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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1137 · भैरों

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अंग
1137
भैरों
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  1. खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥
  2. जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥
  3. आगै दयु पाछै नाराइण ॥
  4. कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥
  5. लेपु न लागो तिल का मूलि ॥
  6. खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥

अंग 1136 से चला आ रहा अंश

खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥
जैसे दह दिस पवनु झुलाइआ ॥3॥
बिनु कण खलहानु जैसे गाहन पाइआ ॥
तिउ साकत ते को न बरासाइआ ॥4॥
तित ही लागा जितु को लाइआ ॥
कहु नानक प्रभि बणत बणाइआ ॥5॥5॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अगर किसी अनपढ़ मूर्ख को छे शास्त्र सुनाए जाएं (वह अनपढ़ बेचारा क्या समझे उन शास्त्रों को। उसके जानिब तो यूं है) जैसे उसके (चारों तरफ) दसों दिशाओं में (सिर्फ) हवा ही चल रही है (यही हाल है साकत का)। 3। हे भाई ! जैसे अन्न के दानों के बिना कोई खलिहान गाहा जाय (तो उसमें से दानों का बोहल नहीं बनेगा)। वैसे ही परमात्मा के चरणों से टूटे हुए मनुष्य से कोई मनुष्य आत्मिक जीवन की खुराक प्राप्त नहीं कर सकता। 4। पर। हे भाई ! (साकत के भी क्या वश।) हर कोई उस (काम) में ही लगता है जिसमें (परमात्मा द्वारा) वह लगाया जाता है। हे नानक ! कह- (कोई साकत है और कोई संत है- यह) खेल प्रभू ने स्वयं ही बनाई हुई है। 5। 5।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥

भैरउ महला 5 ॥
जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥
जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥1॥
गुरु गोबिंदु जीअ कै काम ॥
हलति पलति जा की सद छाम ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु आराधन निरमल रीति ॥
साधसंगि बिनसी बिपरीति ॥2॥
मीत हीत धनु नह पारणा ॥
धंनि धंनि मेरे नाराइणा ॥3॥
नानकु बोलै अंम्रित बाणी ॥
एक बिना दूजा नही जाणी ॥4॥6॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने जिंद-प्राण (दे के जीवों के) शरीर रचे हैं। हे भाई ! जिस परमात्मा ने जीव पैदा किए हैं। उसको ही (जीवों का) दर्द है। 1। हे भाई ! जिस (गुरू) का जिस (गोबिंद) का इस लोक में और परलोक में सदा (मनुष्य को) आसरा है। वह गुरू (ही) वह गोबिंद (ही) जिंद की सहायता करने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरना ही पवित्र जीवन-जुगति है (ये जीवन-जुगति साध-संगति में प्राप्त होती है)। हे भाई ! साध-संगति में रहके (सिमरन से) उल्टी जीवन-जुगति नाश हो जाती है (भाव। सिमरन ना करने की बुरी वादी खत्म हो जाती है)। 2। हे भाई ! मित्र, हितैषी, धन- यह (मनुष्य की जिंद का) सहारा नहीं हैं। हे मेरे परमात्मा ! (आप ही हम जीवों का आसरा हैं) आप ही सलाहनेयोग्य हैं। आप ही सराहनीय हैं। 3। हे भाई ! नानक आत्मिक जीवन देने वाला (यह) बचन कहता है कि एक परमात्मा के बिना किसी और को (जिंदगी का सहारा) ना समझना। 4। 6।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

आगै दयु पाछै नाराइण ॥

भैरउ महला 5 ॥
आगै दयु पाछै नाराइण ॥
मधि भागि हरि प्रेम रसाइण ॥1॥
प्रभू हमारै सासत्र सउण ॥
सूख सहज आनंद ग्रिह भउण ॥1॥ रहाउ ॥
रसना नामु करन सुणि जीवे ॥
प्रभु सिमरि सिमरि अमर थिरु थीवे ॥2॥
जनम जनम के दूख निवारे ॥
अनहद सबद वजे दरबारे ॥3॥
करि किरपा प्रभि लीए मिलाए ॥
नानक प्रभ सरणागति आए ॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! आगे आने वाले समय में परमात्मा ही (हम जीवों पर) तरस करने वाला है। बीत चुके समय में भी परमात्मा ही (हमारा रखवाला था)। अब भी सारे सुखों का दाता प्रभू ही (हमारे साथ) प्यार करने वाला है। 1। हे भाई ! प्रभू का नाम ही हमारे लिए अच्छा महूरत बताने वाला शास्त्र है (जिसके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। उस) हृदय-घर में सदा आत्मिक अडोलता के सुख हैं आनंद हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ से नाम (जप के)। कानों से (नाम) सुन के (अनेकों ही जीव) आत्मिक जीवन प्राप्त कर गए। परमात्मा का नाम सदा सिमर के (अनेकों जीव) आत्मिक मौत से बच गए। (विकारों के मुकाबले पर) अडोल-चित्त बने रहे। 2। हे भाई ! (जिन्होंने परमात्मा के नाम को जीवन का आसरा बनाया। उन्होंने अपने) अनेकों ही जन्मों के दुख-पाप दूर कर लिए। उनके हृदय-दरबार में यॅूँ एक-रस आनंद बन गया जैसे पाँचों ही किस्मों के साज़ बजने से संगीतक रस बनता है। 3। हे नानक ! परमात्मा ने कृपा करके उनको अपने चरणों में जोड़ लिया। (जो मनुष्य शगन आदि के भ्रम छोड़ के सीधे) परमात्मा की शरण आ पड़े। 4। 7।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥

भैरउ महला 5 ॥
कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥
जम मारग कै संगी पांथ ॥1॥
गंगा जलु गुर गोबिंद नाम ॥
जो सिमरै तिस की गति होवै पीवत बहुड़ि न जोनि भ्रमाम ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा जाप ताप इसनान ॥
सिमरत नाम भए निहकाम ॥2॥
राज माल सादन दरबार ॥
सिमरत नाम पूरन आचार ॥3॥
नानक दास इहु कीआ बीचारु ॥
बिनु हरि नाम मिथिआ सभ छारु ॥4॥8॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जो मनुष्य नाम जपता है उसके) मन की करोड़ों माँगें पूरी हो जाती हैं। मरने के बाद भी यह नाम ही उसका साथी बनता है सहायक बनता है। 1। हे भाई ! गुरू गोबिंद का नाम (ही असल) गंगा-जल है। जो मनुष्य (गोबिंद का नाम) सिमरता है। उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। जो (इस नाम गंगा-जल को) पीता है दोबारा जूनियों में नहीं भटकता। 1। रहाउ। हे भाई ! हरि-नाम ही (देव-) पूजा है। नाम ही जप-तप है। नाम ही तीर्थ-स्नान है। नाम सिमरने से (सिमरन करने वाले) दुनियावी वासनाओं से रहत हो जाते हैं। 2। हे भाई ! राज, माल, महल-माढ़ियां, दरबार लगाने (जो सुख इनमें हैं। नाम-सिमरन वालों को वह सुख नाम-सिमरन से प्राप्त होते हैं)। हे भाई ! हरी-नाम सिमरते हुए मनुष्य का आचरण स्वच्छ बन जाता है। 3। हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने यह निष्चय किया होता है कि परमात्मा के नाम के बिना और सारी (माया) नाशवंत है राख (के तुल्य) है। 4। 8।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

लेपु न लागो तिल का मूलि ॥

भैरउ महला 5 ॥
लेपु न लागो तिल का मूलि ॥
दुसटु ब्राहमणु मूआ होइ कै सूल ॥1॥
हरि जन राखे पारब्रहमि आपि ॥
पापी मूआ गुर परतापि ॥1॥ रहाउ ॥
अपणा खसमु जनि आपि धिआइआ ॥
इआणा पापी ओहु आपि पचाइआ ॥2॥
प्रभ मात पिता अपणे दास का रखवाला ॥
निंदक का माथा ईहां ऊहा काला ॥3॥
जन नानक की परमेसरि सुणी अरदासि ॥
मलेछु पापी पचिआ भइआ निरासु ॥4॥9॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (परमात्मा की मेहर से अपने सेवक पर हुई है। बालक (गुरू) हरि गोबिंद पर दुष्ट की बुरी करतूत का) बिल्कुल भी बुरा असर नहीं हो सका (पर गुरू के प्रताप से वह) दुष्ट ब्राहमण (पेट में) शूल उठने के कारण मर गया है। 1। हे भाई ! परमात्मा ने अपने सेवकों की रक्षा (सदा ही) स्वयं की है। (देखो, विश्वासघाती ब्राहमण) दुष्ट गुरू के प्रताप से (स्वयं ही) मर गया है। 1। रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा ने अपने सेवकों की स्वयं रक्षा की है। क्योंकि) सेवक ने अपने मालिक-प्रभू को सदा अपने हृदय में बसाया है। वह बेसमझ दुष्ट (इस ईश्वरीय भेद को समझ ना सका। और परमात्मा ने) स्वयं ही उसको मार डाला। 2। हे भाई ! माता-पिता (की तरह) प्रभू अपने सेवक का सदा स्वयं ही रखवाला बनता है (तभी प्रभू के सेवक के) दोखी का मुँह लोक-परलोक दोनों जहानों में काला होता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) अपने सेवक की परमेश्वर ने (अरदास) सुनी है (देखो। परमेश्वर के सेवक पर वार करने वाला) दुष्ट पापी (खुद ही) मर गया। और बेमुराद ही रहा। 4। 9।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग भैरों

खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥

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भैरउ महला 5 ॥
खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥
झूठु झूठु झूठु झूठु दुनी गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
नगज तेरे बंदे दीदारु अपारु ॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आपका नाम सोहाना है। आपका नाम मीठा है। आपका नाम अच्छा है। (पर हे भाई !) दुनिया का मान झूठ है। जल्दी खत्म हो जाने वाला है। दुनिया के माण का क्या भरोसा। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपकी भक्ति करने वाले बंदे सुंदर हैं। उनका दर्शन बेअंत (अमूल्य) है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1137 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।