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अंग 1137

अंग
1137
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खटु सासत्र मूरखै सुनाइआ ॥
जैसे दह दिस पवनु झुलाइआ ॥3॥
बिनु कण खलहानु जैसे गाहन पाइआ ॥
तिउ साकत ते को न बरासाइआ ॥4॥
तित ही लागा जितु को लाइआ ॥
कहु नानक प्रभि बणत बणाइआ ॥5॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अगर किसी अनपढ़ मूर्ख को छे शास्त्र सुनाए जाएं (वह अनपढ़ बेचारा क्या समझे उन शास्त्रों को। उसके जानिब तो यूं है) जैसे उसके (चारों तरफ) दसों दिशाओं में (सिर्फ) हवा ही चल रही है (यही हाल है साकत का)। 3। हे भाई ! जैसे अन्न के दानों के बिना कोई खलिहान गाहा जाय (तो उसमें से दानों का बोहल नहीं बनेगा)। वैसे ही परमात्मा के चरणों से टूटे हुए मनुष्य से कोई मनुष्य आत्मिक जीवन की खुराक प्राप्त नहीं कर सकता। 4। पर। हे भाई ! (साकत के भी क्या वश।) हर कोई उस (काम) में ही लगता है जिसमें (परमात्मा द्वारा) वह लगाया जाता है। हे नानक ! कह- (कोई साकत है और कोई संत है- यह) खेल प्रभू ने स्वयं ही बनाई हुई है। 5। 5।
भैरउ महला 5 ॥
जीउ प्राण जिनि रचिओ सरीर ॥
जिनहि उपाए तिस कउ पीर ॥1॥
गुरु गोबिंदु जीअ कै काम ॥
हलति पलति जा की सद छाम ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभु आराधन निरमल रीति ॥
साधसंगि बिनसी बिपरीति ॥2॥
मीत हीत धनु नह पारणा ॥
धंनि धंनि मेरे नाराइणा ॥3॥
नानकु बोलै अंम्रित बाणी ॥
एक बिना दूजा नही जाणी ॥4॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! जिस (परमात्मा) ने जिंद-प्राण (दे के जीवों के) शरीर रचे हैं। हे भाई ! जिस परमात्मा ने जीव पैदा किए हैं। उसको ही (जीवों का) दर्द है। 1। हे भाई ! जिस (गुरू) का जिस (गोबिंद) का इस लोक में और परलोक में सदा (मनुष्य को) आसरा है। वह गुरू (ही) वह गोबिंद (ही) जिंद की सहायता करने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरना ही पवित्र जीवन-जुगति है (ये जीवन-जुगति साध-संगति में प्राप्त होती है)। हे भाई ! साध-संगति में रहके (सिमरन से) उल्टी जीवन-जुगति नाश हो जाती है (भाव। सिमरन ना करने की बुरी वादी खत्म हो जाती है)। 2। हे भाई ! मित्र। हितैषी। धन- यह (मनुष्य की जिंद का) सहारा नहीं हैं। हे मेरे परमात्मा ! (आप ही हम जीवों का आसरा है) आप ही सलाहनेयोग्य है। आप ही सराहनीय है। 3। हे भाई ! नानक आत्मिक जीवन देने वाला (यह) बचन कहता है कि एक परमात्मा के बिना किसी और को (जिंदगी का सहारा) ना समझना। 4। 6।
भैरउ महला 5 ॥
आगै दयु पाछै नाराइण ॥
मधि भागि हरि प्रेम रसाइण ॥1॥
प्रभू हमारै सासत्र सउण ॥
सूख सहज आनंद ग्रिह भउण ॥1॥ रहाउ ॥
रसना नामु करन सुणि जीवे ॥
प्रभु सिमरि सिमरि अमर थिरु थीवे ॥2॥
जनम जनम के दूख निवारे ॥
अनहद सबद वजे दरबारे ॥3॥
करि किरपा प्रभि लीए मिलाए ॥
नानक प्रभ सरणागति आए ॥4॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! आगे आने वाले समय में परमात्मा ही (हम जीवों पर) तरस करने वाला है। बीत चुके समय में भी परमात्मा ही (हमारा रखवाला था)। अब भी सारे सुखों का दाता प्रभू ही (हमारे साथ) प्यार करने वाला है। 1। हे भाई ! प्रभू का नाम ही हमारे लिए अच्छा महूरत बताने वाला शास्त्र है (जिसके हृदय में प्रभू का नाम बसता है। उस) हृदय-घर में सदा आत्मिक अडोलता के सुख हैं आनंद हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जीभ से नाम (जप के)। कानों से (नाम) सुन के (अनेकों ही जीव) आत्मिक जीवन प्राप्त कर गए। परमात्मा का नाम सदा सिमर के (अनेकों जीव) आत्मिक मौत से बच गए। (विकारों के मुकाबले पर) अडोल-चित्त बने रहे। 2। हे भाई ! (जिन्होंने परमात्मा के नाम को जीवन का आसरा बनाया। उन्होंने अपने) अनेकों ही जन्मों के दुख-पाप दूर कर लिए। उनके हृदय-दरबार में यॅूँ एक-रस आनंद बन गया जैसे पाँचों ही किस्मों के साज़ बजने से संगीतक रस बनता है। 3। हे नानक ! परमात्मा ने कृपा करके उनको अपने चरणों में जोड़ लिया। (जो मनुष्य शगन आदि के भ्रम छोड़ के सीधे) परमात्मा की शरण आ पड़े। 4। 7।
भैरउ महला 5 ॥
कोटि मनोरथ आवहि हाथ ॥
जम मारग कै संगी पांथ ॥1॥
गंगा जलु गुर गोबिंद नाम ॥
जो सिमरै तिस की गति होवै पीवत बहुड़ि न जोनि भ्रमाम ॥1॥ रहाउ ॥
पूजा जाप ताप इसनान ॥
सिमरत नाम भए निहकाम ॥2॥
राज माल सादन दरबार ॥
सिमरत नाम पूरन आचार ॥3॥
नानक दास इहु कीआ बीचारु ॥
बिनु हरि नाम मिथिआ सभ छारु ॥4॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (जो मनुष्य नाम जपता है उसके) मन की करोड़ों माँगें पूरी हो जाती हैं। मरने के बाद भी यह नाम ही उसका साथी बनता है सहायक बनता है। 1। हे भाई ! गुरू गोबिंद का नाम (ही असल) गंगा-जल है। जो मनुष्य (गोबिंद का नाम) सिमरता है। उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। जो (इस नाम गंगा-जल को) पीता है दोबारा जूनियों में नहीं भटकता। 1। रहाउ। हे भाई ! हरि-नाम ही (देव-) पूजा है। नाम ही जप-तप है। नाम ही तीर्थ-स्नान है। नाम सिमरने से (सिमरन करने वाले) दुनियावी वासनाओं से रहत हो जाते हैं। 2। हे भाई ! राज। माल। महल-माढ़ियां। दरबार लगाने (जो सुख इनमें हैं। नाम-सिमरन वालों को वह सुख नाम-सिमरन से प्राप्त होते हैं)। हे भाई ! हरी-नाम सिमरते हुए मनुष्य का आचरण स्वच्छ बन जाता है। 3। हे नानक ! प्रभू के सेवकों ने यह निष्चय किया होता है कि परमात्मा के नाम के बिना और सारी (माया) नाशवंत है राख (के तुल्य) है। 4। 8।
भैरउ महला 5 ॥
लेपु न लागो तिल का मूलि ॥
दुसटु ब्राहमणु मूआ होइ कै सूल ॥1॥
हरि जन राखे पारब्रहमि आपि ॥
पापी मूआ गुर परतापि ॥1॥ रहाउ ॥
अपणा खसमु जनि आपि धिआइआ ॥
इआणा पापी ओहु आपि पचाइआ ॥2॥
प्रभ मात पिता अपणे दास का रखवाला ॥
निंदक का माथा ईहां ऊहा काला ॥3॥
जन नानक की परमेसरि सुणी अरदासि ॥
मलेछु पापी पचिआ भइआ निरासु ॥4॥9॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे भाई ! (परमात्मा की मेहर से अपने सेवक पर हुई है। बालक (गुरू) हरि गोबिंद पर दुष्ट की बुरी करतूत का) बिल्कुल भी बुरा असर नहीं हो सका (पर गुरू के प्रताप से वह) दुष्ट ब्राहमण (पेट में) शूल उठने के कारण मर गया है। 1। हे भाई ! परमात्मा ने अपने सेवकों की रक्षा (सदा ही) स्वयं की है। (देखो। विश्वासघाती ब्राहमण) दुष्ट गुरू के प्रताप से (स्वयं ही) मर गया है। 1। रहाउ। हे भाई ! (परमात्मा ने अपने सेवकों की स्वयं रक्षा की है। क्योंकि) सेवक ने अपने मालिक-प्रभू को सदा अपने हृदय में बसाया है। वह बेसमझ दुष्ट (इस ईश्वरीय भेद को समझ ना सका। और परमात्मा ने) स्वयं ही उसको मार डाला। 2। हे भाई ! माता-पिता (की तरह) प्रभू अपने सेवक का सदा स्वयं ही रखवाला बनता है (तभी प्रभू के सेवक के) दोखी का मुँह लोक-परलोक दोनों जहानों में काला होता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) अपने सेवक की परमेश्वर ने (अरदास) सुनी है (देखो। परमेश्वर के सेवक पर वार करने वाला) दुष्ट पापी (खुद ही) मर गया। और बेमुराद ही रहा। 4। 9।
भैरउ महला 5 ॥
खूबु खूबु खूबु खूबु खूबु तेरो नामु ॥
झूठु झूठु झूठु झूठु दुनी गुमानु ॥1॥ रहाउ ॥
नगज तेरे बंदे दीदारु अपारु ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 5॥ हे प्रभू ! आपका नाम सोहाना है। आपका नाम मीठा है। आपका नाम अच्छा है। (पर हे भाई !) दुनिया का मान झूठ है। जल्दी खत्म हो जाने वाला है। दुनिया के माण का क्या भरोसा। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपकी भक्ति करने वाले बंदे सुंदर हैं। उनका दर्शन बेअंत (अमूल्य) है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अगर किसी अनपढ़ मूर्ख को छे शास्त्र सुनाए जाएं (वह अनपढ़ बेचारा क्या समझे उन शास्त्रों को।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।