥
रोगे फिरि फिरि जोनी भरमै ॥
हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥
काम रोगि मैगलु बसि लीना ॥
द्रिसटि रोगि पचि मुए पतंगा ॥
नाद रोगि खपि गए कुरंगा ॥1॥
जो जो दीसै सो सो रोगी ॥
रोग रहित मेरा सतिगुरु जोगी ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रोगि मीनु ग्रसिआनो ॥
बासन रोगि भवरु बिनसानो ॥
हेत रोग का सगल संसारा ॥
त्रिबिधि रोग महि बधे बिकारा ॥2॥
रोगे मरता रोगे जनमै ॥
रोगे फिरि फिरि जोनी भरमै ॥
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (परमात्मा ने) मनुष्य को अहंकार का रोग दे रखा है। काम-वासना के रोग ने हाथी को अपने वश में किया हुआ है। (दीए की ज्योति को) देखने के रोग के कारण पतंगे (दीए की ज्योति पर) जल मरते हैं। (घंडे हेड़े की) आवाज़ (सुनने) के रोग के कारण हिरन दुखी होते हैं। 1। हे भाई ! जो जो जीव (जगत में) दिखाई दे रहा है। हरेक किसी ना किसी रोग में फंसा हुआ है। (असल) जोगी मेरा सतिगुरू (सब) रोगों से रहित है। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ के रोग के कारण मछली पकड़ी जाती है। सुगंधि के रोग के कारण (फूल की सुगंधि लेने के रस के कारण) भँवरा (फूल की पंखुड़ियों में बंद हो के) नाश हो जाता है। हे भाई ! सारा जगत मोह के रोग का शिकार हुआ पड़ा है। त्रैगुणी माया के मोह के रोग में बँधे हुए जीव अनेकों विकार करते हैं। 2। हे भाई ! (मनुष्य किसी ना किसी आत्मिक) रोग में (फसा हुआ) ही मर जाता है। (किसी ना किसी आत्मिक) रोग में (ग्रसा हुआ) ही पैदा होता है। उस रोग के कारण ही बार-बार जूनियों में भटकता रहता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1140 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।