अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: अहंकार वाली बुद्धि के कारण उनकी अक्ल खोटी हुई रहती है। गुरू की शरण के बिना संसार-समुंद्र में उनके चक्कर लगते रहते हैं। 3। हे नानक ! हवन। यज्ञ। जप-तप साधनों से। इन्द्रियों को वश में करने वाले सारे साधनों से किसी पवित्र नदी के किनारे पर किसी तीर्थ पर (स्नान करने से) परमात्मा का मिलाप नहीं हो सकता। जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ते हैं उनके अंदर से स्वै भाव (अहंम्) मिट जाता है। हे नानक ! (परमात्मा) गुरू की शरण पा कर जगत (जगत के जीवों) को संसार-समुंद्र से पार लंघा लेता है। 4। 1। 14।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (तब मैंने) जंगल में। बनस्पति में (प्रभू को ही बसता) देख लिया। घर में भी उसी को देख लिया। और। त्यागी में भी उसी को देख लिया। तब मैंने उसको दण्ड-धारियों में। जटा-धारियों में बसता देख लिया। व्रत-नेम व तीर्थ-यात्रा करने वालों में भी देख लिया। 1। हे भाई ! जब संत जनों की संगति में परमात्मा के आनंद देने वाले गुण स्वाद से गा के मैंने उसको अपने मन में बसता देख लिया। तो आकाश-पाताल सब में वह व्यापक दिखाई दे गया। 1। रहाउ। हे भाई ! (जब मैंने परमात्मा को अपने अंदर बसता देखा। तब मैंने उस परमात्मा को) जोगियों में। सारे भेषों में। सन्यासियों में। जतियों में। जंगमों में। कापड़िए साधुओं में। सबमें बसता देख लिया। तब मैंने उसको तपियों में। बड़े-बड़े तपियों में। मुनियों में। नाटक करनेवाले नटों में। रासधारियों में (सबमें बसता) देख लिया। 2। हे भाई ! (जब साध-संगति की कृपा से मैंने परमात्मा को अपने अंदर बसता देखा। तब मैंने उसको) चार वेदों में। छह शास्त्रों में। अठारह पुराणों में। (सारी) स्मृतियों में बसता देख लिया। (जब मैंने यह देख लिया कि) सारे जीव-जंतु मिल के सिर्फ परमात्मा के ही गुण गा रहे हैं। तो अब मैं उसको किस तरह से दूर बैठा कह सकता हूँ। 3। हे भाई ! परमात्मा अथाह है। अगम है। बेअंत है। उसका मूल्य नहीं पाया जा सकता। वह किसी दुनियावी पदार्थ के बदले नहीं मिल सकता। हे दास नानक ! (कह- हे भाई ! वह प्रभू बसता तो सबमें ही है। पर) जिस-जिस (भाग्यशाली) के हृदय में वह प्रत्यक्ष हो गया है। उनसे सदके कुर्बान जाना चाहिए। 4। 2। 15।
भैरउ महला 5 ॥ निकटि बुझै सो बुरा किउ करै ॥ बिखु संचै नित डरता फिरै ॥ है निकटे अरु भेदु न पाइआ ॥ बिनु सतिगुर सभ मोही माइआ ॥1॥ नेड़ै नेड़ै सभु को कहै ॥ गुरमुखि भेदु विरला को लहै ॥1॥ रहाउ ॥ निकटि न देखै पर ग्रिहि जाइ ॥ दरबु हिरै मिथिआ करि खाइ ॥ पई ठगउरी हरि संगि न जानिआ ॥ बाझु गुरू है भरमि भुलानिआ ॥2॥ निकटि न जानै बोलै कूड़ु ॥ माइआ मोहि मूठा है मूड़ु ॥ अंतरि वसतु दिसंतरि जाइ ॥ बाझु गुरू है भरमि भुलाइ ॥3॥ जिसु मसतकि करमु लिखिआ लिलाट ॥ सतिगुरु सेवे खुल॑े कपाट ॥ अंतरि बाहरि निकटे सोइ ॥ जन नानक आवै न जावै कोइ ॥4॥3॥16॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा को अपने) नजदीक (बसता) समझता है वह (किसी के साथ कोई) बुराई नहीं कर सकता। पर जो मनुष्य आत्मिक मौत लाने वाली माया को हर वक्त जोड़ता रहता है। वह मनुष्य (हरेक तरफ से) सदा डरता फिरता है। हे भाई ! परमात्मा हरेक के नजदीक तो अवश्य बसता है। पर (नित्य माया जोड़ने वाला मनुष्य) यह भेद नहीं समझता। गुरू की शरण पड़े बिना सारी दुनिया माया के मोह में फसी रहती है। 1। हे भाई ! (कहने को तो) हरेक प्राणी (यह) कह देता है (कि परमात्मा सबके) नजदीक है (सबके) पास है। पर कोई विरला मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर इस गहरी बात को समझता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (वही मनुष्य) पराए घर में (चोरी की नीयत से) जाता है। जो परमात्मा को अपने पास बसता नहीं देखता। वह मनुष्य पराया धन चुराता है। और धन को नाशवान कह-कह के भी पराया माल खाए जाता है। माया ठॅग-बूटी उस पर अपना प्रभाव डाले रखती है। (इस वास्ते वह परमात्मा को अपने) साथ बसता नहीं समझता हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना भटकना में पड़ कर मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। 2। हे भाई ! (वही मनुष्य) झूठ बोलता है जो परमात्मा को अपने साथ बसता नहीं समझता। वह मूर्ख माया के मोह में फस के (अपनी आत्मिक राशि-पूँजी) लुटाए जाता है। परमात्मा का नाम-धन उसके हृदय में बसता है। पर वह (निरी माया की खातिर ही) बाहर भटकता फिरता है। हे भाई ! गुरू की शरण के बिना (जगत) भटकना के कारण गलत राह पर पड़ा रहता है। 3। हे दास नानक ! जिस मनुष्य के माथे पर लिलाट पर (परमात्मा की) बख्शिश (का लेख) लिखा उघड़ पड़ता है। वह गुरू की शरण आ पड़ता है। उसके मन में किवाड़ खुल जाते हैं। उसको अपने अंदर और बाहर जगत में एक परमात्मा ही बसता दिखाई देता है। (उसको ऐसा प्रतीत होता है कि परमात्मा के बिना और) कोई ना पैदा होता है ना मरता है। 4। 3। 16।
भैरउ महला 5 ॥ जिसु तू राखहि तिसु कउनु मारै ॥ सभ तुझ ही अंतरि सगल संसारै ॥ कोटि उपाव चितवत है प्राणी ॥ सो होवै जि करै चोज विडाणी ॥1॥ राखहु राखहु किरपा धारि ॥ तेरी सरणि तेरै दरवारि ॥1॥ रहाउ ॥ जिनि सेविआ निरभउ सुखदाता ॥ तिनि भउ दूरि कीआ एकु पराता ॥ जो तू करहि सोई फुनि होइ ॥ मारै न राखै दूजा कोइ ॥2॥ किआ तू सोचहि माणस बाणि ॥ अंतरजामी पुरखु सुजाणु ॥ एक टेक एको आधारु ॥ सभ किछु जाणै सिरजणहारु ॥3॥ जिसु ऊपरि नदरि करे करतारु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! जिसको आप बचाए। उसको कोई मार नहीं सकता। (क्योंकि) सारे संसार में सारी (उत्पक्ति) आपके ही अधीन है। हे भाई ! जीव (अपने वास्ते) करोड़ों उपाय सोचता रहता है। पर वही कुछ होता है जो आश्चर्यजनक करिश्मे करने वाला परमात्मा करता है। 1। मैं आपके दर पर आया हॅूँ। मेहर कर के मेरी रक्षा कर। रक्षा कर। हे प्रभू ! मैं आपकी शरण में आया हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने निर्भय और सारे सुख देने वाले परमात्मा की शरण ली। उसने (अपना हरेक) डर दूर कर लिया। उसने एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली। हे प्रभू ! जो कुछ आप करता है। वही होता है। (आपके बिना) कोई दूसरा ना किसी को मार सकता है ना बचा सकता है। 2। हे भाई ! (अपने) मनुष्य स्वभाव के अनुसार आप क्या (कौन सी) सोचें सोचता रहता है। सर्व-व्यापक परमात्मा हरेक के दिल की जानने वाला है समझदार है। (हम जीवों की) वही टेक है वही आसरा है। जीवों को पैदा करने वाला वह प्रभू सब कुछ जानता है। 3। हे भाई ! करतार जिस मनुष्य पर मिहर की निगाह करता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अहंकार वाली बुद्धि के कारण उनकी अक्ल खोटी हुई रहती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।