अचरजु तेरी कुदरति तेरे कदम सलाह ॥
गनीव तेरी सिफति सचे पातिसाह ॥2॥
नीधरिआ धर पनह खुदाइ ॥
गरीब निवाजु दिनु रैणि धिआइ ॥3॥
नानक कउ खुदि खसम मिहरवान ॥
अलहु न विसरै दिल जीअ परान ॥4॥10॥
साच पदारथु गुरमुखि लहहु ॥
प्रभ का भाणा सति करि सहहु ॥1॥
जीवत जीवत जीवत रहहु ॥
राम रसाइणु नित उठि पीवहु ॥
हरि हरि हरि हरि रसना कहहु ॥1॥ रहाउ ॥
कलिजुग महि इक नामि उधारु ॥
नानकु बोलै ब्रहम बीचारु ॥2॥11॥
सतिगुरु सेवि सरब फल पाए ॥
जनम जनम की मैलु मिटाए ॥1॥
पतित पावन प्रभ तेरो नाउ ॥
पूरबि करम लिखे गुण गाउ ॥1॥ रहाउ ॥
साधू संगि होवै उधारु ॥
सोभा पावै प्रभ कै दुआर ॥2॥
सरब कलिआण चरण प्रभ सेवा ॥
धूरि बाछहि सभि सुरि नर देवा ॥3॥
नानक पाइआ नाम निधानु ॥
हरि जपि जपि उधरिआ सगल जहानु ॥4॥12॥
अपणे दास कउ कंठि लगावै ॥
निंदक कउ अगनि महि पावै ॥1॥
पापी ते राखे नाराइण ॥
पापी की गति कतहू नाही पापी पचिआ आप कमाइण ॥1॥ रहाउ ॥
दास राम जीउ लागी प्रीति ॥
निंदक की होई बिपरीति ॥2॥
पारब्रहमि अपणा बिरदु प्रगटाइआ ॥
दोखी अपणा कीता पाइआ ॥3॥
आइ न जाई रहिआ समाई ॥
नानक दास हरि की सरणाई ॥4॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
स्रीधर मोहन सगल उपावन निरंकार सुखदाता ॥
ऐसा प्रभु छोडि करहि अन सेवा कवन बिखिआ रस माता ॥1॥
रे मन मेरे तू गोविद भाजु ॥
अवर उपाव सगल मै देखे जो चितवीऐ तितु बिगरसि काजु ॥1॥ रहाउ ॥
ठाकुरु छोडि दासी कउ सिमरहि मनमुख अंध अगिआना ॥
हरि की भगति करहि तिन निंदहि निगुरे पसू समाना ॥2॥
जीउ पिंडु तनु धनु सभु प्रभ का साकत कहते मेरा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! आपके नाम के बिना (जीव के लिए) सारी दुनिया (का धन-पदार्थ) राख (के तुल्य) है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।