नामे नामि मिलै वडिआई जिस नो मंनि वसाए ॥2॥ सतिगुरु भेटै ता फलु पाए सचु करणी सुख सारु ॥ से जन निरमल जो हरि लागे हरि नामे धरहि पिआरु ॥3॥ तिन की रेणु मिलै तां मसतकि लाई जिन सतिगुरु पूरा धिआइआ ॥ नानक तिन की रेणु पूरै भागि पाईऐ जिनी राम नामि चितु लाइआ ॥4॥3॥13॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य को (शबद की लगन लगा के उसके) मन में (अपना नाम) बसाता है। सदा हरी-नाम में टिके रहने के कारण उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। 2। हे भाई ! सदा-स्थिर हरी-नाम का सिमरन ही (असल) कर्तव्य है। (नाम-सिमरन ही) सबसे श्रेष्ठ सुख है। पर यह (हरी-नाम-सिमरन) फल मनुष्य को तभी मिलता है जब इसको गुरू मिलता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की याद में जुड़ते हैं। परमात्मा के नाम में प्यार डालते हैं। वे मनुष्य पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। 3। हे भाई ! जो मनुष्य पूरे गुरू को हृदय में बसाते हैं। अगर मुझे उनकी चरण-धूल मिल जाए। तो वह धूड़ मैं अपने माथे पर लगा लूँ। हे नानक ! जो मनुष्य सदा अपना चित्त परमात्मा के नाम में जोड़े रखते हैं। उनके चरणों की धूल बड़ी किस्मत से मिलती है। 4। 3। 13।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के शबद को (अपने) मन में बसाता है। वह मनुष्य (माया के हमलों से) अडोल-चित्त हो जाता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में सदा कायम रहने वाला परमात्मा बस जाता है। जो मनुष्य दिन-रात सदा-स्थिर प्रभू की भक्ति करते हैं। उनके शरीर में कोई (विकार-) दुख नहीं पैदा होता। 1। (जिस मनुष्य को मिल जाता है। उसके बारे में) हर कोई कहता है कि ये भगत है भगत है। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। पूरी किस्मत से ही (किसी मनुष्य को) वह परमात्मा मिलता है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (अपना) सरमाया (ही) गवा लेते हैं। पर माँगते हैं (आत्मिक) लाभ। (बताओ। उनको) कैसे कमाई हो सकती है। लाभ कहाँ से मिले। आत्मिक मौत सदा उनके सर पर सवार रहती है। माया के प्यार में (फस के उन्होंने लोक-परलोक की) इज्जत गवा ली होती है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य कई (धार्मिक) भेष करके दिन-रात (जगह-जगह) भ्रमण करते फिरते हैं (उनको अपने इस त्याग का अहंकार हो जाता है। उनका यह) अहंकार का रोग दूर नहीं होता। (और। जो पंडित आदि लोग वेद-शास्त्र आदि) पढ़-पढ़ के (फिर अपने आप में) मिल के बहस करते हैं चर्चा करते हैं उन्होंने भी माया के मोह के कारण (आत्मिक जीवन से अपनी) होश गवा ली होती है। 3। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ते हैं। वे सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेते हैं। (परमात्मा के) नाम में जुड़े रहने के कारण उनको (लोक-परलोक की) इज्जत मिल जाती है। हे नानक ! जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा का नाम आ बसा। उन्होंने सदा-स्थिर प्रभू के दर पर आदर कमा लिया। 4। 4। 14।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों के अंदर से (और ज्यादा माया जोड़ने की) लालसा दूर नहीं होती। माया के प्यार में वे सही जीवन राह से टूटे रहते हैं। नदी की तरह उनका पेट (माया से) कभी नहीं भरता। तृष्णा की आग उन्हें जलाती रहती है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रस में भीगे रहते हैं। उनके अंदर सदा आनंद बना रहता है। (माया के मोह के कारण मनुष्य के) मन में मेर-तेर टिकी रहती है। पर जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है। उनकी मेर-तेर दूर हो जाती है। परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पी के वह (माया की तरफ से सदा) तृप्त रहते हैं। 1। रहाउ। पर।हे भाई ! (जीवों के भी क्या वश।) जिस (परमात्मा) ने जगत रचा है वह परमात्मा स्वयं ही सब जीवों को पिछली की कमाई अनुसार माया की दौड़-भाग में लगाए रखता है। जिस प्रभू ने माया का मोह बनाया है। वह स्वयं ही (जीवों को) माया के मोह में जोड़े रखता है। 2। हे भाई ! (माया के मोह के बारे में) उस परमात्मा को कुछ तभी कहा जा सकता है अगर वह हमसे बाहर का हो (बेगाना हो)। हे प्रभू ! सारे जीव आपके में ही लीन हैं (जैसे दरिया की लहरें दरिया में)। हे भाई ! जिस मनुष्य ने आत्मिक जीवन की असल सूझ को विचारा है। उसकी जिंद प्रभू की ज्योति में जुड़ी रहती है। 3। हे भाई ! वह परमात्मा सदा कायम रहने वाला है। सदा ही अस्तित्व वाला है। यह सारा जगत भी सदा अस्तित्व वाला है (क्योंकि इसमें परमात्मा ही सब जगह व्यापक है)। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शी है। उसको उसने परमात्मा के नाम में जोड़ के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया है। 4। 5। 15।
भैरउ महला 3 ॥ कलि महि प्रेत जिन॑ी रामु न पछाता सतजुगि परम हंस बीचारी ॥ दुआपुरि त्रेतै माणस वरतहि विरलै हउमै मारी ॥1॥ कलि महि राम नामि वडिआई ॥ जुगि जुगि गुरमुखि एको जाता विणु नावै मुकति न पाई ॥1॥ रहाउ ॥ हिरदै नामु लखै जनु साचा गुरमुखि मंनि वसाई ॥ आपि तरे सगले कुल तारे जिनी राम नामि लिव लाई ॥2॥ मेरा प्रभु है गुण का दाता अवगण सबदि जलाए ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! कलियुग में प्रेत (सिर्फ वही) हैं। जिन्होंने परमात्मा को (अपने दिल में बसता) नहीं पहचाना। सतियुग में सबसे उच्च जीवन वाले वही हैं। जो आत्मिक जीवन की सूझ वाले हो गए (सारे लोग सतियुग में भी परमहंस नहीं)। द्वापर में त्रेते में भी (सतियुग और कलियुग जैसे ही) मनुष्य बसते हैं । (तब भी) किसी विरले ने ही (अपने अंदर से) अहंकार को दूर किया। 1। हे भाई ! (युग चाहे कोई भी हो) हरेक युग में गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य ने (ही) परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाली है। (किसी भी युग में) परमात्मा के नाम के बिना किसी ने भी विकारों से मुक्ति प्राप्त नहीं की। (इस तरह) कलियुग में भी परमात्मा के नाम में जुड़ के ही (लोक-परलोक का) आदर मिलता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम (अपने अंदर बसता) समझ लेता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (हरी-नाम को अपने) मन में बसा लेता है। (वह मनुष्य संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। हे भाई ! जिन भी मनुष्यों ने परमात्मा के नाम में लगन बनाई। वह स्वयं संसार-समुंद्र से पार लांघ गए। उन्होंने अपनी सारी कुले भी पार लंघा लीं। 2। हे भाई ! मेरा परमात्मा गुरू बख्शने वाला है। वह (जीव को गुरू के) शबद में (जोड़ के उसके सारे) अवगुण जला देता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य को (शबद की लगन लगा के उसके) मन में (अपना नाम) बसाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।