Lulla Family

अंग 1130

अंग
1130
राग भैरों
राग: भैरों · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गिआन अंजनु सतिगुर ते होइ ॥
राम नामु रवि रहिआ तिहु लोइ ॥3॥
कलिजुग महि हरि जीउ एकु होर रुति न काई ॥
नानक गुरमुखि हिरदै राम नामु लेहु जमाई ॥4॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आत्मिक जीवन की सूझ देने वाला सुरमा जिस मनुष्य को गुरू से मिल गया। उसको सारे जगत में परमात्मा का नाम ही व्यापक दिखाई देता है। 3। (शास्त्रों के अनुसार भी) कलियुग में सिर्फ हरी-नाम सिमरन की ही ऋतु है। किसी और कर्म-काण्ड के करने का मौसम नहीं। (इसलिए) हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर अपने दिल में परमात्मा के नाम का बीज बो लो। 4। 10।
भैरउ महला 3 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुबिधा मनमुख रोगि विआपे त्रिसना जलहि अधिकाई ॥
मरि मरि जंमहि ठउर न पावहि बिरथा जनमु गवाई ॥1॥
मेरे प्रीतम करि किरपा देहु बुझाई ॥
हउमै रोगी जगतु उपाइआ बिनु सबदै रोगु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
सिंम्रिति सासत्र पड़हि मुनि केते बिनु सबदै सुरति न पाई ॥
त्रै गुण सभे रोगि विआपे ममता सुरति गवाई ॥2॥
इकि आपे काढि लए प्रभि आपे गुर सेवा प्रभि लाए ॥
हरि का नामु निधानो पाइआ सुखु वसिआ मनि आइ ॥3॥
चउथी पदवी गुरमुखि वरतहि तिन निज घरि वासा पाइआ ॥
पूरै सतिगुरि किरपा कीनी विचहु आपु गवाइआ ॥4॥
एकसु की सिरि कार एक जिनि ब्रहमा बिसनु रुद्रु उपाइआ ॥
नानक निहचलु साचा एको ना ओहु मरै न जाइआ ॥5॥1॥11॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य भेदभाव के आत्मिक रोग में जकड़े हुए हैं। माया के लालच की आग में बहुत जलते हैं (इस तरह ही अपना कीमती) जनम व्यर्थ गवा के पैदा होने-मरने के चक्करों में पड़े रहते हैं। इस चक्कर में से उनको मुक्ति नहीं मिली। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर। (मुझे आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श। हे प्रभू ! अहंकार ने सारे जगत को (आत्मिक तौर पर) रोगी बना रखा है। यह रोग गुरू के शबद के बिना दूर नहीं हो सकता। 1। रहाउ। हे भाई ! अनेकों मुनि जन स्मृतियाँ पढ़ते हैं शास्त्र भी पढ़ते हैं। पर गुरू के शबद के बिना आत्मिक जीवन की सूझ किसी को प्राप्त नहीं होती। सारे ही त्रै-गुणी जीव अहंकार के रोग में फंसे पड़े हैं। ममता ने उनकी होश भुला रखी है। 2। पर। हे भाई ! कई ऐसे (भाग्यशाली) हैं जिन्हें प्रभू ने स्वयं ही (ममता में से) बचा रखा है। प्रभू ने उनको गुरू की सेवा में लगा रखा है। उन्होंने परमात्मा का नाम-खजाना पा लिया है। (इस वास्ते उनके) मन में आत्मिक आनंद आ बसा है। 3। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य तीनों गुणों के प्रभाव से ऊपर के आत्मिक मण्डल में रह के जगत से कार-व्यवहार बनाए रखते हैं। वह सदा प्रभू-चरणों में टिके रहते हैं। पूरे गुरू ने उन पर मेहर की हुई है। (इस वास्ते उन्होंने अपने) अंदर से स्वै भाव दूर कर लिया है। 4। (पर। हे भाई ! जीवों के भी क्या वश।) जिस परमात्मा ने ब्रहमा विष्णू शिव (जैसे बड़े-बड़े देवता) पैदा किए। उसका ही हुकम हरेक जीव के ऊपर चल रहा है। हे नानक ! सदा कायम रहने वाला सदा अटल रहने वाला एक परमात्मा ही है। वह ना कभी मरता है ना पैदा होता है। 5। 1। 11।
भैरउ महला 3 ॥
मनमुखि दुबिधा सदा है रोगी रोगी सगल संसारा ॥
गुरमुखि बूझहि रोगु गवावहि गुर सबदी वीचारा ॥1॥
हरि जीउ सतसंगति मेलाइ ॥
नानक तिस नो देइ वडिआई जो राम नामि चितु लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
ममता कालि सभि रोगि विआपे तिन जम की है सिरि कारा ॥
गुरमुखि प्राणी जमु नेड़ि न आवै जिन हरि राखिआ उरि धारा ॥2॥
जिन हरि का नामु न गुरमुखि जाता से जग महि काहे आइआ ॥
गुर की सेवा कदे न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥3॥
नानक से पूरे वडभागी सतिगुर सेवा लाए ॥
जो इछहि सोई फलु पावहि गुरबाणी सुखु पाए ॥4॥2॥12॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा मेर-तेर के रोग में फंसा रहता है। (मन का मुरीद) सारा जगत ही इस रोग का शिकार हुआ रहता है। पर। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (सही जीवन-जुगति को) समझ लेते हैं। गुरू के शबद की बरकति से विचार करके वह (यह) रोग (अपने अंदर से) दूर कर लेते हैं। 1। हे प्रभू जी ! (मुझे) साध-संगति का मेल मिला। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य (साध-संगति में मिल के) परमात्मा के नाम में (अपना) चित्त जोड़ता है (परमात्मा) उसको (लोक-परलोक की) इज्जत बख्शता है। 1। रहाउ। हे भाई ! ममता में फसे हुए सारे जीव आत्मिक मौत में फसें रहते हैं। उनके सिर पर (जैसे) जमराज का हुकम चल रहा है। पर गुरू के सन्मुख रहने वाले जिन मनुष्यों ने परमात्मा (की याद) को अपने हृदय में बसा रखा है। जमराज उनके नजदीक नहीं फटकता। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डाली। उनका जगत में आना व्यर्थ चला जाता है। जिन्होंने कभी भी गुरू की सेवा नहीं की। उन्होंने जीवन बेकार ही गवा लिया। 3। हे नानक ! वह मनुष्य (गुणों के) समूचे (बर्तन) हैं। भाग्यशाली हैं। जिनको (परमात्मा ने) गुरू की सेवा में जोड़ दिया है। वह मनुष्य (परमात्मा से) जो कुछ माँगते हैं वही प्राप्त कर लेते हैं। हे भाई ! जो भी मनुष्य गुरू की बाणी का आसरा लेता है। वह आत्मिक आनंद पाता है। 4। 2। 12।
भैरउ महला 3 ॥
दुख विचि जंमै दुखि मरै दुख विचि कार कमाइ ॥
गरभ जोनी विचि कदे न निकलै बिसटा माहि समाइ ॥1॥
ध्रिगु ध्रिगु मनमुखि जनमु गवाइआ ॥
पूरे गुर की सेव न कीनी हरि का नामु न भाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का सबदु सभि रोग गवाए जिस नो हरि जीउ लाए ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य दुख में पैदा होता है दुख में मारता है दुख में ही (सारी उम्र) कार्र-व्यवहार करता रहता है। वह सदा जनम-मरन के चक्करों में पड़ा रहता है। (जब तक वह मन का मुरीद है तब तक) कभी भी वह (इस चक्कर में से) निकल नहीं सकता (क्योंकि वह) सदा विकारों की गंदगी में जुड़ा रहता है। 1। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपना जीवन गवा लेता है। उसको (लोक-परलोक में) धिक्कारें ही पड़ती हैं (उसने सारी उम्र) ना पूरे गुरू का आसरा लिया और ना ही परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगा। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू का शबद सारे रोग दूर कर देता है। (पर गुरू-शबद में वही जुड़ता है) जिसको परमात्मा (शबद की लगन) लगाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आत्मिक जीवन की सूझ देने वाला सुरमा जिस मनुष्य को गुरू से मिल गया।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।