Lulla Family

अंग 1135

अंग
1135
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मधुसूदनु जपीऐ उर धारि ॥
देही नगरि तसकर पंच धातू गुर सबदी हरि काढे मारि ॥1॥ रहाउ ॥
जिन का हरि सेती मनु मानिआ तिन कारज हरि आपि सवारि ॥
तिन चूकी मुहताजी लोकन की हरि अंगीकारु कीआ करतारि ॥2॥
मता मसूरति तां किछु कीजै जे किछु होवै हरि बाहरि ॥
जो किछु करै सोई भल होसी हरि धिआवहु अनदिनु नामु मुरारि ॥3॥
हरि जो किछु करे सु आपे आपे ओहु पूछि न किसै करे बीचारि ॥
नानक सो प्रभु सदा धिआईऐ जिनि मेलिआ सतिगुरु किरपा धारि ॥4॥1॥5॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! (दैत्यों का विनाश करने वाले) परमात्मा का नाम हृदय में बसा के जपना चाहिए। (जो मनुष्य नाम जपता है) वह गुरू के शबद की बरकति से (अपने) शरीर नगर में (बस रहे) भटकना में डालने वाले (कामादिक) पाँचों चोरों को मार के बाहर निकाल देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों का मन परमात्मा (की याद) में जुड़ जाता है उनके सारे काम परमात्मा आप सँवारता है। करतार ने सदा उनकी सहायता की होती है (इसलिए) उनके अंदर से लोगों की मुथाजी समाप्त हो चुकी होती है। 2। हे भाई ! अपने मन की सलाह अपने मन का मश्वरा तब ही कोई किया जा सकता है अगर परमात्मा से बाहर कोई भी काम हो सकता हैं। हे भाई ! जो कुछ परमात्मा करता है वह हमारे भले के वास्ते ही होता है। (इस वास्ते। हे भाई !) हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरते रहा करो। 3। हे भाई ! परमात्मा जो कुछ करता है स्वयं ही करता है खुद ही करता है। वह किसी से पूछ के नहीं करता। किसी के साथ विचार करके नहीं करता। हे नानक ! उस परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए जिस ने मेहर कर के (हमें) गुरू से मिलाया है। 4। 1। 5।
भैरउ महला 4 ॥
ते साधू हरि मेलहु सुआमी जिन जपिआ गति होइ हमारी ॥
तिन का दरसु देखि मनु बिगसै खिनु खिनु तिन कउ हउ बलिहारी ॥1॥
हरि हिरदै जपि नामु मुरारी ॥
क्रिपा क्रिपा करि जगत पित सुआमी हम दासनि दास कीजै पनिहारी ॥1॥ रहाउ ॥
तिन मति ऊतम तिन पति ऊतम जिन हिरदै वसिआ बनवारी ॥
तिन की सेवा लाइ हरि सुआमी तिन सिमरत गति होइ हमारी ॥2॥
जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते हरि दरगह काढे मारी ॥
ते नर निंदक सोभ न पावहि तिन नक काटे सिरजनहारी ॥3॥
हरि आपि बुलावै आपे बोलै हरि आपि निरंजनु निरंकारु निराहारी ॥
हरि जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलसी जन नानक किआ एहि जंत विचारी ॥4॥2॥6॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 4॥ हे हरी ! हे स्वामी ! मुझे उन गुरमुखों से मिलाप करा दे। जिनको याद करने से मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन जाए। उनका दर्शन करके मेरा मन खिला रहे। हे हरी ! मैं एक-एक छिन उनसे सदके जाता हूँ। 1। हे हरी ! हे जगत के पिता ! हे स्वामी ! (मेरे पर मेहर कर) मैं (सदा) आपका नाम जपता रहूँ। (मेरे पर) मेहर कर। मेहर कर। मुझे अपने दासों का दास बना ले। मुझे अपने दासों का पानी ढोने वाला सेवक बना ले। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन (गुरमुखों) के दिल में परमात्मा का नाम (सदा) बसता है। उनकी मति श्रेष्ठ होती है। उनको (लोक-परलोक में) उक्तम आदर मिलता है। हे हरी ! हे स्वामी ! मुझे उन (गुरमुखों की) सेवा में लगाए रख। उनको याद करने से मुझे उच्च आत्मिक अवस्था मिल सकती है। 2। हे भाई ! (जिस गुरू की शरण पड़ने से ऊँची आत्मिक अवस्था मिल जाती है) जिन मनुष्यों को ऐसा साधू गुरू नहीं मिला। वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में से धक्के मार के बाहर निकाल दिए जाते हैं। वह निंदक मनुष्य (कहीं भी) शोभा नहीं पाते। सृजनहार ने (स्वयं) उनका नाक-कान काट दिया हुआ है। 3। (पर जीवों के भी क्या वश।) जो परमात्मा माया के प्रभाव से परे रहता है। जिस परमात्मा का कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता। जिस परमात्मा को (जीवों की तरह) किसी खुराक की आवश्यक्ता नहीं। वह परमात्मा स्वयं ही (सब जीवों को) बोलने की प्रेरणा देता है। वह परमात्मा स्वयं ही (सब जीवों में बैठा) बोलता है। हे नानक ! (कह-) हे हरी ! जिस मनुष्य को आप (अपने साथ) मिलाता है। वही आपको मिल सकता है। इन निमाणे जीवों के वश में कुछ नहीं। 4। 2। 6।
भैरउ महला 4 ॥
सतसंगति साई हरि तेरी जितु हरि कीरति हरि सुनणे ॥
जिन हरि नामु सुणिआ मनु भीना तिन हम स्रेवह नित चरणे ॥1॥
जगजीवनु हरि धिआइ तरणे ॥
अनेक असंख नाम हरि तेरे न जाही जिहवा इतु गनणे ॥1॥ रहाउ ॥
गुरसिख हरि बोलहु हरि गावहु ले गुरमति हरि जपणे ॥
जो उपदेसु सुणे गुर केरा सो जनु पावै हरि सुख घणे ॥2॥
धंनु सु वंसु धंनु सु पिता धंनु सु माता जिनि जन जणे ॥
जिन सासि गिरासि धिआइआ मेरा हरि हरि से साची दरगह हरि जन बणे ॥3॥
हरि हरि अगम नाम हरि तेरे विचि भगता हरि धरणे ॥
नानक जनि पाइआ मति गुरमति जपि हरि हरि पारि पवणे ॥4॥3॥7॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 4॥ हे हरी ! (वही एकत्रता) आपकी साध-संगति (कहलवा सकती) है। जिसमें। हे हरी ! आपकी सिफतसालाह (आपकी उस्तति) सुनी जाती है। हे भाई ! (साध-संगति में रह के) जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सुना है (साध-संगति में टिक के) जिनका मन (हरी-नाम-अमृत में) भीग गया है। मैं उनके चरणों की सेवा करनी (अपना) सौभाग्य समझता हूँ। 1। हे भाई ! जगत के जीवन प्रभू को हरी को सिमर के संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है। हे हरी ! (आपकी उस्तति से बने हुए) आपके नाम अनेकों हैं अनगिनत हैं। इस जीभ से गिने नहीं जा सकते। 1। रहाउ। हे गुरू के सिखो ! गुरू की शिक्षा ले के परमात्मा का नाम उचारा करो। परमात्मा की सिफतसालाह गाया करो। हरी का नाम जपा करो। हे गुरसिखो ! जो मनुष्य गुरू का उपदेश (श्रद्धा से) सुनता है। वही हरी के दर से बहुत सुख प्राप्त करता है। 2। हे भाई ! भाग्यशाली है वह कुल। धन्य है वह पिता धन्य है वह माँ जिसने भगत-जनों को जन्म दिया। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने अपने हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ परमात्मा का नाम सिमरा है। वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा की दरगाह में शोभा वाले बन जाते हैं। 3। हे हरी ! (आपके बेअंत गुणों के कारण) आपके बेअंत ही नाम हैं। तूने अपने वह नाम अपने भगतों के हृदय में टिकाए हुए हैं। हे नानक ! जिस-जिस सेवक ने गुरू की मति पर चल के परमात्मा का नाम प्राप्त किया है। वह सदा नाम जप के संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 4। 3। 7।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! (दैत्यों का विनाश करने वाले) परमात्मा का नाम हृदय में बसा के जपना चाहिए।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।