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अंग 1138

अंग
1138
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नाम बिना सभ दुनीआ छारु ॥1॥
अचरजु तेरी कुदरति तेरे कदम सलाह ॥
गनीव तेरी सिफति सचे पातिसाह ॥2॥
नीधरिआ धर पनह खुदाइ ॥
गरीब निवाजु दिनु रैणि धिआइ ॥3॥
नानक कउ खुदि खसम मिहरवान ॥
अलहु न विसरै दिल जीअ परान ॥4॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आपके नाम के बिना (जीव के लिए) सारी दुनिया (का धन-पदार्थ) राख (के तुल्य) है। 1। हे प्रभू ! आपकी रची कुदरति एक हैरान करने वाला तमाशा है। आपके चरण सराहनीय हैं। हे सदा कायम रहने वाले पातशाह ! आपकी सिफत-सालाह (एक) अमूल्य (खजाना) है। 2। हे भाई ! दिन-रात उस परमात्मा का नाम सिमरा कर। वह निआसरों का आसरा है (निओटों की) ओट है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू स्वयं दयावान होता है। उसकी जिंद से। उसके दिल से। उसके प्राणों से वह कभी नहीं बिसरता। 4। 10।
भैरउ महला 5 ॥
साच पदारथु गुरमुखि लहहु ॥
प्रभ का भाणा सति करि सहहु ॥1॥
जीवत जीवत जीवत रहहु ॥
राम रसाइणु नित उठि पीवहु ॥
हरि हरि हरि हरि रसना कहहु ॥1॥ रहाउ ॥
कलिजुग महि इक नामि उधारु ॥
नानकु बोलै ब्रहम बीचारु ॥2॥11॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (यह) सदा कायम रहने वाला (हरी-नाम) धन गुरू की शरण पड़ कर हासिल करो। परमात्मा द्वारा बरती हुई रज़ा को (अपने) भले के लिए जान के सहो। 1। (इस तरह) सदा आत्मिक जीवन वाले बने रहो। हे भाई ! सदा ही प्रयत्न करके सब रसों से श्रेष्ठ नाम-रस पीते रहो। हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम अपनी जीभ सें उचारते रहो। 1। रहाउ। हे भाई ! सिर्फ हरी-नाम से ही जगत में संसार-समुंद्र से पार-उतारा होता है। नानक (आपको) परमात्मा के साथ मिलाप की (यही) जुगति बताता है। 2। 11।
भैरउ महला 5 ॥
सतिगुरु सेवि सरब फल पाए ॥
जनम जनम की मैलु मिटाए ॥1॥
पतित पावन प्रभ तेरो नाउ ॥
पूरबि करम लिखे गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
साधू संगि होवै उधारु ॥
सोभा पावै प्रभ कै दुआर ॥2॥
सरब कलिआण चरण प्रभ सेवा ॥
धूरि बाछहि सभि सुरि नर देवा ॥3॥
नानक पाइआ नाम निधानु ॥
हरि जपि जपि उधरिआ सगल जहानु ॥4॥12॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जिसको गुरू मिल जाता है। वह) गुरू की शरण पड़ कर सारे फल (देने वाला हरी-नाम) प्राप्त कर लेता है (और। इस तरह) जन्मों-जन्मों के विकारों की मैल दूर कर लेता है। 1। हे प्रभू ! आपका नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। पर आपके गुण गाने की दाति उसी को मिलती है जिसने पूर्बले जनम में किए कर्मों के अनुसार (गुरू की प्राप्ति उसके भाग्यों में) लिखी है। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में रहने से संसार-समुंद्र से पार-उतारा हो जाता है। (जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। वह) परमात्मा के दर पर शोभा कमाता है। 2। हे भाई ! प्रभू के चरणों की सेवा-भक्ति से सारे सुख प्राप्त होते हैं। (जो मनुष्य प्रभू के चरणों में शरण लेता है) उसके चरणों की धूड़ सारे देवता-गण सारे दैवी-गुणों वाले मनुष्य लोचते हैं। 3। हे नानक ! (गुरू की शरण में रह के) नाम-खजाना मिल जाता है। (गुरू की संगति में) हरी-नाम जप-जप के सारा जगत संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 4। 12।
भैरउ महला 5 ॥
अपणे दास कउ कंठि लगावै ॥
निंदक कउ अगनि महि पावै ॥1॥
पापी ते राखे नाराइण ॥
पापी की गति कतहू नाही पापी पचिआ आप कमाइण ॥1॥ रहाउ ॥
दास राम जीउ लागी प्रीति ॥
निंदक की होई बिपरीति ॥2॥
पारब्रहमि अपणा बिरदु प्रगटाइआ ॥
दोखी अपणा कीता पाइआ ॥3॥
आइ न जाई रहिआ समाई ॥
नानक दास हरि की सरणाई ॥4॥13॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा अपने सेवक को (सदा अपने) गले से लगाए रखता है। और (अपने सेवक के) दोखी को (ईष्या की भीतर-भीतर से ही धुख रही) आग में डाले रखता है। 1। हे भाई ! निंदक-दोखी से परमात्मा (अपने सेवक को सदा स्वयं) बचाता है। निंदक-दोखी की आत्मिक अवस्था कभी भी ऊँची नहीं हो सकती। (क्योंकि) निंदक’दोखी अपने कमाए कर्मों के अनुसार (सदा निंदा-ईष्या की आग में अंदर-अंदर से) जलता रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के सेवक की परमात्मा के साथ प्रीति बनी रहती है। पर सेवक के दोखी का (निंदा-ईष्या आदि) बुरे कामों से प्यार बना रहता है। 2। हे भाई ! (सदा ही) परमात्मा ने (अपने सेवक की लाज रख कर) अपना मूल कदीमी का (यह) स्वभाव (बिरद) (जगत में) प्रकट किया है। (सेवक के) निंदक-दोखी ने (भी सदा) अपने किए बुरे कर्मों का फल भुगता है। 3। हे नानक ! जो परमात्मा ना पैदा होता है ना मरता है जो परमात्मा सब जगह व्यापक है। उसके दास (सदा ही) उसकी शरण में पड़े रहते हैं। 4। 13।
रागु भैरउ महला 5 चउपदे घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्रीधर मोहन सगल उपावन निरंकार सुखदाता ॥
ऐसा प्रभु छोडि करहि अन सेवा कवन बिखिआ रस माता ॥1॥
रे मन मेरे तू गोविद भाजु ॥
अवर उपाव सगल मै देखे जो चितवीऐ तितु बिगरसि काजु ॥1॥ रहाउ ॥
ठाकुरु छोडि दासी कउ सिमरहि मनमुख अंध अगिआना ॥
हरि की भगति करहि तिन निंदहि निगुरे पसू समाना ॥2॥
जीउ पिंडु तनु धनु सभु प्रभ का साकत कहते मेरा ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु भैरउ महला 5 चउपदे घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे मन ! जो सुंदर प्रभू ! लक्ष्मी का आसरा है। जो आकार-रहित प्रभूसबको पैदा करने वाला है। जो सारे सुख देने वाला है। उसको छोड़ के आप और-और की सेवा-पूजा करता है। आप माया के कोझे स्वादों में मस्त है। 1। हे मेरे मन ! आप (सदा) परमात्मा का नाम जपा कर। (सिमरन के बिना) और सारे उपाय (करते लोग) मैंने देखे हैं (यही) नतीजा निकलता देखा है (कि) और जो भी उपाय सोचा जाता है उस (तरीके) से (आत्मिक जीवन का) काम (बल्कि) बिगड़ता (ही) है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। माया के मोह में अंधे हो चुके मनुष्य। आत्मिक जीवन की सूझ से रहित मनुष्य मालिक-प्रभू को छोड़ के उसकी दासी (माया) को ही हर वक्त याद रखते हैं। ऐसे निगुरे मनुष्य। पशुओं जैसे जीवन वाले मनुष्य उन लोगों की निंदा करते हैं जो परमात्मा की भक्ति करते हैं। 2। हे भाई ! यह जिंद ये शरीर ये धन- ये सब कुछ परमात्मा का दिया हुआ है। पर परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य कहते रहते हैं कि यह हरेक चीज़ हमारी है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके नाम के बिना (जीव के लिए) सारी दुनिया (का धन-पदार्थ) राख (के तुल्य) है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।