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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1130 · भैरों

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अंग
1130
भैरों
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  1. गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥
  2. दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥
  3. मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥
  4. दुख विचि जंमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥

गुरु अमर दास जी · शबद · राग भैरों

गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥

अंग 1129 से चला आ रहा अंश

गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥
राम नामु रवि रहिआ तिहु लोइ ॥3॥
कलिजुग महि हरि जीउ एकु होर रुति न काई ॥
नानक गुरमुखि हिरदै राम नामु लेहु जमाई ॥4॥10॥

हिन्दी अर्थ: आत्मिक जीवन की सूझ देने वाला सुरमा जिस मनुष्य को गुरू से मिल गया। उसको सारे जगत में परमात्मा का नाम ही व्यापक दिखाई देता है। 3। (शास्त्रों के अनुसार भी) कलियुग में सिर्फ हरी-नाम सिमरन की ही ऋतु है। किसी और कर्म-काण्ड के करने का मौसम नहीं। (इसलिए) हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर अपने दिल में परमात्मा के नाम का बीज बो लो। 4। 10।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग भैरों

दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥

भैरउ महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥
मरि मरि जंमहि ठउर न पावहि बिरथा जनमु गवाई ॥1॥
मेरे प्रीतम करि किरपा देहु बुझाई ॥
हउमै रोगी जगतु उपाइआ बिनु सबदै रोगु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
सिंम्रिति सासत्र पड़हि मुनि केते बिनु सबदै सुरति न पाई ॥
त्रै गुण सभे रोगि विआपे ममता सुरति गवाई ॥2॥
इकि आपे काढि लए प्रभि आपे गुर सेवा प्रभि लाए ॥
हरि का नामु निधानो पाइआ सुखु वसिआ मनि आइ ॥3॥
चउथी पदवी गुरमुखि वरतहि तिन निज घरि वासा पाइआ ॥
पूरै सतिगुरि किरपा कीनी विचहु आपु गवाइआ ॥4॥
एकसु की सिरि कार एक जिनि ब्रहमा बिसनु रुद्रु उपाइआ ॥
नानक निहचलु साचा एको ना ओहु मरै न जाइआ ॥5॥1॥11॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य भेदभाव के आत्मिक रोग में जकड़े हुए हैं। माया के लालच की आग में बहुत जलते हैं (इस तरह ही अपना कीमती) जनम व्यर्थ गवा के पैदा होने-मरने के चक्करों में पड़े रहते हैं। इस चक्कर में से उनको मुक्ति नहीं मिली। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर। (मुझे आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श। हे प्रभू ! अहंकार ने सारे जगत को (आत्मिक तौर पर) रोगी बना रखा है। यह रोग गुरू के शबद के बिना दूर नहीं हो सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! अनेकों मुनि जन स्मृतियाँ पढ़ते हैं शास्त्र भी पढ़ते हैं। पर गुरू के शबद के बिना आत्मिक जीवन की सूझ किसी को प्राप्त नहीं होती। सारे ही त्रै-गुणी जीव अहंकार के रोग में फंसे पड़े हैं। ममता ने उनकी होश भुला रखी है। 2। पर। हे भाई ! कई ऐसे (भाग्यशाली) हैं जिन्हें प्रभू ने स्वयं ही (ममता में से) बचा रखा है। प्रभू ने उनको गुरू की सेवा में लगा रखा है। उन्होंने परमात्मा का नाम-खजाना पा लिया है। (इस वास्ते उनके) मन में आत्मिक आनंद आ बसा है। 3। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर के आत्मिक मण्डल में रह के जगत से कार-व्यवहार बनाए रखते हैं। वह सदा प्रभू-चरणों में टिके रहते हैं। पूरे गुरू ने उन पर मेहर की हुई है। (इस वास्ते उन्होंने अपने) अंदर से स्वै भाव दूर कर लिया है। 4। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश।) जिस परमात्मा ने ब्रहमा विष्णू शिव (जैसे बड़े-बड़े देवता) पैदा किए। उसका ही हुकम हरेक जीव के ऊपर चल रहा है। हे नानक ! सदा कायम रहने वाला सदा अटल रहने वाला एक परमात्मा ही है। वह ना कभी मरता है ना पैदा होता है। 5। 1। 11।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग भैरों

मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥

भैरउ महला 3 ॥
मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥
गुरमुखि बूझहि रोगु गवावहि गुर सबदी वीचारा ॥1॥
हरि जीउ सतसंगति मेलाइ ॥
नानक तिस नो देइ वडिआई जो राम नामि चितु लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
ममता कालि सभि रोगि विआपे तिन जम की है सिरि कारा ॥
गुरमुखि प्राणी जमु नेड़ि न आवै जिन हरि राखिआ उरि धारा ॥2॥
जिन हरि का नामु न गुरमुखि जाता से जग महि काहे आइआ ॥
गुर की सेवा कदे न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥3॥
नानक से पूरे वडभागी सतिगुर सेवा लाए ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि गुरबाणी सुखु पाए ॥4॥2॥12॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा मेर-तेर के रोग में फंसा रहता है। (मन का मुरीद) सारा जगत ही इस रोग का शिकार हुआ रहता है। पर। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (सही जीवन-जुगति को) समझ लेते हैं। गुरू के शबद की बरकति से विचार करके वह (यह) रोग (अपने अंदर से) दूर कर लेते हैं। 1। हे प्रभू जी ! (मुझे) साध-संगति का मेल मिला। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य (साध-संगति में मिल के) परमात्मा के नाम में (अपना) चित्त जोड़ता है (परमात्मा) उसको (लोक-परलोक की) इज्जत बख्शता है। 1। रहाउ। हे भाई ! ममता में फसे हुए सारे जीव आत्मिक मौत में फसें रहते हैं। उनके सिर पर (जैसे) जमराज का हुकम चल रहा है। पर गुरू के सन्मुख रहने वाले जिन मनुष्यों ने परमात्मा (की याद) को अपने हृदय में बसा रखा है। जमराज उनके नजदीक नहीं फटकता। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डाली। उनका जगत में आना व्यर्थ चला जाता है। जिन्होंने कभी भी गुरू की सेवा नहीं की। उन्होंने जीवन बेकार ही गवा लिया। 3। हे नानक ! वह मनुष्य (गुणों के) समूचे (बर्तन) हैं। भाग्यशाली हैं। जिनको (परमात्मा ने) गुरू की सेवा में जोड़ दिया है। वह मनुष्य (परमात्मा से) जो कुछ माँगते हैं वही प्राप्त कर लेते हैं। हे भाई ! जो भी मनुष्य गुरू की बाणी का आसरा लेता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। 4। 2। 12।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग भैरों

दुख विचि जंमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥

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भैरउ महला 3 ॥
दुख विचि जंमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥
गरभ जोनी विचि कदे न निकलै बिसटा माहि समाइ ॥1॥
ध्रिगु ध्रिगु मनमुखि जनमु गवाइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी हरि का नामु न भाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का सबदु सभि रोग गवाए जिस नो हरि जीउ लाए ॥

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य दुख में पैदा होता है दुख में मारता है दुख में ही (सारी उम्र) कार्र-व्यवहार करता रहता है। वह सदा जनम-मरन के चक्करों में पड़ा रहता है। (जब तक वह मन का मुरीद है तब तक) कभी भी वह (इस चक्कर में से) निकल नहीं सकता (क्योंकि वह) सदा विकारों की गंदगी में जुड़ा रहता है। 1। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपना जीवन गवा लेता है। उसको (लोक-परलोक में) धिक्कारें ही पड़ती हैं (उसने सारी उम्र) ना पूरे गुरू का आसरा लिया और ना ही परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगा। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू का शबद सारे रोग दूर कर देता है। (पर गुरू-शबद में वही जुड़ता है) जिसको परमात्मा (शबद की लगन) लगाता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1130 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।