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अंग 1140

अंग
1140
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिसु जन के सभि काज सवारि ॥
तिस का राखा एको सोइ ॥
जन नानक अपड़ि न साकै कोइ ॥4॥4॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उस सेवक के वह सारे काम सवारता है। उस मनुष्य का रखवाला वह परमात्मा स्वयं ही बना रहता है। हे दास नानक ! (जगत का कोई जीव) उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 4। 4। 17।
भैरउ महला 5 ॥
तउ कड़ीऐ जे होवै बाहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे विसरै नरहरि ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा भाए ॥
किआ कड़ीऐ जां रहिआ समाए ॥1॥
माइआ मोहि कड़े कड़ि पचिआ ॥
बिनु नावै भ्रमि भ्रमि भ्रमि खपिआ ॥1॥ रहाउ ॥
तउ कड़ीऐ जे दूजा करता ॥
तउ कड़ीऐ जे अनिआइ को मरता ॥
तउ कड़ीऐ जे किछु जाणै नाही ॥
किआ कड़ीऐ जां भरपूरि समाही ॥2॥
तउ कड़ीऐ जे किछु होइ धिङाणै ॥
तउ कड़ीऐ जे भूलि रंञाणै ॥
गुरि कहिआ जो होइ सभु प्रभ ते ॥
तब काड़ा छोडि अचिंत हम सोते ॥3॥
प्रभ तूहै ठाकुरु सभु को तेरा ॥
जिउ भावै तिउ करहि निबेरा ॥
दुतीआ नासति इकु रहिआ समाइ ॥
राखहु पैज नानक सरणाइ ॥4॥5॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! अगर (जीव को यह ख्याल बना रहे कि परमात्मा मुझसे अलग) कहीं दूर है। तब (हर बात पर) चिंता होती है। तब भी चिंता करते रहते हैं जब परमात्मा (हमारे मन से) भूल जाए। जब (परमात्मा के बिना) कोई और पदार्थ (परमात्मा से ज्यादा) प्यारा लगने लग जाता है। तब (भी बंदा) झुरता रहता है। पर जब (यह यकीन बना रहे कि परमात्मा) हरेक जगह व्यापक है। तब चिंता-फिकर समाप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य खिझ खिझ के आत्मिक मौत मरता रहता है। परमात्मा के नाम के बिना (माया की खातिर) भटक के भटक के भटक के दुखी होता रहता है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! अगर (ये ख्याल टिका रहे कि परमात्मा के बिना) कोई और कुछ कर सकने वाला है। तब चिंता-फिक्र में फसे रहते हैं। तब भी झुरते हैं जब ये ख्याल बना रहे कि कोई प्राणी परमात्मा के हुकम से बाहर मर सकता है। अगर यह यकीन टिक जाए कि परमात्मा हमारी आवश्यक्ताएं जानता नहीं। तब भी झुरते रहते हैं। पर। हे प्रभू ! आप तो हर जगह मौजूद है। फिर हम चिंता-फिक्र क्यों करें। 2। हे भाई ! कुछ भी परमात्मा के हुकम के बाहर नहीं होता। किसी को भी वह भुलेखे से दुखी नहीं करता। फिर चिंता-फिक्र क्यों किया जाऐ। हे भाई ! गुरू ने यह बताया है कि जो कुछ होता है सब प्रभू के हुकम से ही होता है। इस लिए हम तो चिंता-फिक्र छोड़ के (उसकी रज़ा में) बेफिक्र टिके हुए हैं। 3। हे प्रभू ! आप सब जीवों का मालिक है। हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है। जैसे आपकी रज़ा होती है। आप (जीवों की किस्मत का) फैसला करता है। हे प्रभू ! आपके बिना (आपके बराबर का) और कोई नहीं। आप ही हर जगह व्यापक है। हे नानक ! (प्रभू के ही दर पर अरदास किया कर कि। हे प्रभू !) मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी लाज रख। 4। 5। 18।
भैरउ महला 5 ॥
बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥
बिनु कंठै कैसे गावनहारी ॥
जील बिना कैसे बजै रबाब ॥
नाम बिना बिरथे सभि काज ॥1॥
नाम बिना कहहु को तरिआ ॥
बिनु सतिगुर कैसे पारि परिआ ॥1॥ रहाउ ॥
बिनु जिहवा कहा को बकता ॥
बिनु स्रवना कहा को सुनता ॥
बिनु नेत्रा कहा को पेखै ॥
नाम बिना नरु कही न लेखै ॥2॥
बिनु बिदिआ कहा कोई पंडित ॥
बिनु अमरै कैसे राज मंडित ॥
बिनु बूझे कहा मनु ठहराना ॥
नाम बिना सभु जगु बउराना ॥3॥
बिनु बैराग कहा बैरागी ॥
बिनु हउ तिआगि कहा कोऊ तिआगी ॥
बिनु बसि पंच कहा मन चूरे ॥
नाम बिना सद सद ही झूरे ॥4॥
बिनु गुर दीखिआ कैसे गिआनु ॥
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ॥
बिनु भै कथनी सरब बिकार ॥
कहु नानक दर का बीचार ॥5॥6॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (नृत्य के साथ) साज़ों के बिना नृत्य नहीं फबता। गले के बिना कोई गवईया गा नहीं सकता। तंदी के बिना रबाब नहीं बज सकती। (इसी तरह) परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (दुनिया वाले और) सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं। 1। हे भाई ! बताओ। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना कौन संसार समुंद्र से पार लांघ सकता है। गुरू की शरण पड़े बिना कैसे कोई पार लांघ सकता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ के बिना कोई बोलने योग्य नहीं हो सकता। कान के बिना कोई सुन नहीं सकता। आँखों के बिना कोई देख नहीं सकता। (इसी तरह) परमात्मा के नाम सिमरन के बिना मनुष्य की कोई बात नहीं पूछता। 2। हे भाई ! विद्या प्राप्ति के बगैर कोई पंडित नहीं बन सकता। (राजाओं के) हुकम के बिना राज की सजावटें किसी काम की नहीं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना मनुष्य का मन कहीं टिक नहीं सकता। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना सारा जगत पागल हुआ फिरता है। 3। हे भाई ! अगर वैरागी के अंदर माया के प्रति निर्मोह नहीं। तो वह वैरागी कैसा। अहंकार को त्यागे बिना कोई त्याग नहीं कहलवा सकता। कामादिक पाँचों को वश में किए बिना मन मारा नहीं जा सकता। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरन के बिना मनुष्य सदा ही सदा ही चिंता-फिक्र में पड़ा रहता है। 4। हे भाई ! गुरू के उपदेश के बिना आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ सकती। हे भाई ! वह समाधि कैसी। अगर अपने ईष्ट के दर्शन नहीं होते। हे भाई ! परमात्मा का डर-अदब हृदय में बसाए बिना मनुष्य का सारा चोंच-ज्ञान विकारों का मूल है। हे नानक ! कह- हे भाई ! परमात्मा के दर पर पहुँचाने वाली यही विचार है। 5। 6। 19।
भैरउ महला 5 ॥
हउमै रोगु मानुख कउ दीना ॥
काम रोगि मैगलु बसि लीना ॥
द्रिसटि रोगि पचि मुए पतंगा ॥
नाद रोगि खपि गए कुरंगा ॥1॥
जो जो दीसै सो सो रोगी ॥
रोग रहित मेरा सतिगुरु जोगी ॥1॥ रहाउ ॥
जिहवा रोगि मीनु ग्रसिआनो ॥
बासन रोगि भवरु बिनसानो ॥
हेत रोग का सगल संसारा ॥
त्रिबिधि रोग महि बधे बिकारा ॥2॥
रोगे मरता रोगे जनमै ॥
रोगे फिरि फिरि जोनी भरमै ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (परमात्मा ने) मनुष्य को अहंकार का रोग दे रखा है। काम-वासना के रोग ने हाथी को अपने वश में किया हुआ है। (दीए की ज्योति को) देखने के रोग के कारण पतंगे (दीए की ज्योति पर) जल मरते हैं। (घंडे हेड़े की) आवाज़ (सुनने) के रोग के कारण हिरन दुखी होते हैं। 1। हे भाई ! जो जो जीव (जगत में) दिखाई दे रहा है। हरेक किसी ना किसी रोग में फंसा हुआ है। (असल) जोगी मेरा सतिगुरू (सब) रोगों से रहित है। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ के रोग के कारण मछली पकड़ी जाती है। सुगंधि के रोग के कारण (फूल की सुगंधि लेने के रस के कारण) भँवरा (फूल की पंखुड़ियों में बंद हो के) नाश हो जाता है। हे भाई ! सारा जगत मोह के रोग का शिकार हुआ पड़ा है। त्रैगुणी माया के मोह के रोग में बँधे हुए जीव अनेकों विकार करते हैं। 2। हे भाई ! (मनुष्य किसी ना किसी आत्मिक) रोग में (फसा हुआ) ही मर जाता है। (किसी ना किसी आत्मिक) रोग में (ग्रसा हुआ) ही पैदा होता है। उस रोग के कारण ही बार-बार जूनियों में भटकता रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस सेवक के वह सारे काम सवारता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।